Bhoot bangla-भूत बंगला
06-29-2017, 11:16 AM,
#21
RE: Bhoot bangla-भूत बंगला
काफ़ी देर तक एक दूसरे की चूचियो से खेलने के बाद देवयानी अपना मुँह रुक्मणी की चूचियो से हटाकर धीरे धीरे नीचे जाने लगी. अपनी बहेन का पेट चूमते हुए वो नीचे उसकी सलवार के नाडे तक पहुँची और एक हाथ से वो जैसे ही उसे खोलने को हुई, रुक्मणी ने उसका हाथ पकड़कर उसको रोक दिया.

"फिर आती है मेरी बारी" कहते हुए रुक्मणी उठी और देवयानी को नीचे धकेल कर खुद उसके उपेर चढ़ गयी.
"सबसे पहले मैं उसके होंठ चूस्ति हूँ" कहते हुए रुक्मणी देवयानी के उपेर झुक गयी और उसके होंठ चूमने लगी.
"फिर धीरे से नीचे आती हूँ" कहते हुए वो देवयानी के गले तक पहुँची और उसके गले पर अपनी जीभ फिराने लगी.

"फिर उसके निपल्स" रुक्मणी ने कहा और देवयानी के दोनो निपल्स चूसने लगी.
"दबा ना" देवयानी ने आह भरते हुए कहा तो रुक्मणी मुस्कुरा उठी
"उसकी छाती पर दबाने के लिए कुच्छ नही है. तेरे तो इतने बड़े बड़े हैं पर उसके निपल्स ऐसे नही है इसलिए ज़्यादा देर नही लगती. फिर मैं नीचे को सरक्ति हूँ" कहते हुए रुक्मणी देवयानी के पेट को चूमते हुए नीचे तक पहुँच और उसकी नंगी चूत तक पहुँच कर सर उठाकर हस्ने लगी.

"फिर मैं यहाँ कुच्छ चूस्ति हूँ जो तेरे पास नही है" रुक्मणी ने कहा
"इंतज़ाम हो जाएगा" कहते हुए देवयानी ने अपना एक हाथ अपनी चूत पर उल्टा रखा और अपनी बीच की उंगली उपेर को उठा दी, जैसे उसकी टाँगो के बीच कोई लंड खड़ा हो.

उसकी इस हरकत पर रुक्मणी मुस्कुराइ और उसकी उंगली को ऐसे चूसने लगी जैसे मेरा लंड चूस रही हो. मेरा खुद का लंड तो कबका खड़ा हो चुका था और मेरा दिल कर रहा था के कपड़े उतारकर अभी इसी वक़्त दोनो बहनो के बीच पहुँच जाऊं पर खामोशी से खड़ा सब देखता रहा.

थोड़ी देर तक देवयानी के उंगली चूसने के बाद रुक्मणी सीधी हुई और अपनी सलवार उतारने लगी.

"और फिर वक़्त आता है फाइनल आक्षन का" कहते हुए रुक्मणी ने अपनी सलवार और पॅंटी एक साथ उतार कर फेंक दिए. दोनो बहने पूरी तरह से नंगी हो चुकी थी और मैं उन दोनो के जिस्म पर नज़र दौड़ाने लगा. दोनो में ज़्यादा फरक नही था. बिल्कुल एक जैसे जिस्म थे सिवाय इसके के देवयानी की गांद रुक्मणी से ज़्यादा भारी थी.

रुक्मणी के अपने एक हाथ पर थोड़ा सा थूक लेकर अपनी चूत पर लगाया और दोनो टांगे नीचे लेटी हुई देवयानी के दोनो तरफ रखकर उसके उपेर खड़ी हो गयी. एक आखरी बार अपनी चूत को सहला कर वो नीचे हुई और धीरे से अपनी बहेन की उंगली अपनी चूत में लेकर उसके उपेर बैठ गयी. चूत के अंदर जैसे ही उंगली दाखिल हुई, दोनो बहनो ने एक लंबी आह भरी.

मैं उन दोनो का ये खेल देखने में इतना बिज़ी हो चुका था के मुझे वक़्त का अंदाज़ा ही नही रहा. जब मेरी जेब में रखा हुआ मेरा सेल वाइब्रट हुआ तो मैं जैसे एक नींद से जागा. दिल ही दिल में उपेरवाले का शुक्र अदा करते हुए के फोन साइलेंट मोड पर था इसलिए बजा नही, मैं जल्दी से घर के बाहर आया.

कॉल मिश्रा की थी.
"क्या कर रहा है तू आजकल?" उसने फोन उठाते ही सवाल किया
"क्या मतलब" मैने पुचछा
"कहाँ इन्वॉल्व्ड है?" मिश्रा ने कहा
"कहीं नही, क्यूँ?" मुझे उसकी बात समझ नही आ रही थी पर इतना शक हो गया था के कुच्छ गड़बड़ है.

"हमें 2 डेड बॉडीस मिली हैं, लावारिस. एक तो कोई टॅक्सी ड्राइवर है और दूसरे की पहचान होनी बाकी है" कहकर वो चुप हो गया
"हाँ तो?" मैने पुचछा
"देख इशान मुझसे कुच्छ च्छुपाना मत" मिश्रा बोला "सबसे पहले तो तेरा उस सोनी मर्डर केस में नाम आना, फिर अचानक तेरा उस अदिति मर्डर केस में किताब लिखने के बहाने गाड़े मुर्दे उखाड़ना, उस दिन शाम को तुझे बेहोशी की हालत में हॉस्पिटल में लाया जाना, ये सब कुच्छ पहले से ही काफ़ी अजीब था और अब ये?"

"ये क्या?" मुझे अब भी कुच्छ समझ नही आया
"जो 2 डेड बॉडीस मिली हैं, उनके पास ही मर्डर वेपन भी पड़ा हुआ था. एक लंबा सा चाकू. उसी चाकू से दोनो को बड़ी बेरहमी से मारा गया है" मिश्रा बोला
"ह्म्‍म्म्म" मैं बस इतना ही कह सका
"अभी अभी लॅब से रिपोर्ट मेरे पास आई है. इत्तेफ़ाक़ से वो डेड बॉडीस भी और मर्डर वेपन भी उसी हॉस्पिटल में ले जाया गया था जहाँ उस रात तू बेहोश होकर पहुँचा था" उसने कहा
"ओके" मैने हामी भरी

"रिपोर्ट की मुताबिक उस चाकू पर तीन लोगों का खून के सॅंपल्स मिले हैं. एक तो उस टॅक्सी ड्राइवर के, दूसरे उस आदमी के जिसकी आइडेंटिटी अब भी हमें पता नही और जानता है तीसरे आदमी के खून के सॅंपल्स किससे मॅच करते हैं?"
"किससे?" मैने पुचछा
"तुझसे" मिश्रा बोला "उस चाकू पर तेरा भी खून था"

उसकी ये बात सुनकर एक पल के लिए चुप्पी च्छा गयी. ना वो कुच्छ बोला ना ही मैं.
"तुझे मेरा ब्लड सॅंपल कहाँ से मिला?" मैने खामोशी तोड़ी
"मुझे नही मिला. पर उस रात उस डॉक्टर ने तेरा चेक अप करते हुए ब्लड सॅंपल लिया था जो उनके हॉस्पिटल रेकॉर्ड्स में अब भी है. टॅक्सी ड्राइवर की पहचान तो हो गयी थी पर उस दूसरे आदमी की पहचान के लिए जब उसने अपने रेकॉर्ड्स पर नज़र डाली तो कंप्यूटर ने उस आदमी का तो कोई मॅचिंग सॅंपल नही दिखाया पर उस तीसरे खून के निशान को तेरे ब्लड सॅंपल से मॅच कर दिया" कहकर वो फिर खामोश हो गया.

अगले एक मिनिट तक फिर फोन पर खामोशी रही.
"ठीक है यार मैने कुच्छ च्छुपाया है तुझसे" मैने फिर से खामोशी तोड़ी
"गुड. बोलता रह मैं सुन रहा हूँ" मिश्रा ने कहा
"यहाँ नही. तू पोलीस स्टेशन में ही रुक मैं वहीं आ रहा हूँ" कहते हुए मैने फोन रख दिया

अपनी गाड़ी निकालकर मैं पोलीस स्टेशन की तरफ चला. मैं समझ गया था के अब वक़्त आ गया है के मैं मिश्रा से कुच्छ भी ना च्छूपाऊँ वरना खुद ही फस जाऊँगा. जो बात मेरी समझ में नही आ रही थी के उन दो आदमियों को किसने मार दिया. ये तो सॉफ था के ये वही 2 लोग थे जिन्होने उस रात मुझपर हमला किया था और क्यूंकी उसी चाकू से उन्होने मुझपर भी वार किया था इसलिए मेरा ब्लड अब भी थोड़ा बहुत चाकू पर लगा रह गया था. पर बड़ा सवाल ये था के जो मुझे मारने आए थे उनको किसने मार दिया?

पर फिर जवाब भी मैने खुद ही दे दिया. गुंडे थे साले, कोई भी मार सकता है ऐसे लोगों को. इनके दुश्मनो की कमी थोड़े ही ना होती है.

लड़की की कहानी जारी है ..................................




"हमें यहाँ से जल्दी निकलना होगा" वो लड़का कह रहा था
"मतलब?" उसने पुचछा
"मतलब के यहाँ से भागना पड़ेगा" लड़के ने कहा तो वो हैरत से उसको देखने लगी
"कहाँ" उसने पुचछा
"शहेर और कहाँ" लड़के ना कहा
"पर चाचा चाची" उसका इशारा अपने घरवालो की तरफ था
"भागना तो पड़ेगा वरना तुम और मैं साथ नही रह सकते" लड़के ने कहा.

उसकी बात सुनकर वो सोच में पड़ गयी. ये सच था के वो खुद भी वहाँ से भाग जाना चाहती थी. अपने चाचा चाची से वो बहुत नफ़रत करती थी पर आज तक कभी सच में भाग जाने के बारे में उसने सोचा नही था.
"और तुम्हारे घरवाले" उसने पुचछा
"उनकी फिकर मत करो. उनका होना ना होना एक ही बात है" लड़के ना कहा
"पर शहेर जाके करेंगे क्या?" लड़की ने पुचछा
"मैं कोई नौकरी कर लूँगा. मैने सुना है के शहेर में काम ढूँढना मुश्किल नही है" लड़का बोला
"और मैं क्या करूँगी?" उसने अपना शक जताया
"तुम्हें कोई काम आता है?" लड़के ने पुचछा तो उसने इनकार में सर हिला दिया
उसके बाद दोनो थोड़ी देर चुप बैठे रहे.

"अगर तुम यहाँ रहती तो क्या करती?" लड़के ने थोड़ी देर बाद पुचछा
"पढ़ाई करती और फिर गाती" उसने जवाब दिया
"तुम गाती हो?" लड़के ने पुचछा
"हाँ और मैं जानती हूँ के मैं बहुत अच्छा गाती हूँ" वो भरोसे के साथ बोली
फिर थोड़ी देर तक खामोशी बनी रही.

"तुम क्यूँ भागना चाहते हो?" उसने लड़के से पुचछा
"यहाँ कुच्छ ठीक नही है" लड़के ने कहा "और तुमने देखा ही था के वो लड़के भी कैसे मुझे परेशान करते हैं"
"कौन थे वो लोग" उसने पुचछा
"गाओं के ही हैं. साले जब भी मिलते हैं मुझे परेशान करते हैं" लड़के ने ज़मीन की तरफ देखते हुए कहा

"तुम अपने माँ बाप को क्यूँ नही बता देते?" उसने पुचछा
"मेरे माँ बाप इस दुनिया में नही है" लड़ने ने वैसे ही ज़मीन की ओर देखते हुए कहा
फिर कुच्छ पल के लिए खामोशी च्छा गयी.
"मेरे भी" थोड़ी देर बाद वो बोली
"जानता हूँ" लड़के ने कहा

क्रमशः.............................
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Reply
06-29-2017, 11:16 AM,
#22
RE: Bhoot bangla-भूत बंगला
भूत बंगला पार्ट--14

गतान्क से आगे....................
लड़की की कहानी जारी है...................................
बाहर रात का अंधेरे फेल चुका था. वो घर में चिराग की रोशनी में पढ़ रही थी. चाचा घर पर नही था और चाची कमरे के एक कोने में ही अपनी साडी का परदा बनाए उसके पिछे बैठी नहा रही थी. उसके चाचा चाची का बेटा सो चुका था.

"सुन" पर्दे के पिछे से आवाज़ आई तो उसने गर्दन उठाकर देखा.
"जी?" वो बोली
"इधर आ" चाची ने उसको बुलाया
इस बात को सुनकर वो थोडा परेशान हो गयी. चाची पर्दे के पिछे नहा रही थी ये बात वो जानती थी, फिर उसको वहाँ क्यूँ बुला रही थी?

"इधर आ ना" चाची की आवाज़ दोबारा आई और इस बार आवाज़ में गुस्सा था. वो फ़ौरन उठकर पर्दे के पास जा खड़ी हुई.
"जी?" उसने ज़मीन की तरफ देखते हुए पुचछा
"ज़रा कमर पर साबुन लगा दे" चाची ने कहा और इसके साथ ही बीचे में सारी का बना परदा हट गया. उसे उम्मीद थी के चाची नंगी बैठी होगी पर ऐसा हुआ नही. वो अपना पेटिकोट पहने बैठी थी और छाती पर टवल डाल रखा था. हाँ कमर ज़रूर पूरी नंगी थी.

काँपते हुए हाथों से उसने साबुन उठाया और चाची की कमर पर लगाने लगी. ये बात सच थी के अपनी चाची को नंगा देखने में उसको बहुत मज़ा आता था पर इस तरह नही. वो तो जब चोरी छुपे अपनी चाची की चूचिया देखती या कभी उनकी सारी उपेर होने पर उनकी टांगे देखती तो उसको मज़ा आता था. पर इस तरह नही के जब चाची खुद ही उसको अपनी कमर पर साबुन लगाने को कह रही थी.
चुपचाप उसने पूरा साबुन चाची की नंगी कमर पर लगाया. वो उस वक़्त एक अजीब से हालत से गुज़र रही थी. एक तरफ तो दिल में डर, सामने चाची की नज़र और सबसे ज़्यादा ये के जिस नंगे जिस्म को वो दूर से देख कर ही उसके शरीर में कुच्छ होता था आज वो नंगा जिस्म उसके सामने बैठा था और उसको उस जिस्म को च्छुने का मौका मिल रहा था.

जब पूरी कमर पर साबुन लग गया तो वो रुक गयी..
"दोनो हाथों से रगड़ दे ज़रा" चाची ने कहा
उनकी बात सुनते ही उसका दिल जैसे खुशी से झूम उठा. उनकी नंगी कमर पर हाथ फेरने में उसको बहुत मज़ा आ रहा था और उसका दिल कर रहा था के थोड़ी देर और साबुन लगाए और जब चाची ने खुद ही उसको कमर रगड़ने को कहा तो उसको जैसे मुँह माँगी मुराद मिल गयी.

वो दिल ही दिल में खुश होती चाची की कमर पर हाथ फेरने लगी. अपने हिसाब से वो कमर रगड़ नही रही थी बल्कि उस नंगी कमर को महसूस कर रही थी. उसके हाथ गले के पास से होते हुए कमर के निचले हिस्से तक जाते. उसकी कमर नीचे ज़मीन पर बैठी चाची की भारी गांद पर थी और दिल ही दिल में वो सोच रही थी के काश चाची इस वक़्त पूरी नंगी बैठी होती.

ऐसे ही हाथ फिराते हुए एक बार उसका हाथ नीचे आने के बजाय फिसलकर साइड में चला गया और अपने हाथ पर जो महसूस हुआ उससे उसका खुद का जिस्म जैसे काँप उठा. उसे एहसास हुआ के अभी एक पल के लिए उसने अपनी चाची की नंगी चूची को साइड से हाथ लगाया था, जिन्हें वो च्छूप च्छूप कर देखा करती थी. वही छातिया जो उसकी चाची के झुकने पर नीचे को लटक जाती थी और ब्लाउस के अंदर झाँकते हुए बस उसके दिल में यही ख्याल आता था के उसकी अपनी ऐसी क्यूँ नही है?

फिर ना जाने उसके दिल में कहाँ से हिम्मत आई और कमर रगड़ते हुए हाथ नीचे को लाने की जगह वो साइड में ले जाने लगी. ऐसा करने से बार बार उसका हाथ जाकर चाची की छाती पर लगता और उसको अजीब सा मज़ा आता. चाची का डर उस वक़्त उसके दिल से जाने कहाँ गायब हो गया था. वो तो बस ये चाहती थी के उन 2 फूली हुई चूचिया को अपने हाथ में पकड़ ले. अब उसका हाथ ग़लती से चूचियो पर नही टकरा रहा था. अब तो वो जानकार हर बार जब भी साइड में ले जाती, चाची की छाती को ज़रूर साइड से च्छू लेती.

थोड़ी देर यूँ ही वक़्त गुज़र गया. ना वो कुच्छ बोली और उसे हैरत हुई के ना ही चाची ने उसको मना किया. वो बस एक ही जगह पर हाथ फेरे जा रही थी पर चाची भी चुप बैठी हुई थी. एक बार जब उसका हाथ साइड में गया था सच में ही फिसल गया और पूरा आगे को हो गया. चाची ने सामने के और एक टवल हल्का सा पकड़ रखा था जिससे उनकी छातिया ढाकी हुई थी. जब उसका हाथ फिसला, तो वो सीधा साइड से होता हुआ टवल के अंदर घुस गया और चाची की आधी छाती उसके हाथ में आ गयी.

उस वक़्त उसको जाने क्या हुआ के उसने अपना हाथ पिछे नही किया और ना ही वहाँ से हटाया. उसका हाथ वहीं रुक गया और वो दिल ही दिल में इस बात का यकीन करने लगी के सच में चाची की छाती उसके हाथ में है. पर ये सपना कुच्छ पल ही चला. अगले ही पल चाची सीधी हुई और उसके मुँह पर एक थप्पड़ लगा दिया.
"क्या हो रहा है ये?" चाची ने कहा तो वो जैसे अपने ख्वाब से बाहर आई और फिर खामोशी से अपनी किताब खोल कर बैठ गयी.

उसकी हिम्मत नही हुई के फिर चाची की तरफ नज़र उठाकर देखे. पर इस बात का उसको एहसास था के चाची अब भी वहीं बैठी थी. वो खुद भी ये बात जानती थी के अब किसी भी पल चाची उठेंगी और उसको मार पड़ेगी. और फिर जब चाचा आएँगे तो फिर से मार पड़ेगी और चाची की शिकायत पर तो आज बहुत ज़्यादा मार पड़ने वाली है. ये सोच सोचकर ही उसकी जान सूख रही थी.

कमरे में हलचल होने पर उसने टेढ़ी नज़र से देखा तो महसूस किया के चाची अपनी जगह से उठ रही थी. वो फिर किताब की तरफ देखने लगी और इंतेज़ार करने लगी उस पल का जब चाची उठकर उसको मारने वाली थी पर ऐसा कुच्छ नही हुआ. चाची उसकी तरफ आई ज़रूर पर उसको मारने के बजाय आकर उसके पास बैठ गयी.

"क्या हो रहा था वो" चाची ने पुचछा तो डर के मारे उसने अपनी आँखें बंद कर ली.
जब वो कुच्छ नही बोली तो चाची ने सवाल फिर से दोहराया.
"क्या हो रहा था वो सब? मैने तो सिर्फ़ कमर पर साबुन लगाने को कहा था ना?"

इस बार भी वो कुच्छ नही बोली. आँखें और ज़ोर से बंद कर ली बस. तभी अपने हाथ पर उसको चाची का हाथ महसूस हुआ. चाची ने उसका हाथ पकड़ कर उपेर उठाया और अपने उपेर रख लिया. वो आँखें बंद किए बैठी थी इसलिए समझ नही आया के हाथ चाची ने कहाँ रखा पर इतना वो जानती थी के हाथ चाची के नंगे जिस्म पर है. कुच्छ पल ऐसे ही गुज़रे तो जैसे उसके दिमाग़ की बत्तियाँ जल गयी और उसकी धड़कन वहीं थम गयी. चाची ने उसका हाथ उठाकर अपनी नंगी छाती पर रखा हुआ था.

"यहाँ हाथ लगाना था?" चाची ने पुचछा
इस बार भी वो कुच्छ नही बोली
चाची ने उसका दूसरा हाथ भी उठाकर अपनी छाती पर रख लिया. वो अब भी आँखें बंद किए बैठी थी. जिन चूचियो को पकड़ना उसके लिए एक सपना था आज वो उसके हाथ में थी पर वो चाह कर भी उसका मज़ा नही ले पा रही थी. उसके दिल में उल्टा एक डर सा बैठ रहा था.

"दबा इनको" चाची ने उसको कहा
उसने कोई हरकत नही की.
"पहले तो हाथ सीधा यहीं पहुँच रहे थे. अब क्या हुआ? दबा ना" चाची ने गुस्से में कहा तो उसके हाथ फ़ौरन हरकत में आ गयी. वो धीरे धीरे दोनो चूचिया दबाने लगी.

"ज़ोर से दबा" चाची ने कहा तो उसके हाथ का दबाव बढ़ गया. वो ज़ोर ज़ोर से चूचिया दबाने लगी. उसके छ्होटे हाथों में वो बड़ी बड़ी चूचिया पूरी नही आ रही थी पर जो भी हिस्सा आ रहा था वो बहुत मुलायम था.
"गरम कर दिया तूने मुझे" चाची ने कहा

फिर उसको कुच्छ हरकत महसूस हुई पर उसकी हिम्मत नही पड़ी के आँखें खोलकर देखे. चाची की छातिया उसके हाथ से निकल गयी और उसने महसूस किया के चाची उससे थोड़ा दूर हो गयी. अभी वो सोच ही रही थी के फिर से चाची का हाथ उसको अपने हाथ पर महसूस हुआ और एक बहुत से नर्म सा कुच्छ उसके मुँह पर दबा दिया गया.

"चूस इसे" चाची ने कहा तो उसको एहसास हुआ के उसके चेहरे पर दबा हुआ वो हिस्सा उसकी चाची की एक चूची थी जो इतनी बड़ी थी के उसका पूरा मुँह उसमें दब गया था. फिर एक सख़्त सा हिस्सा उसको अपने होंठों पर महसूस हुआ.
"मुँह खोल ना" चाची ने कहा तो उसने अपना मुँह खोला और वो सख़्त सा हिस्सा उसके मुँह में आ गया.

"चूस इसको" चाची ने कहा
तब उसे पता चला के उसके मुँह में वो सख़्त सा हिस्सा जिसे वो चूस रही थी वो उसकी चाची की चूची पर वो काला हिस्सा था जो उपेर को उठा हुआ था.

"ज़ोर से चूस" चाची ने कहा तो वो और ज़ोर से उस हिस्से को चूसने लगी. फिर थोड़ी देर बाद चूची उसके मुँह से हटी और फिर अगले ही पल फिर से उसके मुँह में वो दे दिया गया. वो समझ गयी के ये चाची की दूसरी चूची है क्यूंकी पहली वाली उसके चूसने से गीली हो गयी थी और ये वाली सूखी थी जिसको वो अब अपने मुँह से गीला कर रही थी.

"हे भगवान. मुझे पता होता के इतना मज़ा आएगा तो मैं पहले ही करवा लेती" चाची कह रही थी और वो उनकी चूची को चूसे जा रही थी. फिर चाची ने उसका एक हाथ अपने हाथ में ले लिया और अपने पेट पर रख दिया. जब उसने खुद कोई हरकत नही की तो चाची ने फिर उसका हाथ पकड़ा और नीचे सरकाते हुए अपनी टाँगो के बीच ले गयी.

इस पूरे वक़्त उसकी आँखें बंद थी और उसका दिल डर के मारे ज़ोर से धड़क रहा था. वो अपनी चाची को नंगी देखना चाहती थी पर इस वक़्त उसकी हिम्मत नही हो रही थी के आँखें खोले. जिस नंगे जिस्म को वो हमेशा च्छुना चाहती थी आज वो उसके हाथों में था पर उसको बिल्कुल मज़ा नही आ रहा था.

उसको अपने हाथ में कुच्छ बाल महसूस हुए और उन बालों के बीच एक बहुत नरम सा हिस्सा महसूस हुआ जो बहुत गीला था और गरम था.
"क्या यहीं पर चाची हाथ लगाती थी?" उसने दिल ही दिल में सोचा

चाची ने खुद उसका हाथ पकड़ कर अपनी टाँगो के बीचे हिलाना शुरू कर दिया था. वो उसके हाथ से अपनी टाँगो के बीच के उस हिस्से को घिस रही थी और आआहह आआहह की आवाज़ें निकल रही थी. जिस तरह चाची का जिस्म काँप रहा था उससे वो अंदाज़ा लगा सकती थी के हाथ रगड़ने के साथ खुद चाची अपनी कमर भी हिला रही थी.

"गरम कर दिया तूने मुझे. अब ठंडी भी कर" चाची ने कहा
तभी उसके मुँह से चूची हट गयी और उसका हाथ भी चाची के टाँगो के बीच से निकल गया. उसको चाची के हाथ अपने कंधो पर महसूस हुए और फिर एक झटके से उसको आगे को खींचा गया. कुच्छ ही पल में वो चाची के उपेर लेटी हुई थी. आँखें अब भी बंद थी. फिर चाची ने उसका सर पकड़ा और नीचे को धकेलने लगी. सर पर ज़ोर पड़ने से वो नीचे को सरकी और अगले ही पल अपने होंठ पर उसको कुच्छ बाल महसूस हुए. वो समझ गयी के जहाँ थोड़ी देर पहले चाची की टाँगो के बीच उसका हाथ था, अब उसी जगह पर उसके होंठ हैं.

"जीभ निकालकर चाट इसे" उसको चाची की आवाज़ सुनाई दी.
उसको समझ नही आ रहा था के चाची उसे क्या करने को कह रही हैं. वो अभी सोच ही रही थी के अचानक कमरे का दरवाज़ा ज़ोर से खुलने की आवाज़ आई और उसके साथी ही चाची की ज़ोर से आवाज़ आई.
"क्या हो रहा है ये?"

कमरे में कुच्छ पल के लिए खामोशी च्छा गयी. वो जानती थी के चाची उठकर बैठ चुकी हैं पर वो अब भी उनके सामने वैसे ही उल्टी अपने पेट के बल पड़ी हुई थी और वो बाल अब भी उसको अपने मुँह पर महसूस हो रहे थे.
"चिल्ला क्यूँ रहा है?" फिर चाची की आवाज़ आई "तेरे लिए भी इंतज़ाम है"
इसके साथ ही उसको चाची का हाथ अपनी गांद पर महसूस हुआ. चाची उसकी गांद को हाथ से सहला रही थी.

"तुझे भी तो ये चाहिए ना" चाची ने कहा "आअज़ा"
इससे पहले की वो कुच्छ समझ पाती, उसको चाचा के हाथ अपनी कमर पर महसूस हुए और उसकी वो घिसी हुई पुरानी पेंट खींच कर नीचे कर दी गयी. उसके गांद अब खुल चुकी थी. उसके बाद 2 चीज़ें उसको एक साथ महसूस हुई. चाची ने उसका सर पकड़ कर अपने टाँगो के बीच घुसा लिया और उसे फिर चाटने को कहा और चाचा का लंड उसको ठीक अपनी गांद पर महसूस हुआ.

वो समझ गयी के चाचा क्या करने वाले हैं. उस दिन का दर्द वो अब भी भूली नही थी और वो याद करने से ही उसका जिस्म सिहर उठा. इस पूरे वक़्त में उसने अब जाकर अपनी आँखें फ़ौरन खोली और छितक कर सीधी खड़ी हो गयी. और यहीं जैसे ग़ज़ब हो गया.

चाचा अपनी दोनो टांगे उसके दोनो तरफ करके उसकी गांद के ठीक उपेर बैठा था. और जैसे ही वो ज़ोर लगाकर उठी, वो लड़खड़ा गया और पिछे को गिरा. उस एक ही कमरे में खाना भी बनाया जाता था इसलिए खाना बनाने का समान भी वहीं कोने में रखा हुआ था. उसका चाचा ठीक बर्तनो के उपेर जाकर गिरा. और फिर कुच्छ पल की खामोशी के बाद चाची के चीखने पर जब उसने चाचा की तरफ देखा तो उसकी खुद की भी चीख निकल गयी. सब्ज़ी काटने वाला चाकू उसके चाचा की गर्दन के पिच्छले हिस्से में घुसकर आगे से बाहर निकल आया था. पास ही केरोसिन की कॅन रखी हुई थी जो शायद खुली थी. चाचा के गिरने से वो कॅन भी गिर गयी थी जिससे केरोसिन निकलकर पूरी झोपड़ी में फेल रहा था.

"ये क्या किया तूने?" चाची ने उसको देखते हुए कहा और फिर अपने चाचा की तरफ देखा जो बिल्कुल भी नही हिल रहा था.
"मैं तुझे ज़िंदा नही छ्चोड़ूँगी" कहते हुए चाची उसकी तरफ बढ़ी. वो अब भी नंगी थी पर पेटिकोट उसने पूरी तरह नही उतारा था. एक पावं अब भी पेटिकोट में ही था इसलिए जैसे ही वो आगे बढ़ी, पेटिकोट भी आगे को सरका और नीचे ज़मीन पर लगा लॅंप टेढ़ा होकर गिर पड़ा. ठीक उस जगह पर जहाँ केरोसिन बिखरा पड़ा था.

पीछे क्या हुआ उसने नही देखा. वो चाची से बचने के लिए झोपड़ी से बाहर भागी. उसको डर था के शायद चाची उसके पिछे आएगी इसलिए बाहर निकलते ही उसने झोपड़ी का दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया और पागलों की तरह भागने लगी. थोड़ी दूर जाकर जब चीख की आवाज़ सुनाई दी तो वो पलटी और उसके पावं वहीं जम गये.

झोपड़ी आग की लपटो में थी. पूरी झोपड़ी ऐसे जल रही थी जैसे घास के ढेर में आग लगा दी गयी हो और उसके बीच आ रही थी उसकी चाची और उनके बेटे के चिल्लाने की आवाज़. वो जानती थी के अंदर चाची जल रही है पर क्या करे ये समझ नही आया. झोपड़ी गाओं से थोड़ा बाहर थी और आस पास और कोई नही रहता था जिसको वो मदद के लिए बुला सके.

"यहाँ क्या कर रही हो तुम?" उसको अपने पिछे से आवाज़ आई "चलो यहाँ से"
पीछे उसका दोस्त वो लड़का खड़ा था
"चलो भागो" लड़के ने कहा और खुद आगे आगे भागने लगा. वो नही जानती थी के उस वक़्त उससे मिलने क्यूँ आया था पर उस वक़्त उसका वहाँ होना उसे बहुत अच्छा लगा. वो खुद भी उसके पिछे पिछे भागने लगी. झोपड़ी अब भी जल रही थी और चाची और उनके बेटे के चीखने की आवाज़ उसको अब भी आ रही थी.

अब इशान की कहानी जारी है.....................................



"तूने मुझे ये पहले क्यूँ नही बताया?" मिश्रा ने पुचछा
मैं पोलीस स्टेशन में उसके सामने बैठा था. रेप केस में मुझे धमकी, रश्मि का मुझसे मिलना, फिर वो मुझपर हमला, सब बता दिया था मैने उसको सिवाय एक बात के. उस गाने की आवाज़ को मैं उससे च्छूपा गया था.

"क्या बताता यार" मैने कहा "इस तरह की ढमाकियाँ मुझे पहले भी एक 2 बार मिल चुकी हैं और मैने उनमें से किसी का चेहरा नही देखा था. बस टॅक्सी से निकलता एक हाथ देखा था मैने"
"मैं उसकी बात नही कर रहा हूँ" मिश्रा ने जवाब दिया "ये रश्मि सोनी के बारे में पहले क्यूँ नही कहा तूने"
"क्यूंकी उसी रात मुझपर हमला हुआ था" मैं बोला "और फिर मेरे दिमाग़ से उतर गयी ये बात"

थोड़ी देर तक हम चुप बैठे रहे
"तूने मारा है उन 2 गुणडो को?" मिश्रा ने टेडी आँख से मेरी तरफ देखा "देख मारा है तो बता दे. मुझे कोई फरक नही पड़ता उनके मरने से. बदमाश थे साले, अच्छुआ ही हुआ के मर गये पर मुझे बता दे ताकि मैं केस को रफ़ा दफ़ा कर दूं"
"तेरा दिमाग़ खराब है?" मैने कहा "अबे मैने आज तक मक्खी नही मारी होगी कभी, आदमी की तो बात ही दूर है. और दूसरा अगर मैं उनको मारना भी चाहता तो कहाँ ढूंढता फिरता शहेर में? सिर्फ़ एक हाथ देखा था मैने"
"गाड़ी की नंबर प्लेट भी तो देखी होगी" मिश्रा मुस्कुराया

"कोशिश की थी पर चाकू का वार खाकर जब तक मैं संभलता तब तक वो टॅक्सी दूर जा चुकी थी और उपेर से रात का अंधेरा" मैने जवाब दिया
"ह्म्‍म्म्म" मिश्रा ने लंबी सी हामी भरी और दोनो हाथ सर के उपेर करके कुर्सी पे आराम से पसर गया "क्या लगता है?"
"किस बारे में?" मैने पुचछा

"मेरे पड़ोसी की बेटी के बारे में. 19 साल की है, क्या लगता है, चुदी होगी अब तक" वो चिड़कर बोला "आबे साले जिस बारे में बात कर रहे हैं उस बारे में. तुझपर हुए हमले के बारे में. क्या लगता है किसने किया होगा या करवाया होगा?"
मैं हस पड़ा

"देख तेरे पड़ोसी की बेटी चुदी है के नही ये तो मैं उससे अकेले में मिलने के बाद ही बता सकता हूँ और बाकी रहा मुझपर हुए हमले का किस्सा, तो पता नही यार. और अगर उस रेप केस के सिलसिले में हुआ है तो भी हम कुच्छ साबित नही कर सकते"
"अगर तू चाहता है तो मैं इन्वेस्टिगेशन कर सकता हूँ और ये केस भी खुला रख सकता हूँ" मिश्रा ने कहा

"किस बिना पर इन्वेस्टिगेट करेगा यार?" मैं बोला "एक हाथ के बिना पर जो मैने देखा था और जिसका मालिक तू कह रहा है के मर चुका है?"
"बात तो सही है. तो ठीक है फिर मैं इस केस को रफ़ा दफ़ा करके बंद करता हूँ. दो बदमास क्यूँ मर गये इस बात का पता लगाने का टाइम नही है मेरे पास" मिश्रा ने कहा और अपने सामने रखे फिर की फाइल बंद कर दी

"तेरी किताब कहाँ तक पहुँची?" मिश्रा ने थोड़ी देर बाद पुचछा.
"शुरू भी नही की अब तक" अब करूँगा
"आज का क्या प्लान है?" उसने घड़ी देखते हुए कहा
"अभी तो घर ही जा रहा हूँ" मैने उठते हुए कहा "शाम को मेरी उस सेक्रेटरी के घर जाना है. डिन्नर के लिए बुलाया है"

पोलीस स्टेशन से निकल कर मैं घर जाने के बजाय अकॅडमी ऑफ म्यूज़िक की तरफ चल पड़ा.
उस जगह का नाम सुनकर ऐसा लगता था के कोई बहुत बड़ा इन्स्टी-त्यूट होगा जहाँ म्यूज़िक से रिलेटेड बहुत कुच्छ होता होगा. मेरी उम्मीद के खिलाफ, वो एक छ्होटा सा स्कूल निकला जहाँ पर बच्चो को म्यूज़िक सिखाया जाता था. मुझे प्रिन्सिपल का ऑफीस ढूँढने में कोई तकलीफ़ नही हुई.

"क्या मदद कर सकती हूँ मैं आपकी?" वो कोई 50 साल की औरत थी. चेहरा देखने से ही लगता था के वो ज़िंदगी से थॅकी हुई एक आम औरत है जो यहाँ बस अपनी ज़िंदगी ही गुज़ार रही है.

"देखिए मैं एक राइटर हूँ" मैने झूठ बोला "आपने बंगलो 13 के बारे में तो सुना ही होगा? आजकल न्यूसपेपर्स में काफ़ी लिखा जा रहा है उस बारे में."
"वो जहाँ कुच्छ महीने पहले खून हुआ था?" उसने मुझे पुचछा तो मैने हाँ में सर हिला दिया
"हाँ बिल्कुल सुना है" वो चश्मा उतारते हुए बोली

"मैं उसी बंगलो पर एक किताब लिख रहा हूँ के कैसे वो एक घर इस शहेर में ख़ौफ्फ की वजह बना हुआ है" मैने फिर झूठ बोला
उसने मेरी बात समझने के अंदाज़ में सर हिलाया

"उस घर में ये दूसरा खून है. पहले भी एक खून हो चुका है वहाँ कई साल पहले" मैने कहा
मुझे उम्मीद थी के ये बात सुनकर वो शायद खुद ही समझ जाएगी के मैं किस बारे में बात कर रहा हूँ. पर उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा तो मैं समझ गया के ना तो उसको उसे उस खून के बारे में पता है ना अदिति के बारे में.
"जी हां" मैने कहा "उस बंगलो में एक और खून हुआ था और जिसका खून हुआ था वो आपके स्कूल में ही एक टीचर थी"

इस बात को सुनकर वो ऐसे उच्छली जैसे मैने कुर्सी के नीचे कोई बॉम्ब फोड़ दिया हो.
"इस स्कूल की टीचर? कौन?" सवाल करने मैं आया था पर उल्टा हो रहा था. सवाल वो कर रही थी और जवाब मैं दे रहा था

"अदिति नाम था उसका. और मैं चाह रहा था के उसके बारे में कुच्छ और इन्फर्मेशन मुझे यहाँ स्कूल से मिल सके" मैने अपने आने की वजह बताई.
वो सोच में पद गयी और फिर काफ़ी देर तक सोचने के बाद आख़िर उसकी ज़ुबान खुली.

"देखिए मैं यहाँ नयी हूँ. कोई 2 साल पहले ही आई थी. इस स्कूल के पिच्छले स्टाफ के बारे में मैं कुच्छ नही जानती पर एक औरत है जो शायद जानती हो" उसने कहा.
"कौन?" मैने फ़ौरन सवाल किया
"इस स्कूल की पुरानी प्रिन्सिपल. उन्होने अपनी पूरी ज़िंदगी यहीं गुज़री है. पहले यहाँ म्यूज़िक सिखाती थी और फिर खुद ही यहाँ की प्रिंकल बनकर रिटाइर हो गयी. आप उनसे बात करके देख लीजिए"

"मैं उनका नाम और अड्रेस जान सकता हूँ?" मैने पेन और पेपर उठाया.
"आइ'एम नोट शुवर" वो मुझे नाम और अड्रेस देते हुए थोड़ा झिझक रही थी
"देखिए मैं यहाँ एक इनस्पेक्टर मिश्रा के कहने पर आया हूँ. तो आप बेफिकर रहिए. पोलिसेवालो तक को पता है के मैं क्या कर रहा हूँ. अगर आप चाहें तो मैं आपकी बात करा देता हूँ उनसे"
मेरी बात सुनकर वो मुस्कुरा उठी.
"उसकी ज़रूरत नही पड़ेगी. आप अड्रेस लिख लीजिए"

क्रमशः.....................................
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06-29-2017, 11:16 AM,
#23
RE: Bhoot bangla-भूत बंगला
भूत बंगला पार्ट--15

गतान्क से आगे...............

इशान की कहानी जारी है ...............................

शाम के वक़्त मैं घर पहुँचा तो बुरी तरह से थक चुका था.
"कैसा रहा ऑफीस?" मुझे देखते ही रुक्मणी बोली. मैं उसको घर से ये बताके निकला था के ऑफीस जा रहा हूँ.
"ठीक ही था?" मैं सोफा पर बैठते हुए बोला
"कुच्छ खाओगे?" उसने मुझसे पुचछा तो मैने इनकार में सर हिला दिया
"आज किसी के यहाँ डिन्नर पर जाना है. रात को शायद आने में देर भी हो जाए"

उन दोनो को देख कर मुझे बड़ा अजीब लग रहा था. आज दोपहर उन दोनो को जिस हालत में देखा था वो देखकर मैं काफ़ी शॉक में था. इस वक़्त भी उन दोनो की तरफ नज़र डालते ही मुझे सिर्फ़ उनके नंगे जिस्म ही ध्यान आ रहे थे. ऐसा नही था के मैने पहली बार उनको नंगा देखा था. रुक्मणी को तो मैं चोद भी चुका था और देवयानी को भी पहले एक बार नंगी देख चुका था पर 2 बहनो को एक साथ बिस्तर पर जिस्म गरम करते हुए देखने के बाद उनकी तरफ देखने का मेरा नज़रिया ही बदल गया था.

"क्या सोच रहे हो?" रुक्मणी किचन की तरफ गयी तो सामने बैठते देवयानी ने मुझसे पुचछा
"कुच्छ नही. मैं नाहकर आता हूँ" कहते हुए मैं उठा
मैं नाहकर अपने कमरे की तरफ बढ़ा ही था के पिछे से देवयानी ने आवाज़ दी. मैं रुक कर उसकी तरफ पलटा. वो धीरे से मेरे करीब आई और वैसे ही धीरे से मुझे बोली
"जो आज दोपहर को देखा, वो पसंद आया?"

मेरे चेहरे के भाव फ़ौरन बदलते चले गये और मैने आँखें फाडे उसकी तरफ देखा. मुझे उस हालत में देखकर वो हस पड़ी और वैसे ही हस्ती हुई किचन की तरफ चली गयी.

अपने कमरे में शवर के नीचे खड़ा मैं नहा कम और सोच ज़्यादा रहा था. वो कम्बख़्त औरत जानती थी के मैं उनको देख रहा हूँ पर फिर भी बिस्तर पर रुक्मणी के साथ ऐसे लगी रही जैसे कुच्छ हुआ ही ना हो. और क्या रुक्मणी कोई भी पता था के मैं देख चुका हूँ? शायद नही क्यूंकी वो काफ़ी सीधी है और अगर वो जानती के मैं उसे उसकी बहेन के साथ देख चुका हूँ तो ऐसे नॉर्मली बिहेव ना कर पाती. और सबसे बड़ी बात के देवयानी क्या चाहती थी? सिर्फ़ मेरे साथ बिस्तर पर आने के लिए उसके ये सब करने की ज़रूरत नही थी? ये काम तो बड़ा आसान था. ज़ाहिर था के उसके दिमाग़ में कुच्छ और चल रहा था. क्या, ये शायद वो खुद ही जानती थी.
मैं प्रिया के यहाँ जाने के लिए तैय्यार हो गया.

अकॅडमी ऑफ म्यूज़िक से आते हुए मुझे एक पल के लिए ख्याल आया था के पुरानी प्रिन्सिपल के यहाँ होता चलूं पर फिर ये इरादा बदल दिया था मैने क्यूंकी प्रिया के यहाँ डिन्नर के लिए लेट हो जाता. मिश्रा के कहने पर मैं पहले तो इस बात के लिए भी मान गया था के उन 2 गुणडो की लाश भी एक बार देख लूँ पर बाद में फोन करके मैने मना कर दिया था क्यूंकी उन लाशों को देखने जाने की वजह नही थी कोई मेरे पास? और सबसे बड़ा सवाल ये था के मुझपर हमला किया क्यूँ था उन्होने और क्या उनकी मौत की वजह भी उनका मुझपर हमला करना ही था?

मैं अपनी सोच में खोया हुआ था के मेरे सामने रखे फोन की घंटी बजी.

फोन रश्मि का था. उसने बताया के वो मुंबई पहुँच चुकी है और उनके मुंबई वाले घर से वो खंजर गायब है. यानी के बंगलो में मिला वो रिब्बन उसी खंजर का था और मर्डर वेपन भी सोनी का अपना खंजर ही था.

मैं प्रिया के घर पहुँचा तो उसके घर पे उसके सिवा कोई नही था जबकि उसने मुझे कहा था के उसके माँ बाप घर पर ही होंगे.
"तेरे मम्मी डॅडी कहाँ हैं?" मैने उससे पुचछा

"घर पर नही हैं" वो मुस्कुराते हुए बोली
"पर तूने तो कहा था के....." मैने घर में एक निगाह चारों और दौड़ाई
"झूठ कहा था मैने" वो मेरा हाथ पकड़कर डाइनिंग टेबल की और ले जाते हुए बोली "क्यूंकी अगर मैं कहती के घर पर कोई नही होगा तो आप आने से पहले 56 सवाल पुछ्ते मुझसे"

उसकी बात सुनकर मैं सिर्फ़ मुस्कुरा कर रह गया. उसने उस वक़्त एक ब्लू कलर की शर्ट और ब्लॅक जीन्स पहेन रखी थी और हमेशा की तरह उसकी चूचिया और गांद जैसे कपड़े फाड़ कर बाहर को निकल रहे थे.

"तो खाने में क्या है?"मैं दोनो हाथ आपस में रगड़ता हुआ बोला
"काफ़ी कुच्छ है" प्रिया बोली "पर उससे पहले कुच्छ और"

"क्या?" मैने पुचछा तो वो मुस्कुराते हुए घर के अंदर चली गयी. थोड़ी देर बाद वो लौटी तो उसके हाथ में एक केक था जिसपर एक कॅंडल जली हुई थी.
"हॅपी बिर्थडे बॉस" कहते हुए वो मेरे करीब आई

मुझे याद नही था के आखरी बार मैने कब अपना बिर्थडे सेलेब्रेट किया था, या कभी सेलेब्रेट किया भी था या नही. सेलेब्रेट करना तो दूर, मुझे तो ये भी याद नही था के मेरे बिर्थडे पर किसी ने कभी मुझे विश भी किया हो. किसी और का तो क्या कहना, मुझे तो खुद भी अपना बिर्थडे याद नही रहता था. पर जब वो कॅंडल लेकर आई तो मुझे याद आया के आज मेरे बिर्थडे था.

"तुझे कैसे....." मैं कभी हैरत से उसको देखता तो कभी केक की तरफ.
"आपके यहाँ काम करती हूँ. आपके बारे में सब पता है मुझे" वो हस्ते हुए बोली और केक लाकर टेबल पर मेरे सामने रख दिया.

उसके हाथ में एक चाकू था जो मैने केक काटने के लिए उठा लिया.

"चलिए अब जल्दी से केक काटिए फिर हम लोग कहीं बाहर जा रहे हैं" वो बोली
"बाहर?" मैने पुचछा
"हाँ और नही तो क्या?" वो भी वैसे ही हस्ते हुए बोली "बिर्थडे की पार्टी नही देंगे क्या? आपको क्या लगा था के मैं आपको अपने घर का राशन खिलाऊंगी?"
उसकी बात पर हम दोनो ही ज़ोर से हस्ने लगे.

"ठीक है पार्टी भी दे दूँगा पर पहले ये तो बता के मेरा गिफ्ट कहाँ है?" मैने पुचछा
"गिफ्ट भी मिल जाएगा" कहते हुए वो थोड़ा सा शर्मा गयी. उसके सावले चेहरे पर एक शरम की लाली सी छा गयी और नज़र उसने केक की तरफ घुमा ली. मुझे समझ नही आया क्यूँ.

"चलिए अब केक काटिए"
उसने कहा तो मैने केक काटा और अपनी ज़िंदगी में पहली बार मैने अपना बिर्थडे सेलेब्रेट किया. मैने केक काटा तो वो उसके क्लॅप करते हुए हप्पी बिर्थडे का वही पुराना गाना सा गया और फिर हम दोनो ने थोड़ा थोड़ा केक एक दूसरे को खिलाया.

"चलिए अब निकलते हैं यहाँ से. मेरे मम्मी डॅडी आने वाले होंगे. वो आ गये तो रात को बाहर नही जाने देंगे" वो बोली
"ऐसे नही. पहले मेरा गिफ्ट" मैने कहा
गिफ्ट की बात पर वो फिर से शर्मा सी गयी.
"बाद में....." उसने कहा तो मैने फ़ौरन इनकार कर दिया
"अभी इसी वक़्त. मुझे भी तो पता चले के मुझे इतनी शॉपिंग करने के बदले में तू खुद मेरे लिए क्या लाई है"

उसके बाद कुच्छ देर तक वो खामोश खड़ी रही जैसे डिसाइड कर रही हो के गिफ्ट दे या ना दे. चेहरे पर शरम अब भी थी.
"क्या सोचने लगी. जल्दी कर फिर चलते हैं. ऐसे ही उठा ला मैं कार में बैठकर खोल लूँगा" मैने कहा तो उसने एक लंबी साँस ली
"चेहरा दूसरी तरफ कीजिए. मैं लाती हूँ. सर्प्राइज़ है" उसने कहा तो मैने अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया

वो थोड़ा सा पिछे को हटी जिससे मुझे लगा के वो शायद दूसरे कमरे में गयी पर फिर अपने पिछे हुई आहट से मुझे एहसास हुआ के वो वहीं मेरे पिछे ही खड़ी थी.
"पलटू?" मैने पुचछा
"2 मिनट...." मेरे पिछे से आवाज़ आई.
थोड़ी देर तक मैं फिर ऐसे ही खड़ा रहा और अपने पिछे होती आहट को सुनता रहा.
"अब पलटीए" पीछे से आवाज़ आई तो मैं फिर उसकी तरफ पलटा और मेरी आँखें खुली रह गयी.

उसने अपनी शर्ट के सारे बटन खोल दिए थे. शर्ट दोनो तरफ ढीली पड़ी हुई थी और उसका सामने का हिस्सा सॉफ नज़र आ रहा था. नीली शर्ट के अंदर उसका हल्का सावला जिस्म और उन दो बड़ी बड़ी चूचियो को ढके हुए ब्लॅक कलर की एक ब्रा जिसमें दोनो चूचिया मुश्किल से समा पा रही थी.
कुच्छ देर तक ना उसने कुच्छ कहा और ना मैने. वो वहीं अपनी जगह पर खड़ी रही और मैं भी वहीं अपनी जगह पर खड़ा रहा. मुझे पलट जाना चाहिए था पर ऐसा हुआ नही. मेरी नज़र उसकी चूचियो पर गढ़ी रह गयी. वो मेरी ओर देख रही थी और मैं उसकी ब्रा में बंद बड़ी बड़ी च्चातियों को ऐसे देख रहा था जैसे कई साल के प्यासे को शरबत का ग्लास दिख गया हो.

"प्रिया ये......." काफ़ी देर तक घूर्ने के बाद आख़िर मैं बोला पर नज़र अब भी उसकी चूचियो से नही हटाई.
"मैने काफ़ी सोचा" वो नज़र नीची किए शरमाती हुई बोली "फिर ख्याल आया के आपको जो चीज़ सबसे ज़्यादा मुझ में पसंद है वो ये है तो मैने सोचा के आपके बिर्थडे पर आपको यही गिफ्ट दूँ. जो चीज़ आप चोरी से देखते हैं, वो आज आपके सामने हैं"

कहकर वो चुप हो गयी. ना उसके बाद वो कुच्छ बोली और ना ही मैं. बस खामोश एक दूसरे से थोड़ी दूर खड़े रहे. मेरी पेंट में मेरे लंड पूरे ज़ोर पर आ चुका था.
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06-29-2017, 11:16 AM,
#24
RE: Bhoot bangla-भूत बंगला
कुच्छ देर बाद आख़िर मेरे जिस्म में हरकत हुई और मैने एक कदम उसकी तरफ बढ़ाया. मुझे अपनी तरफ आता देख वो भी एक कदम पिछे को हो गयी. उसकी इस हरकत पर मैं फिर अपनी जगह पर ही रुक गया और कुच्छ देर बाद फिर उसकी तरफ बढ़ा. इस बार वो हिली नही. वहीं खड़ी रही और मैं उसके करीब पहुँच गया.

मैं इससे पहले भी नंगी चूचिया देख चुका था पर उस वक़्त उसको ऐसे देख रहा था जैसे इससे पहले कभी किसी औरत को नंगी देखा ही ना हो. मेरा गला हल्का सूखने लगा था. उसके करीब पहुँचकर मुझे समझ नही आया के क्या करूँ. हमारे जिस्म एक दूसरे से तकरीबन लगे हुए खड़े थे. उसका चेहरा मेरे चेहरे के सामने था. वो जाने क्या देख रही थी पर मेरी नज़र उसके क्लीवेज पर ही थी. जब मैने कोई हरकत नही की और ऐसे ही खड़ा रहा तो उसने खुद ही मेरा हाथ पकड़ा और उठाकर अपने क्लीवेज पर रख दिया. तब पहली बार मैने नज़र उसके चेहरे पर डाली और हमारी नज़र एक दूसरे से मिली.

"आज मैं आपको नही रोकूंगी सर" उसने कहा और फिर नज़र नीचे झुका ली.

मेरा हाथ उसके क्लीवेज पर था और उसके नीचे मुझे उसकी नरम छातिया महसूस हो रही थी जो उसकी साँस के साथ उपेर नीचे हो रही थी. उसकी धड़कन मुझे अपने हाथ पर महसूस हो रही थी जो काफ़ी तेज़ थी जिससे मुझे अंदाज़ा था के वो खुद भी काफ़ी नर्वस थी, शायद पहले बार किसी मर्द के सामने ऐसी आधी नंगी हालत में खड़ी थी इसलिए. मेरा हाथ उसकी चूचियो को सहलाता हुआ उसके नंगे पेट पर आया और उसकी नंगे जिस्म को सहलाने लगा.

"सर्ररर" मेरा पूरा हाथ अपने खुले हुए जिस्म पर महसूस होते ही वो सिहर उठी.

कुच्छ देर उसका पेट सहलाने के बाद मेरा वो हाथ फिर से उसकी चूचियो पर आ गया और ब्रा के उपेर से मैं उन्हें दबाने लगा. इस पूरे वक़्त हम दोनो एक दूसरे के बिल्कुल सामने खड़े थे और इससे ज़्यादा कुच्छ नही कर रहे थे. बस मेरा एक हाथ उसकी चूचिया दबा रहा था.

मैं एक कदम आगे को बढ़ा और पेंट के अंदर खड़ा हुआ मेरा लंड उसकी टाँग पर जा लगा और वो एक पल था जब मेरे सबर का बाँध टूट गया और अंदर का जानवर जैसे जाग उठा. मैं उससे एकदम लिपट गया. अचानक हुए इस हरकत से उसके कदम अपनी जगह से हीले और खुद को संभालने के लिए वो अपने पिछे दीवार से जा लगी. ये जैसे मेरे लिए और भी अच्छा हो गया. मैं उससे पूरी तरह लिपट गया और पागलों की तरह उसका गला चूमने लगा. अब मेरे दोनो हाथ उसकी चूचियो पर आ चुके थे और बेदर्दी से मसल रहे थे. मैने कभी उसके गले को चूमता तो कभी नीचे उसकी चूचियो को ब्रा के उपेर से चूमता. उसके खुदके हाथ भी मेरा सर और पीठ सहला रहे थे और उसकी गरम हो चुकी सांसो से मुझे इस बात का अंदाज़ा था के वो खुद भी उस वक़्त पूरी गर्मी में थी.

मैं उस वक़्त जैसे दीवाना हो चुका था. हाथ उसकी चूचियो से हटने का नाम ही नही ले रहे थे.

उसका गला चूमते हुए एक बार जब मैं नीचे आया तो एक हाथ उपेर से उसकी ब्रा के अंदर घुसकर उसकी एक चूची ब्रा से बाहर खींच ली. उसका निपल जैसे ही मेरे सामने आया तो मैने फ़ौरन उसको अपने होंठों के बीच दबा लिया.

"आआहह सर" वो बस इतना ही कह सकी और मैं उसके निपल को चूसने लगा. कभी उसका निपल मेरे होंठो के बीच होता, कभी मेरे दाँत के बीच तो कभी मैं उसकी चूची को जितनी हो सके अपने मुँह में लेने की कोशिश करता. एक चूची को जी भरके चूसने के बाद मैं दूसरी भी उसी तरह ब्रा से बाहर निकाली और पहली को हाथ से दबाते हुए दूसरी को चूसना शुरू कर दिया.

मैं उस वक़्त इतना जोश में था के उसको पूरी तरह हासिल करना चाहता था. मेरे दिमाग़ में उस वक़्त बस एक ही ख्याल था के उसकी चूत में अपना लंड घुसाकर उसको पूरी तरह हासिल कर लूँ और इसी कोशिश में मेरा हाथ उसकी चूचियो से हटकर उसकी जीन्स तक आया.

"नही सर" जैसे ही मैने उसकी जीन्स का बटन खोलना चाहा उसने फ़ौरन मेरे हाथ पकड़कर हटा दिए.

मैने उसके दोनो हाथ उसके सर के उपेर उठाकर दीवार के सहर छ्चोड़ दिए और फिर उसकी चूचियो को दबाने और चूसने लगा. जब उसने कोई हरकत नही की तो मेरे हाथ फिर उसकी जीन्स के बटन पर आ पहुचे.

"नही सर प्लीज़" उसने फिर मुझे रोकने की कोशिश की पर इस बार मैं माना नही. उसके हाथ मेरे हाथों को पकड़कर हटाने की कोशिश करते रहे पर मैने जीन्स का बटन खोल ही दिया.

"सर प्लीज़.... मेरे मम्मी डॅडी कभी भी आ सकते हैं" जैसे ही मैने उसकी जीन्स की ज़िप नीचे खींची, उसने पूरी ताक़त से मुझे अपने से दूर धकेल दिया.

मैने गिरता गिरता बचा और उससे कुच्छ कदम दूर हटकर उसकी तरफ देखने लगा.

हम दोनो की साँसे काफ़ी तेज़ चल रही थी और ऐसा लग रहा था जैसे हम दोनो ही मरथोन में भाग कर आए हैं. मैने एक नज़र उसपर डाली. खुली हुई शर्ट, उसके अंदर ब्रा के उपेर से बाहर निकली हुई उसकी भारी छातिया जो उसकी सांसो के साथ उपेर नीचे हो रही थी, उसकी खुली हुई जीन्स जिसने अंदर से उसकी ब्लू कलर की पॅंटी नज़र आ रही थी, ये नज़ारा काफ़ी थी किसी कोई भी उसका रेप कर देने पर मजबूर कर देने के लिए. पर जिस तरह से उसने मुझे अपने आप से दूर धकेला था, उससे पता नही मुझे क्या हुआ के मैने एक नज़र उसपर डाली और अपने बालों में हाथ फिराता घर से बाहर निकल गया.


घर वापिस जाते हुए मेरा जिस्म ऐसे तप रहा था जैसे मुझे बुखार हो गया हो. पेंट में लंड अब भी तना हुआ था. मेरे सर में जैसे हथोदे बज रहे थे. मैने अपने आपको कभी इस हालत में नही देखा था. मैं कभी इस हद तक गरम नही होता था पर प्रिया के नंगे जिस्म में जाने क्या था के मैं हवस में पागल हो रहा था. दिल ही दिल में मैं फ़ैसला कर चुका था के घर पहुँचते ही देवयानी या रुक्मणी जो भी सामने आई, वही चुदेगि और अगर दोनो सामने एक साथ आ गयी तो थ्रीसम होगा, फिर चाहे जिसको जैसा लगे.

अपनी ही धुन में कार चलाता मैं अपनी कॉलोनी में दाखिल हुआ और घर की तरफ जाने लगा. रास्ते में मुझे बंगलो नो 13 नज़र आया और जैसे जैसे मेरी गाड़ी बंगलो के नज़दीक पहुँची, वो गाने की आवाज़ मुझे फिर से सुनाई देने लगी.

वही मधुर गाने की आवाज़.
हल्की सी जैसे कोई बहुत दूर गा रहा हो.
जैसे कोई माँ अपने बच्चे को लोरी सुना रही हो.
शब्द मुझे अब भी समझ नही आ रहे थे.

उस गाने की आवाज़ सुनते ही मेरा सारा एग्ज़ाइट्मेंट ख़तम होता चला गया. मेरा वो जिस्म जो वासना में काँप रहा था ठंडा पड़ गया. दिमाग़ जो घूम रहा था जैसे एक जगह ठहेर गया. एक अजीब सा सुकून मेरी रूह के अंदर तक उतरता चला गया और एक अजीब सा नशा मुझपर छाने लगा.
मेरी गाड़ी की स्पीड गाने की आवाज़ सुनते ही काफ़ी कम हो गयी थी. धीरे धीरे गाड़ी चलाता मैं बंगलो के सामने से जैसे ही निकला, मेरा पावं ब्रेक्स पर पूरे ज़ोर से आ गया और गाड़ी वहीं बंगलो के मैं गेट के सामने रुक गयी.

लोहे के उस बड़े गेट के पिछे वो खड़ी थी. हाथों में गेट की रोड्स को पकड़ा हुआ था जैसे कोई मुजरिम जैल के अंदर जेल की सलाखों को पकड़कर खड़ा होता है.

जिस्म पर कुच्छ पुराने से कपड़े थे. एक घिसी हुई शर्ट और एक फटी हुई पेंट .
मैं अपनी गाड़ी में बैठा उसकी तरफ देखता रहा और वो भी सीधा मेरी ही ओर देख रही थी.
और आज पहली बार मुझे वो गाना कहाँ से आ रहा था पता चला. वो वहीं मेरी नज़रों के सामने खड़ी गा रही थी.
"जनमदिन मुबारक हो इशान" उसने एक पल के लिए गाना बंद किया और मुस्कुराते हुए बोली.


क्रमशः...........................
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06-29-2017, 11:17 AM,
#25
RE: Bhoot bangla-भूत बंगला
भूत बंगला पार्ट-16

गतान्क से आगे..................

लड़की की कहानी जारी है ..............................

वो आँखों में खून लिए कमरे के दरवाज़े के बाहर खड़ी थी. हाथ में एक बहुत बड़ा सा पथर था. उसे अपने दोनो तरफ एक नज़र दौड़ाई. आस पास कोई नही था.

"कौन है?" कमरे का दरवाज़ा खटखटाने पर अंदर से आवाज़ आई. उसने कोई जवाब नही दिया और फिर से दरवाज़ा खटखटाया.
दरवाज़ा एक लड़के ने खोला जो तकरीबन उसके बराबर ही लंबा था पर कद काठी में उससे कहीं ज़्यादा मज़बूत था.

"क्या है?" लड़के ने पुचछा

जवाब में उसका वो हाथ जिसमें पथर था हवा में उठाया और अगले ही पल पथर का वार सीधा लड़के के सर पर पड़ा. उसके सर से खून बह चला और वो लड़खडकर ज़मीन पर गिर पड़ा. लकड़े के गिरने के बाद उसने अपने दोनो तरफ एक नज़र दौड़ाई और अंदर आकर कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया.

इस लड़के से उसकी कोई दुश्मनी नही थी पर इसने उसके दोस्त पर हाथ उठाया था जो उसके बिल्कुल भी गवारा नही था. उस वक़्त तो उसकी समझ में नही आया के क्या करे और बड़ी मुश्किल से अपने दोस्त को खींच कर दूर ले गयी थी ताकि झगड़ा ख़तम हो सके पर दिल ही दिल में उसने सोच लिया था के इसका बदला वो खुद लेगी और ये करने के लिए उसको रात का वक़्त बिल्कुल ठीक लगा.
उस वक़्त कमरे में उस लड़के के सिवा कोई नही था. वो कुच्छ देर तक खड़ी हुई उसके नीचे ज़मीन पर गिरे हुए जिस्म की तरफ देखती रही. उसके सर से खून निकलकर ज़मीन पर बह रहा था. ज़्यादा देर उसको वहाँ छ्चोड़ना ठीक नही था और वो अब उसको ऐसे भी नही छ्चोड़ सकती थी क्यूंकी उसने उसका चेहरा देख लिया था.

उसने कमरे का दरवाज़ा एक बार फिर खोला और बाहर नज़र दौड़ाई. बाहर अब भी सन्नाटा था. उसने उस लड़के के हाथ पकड़ा और खींच कर उसको कमरे से बाहर निकाला. दिल की धड़कन अब उसको खुद भी शोर लग रही थी. लग रहा था के कहीं कोई सुन ना ले और अगर कोई आ गया तो वो फस जाएगी. दुनिया की उसको कोई फिकर नही थी पर डर ये था के अगर उसके दोस्त को पता चला तो वो उसके बारे में जाने क्या सोचेगा.

बहुत ही खामोशी से लड़के के बेहोश जिस्म को खींचती हुई वो तीसरे माले की छत पर ले आई. उसको वो वक़्त अब भी याद था जब उसने गाओं में पहली बार एक लड़के के सर पर तब पथर मारा था जब उन लड़को ने उसके दोस्त की पिटाई की थी और अब भी वो वैसा ही कर रही थी. फरक सिर्फ़ ये था के इस बार वो पथर मारकर वहाँ से भागी नही.

लड़के के बेहोश जिस्म को खींचती हुई वो छत के उस किनारे की तरफ लाई जिसके नीचे कुच्छ कन्स्ट्रक्षन वर्क चल रहा था जिसकी वजह से नीचे बहुत सारे पथर पड़े हुए थे. उसने छत से नीचे एक बार देखा और जब यकीन हो गया के दूर दूर तक कोई नही है, उसने लड़के का जिस्म को तीसरी मंज़िल से नीचे धकेल दिया. जिस्म नीचे पत्थरो में गिरने की एक हल्की सी आवाज़ उसके कानो में आई और फिर पहली की तरह ही सन्नाटा च्छा गया. अंधेरा होने की वजह से वो नीचे देख नही पा रही थी.

पहली के जैसी खामोशी के साथ ही वो सीढ़ियाँ उतरकर फिर नीचे पहुँची और उस जगह पर गयी जहाँ उसने उस लड़के को फेंका था. वो पत्थरो में गिरा पड़ा था और चारों तरफ उसका खून फेला हुआ था. एक नज़र डालने से ही पता चलता था के वो मर चुका है पर उसने फिर भी अपनी तसल्ली के लिए एक बार उसकी साँस और दिल की धड़कन देखी. जब यकीन हो गया के लड़का पूरी तरह मर चुका है तो वो मुस्कुराइ और मुड़कर अपने घर की तरफ चल दी.

*******

"तुम्हें वो लड़का याद है जिसने मुझे थप्पड़ मारा था?" उस लड़के ने पुचछा
वो दोनो आज काफ़ी दिन बाद अकेले में मिल रहे थे. वो प्यार से उसकी गोद में सर रखे लेटा हुआ था.
"हां याद है" वो बोली
"वो मर गया" लड़का उसकी तरफ देखते हुए बोला "घर की छत से कूद कर स्यूयिसाइड कर ली उसने"
"अच्छा हुआ" वो बोली "तुम इस बारे में क्यूँ सोच रहे हो. थके हुए हो ना. सो जाओ चुप चाप"
"तुम गाओ ना" लड़का बोला "तुम गाती हो तो फ़ौरन नींद आ जाती है"
"इतना बुरा गाती हूँ मैं?" वो बनावटी गुस्सा दिखाते हुए बोली "के सुनने वाला बोर होके सो जाए?"
उसकी बात पर वो दोनो ही हस पड़े

इशान की कहानी जारी है............................
कल रात प्रिया के घर पर जो हुआ था उसके बाद मुझे उसके सामने जाने में बड़ा अजीब सा लग रहा था इसलिए मैने उसके सेल पर मेसेज कर दिया था के मैं ऑफीस थोड़ा लेट आऊंगा. सच तो ये था के मैं पहले ये डिसाइड करना चाहता था के उसके सामने बिहेव कैसे करूँ, कैसे उसको फेस करूँ और क्या कहूँ.

मेरे दिल का एक कोना ये कह रहा था के उसने खुद मुझे डिन्नर के लिए इन्वाइट किया, खुद मेरे सामने अपनी शर्ट खोली और खुद ही कहा के वो ये अपनी मर्ज़ी से कर रही है पर मेरा दिल का दूसरा कोना ये कह रहा था के मैं ज़रूरत से ज़्यादा आगे बढ़ गया था. पहली बार में मुझे इतना ज़्यादा नही करना चाहिए था वरना वही होता जो हुआ. अब मैं खुद ही एक अनकंफॉरेटीब्ल सिचुयेशन में पहुँच गया था.

दूसरी ऑफीस ना जाने की वजह ये थी के मैं घर जाकर आराम करना चाहता था. मैं कल पूरी रात बंगलो 13 के सामने अपनी कार में पड़ा हुआ सोया था. मैने बंगलो 13 के गेट के सामने एक लड़की को खड़ा हुआ देखा था जो गाना गा रही थी. पहली बार मुझे पता चला था के वो गाने की आवाज़ कहाँ से आती थी और फिर वही हुआ था जो हमेशा होता था. उसके गाने की आवाज़ ने मुझे ऐसा मदहोश किया के मैं फ़ौरन नींद के आगोश में चला गया.

गुज़री रात ने मेरे एक सवाल का जवाब दिया था पर उसके साथ ही दिल में जाने और कितने सवाल खड़े कर दिए थे. अब मैं ये जानता था के मुझे जो गाना सुनाई देता है वो गाता कौन है पर उसके साथ ही और सवाल ये उठ गये थे के ये गाना मुझे क्यूँ सुनाई देता है. और वो लड़की कौन थी? उसने मुझे मेरे नाम से बुलाया था, मेरा नाम कैसे जानती थी वो? रात को उस वक़्त बंगलो में क्या कर रही थी? जितना मैं इस बारे में सोचता मेरा दिमाग़ उतना ही घूमने लगता. दिल ही दिल में मैं कहीं शायद ये मान चुका था के वो लड़की वही आत्मा है जो इतने लोग कहते हैं के वहाँ भटकती है. आख़िर पूरा शहेर तो ग़लत नही हो सकता? पर फिर मेरा वकील का दिमाग़ इस बात को झुटलाने लगता और इस कन्फ्यूषन का नतीजा ये हुआ के घर पर आराम करने के बजाय मैं अदिति के बारे में और पता करने के लिए अकॅडमी ऑफ म्यूज़िक की पुरानी प्रिन्सिपल के यहाँ जा पहुँचा.

"वो लड़की अब मर चुका है मिस्टर आहमेद" प्रिन्सिपल म्र्स द'सूज़ा ने कहा "अब उसके बारे में कुच्छ लिखकर क्यूँ उस बेचारी की बदनामी करना"


वो एक बूढ़ी औरत थी जिसके चेहरे पर ही उसकी गुज़री हुई ज़िंदगी की समझ नज़र आती थी. उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी जो इस बात का सबूत थी के वो एक बहुत ही इंटेलिजेंट औरत थी. ज़िंदगी में काफ़ी कुच्छ देखा था उसने और ज़िंदगी से काफ़ी कुच्छ सीखा भी था.

"मैं उसको बदनाम नही करना चाहता मॅ'म" मैने कहा "उस बेचारी का खून हुआ और फिर उसपर अपने पाती के साथ बेवफ़ाई का दाग भी लगाया गया. मैं जानता हूँ के क़ानून उसके पति को सज़ा दे चुका है पर मैं चाहता हूँ के उस बेचारी की इमेज भी उस घर की इमेज के साथ ही सॉफ हो जाए"

मैं झूठ पर झूठ बोले जा रहा था.

"क्या मालूम करना चाहते हैं आप?" म्र्स डी'सूज़ा ने मेरी बात समझते हुए बोला
"जो कुच्छ भी आप बता सकें" मैने पेन और नोटेपेड निकाला

"वो एक बहुत ही सिंपल लड़की था, बहुत साइलेंट टाइप. किसी से फ़िज़ूल बात नही करता था और गॉड क्या वाय्स दिया था उसको. जब वो गाता था ना तो जैसे पूरा दुनिया रुक जाता था. हमको कई बार नींद नही आता था तो हम रात को उसको फोन करता था और वो हमको फोन पे गाना सुनाके सुला देता था" वो मुस्कुराते हुए बोली. जवाब में मैं भी मुस्कुरा दिया.

"हम स्कूल में उसका बॉस था पर वैसे हम उसका मदर, सिस्टर सब कुच्छ था. कुच्छ टाइम हमारे साथ ही रहा वो इस घर में जब उसके पास रहने को जगह नही थी. हमको भी उसने ज़्यादा नही बताया था अपने बारे में. कहती थी के उसके माँ बाप मर चुके थे और उसके रिश्तेदार परेशान करते थे इसलिए भाग कर अकेली शहेर आ गयी थी पर हम जानता था के वो झूठ बोलता है"

"कैसे?" मैने पुचछा

"अरे वो छ्छोकरी रात को फोन पे किसी से बात करता था. कई बार हमको लगता था के वो किसी छ्होकरे के साथ भाग कर आया है. पर फिर धीरे धीरे उसका वो फोन पे बात करना ख़तम हो गया और वो पहले से साइलेंट लड़की और भी ज़्यादा साइलेंट हो गया. बहुत सॅड रहता था. हम पुछ्ता था तो बताता ही नही था. सारा दिन कहीं जॉब करता, शाम को बच्चा लोग को म्यूज़िक सिखाता और रात को चुप सो जाता. और फिर एक दिन फोन आया के उसने अपना बॉस से शादी कर लिया"

"मिलने आती थी वो आपसे?" मैने पुचछा

"हाँ कभी कभी वरना जब हमको नींद नही आता था तो हम उसको रात को फोन कर लेता था. और फिर एक दिन हम न्यूसपेपर में पढ़ा के हमारा बच्ची को उसका वो बस्टर्ड हज़्बेंड मार डाला" कहते कहते म्र्स डी'सूज़ा की आँखों से आँसू बह चले.

"म्र्स डी'सूज़ा उसके पति का कहना था के अदिति उसको धोखा दे रही थी और आपने खुद कहा के वो किसी लड़के के साथ भागकर आई थी तो क्या ........"
"हमारा छ्छोकरी एकदम मदर मेरी का माफिक प्यूर था मिस्टर आहमेद" उन्होने मेरी बात बीचे में ही काट दी "वो अगर किसी छ्होकरे के साथ था तो वो रिश्ता ख़तम हो चुका था ये हम अच्छी तरह जानता है. और अगर उसका हज़्बेंड को ऐसा लगा के हमारा छ्छोकरी उसको धोखा दिया ये तो उस हरामी का ही ग़लती रहा होएंगा. वो सताया होएंगा उस बच्ची को. और जब कोई परेशान हो तो वो सहारा तो ढूंढता ही है ना?

थोड़ी देर बाद मैं उनके घर से बाहर निकला तो मैं वहीं का वहीं था. वो मुझे कुच्छ भी ऐसा नही बता पाई थी जो मुझे पोलीस फाइल्स से नही मिला था. मैं अब भी वहीं था और उस लड़की के बारे में कुच्छ नही जानता था. एक बड़ा रेप केस, सोनी मर्डर केस में मदद माँग रही रश्मि सोनी और अब ये अदिति की कहानी, मेरी ज़िंदगी अचानक एक ऐसे तेज़ ढर्रे पर चल पड़ी थी के मेरे लिए कदम मिलना मुश्किल हो गया था.
म्र्स डी'सूज़ा के घर से निकलकर मैं सोच ही रहा था के घर जाऊं या ऑफीस के मेरा फोन बजने लगा. कॉल रश्मि की थी. वो आज की ही फ्लाइट से वापिस आ रही थी.

फोन रखा ही था के घंटी दोबारा बजने लगी. इस बार कॉल प्रिया की थी. मुझे समझ नही आया के रिसीव करूँ या ना करूँ. आख़िर में मैने कॉल रिसीव कर ही ली.

"कहाँ हैं आप?" वो बोली
"कुच्छ काम है वहीं अटक गया हूँ. क्या हुआ?" मैने पुचछा
"वो कुच्छ लोग मिलने आए थे आपसे वो रेप केस के मामले में" वो बोली
"नाम और नंबर ले ले. मैं कॉल कर लूँगा बाद में" मैने कहा
"ले लिए मैने. चले गये वो लोग"

मैं एक पल के लिए बात ख़तम कर दूं पर फिर ना जाने क्या सोचके कल रात के बारे में बोल ही पड़ा. उसको अवाय्ड भी तो नही कर सकता था.
"प्रिया यार कल रात तेरे घर....." मैने कहना शुरू ही किया था के वो बीच में बोल पड़ी
"सर वो मेरा घर था. कोई भी आ सकता था. मैं रोकती नही तो क्या करती?"
मैने एक लंबी राहत की साँस ली. मतलब उसको कल रात की बात का बुरा नही लगा. उल्टा वो तो ये सोच रही थी के मैं उसके रोकने पर नाराज़ हो जाऊँगा. मैं हस पड़ा.

"थॅंक गॉड आप हसे. मुझे तो लग रहा था के आपका दिमाग़ आज काफ़ी गरम होगा." उसने कहा
"दिमाग़ तो गरम ही है पर कल रात की बात को लेकर नही किसी और बात को लेकर. मैं ऑफीस आ रहा हूं अभी. कुच्छ खाने का इंतज़ाम करके रख और कुच्छ ठंडा भी मंगवा लेना" मैने कहा
"मैं तो कब्से कह रही हूँ के ऑफीस में एक फ्रिड्ज रख लो कम से कम ठंडा पानी तो मिलेगा पीने को" कहते हुए उसने फोन काट दिया.

मैने ऑफीस की तरफ गाड़ी घुमाई ही थी. आधे रास्ते में मुझे प्रिया की कही बात याद आई और जैसे मेरे दिमाग़ की बत्ती जली. फ्रिड्ज. मैने गाड़ी वापिस बंगलो 13 की तरफ घुमा दी.

जैसा की मुझे उम्मीद थी, श्यामला बाई मुझे बंगलो पर ही सफाई करती हुई मिल गयी.
"चुप चाप अपना काम करती रहो और मुझे अपना करने दो तो 100 के 2 नोट तुम्हारे" मैने कहा तो उसके चेहरे पर चमक आ गयी और उसने मुझे अंदर आने दिया.

घर के अंदर आते ही मैं किचन में पहुँचा और वहाँ रखे उस बड़े से फ्रीदे के सामने जा खड़ा हुआ. कल जब मैं और रश्मि आए थे तो फ्रिड्ज की सारी ट्रेस निकली हुई बाहर रखी थी जो अब अंदर लगी हुई थी.

"ये अंदर तुमने लगाई हैं?" मैं हैरान खड़ी श्यामला बाई से पुचछा
"हाँ. कल आप लोगों के जाने के बाद" वो उसी हैरानी से मुझे देखते हुई बोली.
मैने फ्रिड्ज पर एक नज़र डाली.
"इसकी चाभी तुम्हारे पास है?" मैने फ्रिड्ज के लॉक की तरफ देखते हुए कहा
"मैने तो हमेशा इसको खुला ही देखा है. फ्रिड्ज में ताला लगाने की क्या ज़रूरत है" वो ऐसे बोली जैसे मैं कोई पागलों वाला सवाल कर रहा था.
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06-29-2017, 11:17 AM,
#26
RE: Bhoot bangla-भूत बंगला
मैने फ्रिड्ज का दरवाज़ा खोला और अंदर लगे उस हुक को देखा जो बाहर से लॉक में चाबी घुमाने पर अंदर अटक जाता था. वो हुक फ्री था और आसानी से मेरे हाथ से ही घूम गया.

"कुच्छ ठंडा पीना है क्या आपको?" श्यामला मुझे इतने गौर से फ्रिड्ज की तरफ देखते हुए पुच्छ बेती
ठंडा तो मुझे उस वक़्त पीना था पर उस वक़्त मेरे दिमाग़ में वो आखरी बात थी.

"ये पाकड़ो" मैने एक एक करके फ्रिड्ज के अंदर रखी ट्रेस निकालनी शुरू कर दी.
"क्या कर रहे हैं?" उसने फ़ौरन पुचछा पर जब मैने अपने पर्स से 100 के 2 नोट निकालकर उसकी तरफ बढ़ाए तो वो चुप हो गयी.

जब फ्रिड्ज की सारी ट्रेस निकल गयी तो मैने खड़ा होकर एक बार उसकी तरफ देखा. वो फ्रिड्ज तकरीबन मेरे ही जितना लंबा था और काफ़ी चौड़ा भी था. मैने अपना सर थोड़ा नीचे झुकाया और फ्रिड्ज के अंदर घुस गया. अंदर घुसकर मैं सिकुड़कर नीचे को बैठ गया.

"क्या कर रहे हैं आप?" श्यामला बाई ने लगभज् चिल्लाते हुए मुझसे पुचछा. मैने उसके सवाल पर कोई ध्यान नही दिया और फ्रिड्ज का दरवाज़ा बंद करके हुक अंदर की तरफ से घुमाया. हुक अपनी जगह पर जाके अटक गया. मतलब बाहर खड़े किसी भी आदमी के लिए वो फ्रिड्ज लॉक्ड था.

मैं जब बंगलो से निकला तो एक बहुत बड़े सवाल का जवाब मुझे मिल चुका था. जिस किसी ने भी सोनी को मारा था वो वहीं घर में ही था. वो उसको मारकर कहीं गया नही बल्कि वहीं घर में ही रहा और जब अगले दिन मौका पाकर उस वक़्त भाग निकला जब घर का दरवाज़ा खोला गया था. और वो लोग जिन्हें मैने घर में उस रात देखा था पर जब मैं और सोनी घर में गये तो नही थे वो भी शायद यहीं च्छूपे हुए थे क्यूंकी हमने पूरा घर छ्चान मारा था और वो कहीं और मौजूद नही थे. फ्रिड्ज इतना बड़ा था के 2 लोग उसमें आसानी से सिकुड़कर घुस सकते थे.

"साहब" मैं जा ही रहा था के पिछे से श्यामला बाई की आवाज़ आई. मैने पलटकर उसकी तरफ देखा.
"आप बोले थे ना के मैं कुकछ अगर घर में मिला तो आपको लाकर दूँ. पैसे देंगे आप" वो बोली
"हां याद है" मैने कहा
"ये मिला मेरे को" उसने एक कपड़े का टुकड़ा मेरी तरफ बढ़ाया.

वो एक सफेद रंग का स्कार्फ या रुमाल था. देखकर अंदाज़ा लगाना मुश्किल था के लड़के का था या लड़की का. एक पल के लिए तो मुझे लगा के श्यामला बाई शायद ऐसे ही कोई रुमाल मुझे थमाके पैसे निकालने के चक्कर में है पर वो रुमाल देखने से ही काफ़ी महेंगा सा लग रहा था. दोनो तरफ हाथ से की गयी गोलडेन कलर की कढ़ाई थी और कपड़े भी काफ़ी महेंगा मालूम पड़ता था. ऐसा रुमाल श्यामला बाई के पास नही हो सकता, ये सोचकर मैं उसे पैसे देने चाह ही रहा था के उस रुमाल पर मुझे कुच्छ ऐसा नज़र आया के मेरा उसको रख लेने का इरादा पक्का हो गया.
रुमाल के एक कोने पर गोलडेन कलर के धागे से 2 लेटर्स कढ़ाई करके लिखे गये थे.

एच.आर.

मेरे दिमाग़ में फ़ौरन एक ही नाम आया.
हैदर रहमान.

पहले तो मैने सोचा के पोलीस स्टेशन जाकर मिश्रा से बात करूँ पर जब मैने उसको फोन किया तो वो पोलीस स्टेशन में नही था. मैने उसको अपने ऑफीस आकर मुझसे मिलने को कहा और ऑफीस पहुँचा.

"फाइनली" प्रिया मुझे देखकर बोली "सरकार की तशरीफ़ आ ही गयी. सारी दिन अकेली बोर हो गयी मैं. खाना भी ठंडा हो गया है"
"अब तो भूख ही ख़तम हो गयी यार" मैने कहा और अपनी डेस्क पर बैठ गया.
"क्यूँ कहीं से ख़ाके आ रहे हो क्या?" वो उठकर मेरे करीब आई.

मैं कुर्सी पर सीधा होकर लेट सा गया और आँखें बंद करके इनकार में सर हिलाया.
"तो भूख क्यूँ नही है? तबीयत ठीक है?" कहते हुए वो घूमकर डेस्क के मेरी तरफ आई और मेरे माथे पर हाथ लगाके देखा.
"बुखार तो नही है" वो बोली

"नही तबीयत तो ठीक है. बस ऐसे ही भूख ख़तम हो गयी" कहते हुए मैने आँखें खोली तो फिर वही नज़र सामने था जहाँ अक्सर मेरी नज़र अटक जाती थी. उसकी बड़ी बड़ी चूचिया जो उसके पिंक टॉप के उपेर ऐसे उठी हुई थी जैसे 2 माउंट एवरेस्ट. मेरी नज़र एक पल के लिए फिर वहीं अटक गयी और खुद प्रिया को भी अंदाज़ा हो गया के मैं कहाँ देख रहा हूँ.

"ओह प्लीज़ सर......." वो बोली
"क्या?" मैने मुस्कुराते हुए उसकी नज़र से नज़र मिलाई.
"मुझे लगा था के अब आप ऐसे नही घुरोगे" वो हस्ती हुई बोली और टेबल के दूसरी तरफ जा बैठी.
"वो क्यूँ?" मैने पुचछा
"अरे अब देख तो लिया आपने. आँखों से भी देख लिया और अपने हाथों से भी देख लिया" वो हल्के से शरमाते हुए बोली.

"अरे तो एक बार देख लिया तो इसका मतलब ये थोड़े ही है के इंटेरेस्ट ख़तम हो गया" मैने उसे छेड़ते हुए कहा.
"तो अब क्या डेली सुबह शाम एक एक बार दिखाया करूँ?" वो आँखें फेलाति हुई बोली.
"सच?" मैं एकदम खुश होता हुआ बोला "क्या ऐसा कर सकती है तू?"
"बिल्कुल नही" वो थोड़ा ज़ोर से बोली और हस्ने लगी "वो आपका बिर्थडे गिफ्ट था जो आपको कल मिल गया."

"याअर ये तो ग़लत बात है" मैने कहा
"क्या ग़लत है?" वो बोली
"ये तो शेर के मुँह खून लगाने वाली बात हो गयी. एक बार ज़रा थोड़ी देर के लिए दिखा कर तो जैसे और देखने की ख्वाहिश बढ़ा दी तूने"
"थोड़ी देर के लिए? और बस देखा आपने" वो इस बात की तरफ इशारा करते हुए बोली के मैने काफ़ी देर तक देखे थे और देखने के साथ दबाए और चूसे भी थे.

मैं जवाब में हस पड़ा.
"वैसे ये सब मज़ाक ही है ना?" उसने पुचछा
"शायद और शायद नही" मैने गोल मोल सा जवाब दिया
"इस बात का क्या मतलब हुआ?"

मैने फिर जवाब नही दिया

"एक बात बताइए सर" उसने पुचछा "लड़को को इनमें क्या अच्छा लगता है?"
"ऑपोसिट अट्रॅक्ट्स यार" मैने कहा "लड़को को ऑफ कोर्स लड़की के जिस्म की तरफ अट्रॅक्षन होती है तो ऑफ कोर्स लड़की के ब्रेस्ट्स की तरफ भी अट्रॅक्षन होती है. और जैसी तेरी हैं, ऐसे तो हर बंदा चाहता है के उसकी गर्ल फ्रेंड या बीवी की हों"

"जैसी मेरी हैं मतलब?" उसने अपनी चूचियो की तरफ देखते हुए कहा
"मतलब के तेरी बड़ी हैं काफ़ी और ज़्यादातर लड़को को बड़ी छातिया अच्छी लगती हैं" मैने कहा तो वो इनकार में सर हिलाने लगी.

"याद है आपको मैं एक शादी में गयी थी और मैने एक कज़िन के बारे में बताया था जिसके साथ मेरी एक लड़के को पटाने की शर्त लगी थी?" उसने पुचछा तो मैने हाँ में सर हिलाया
"हाँ याद है"

"सर मेरी उस कज़िन के पास लड़कियों जैसा कुच्छ नही है. बस शकल से लड़की है वो. सीने पर ज़रा भी उभार नही है और फिर वो लड़का उससे जाकर फस गया. मुझे तो उसने घास भी नही डाली" वो बोली तो मैं हस पड़ा
"अरे और भी कई बातें होती हैं जो लड़को को पसंद होती हैं. सिर्फ़ ब्रेस्ट्स नही" मैने कहा

"और क्या?" वो ऐसे बोली जैसे मैं उसकी टूवुशन क्लास ले रहा था.
मैं कुच्छ कह ही रहा था के मेरे ऑफीस के दरवाज़े पर नॉक हुआ और मिश्रा अंदर आया.

क्रमशः.............................
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06-29-2017, 11:17 AM,
#27
RE: Bhoot bangla-भूत बंगला
भूत बंगला पार्ट-17

गतान्क से आगे..................

मैने मिश्रा को वो सारी बात बता दी जो मुझे बंगलो और सोनी मर्डर केस के बारे में पता चली थी. जो एक बात मैं उससे भी च्छूपा गया वो थी हैदर रहमान का रुमाल वहाँ मिलने की बात. मैं अब तक हैदर रहमान से मिला नही था और उसके बारे में कोई भी बात करने से पहले ज़रूरी था के मैं पहले खुद ये डिसाइड करूँ के क्या वो ऐसा कर सकता है या नही. और उसके लिए फिलहाल अभी और इन्फर्मेशन हासिल करना ज़रूरी था.

"फ्रिड्ज?" मिश्रा हैरत से बोला "उस फ्रिड्ज में जगह है इतनी?"
"मेरी हाइट 6 फुट से ज़्यादा है और मैं पूरा आ गया उसके अंदर. उसके बाद भी इतनी जगह थी के तू भी अंदर घुस सकता था. वो फ्रिड्ज बहुत बड़ा है यार" मैने कहा

"और ये ख्याल आया कैसे तुझे?" उसने पुचछा
एक पल के लिए मेरे दिमाग़ में आया के मैं उसको रश्मि और मेरे बंगलो में जाने के बारे में बता दूँ पर उसका नतीजा ये होता के वो मुझसे और ज़्यादा सवाल पुचहता और फिलहाल मेरे पास उसको बताने के लिए और ज़्यादा कुच्छ ख़ास था नही.

"मुझे याद था के मैने एक बहुत बड़ा फ्रिड्ज देखा था जब तू और मैं तलाशी लेने गये थे. अपने घर में फ्रिड्ज से कुच्छ निकल रहा था तब मुझे ख्याल आया के फ्रिड्ज के अंदर भी तो कोई हो सकता है क्यूंकी उसकी ट्रेस मैने बाहर रखी हुई देखी थी" मैने कहानी बनाते हुए कहा
"ह्म" मिश्रा बोला "और निकला कब होगा वो?"

"कभी भी निकल सकता है यार. अंदर बैठा रहा होगा काफ़ी देर तक और जब मौका मिला तो निकल भागा. घर की इतनी सारी खिड़कियाँ है वो कहीं से भी निकल सकता था" मैने कहा पर मिश्रा मेरे जवाब से सॅटिस्फाइड नही था.

"तू एक बहुत बड़ा पॉइंट मिस कर रहा है मेरे भाई" वो बोला "अगर उस बंदे ने खून किया था तो उसको क्या दरकार थी वहीं घर में ही बैठे रहने की और वो भी फ्रिड्ज में घुसके. उसने खून किया था यार वो सॉफ बचके निकल सकता था वहाँ से. वहीं घर में बैठे रहने की क्या ज़रूरत थी उसको?"

मिश्रा जो कह रहा था वो बिल्कुल सही था. इस बारे में मैने बिल्कुल नही सोचा था. अगर कोई किसी की जान ले सबसे पहली रिक्षन वहाँ से निकल भागना होता है. अगर उसको घर से कुच्छ लेना ही था तो पूरी रात थी उसके पास. वो आराम से घर की तलाशी लेकर वहाँ से निकल सकता था. बंगलो 13 के नाम से तो वैसे भी लोग डरते थे और उसके आस पास भी नही जाते थे तो इस बार का तो कोई डर ही नही था के कोई देख सकता था. तो फिर वो आदमी खून करने के बाद भला वहाँ क्यूँ रहेगा?

"कह तो तू सही रहा है" मैने कहा "पर जो भी वजह थी, इतना तो हम जानते हैं के सोनी का खूनी उसकी जान लेके के बाद घर से निकला नही. अट लीस्ट दरवाज़े से तो नही. और अनलेस आंड अंटिल उसके पास कोई मॅजिकल पवर्स थी, मैं पूरे दावे के साथ कहता हूँ के वो वहीं फ्रिड्ज के अंदर च्छूपा बैठा था जब उस नौकरानी ने आकर घर का दरवाज़ा खोला और जहाँ तक मेरा ख्याल है, जब वो पोलीस को बुलाने बंगलो के सामने वाली चौकी की तरफ गयी, तभी वो वहाँ से निकल भागा"

"पक्के तौर पर तो मैं खुद उस फ्रिड्ज को देखने के बाद ही कुच्छ कह सकता हूँ. कल लगाऊँगा उधर का चक्कर. वैसे अब मेरा कोई फयडा तो है नही इसमें क्यूंकी केस सी.बी.आइ के पास है पर अगर मैने कुच्छ कमाल कर दिखाया तो मेरी वाह वाह हो जाएगी" वो मुस्कुराता हुआ बोला

हम थोड़ी देर और इधर उधर की बातें करते रहे और फिर वो उठकर मेरे ऑफीस से जाने लगा. जाते जाते वो पलटा.

"अरे इशान तू वो अदिति के बारे में कोई बुक लिख रहा था ना"
"अदिति नही बंगलो के बारे में" मैने कहा
"हाँ वही" वो बोला "एक बात पता चली है मुझे. सोचा तेरे फ़ायडे की हो सकती है. उस अदिति का हज़्बेंड अभी भी ज़िंदा है. जैल में उमेर क़ैद की सज़ा काट रहा है. तू चाहे तो मिल सकता है उससे. शायद उससे कुच्छ इन्फर्मेशन मिल सके तुझे"

मैं, रुक्मणी और देवयानी डिन्नर टेबल पर साथ बैठे थे. वो दोनो बिल्कुल नॉर्मल थी पर मुझे बड़ा अजीब सा लग रहा था. जबसे उन दोनो को बिस्तर पर एक साथ देखा था, ना जाने क्यूँ उन दोनो के सामने मैं बड़ा अनकंफर्टबल फील करता था. दोनो साथ हों तब भी और अगर रुक्मणी अकेली हो तब भी मुझे उससे बात करते हुए बार बार वही सीन याद आता था. वो दोनो अपनी मर्ज़ी की भी मलिक थी और इस घर की भी और मैं तो यहाँ फ्री में रह रहा था तो हिसाब से मुझे उन दोनो के कुच्छ भी करने पर कोई ऐतराज़ नही होना चाहिए थे. ऐसा तो कुच्छ भी नही था के उन दोनो में से कोई एक मेरी प्रेमिका या बीवी थी जिसकी वजह से मुझे उनकी इस हरकत पर ऐतराज़ हो रहा था पर फिर भी ना जाने क्यूँ, घर के अंदर आते ही मुझे ऐसा लगने लगता था के उन दोनो के सामने से हट जाऊं.

सबसे ज़्यादा परेशान मुझे ये बात करती थी के देवयानी जानती थी के मैने उन दोनो को देखा है इसलिए मैं कोशिश यही करता था के उसके सामने ना आऊँ और अगर आ भी जाऊं तो उससे नज़र ना मिलाउ.

"इतने खामोश क्यूँ हो इशान?" देवयानी ने मुस्कुराते हुए पुचछा "कोई बात परेशान कर रही है क्या?"

मैने इनकार में गर्दन हिलाई पर जानता था के उसने जान भूझकर ये बात छेड़ी है. अब उसने कह दिया है तो रुक्मणी भी मुझसे ज़रूर वही सवाल करेगी क्यूंकी उसको भी मेरा बर्ताव बदला हुआ लग रहा था. सवालों से बचने का मुझे एक ही तरीका दिखाई दे रहा था और वो ये था के मैं बात को बदल दूँ.

जो एक बात मेरे दिमाग़ में चल रही थी और जिसके बारे में मैं रुक्मणी से पुच्छना भी चाहता था वो ये थी के बंगलो 13 के साइड वाले घरों में कौन रहता है. अगर उस रात कोई बंगलो में कोई आया गया था जब सोनी का खून हुआ था तो बहुत मुमकिन के उन घरों के लोगों में से किसी ने देखा हो. बंगलो 13 के आस पास बना हुआ लॉन और गार्डेन काफ़ी बड़ा था और घर के चारों तरफ एक ऊँची दीवार थी जिस वजह से दोनो तरफ के घर असल बंगलो से थोड़ी दूर पर थे पर ऐसा हो सकता था के शायद उन घर के लोगों में से किसी ने कुच्छ देखा हो. मिश्रा ने मुझे बताया था के वो ऑलरेडी पुच्छ चुका है और कुच्छ हासिल नही हुआ पर फिर भी मैने खुद पता लगाना ठीक समझा. मुसीबत ये थी के मैं रुक्मणी के साथ भी बड़ा अनकंफर्टबल फील कर रहा था इसलिए उससे बात कर नही पाया. पर इस वक़्त जबकि मैं खुद ही बात बदलना चाहता था तो इस वक़्त मैं वो बात उठा सकता था. वैसे भी दोनो बहनो को गॉसिप करने में बड़ा मज़ा आता था तो इस बहाने टॉपिक ऑफ डिस्कशन मेरे खामोश रहने से हटकर बंगलो 13 बन सकता था.

"आपको पता है के बंगलो 13 के आस पास के घरों में कौन रहता है?" मैने सवाल किया तो दोनो बहनो ने पहले तो मुझे हैरत से पुचछा फिर थोड़ी देर बाद रुक्मणी बोली.

"उस लेन में ज़्यादा लोग नही रहते. कुल मिलके 15 घर हैं. बंगलो 7 तक के घरों में तो फॅमिलीस रहती हैं पर फिर 8,9.10,11 खाली पड़े हैं. फिर 12 ऑक्युपाइड है और 14,15 खाली हैं. उस मनहूस बंगलो के आस पास कोई रहना नही चाहता इसलिए लोग घर छ्चोड़ छ्चोड़के चले गये"

भले ही वो लेन खाली पड़ी हो पर मेरे मतलब की बात मैं सुन चुका था. बंगलो 12 में कोई रहता है.

"12 में कौन रहता है?" मैने पुचछा
"वो घर कम होटेल ज़्यादा है. बना भी इस तरीके से हुआ है के उसको होटेल के हिसाब से इस्तेमाल किया जा सके" रुक्मणी बोली
"मैं समझा नही" मैने कहा

"वो जिस औरत का है वो इस दुनिया में अकेली है. कोई नही है उसके आगे पिछे. उस घर में अकेली रहती है इसलिए उसने किरायेदार रखने शुरू कर दिए. घर को 1 रूम और 2 रूम सेट्स में बाँट रखा है जिन में वो किरायेदार रखती है. इस इलाक़े के सबसे बड़ी औरत है वो" रुक्मणी ने मुस्कुराते हुए कहा.

"बड़ी?" मैने फिर सवाल किया
"मोटी है बहुत. हाढ़ से ज़्यादा. इतना वज़न होगा उस औरत में के अगर किसी वज़न नापने वाली मशीन पर कदम रख दे तो मशीन ही टूट जाए" कहकर दोनो बहें ज़ोर ज़ोर से हस्ने लगी.

"वैसे नेचर की काफ़ी अच्छी है वो" हसी रोकते हुए रुक्मणी बोली "वैसे लोग कहते हैं के किराया काफ़ी ज़्यादा लेती है"

"फिलहाल कोई किरायेदार रह रहा है वहाँ?" मैने पुचछा
"पता नही पर मैने सुना था के वो सोनी के मर्डर के बाद उस बेचारी को भी काफ़ी नुकसान हुआ है. जो एक किरायेदार था वो खून होने के 2 दिन बाद ही घर छ्चोड़के भाग गया था और अब कोई वहाँ रहने की हिम्मत नही करता. क्यूँ तुम शिफ्ट होने की सोच रहे हो क्या?" इस बात पर वो दोनो फिर ज़ोर ज़ोर से हस्ने लगी.

"नही मेरा ऐसा की नेक इरादा नही है" मैने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा "वैसे आप गयी हैं कभी बंगलो 12 में?"
"हाँ मेरा तो पूरा घर देखा हुआ है" रुक्मणी बोली "कभी कभी चली जाती हूँ ऐसे ही बात करने"

"उस घर से बंगलो 13 नज़र आता है?" मैने बात जारी रखते हुए कहा.
"नही वैसे तो नही दिखाई देता क्यूँ दोनो घरों के बीच एक ऊँची दीवार है और तुमने तो देखा ही है के बंगलो 13 का कॉंपाउंड कितना बड़ा है. घर का कॉंपाउंड कम रेस कोर्स ज़्यादा लगता है. पर हां अगर बंगलो 12 की छत पर जाओ तो वहाँ से बंगलो 13 दिखाई देता है. पर तुम ये सब क्यूँ पुच्छ रहे हो" रुक्मणी ने पुचछा

उसके इस बात का मेरे पास कोई जवाब नही था इसलिए मैं चुप ही रहा पर थोड़ी देर बाद जवाब देवयानी ने दिया.

"इशान अगर तुम ये जानने की कोशिश कर रहे हो के खून की रात बंगलो 12 से किसी ने कुच्छ देखा था तो तुम्हें झांवी से बात करनी चाहिए"
मुझे उसकी अकल्मंदी पर हैरत हुई. वो फ़ौरन समझ गयी थी के मैं क्या कोशिश कर रहा हू.

"ये झांवी कौन है?" मैने पुचछा
"नौकरानी है" देवयानी सीधा मेरी नज़र से नज़र मिलाते हुए बोली "बंगलो 12 में मैं भी गयी हूँ इशान. उस घर की मालकिन मिसेज़ पराशर इतनी मोटी हैं के अपनी कुर्सी से उठ तक नही पाती तो इस बात का सवाल ही नही के उन्होने कुच्छ देखा हो. हां पर वो नौकरानी झांवी एक पक्की छिनाल है. अगर उसने बंगलो 13 में कुच्छ नही देखा तो समझ जाओ के किसी ने नही देखा"

मैं देवयानी की बात सुनकर मुस्कुरा उठा.

"कहते हैं के कोई बंजारन है वो" रुक्मणी ने डाइनिंग टेबल से उठते हुए कहा.

अगले दिन की सुबह मेरे लिए एक प्यार भरी सुबह थी क्यूंकी मेरी आँख रश्मि की आवाज़ सुनकर खुली.

"हां रश्मि जी" मैं फ़ौरन अपने बिस्तर पर उठकर बैठ गया "कहिए"
"फर्स्ट यू गॉटा स्टॉप कॉलिंग मे रश्मि जी. आंड सेकंड्ली मैं सोच रही थी के आप मिलने आ सकते हैं क्या?" दूसरी तरफ से रश्मि की आवाज़ आई जिसने सुनकर मेरे दिल की धड़कन कई गुना बढ़ गयी. वही सुरीली मधुर आवाज़.

"हाँ बिल्कुल" कहते हुए मैने घड़ी की तरफ नज़र डाली. सुबह के 7 बज रहे थे. 11 बजे मेरी कोर्ट में रेप केस को लेकर हियरिंग थी. 4 घंटे का वक़्त अभी और था मेरे पास.
"मैं अभी एक घंटे में आपके पास पहुँचता हूँ" मैने बिस्तर से उठकर खड़े होते हुए कहा
"ठीक है" रश्मि बोली "कुच्छ खाकर मत आईएगा. ब्रेकफास्ट साथ में करेंगे"
"डील" कहते हुए मैने फोन डिसकनेक्ट किया.

मुझे अपने उपेर हैरत थी के सिर्फ़ एक उसकी आवाज़ सुनकर ही मैं किसी बच्चे की तरह खुश हो रहा था. सुबह जैसे एक अलग ही रोशनी फेला रही थी और मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैने अभी अभी पूरी दुनिया पर जीत हासिल की हो. जाने क्या था उसकी आवाज़ में पर मेरा दिल जैसे मेरे अपने ही बस में नही था. किसी छ्होटे बच्चे की तरह मैं जल्दी जल्दी उससे मिलने के लिए तैय्यार हो रहा था. आजकल तो जैसे मेरी ज़िंदगी ही बस 2 आवाज़ों में खोकर रह गयी थी. एक वो गाने की आवाज़ जो मैं सुनता था और दूसरी रश्मि की. फरक सिर्फ़ इतना था के गाने की आवाज़ सुनकर मेरी रूह को सुकून मिलता था पर रश्मि की आवाज़ मेरी दिल को बेचैन भी करती थी और सुकून भी देती थी और वो भी एक साथ, एक ही वक़्त पे.

जब उसने अपने होटेल कर दरवाज़ा मेरे लिए मुस्कुराते हुए खोला तो मुझे लगा के मैं वहीं चक्कर खाकर गिर जाऊँगा. उसका वो मुझे देखकर मुस्कुराना और फिर नज़र झुखा लेना मुझे ख़तम कर देने के लिए काफ़ी था. वो मुझे देखकर खुश भी हो रही थी और साथ ही शायद शर्मा भी रही थी और मेरे ख्याल से शरम की वजह मेरी और उसकी आखरी मुलाक़ात थी जब मैने जाने क्यूँ कह दिया था के उसका मुझपर पूरा हक है. जो भी था, बस उस वक़्त तो मैं उसको ऐसे देख रहा था जैसे कोई पतंगा रोशनी को देखता है.
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06-29-2017, 11:17 AM,
#28
RE: Bhoot bangla-भूत बंगला
अगर देखा जाए तो ये एक बहुत ही अजीब बात है. मर्द दुनिया की ज़्यादातर औरतों को हवस की नज़र से देखता है और यही सोचता है के ये नंगी कैसी लगती होगी. उसके लिए एक औरत का जिस्म किसी अम्यूज़्मेंट पार्क से ज़्यादा नही होता. पर वो औरत जिसको वो चाहता है, जिसको वो अपना दिल देता है, उस औरत का जिस्म उसके लिए एक मंदिर बन जाता है. उस औरत की खुशी में उसकी खुद की खुशी हो जाती है और जब वो रोटी है तो साथ साथ मर्द की आँखों से भी आँसू निकल पड़ते हैं. फिर चाहे वो बाहर खुद कितनी भी लड़कियों को देखकर सीटी मारे पर अगर उस लड़की को जिससे वो प्यार करता है कोई और छेड़ दे तो सर पर खून सवार हो जाता है.

"वेल" वो मेरे लिए एक कप में चाय डालते हुए अपने वही ऑस्ट्रेलियन आक्सेंट में बोली "हॅव यू बिन एबल तो फाइंड आउट एनितिंग?"
"ए ग्रेट डील लाइक्ली टू बी ऑफ सर्विस टू उस. आंड यू?" मैने जवाब दिया.

"आइ" उसने सॅटिस्फाइड टोन में जवाब दिया " आइ हॅव डिसकवर्ड दट दा डॅगर विथ दा रिब्बन ईज़ गॉन फ्रॉम दा लाइब्ररी ऑफ माइ हाउस इन मुंबई"
"अन्य आइडिया हू टुक इट अवे?" मैने पुचछा

"ये तो मैं नही जानती" उसने सीरीयस होते हुए कहा "कोशिश की थी मैने पता करने की बट आइ कॉयुल्ड्न्ट फाइंड आउट, ऑल्दो आइ आस्क्ड ऑल दा सर्वेंट्स; पर वो खंजर तो कई महीनो से गायब था"
"आपको लगता है के भूमिका ने लिया होगा?" मैने पुचछा

"कह नही सकती" रश्मि ने कहा "पर एक बात पता चली है मुझे. खून की रात भूमिका घर में तो क्या, मुंबई में ही नही थी"
"अच्छा?" मैने चौंकते हुए कहा "पर इनस्पेक्टर मिश्रा से तो उसने कहा था के जिस रोज़ खून हुआ, उस दिन वो मुंबई में थी"

"सही कहा था उसने" रश्मि ने कहा "उस दिन वो मुंबई में थी पर उस रात नही. मुंबई से रात 8 बजे की फ्लाइट से वो यहाँ आई थी और अगले दिन सुबह ही वापिस मुंबई चली गयी थी"

ये एक बहुत सीरीयस बात थी जो सीधा भूमिका सोनी की खिलाफ जाती थी. वो खून की रात इसी शहेर में थी और मुझे पक्का यकीन था के उसने ये बात मिश्रा को नही बताई थी. सबसे ज़्यादा जो बात उसको शक के घेरे में डालती थी वो ये थी के वो सिर्फ़ एक रात के लिए इस शहेर में आई थी और अगले दिन सुबह ही वापिस चली गयी थी. जितना वक़्त वो यहाँ रही थी, उसी बीच में उसके पति का खून हुआ था.

खून की रात मैं भी बंगलो 13 में गया था और मैने एक औरत और आदमी की परच्छाई को घर में देखा था. ये बात साबित हो चुकी थी के भूमिका उस रात शहेर में ही थी और जो रुमाल मुझे मिला था वो हैदर रहमान की तरफ इशारा करता था. मैने जेब से रुमाल निकालकर रश्मि को दिखाया.

"ये तो उस हैदर का है" बिना रुमाल पर इनिशियल्स एच.आर. देखे वो फ़ौरन बोल पड़ी "वो एकदम इस तरह के रुमाल ही रखता है"
"ये मुझे बंगलो 13 में पड़ा मिला था" मैने कहा.

"तो साबित हो गया फिर. मेरे घर से खंजर गायब है जिसका रिब्बन हमें बंगलो में मिला. भूमिका उस रात शहेर में थी और हैदर का रुमाल भी हमें बंगलो से मिला जो इस बात को साबित करता है के वो घर में गया था जबकि मेरे डॅड से उसका मिलना जुलना बिल्कुल नही था. वो नफ़रत करते थे उससे तो हैदर वहाँ क्या करने गया था? और सबसे ज़रूरी बात ये है इशान के उस रात तुमने 2 लोगों को बंगलो में देखा था. हैदर और भूमिका को" वो एक साँस में बोली.

हमारे पास जो भी था वो सर्कम्स्टॅन्षियल एविडेन्स थी जिसकी बिना पर अदालत में कुच्छ भी साबित कर पाना मुश्किल होता. रश्मि को शायद दिल में ये यकीन हो चुका था के हेडर और भूमिका ने ही उसकी बाप को मारा था और उसके पास जो वजह थी वो काफ़ी मज़बूत भी थी.

पहली तो ये के उसके पिता का खून एक खंजर से हुआ था और उसके अपने घर से एक खंजर गायब था. वही खंजर जिसपर बँधा हुआ रिब्बन हमें बंगलो 13 में पड़ा मिला था.

दूसरा ये के भूमिका खून की रात इसी शहेर में थी जबकि उसने किसी से इस बात का ज़िक्र नही किया था.

और तीसरी और सबसे मज़बूत वजह जो रश्मि मान रही थी वो ये थी के मैने उस रात घर में एक औरत की परच्छाई देखी थी. उसको शायद ये यकीन था के क्यूंकी मैने खुद ही परच्छाई देखी थी तो मैं बड़ी आसानी से अदालत में इस बात को साबित कर दूँगा. पर किसी और को यकीन दिलाने से पहले मुझे खुद को इस बात का यकीन दिलाना था के वो परच्छाई आख़िर थी तो किसकी थी.

अगर मैं ये मान लूँ के वो परच्छाई भूमिका का ही थी तो फिर सवाल ये बनता है के मैने उस रात बंगलो के गेट पर जो लड़की देखी थी वो कौन थी. वो मेरा भ्रम नही हो सकती क्यूंकी उसने मुझसे बात की थी, मुझे बर्तडे विश किया था.

और अगर मैं ये बात मान लूं के खून से पहले जो परच्छाई मैने देखी थी वो उस लड़की की थी जिसे मैने गेट पर देखा था तो दूसरा सवाल ये था के उसके साथ खड़ा वो आदमी कौन था जो उसके साथ लड़ रहा था. अगर हिसाब से देखा जाए तो उस लड़की को एक भूत होना चाहिए जो कि सब कहते हैं और उससे पहले भी लोगों ने घर में सिर्फ़ एक औरत की परच्छाई को देखने का दावा किया है, किसी आदमी को कभी किसी ने नही देखा.

फिलहाल तो मैं खुद ही बुरी तरह से कन्फ्यूज़्ड था, किसी और को क्या समझाता.
"मुझे हमेशा से यकीन था के भूमिका ने ही मेरे पिता को मारा है" मुझे ख्यालों में खोया हुआ देखकर रश्मि ने कहा "पर हैरत मुझे इस बात की है के उसने ये काम खुद किया"

"क्या सच में ऐसा किया उसने?" मैने रश्मि की बात पर सवाल उठाते हुए कहा.
"मुझे समझ नही आता के आपको और क्या सबूत चाहिए" रश्मि ने थोड़ा चिदते हुए कहा "वो खून की रात यहाँ थी, उसने मुंबई वाले घर से वो खंजर उठाया और ........."

"आप इस बात को साबित नही कर सकती" मैने उसकी बात बीच में काट दी. ऐसा करते हुए जाने कैसे मेरी आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गयी जो शायद रश्मि को पसंद नही आया. उसके चेहरे पर एक पल के लिए गुस्से का एक एक्सप्रेशन आया और चला गया पर मैने उस बात को नोटीस कर लिया.

"देखो रश्मि" मैने धीरे से उसको समझाते हुए कहा "आइ आम नोट दा लेस युवर फ्रेंड बिकॉज़ आइ कॉंबॅट युवर अगरुएमेंट्स. बट इस वक़्त हमें कहानी का हर पहलू देखना पड़ेगा. क्या हम सच में ये साबित कर सकते हैं के खंजर भूमिका ने ही लिया था?"

"नोबडी आक्च्युयली सॉ इट इन हर पोज़ेशन" वो मेरी बात को समझते हुए बोली "पर मुझे इस बात को पूरा यकीन है के वो खंजर मेरे डॅड के घर छ्चोड़कर चले जाने के बाद भी वहीं लाइब्ररी में था. उसके बाद अगर भूमिका ने वो खंजर नही लिया तो किसने लिया?"

"लेट उस से हैदर रहमान खुद ही वो खंजर ले गया?" मैने कहा
"पर आपने खुद कहा के उस रात घर में आपने 2 लोगों की परच्छाई देखी थी" वो फिर बच्ची की तरह ज़िद करते हुए बोली.

एक पल के लिए मेरे दिमाग़ में ख्याल आया के उसको बता दूँ के मैने उसके बाद एक लड़की को भी बंगलो में देखा था पर फिर मुझे उसको सारी बात बतानी पड़ती. अपने गाना सुनने की आवाज़ से लेकर अदिति की कहानी सब. इसलिए मैने अपना इरादा बदल दिया.

"राशि मैने वहाँ 2 लोगों की परच्छाई देखी थी. एक आदमी और एक औरत" मैने कहा.
"इन प्लैइन इंग्लीश, इशान, दोज़ ऑफ हैदर आंड भूमिका"
"हम इस बात को दावे के साथ नही कह सकते"
"बट सर्कम्स्टॅन्षियल एविडेन्स..............."
"क्या तुम सच में ये चाहती हो के हम सर्कम्स्टॅन्षियल एविडेन्स लेकर कोर्ट जाएँ और हारने का रिस्क लें?" मैने कहा.
"तुम उस भूमिका को इतना बचाने पर क्यूँ आमादा हो?" वो फिर हल्के से गुस्से से बोली.

ये बात मेरे लिए ख़तरनाक थी. अगर उसको ऐसा लगने लगा के मैं भूमिका के चक्कर में हूँ तो मेरे प्यार की नैय्या वहीं डूब जाएगी.


"रश्मि" मैने मुस्कुराते हुए उसको समझाया "इफ़ वी डोंट गिवर हर दा बेनेफिट ऑफ एवेरी डाउट दा कोर्ट विल, शुड शी बी ट्राइड ऑन दिस चार्ज. एक वकील होने के नाते मैं ये मानता हूँ के इस औरत के खिलाफ हमारे पास काफ़ी ठोस सबूत हैं पर तुम्हारा दोस्त होने के नाते मैं कहता हूँ के हम इनकी बिना पर कोर्ट में मर्डर चार्ज साबित नही कर पाएँगे. मैं दोनो व्यूस से इस केस को देख रहा हूँ. हमारे व्यू से भी और भूमिका के वकील के व्यू से भी अगर हमने उसपर केस किया तो. अगर उसने अपने पति को मारा है तो उसके पास कोई वजह होनी चाहिए"

"उसको इतना पैसा मिला तो है....." वो किसी छ्होटे बच्चे के तरह इस अंदाज़ में बोली के मेरा दिल किया के मैं उसका माथा चूम लूँ.

"अगर हम ध्यान से देखनें तो ये बात उसके खिलाफ नही उसके फेवर में जाती है. तुम कई साल से ऑस्ट्रेलिया में थी और तुम्हारे डॅडी घर छ्चोड़ चुके थे. किसी को नही पता था के वो कहाँ है. इस हालत में उनकी बीवी होने के नाते उनका जो कुच्छ भी था वो भूमिका का था. वो ऑलरेडी एक आलीशान घर में रह रही थी और तुम्हारे डॅड के बेशुमार पैसे पर उसको कंप्लीट आक्सेस थी. अगर देखा जाए तो उसको तो आक्च्युयली मिस्टर सोनी की मौत से नुकसान हुआ है. पहले जहाँ इतना सारा पैसा था, अब वहाँ सिर्फ़ इन्षुरेन्स क्लेम का पैसा है उसके पास. मैं मानता हूँ के इन्षुरेन्स क्लेम का पैसा भी बहुत ज़्यादा है पर पहले जितना था उससे कयि गुना कम है. तुम्हें लगता है के जो बेशुमार दौलत उसके पास ऑलरेडी थी, उस सबको वो सिर्फ़ इन्षुरेन्स क्लेम का पैसा हासिल करने के लिए रिस्क करेगी?"

"वो हैदर रहमान से शादी करना चाहती थी" रश्मि अब भी अपनी बात साबित करने में लगी हुई थी. एक पल को मुझे लगा के मैं अपना सर पीट लूँ. मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं कोर्ट में खड़ा बहस कर रहा हूँ.

"देखो इशान" वो मुझे फिर समझते हुए बोली " शी वाज़ ऑलमोस्ट एंगेज्ड टू हैदर बिफोर शी मॅरीड माइ फूलिश फादर. और फिर उसने हैदर को हमारे मुंबई वाले घर में बुलाना भी शुरू कर दिया. अब जबकि वो शादी शुदा नही है और उसके पास इन्षुरेन्स कंपनी से मिली एक बहुत मोटी रकम है, वो आसानी से उस कश्मीरी से शादी कर सकती है"
"क्या हम ये साबित कर सकते हैं के वो सच में इतनी लापरवाह थी?

"हाँ कर सकते हैं" रश्मि फ़ौरन बोली "जिसने मुझे ये बताया के खून की रात भूमिका यहाँ इस शहेर में आई थी वही इंसान ये भी बता सकती है के कैसे भूमिका और हैदर मेरे डॅड के रहते उन्ही के घर में लवबर्ड्स बने हुए थे"
"और कौन है ये बताने वाली?" मैने पुचछा.

"मेरी दोस्त है एक, तहज़ीब" रश्मि ने कहा "तुम चाहो तो मैं तुम्हारी बात करा सकती हूँ उससे"
"एक मिनट" मैने फ़ौरन कहा "तुमने उसको बता तो नही दिया के यू आर ट्राइयिंग टू फाइंड हू किल्ड युवर फादर?"
"आइ हॅव नोट टोल्ड हर डाइरेक्ट्ली" रश्मि ने कहा " बट आस शी ईज़ नो फूल, आइ फॅन्सी शी सस्पेक्ट्स."

"और तुम्हें लगता है के हम उसकी बात कर यकीन कर सकते हैं?" मैने पुचछा "आइ मीन डू योउ कन्सिडर हर एविडेन्स रिलाइयबल?"

रश्मि ने हाँ में सर हिलाया. उसके बाद मैं रश्मि को अपने बंगलो में जाने और फ्रिड्ज में किसी के छुप जाने वाली बात बताने लगा.

" फ्रिड्ज में? वाउ" रश्मि हैरत से बोली "नो वंडर के परच्छाई देखने के बाद जब तुम और डॅड घर के अंदर गये तो वहाँ तुम्हें कोई मिला नही."
"आक्च्युयली रश्मि" मैने कहा "मुझे लगता है के तुम्हारे डॅड जानते थे के घर के अंदर कोई है. अगर घर के अंदर भूमिका और हैदर थे तो मुझे लगता है के तुम्हारे डॅड को इस बात का पता था"

ये रश्मि के लिए एक बिल्कुल नयी बात थी. वो हैरत से मेरी और देखने लगी. ज़ुबान से उसँके कुच्छ नही कहा पर उसकी आँखों में मैने सवाल पढ़ लिया.

"जिस तरह से तुम्हारे डॅड मुझे घर के अंदर ले गये थे उससे लगता था के वो ये बात साबित करने पर तुले हुए थे के घर में कोई नही है. अगर मैं चलने से इनकार कर देता तो शायद वो मुझे घसीट कर अंदर ले जाते क्यूंकी वो बहुत शिद्दत से ये चाहते थे के मैं अंदर आकर अपनी तसल्ली कर लूं के घर में कोई नही है. मैं उस वक़्त उनके लिए एक अजनबी था पर फिर भी वो मुझसे बार बार कहकर घर के अंदर ले गये और फिर ज़बरदस्ती पूरा घर भी दिखाया. जिस तरह से उन्होने मुझे इस बात का यकीन दिलाया के घर में कोई नही है, उससे मुझे लगता है के वो जानते थे के घर में कोई है" मैने अपनी बात ख़तम की.

उसके बात कमरे में खामोशी च्छा गयी. मुझे समझ नही आ रहा था के उस वक़्त रश्मि के दिमाग़ में क्या चल रहा था पर वो खामोश बैठी थी. पता नही उसको मेरी बात से ऐतराज़ था या वो खुद भी मेरी बात से सहमत थी.

"तो अब क्या करना है?" थोड़ी देर बाद वो बोली
"पता नही रश्मि" मैने कहा "पर इस वक़्त मैं खुद भी इतना कन्फ्यूज़्ड हूँ के मेरे ख्याल से हमें हर बात की तफ़तीश करके पहले अपनी तसल्ली कर लेनी चाहिए इससे पहले के हम किसी पर मर्डर का इल्ज़ाम लगाएँ"

उसने सहमति में सर हिलाया.

क्रमशः........................
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06-29-2017, 11:17 AM,
#29
RE: Bhoot bangla-भूत बंगला
भूत बंगला पार्ट-18

गतान्क से आगे.................

दा गर्ल


"तुम अब मुझसे मिलने क्यूँ नही आते?" वो उस लड़के से कह रही थी.

रात के अंधेरे में वो खामोशी से फोन पर बात कर रही थी. वो जहाँ रहती थी वहाँ उसने किसी को अपनी गुज़री ज़िंदगी के बारे में नही बताया था. उस लड़के के कहने पर उसने सब को यही कहा था के वो गाओं से अकेली ही भागकर आई थी क्यूंकी उसके रिश्तेदार उसको बहुत परेशान करते थे. वो अक्सर रात को उस लड़के के फोन का इंतेज़ार करती थी और जब वो फोन पर उससे बात करती, वो लम्हे उसकी ज़िंदगी के सबसे ख़ुशगवार लम्हे होते थे.

"आजकल काम बहुत ज़्यादा हो गया है. वक़्त ही नही निकल पाता" दूसरी तरफ से उस लड़के की फोन पर आवाज़ आई.

"तुमने तो कहा था के हम साथ रहेंगे और अब यहाँ अकेले अकेले रहना पड़ रहा है. मुझे ये सब ठीक नही लग रहा" उसने शिकायत करने वाले अंदाज़ में कहा.

"ठीक तो मुझे भी नही लग रहा" लड़के ने कहा "बस कुच्छ और दिनो की परेशानी है उसके बाद सब ठीक हो जाएगा"

उन दोनो को शहेर आए काफ़ी वक़्त हो चुका था. यहाँ आने के बाद से ही वो दोनो अलग अलग रह रहे थे और उनके मिलने का सिलसिला भी काफ़ी कम होता जा रहा था. उसकी अपनी तबीयत भी काफ़ी खराब रहने लगी थी. आधे से ज़्यादा वक़्त तो उसको याद ही नही होता था के वो कहाँ होती है. उसको अंदर से लगने लगा था के उसके अंदर कुच्छ सही नही है क्यूंकी उसको गुस्सा बहुत ज़्यादा आने लगा था.

"कब मिलोगे?" उसने उम्मीद भरी आवाज़ में लड़के से पुचछा.
"कल शाम को मिलते हैं. उसी पार्क में" लड़के ने कहा तो उसके चेहरे पर मुस्कुराहट फेलति चली गयी.

फोन चुप चाप नीचे रखकर वो दबे हुए कदमों से अपने कमरे की तरफ बढ़ चली.

अगले दिन बताए हुए वक़्त पर वो सज धज कर उस लड़के से मिलने पहुँची. वो आज काफ़ी दिन बाद उससे मिलने आई थी इसलिए आने से पहले 10 बार उसने अपने आपको शीशे में देखा था और जब उसको यकीन हो गया के वो अच्छी लग रही है, तब कहीं जाकर उसने घर से बाहर कदम निकाला.

पार्क के एक कोने में वो बैठी रो रही थी. लड़के ने शाम को मिलने का वादा किया था और उस वक़्त रात के 9 बज चुके थे पर वो नही आया था. उसको गुस्सा भी आ रहा था और रोना भी. वो कितनी उम्मीद के साथ इतना सज संवर कर उससे मिलने आई थी. वो चाहती थी के इतने दिन बाद जब वो उससे मिले तो दोनो बैठकर घंटो तक बातें करते रहें, जैसे कि वो अक्सर तब करते थे जब गाओं में मिलते थे. पर जबसे वो शहेर आए थे तब से वो बदल गया था. कभी कभी रात को फोन करता था और आज पता नही कितने दिन बाद उसने मिलने का वादा किया था जो निभाया नही.

रात के 10 बजे जब उसको यकीन हो गया के वो नही आएगा तो उसने वापिस घर जाने का फ़ैसला किया. तभी एक तरफ हलचल से नज़र घूमकर देखा तो वहाँ एक आदमी खड़ा था. एक पल के लिए तो वो खुश हो गयी के शायद देर से ही सही पर वो उससे मिलने आ गया पर जब वो आदमी अंधेरे से निकलकर थोड़ी रोशनी में आया तो उसने देखा के वो कोई और था.

"चलती है क्या?" उस आदमी ने पुचछा
उसने जवाब नही दिया और उठकर पार्क के गेट की तरफ चल पड़ी. उसको जाता देखकर वो आदमी उसके पिछे पिछे आया.

"आए बोल ना. कितना लेगी?"
उस आदमी ने कहा तो भी उसके कोई जवाब नही दिया और खामोशी से कदम बढ़ती रही पर वो आदमी भी काफ़ी ढीठ था. पीछे पीछे आता रहा.
"अरे बता ना साली. नखरा क्या करती है. कहीं चलने का नही है तो यहीं पार्क में काम निपटा लेते हैं"

उसका दिमाग़ गुस्से में भन्ना रहा था. एक तो वो पहले से ही भड़की हुई थी के 5 घंटे इंतेज़ार करने के बाद भी वो लड़का उससे मिलने नही आया था और अब ये आदमी परेशान कर रहा था. उसका दिल तो कर रहा था के घूमकर उस आदमी का सर फोड़ दे पर बोली कुच्छ नही. बस गेट की तरफ कदम बढ़ाती रही.

"अरे रुक ना" कहते हुए उस आदमी ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया.
और जैसे ठीक उसी पल क़यामत आ गयी. उसका दिमाग़ गुस्से के मारे फॅट पड़ा और उसने घूमकर उस आदमी की तरफ देखा. दोनो की नज़रें मिली तो उस आदमी की आँखे हैरत से खुल गयी.

"आबे तेरी मा की" कहते हुए उसने उसका फ़ौरन हाथ छ्चोड़ दिया और पिछे को हो गया.

पर तब तक उसका गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच चुका था. वो किसी घायल शेरनी की तरफ उसकी तरफ लपकी. इस अचानक हुए हमले से वो आदमी लड़खदाया और नीचे ज़मीन पर गिरते चला गया. उसके गिरते ही वो उसके सीने पर चढ़ बैठी. पास ही पड़ा एक पथर अपने हाथ में उठाया और वार सीधा उस आदमी के सर पर किया. पहला वार होने के बाद उसका हाथ रुका नही और एक के बाद एक वार करती वो पथर से उस आदमी का सर फोड़ती चली गयी.
कोई एक घंटे बाद जब वो अपने घर के करीब पहुँची तो उसकी हालत खराब थी. बाल बिखरे हुए थे और हाथो में उस आदमी का खून सूख चुका था.

"ये क्या हाल बना रखा है तूने? और ये क्या कपड़े पहेन रखे हैं?" गेट के पास उसे अपनी पहचान का एक लड़का दिखाई दिया जिसने उसको हैरत से देखते हुए सवाल किया.

उसने लड़के के सवाल का कोई जवाब नही दिया और अपने कमरे की तरफ बढ़ गयी.

इशान की कहानी................................


मैं और मिश्रा मेरे ऑफीस में बैठे लंच कर रहे थे.
"तेरे बताने के बाद मैं बंगलो 13 गया था आंड आइ थिंक यू आर राइट" मिश्रा ने कहा
"तूने फ्रिड्ज देखा?" मैने पुचछा
"हां देखा और मुझे लगता है के तेरा अंदाज़ा सही है. अगर ट्रेस निकाल दी जाएँ तो उसमें एक क्या 2 आदमी समा सकते हैं" मिश्रा बोला
"और कुछ पता चला?" मैने पुचछा
"नही यार" मिश्रा ने कहा "और सच बोलूं तो अब मैं कोई ख़ास कोशिश कर भी नही रहा. अफीशियली तो ये केस मेरे हाथ से जा चुका है"
उसके बाद हम दोनो खामोशी से खाना खाते रहे. प्रिया अपनी टेबल पर बैठी डिन्नर कर रही थी. तभी मुझे रश्मि के साथ हुई अपनी मीटिंग का ध्यान आया और मुझे लगा के मुझे इस बारे में मिश्रा को बता देना चाहिए.
"मैं रश्मि से मिला था" मैने मिश्रा से कहा
"वो यहीं है अभी?" वो हैरत से बोला
"हां यहीं है और कुच्छ बताया उसने मुझे जो मुझे लगा के तुझको पता होना चाहिए" कहते हुए मैने उसको भूमिका के खून की रात यहीं इसी शहेर में होने की बात बताई.
"पर मुझे तो उसने कहा था के वो उस दिन मुंबई में थी" मिश्रा बोला
"एग्ज़ॅक्ट्ली" मैने कहा "दिन में वो वहीं थी पर रात में यहाँ थी और अगले दिन फिर वहीं थी"
थोड़ी देर तक मिश्रा खामोश रहा.
"वैसे एक बात सच कहीं यार तो मुझे नही लगता के उसने अपने पति को मारा है" थोड़ी देर बाद वो बोला
"लगता तो मुझे भी नही मेरे भाई पर फिर भी तुझे बताना ज़रूरी समझा" मैने कहा
"और अदिति के बारे में कुच्छ पता चला तुझे अपनी किताब के लिए?" मिश्रा ने पुचछा
"कुच्छ ख़ास नही. उसके बारे में हर कोई प्रेटी मच उतना ही जनता है जितना पोलीस फाइल्स में लिखा है. मैं तो सोच रहा था के ये आइडिया ड्रॉप ही कर दूँ" मैने मुस्कुराते हुए कहा
"अगर तू चाहे तो मैं उसके पति के साथ तेरी मीटिंग फिक्स करा सकता हूँ. शायद वहाँ से कुच्छ इन्फ़ॉर्मेशन हासिल हो सके" मिश्रा ने कहा
"वो ज़्यादा से ज़्यादा क्या कहेगा? आइ आम श्योर के वो उसकी बुराई ही करेगा. बताएगा के क्यूँ उसने अपनी बीवी का खून कर दिया और कैसे वो कितनी बुरी थी"
"फिर भी एक बार कोशिश करके देख ले" मिश्रा ने कहा "कुच्छ भी ना पता हो इससे बेटर तो ये है के कुच्छ तो पता हो"
"बात तो सही है. मीटिंग कब अरेंज करा सकता है?" मैने पुचछा
"जल्दी ही करने की कोशिश करूँगा. वैसे ये रश्मि का क्या चक्कर है?"
"कोई चक्कर नही है" मैने कहा
"तू कुच्छ ज़्यादा ही नही मिल रहा उससे आजकल?"
"मुश्किल से 2-3 बार मिला हूँ यार" मैने कहा पर मैं जानता था के मेरे चहेरे को पढ़कर मिश्रा समझ जाएगा के माजरा क्या है और उसने एग्ज़ॅक्ट्ली वही किया.
"माजरा कुच्छ और ही है मेरे भाई" उसने कहा "बस ज़रा संभलकर रहना"

"ये रश्मि कौन है?" मिश्रा के जाने के बाद प्रिया ने मुझसे पुचछा
"वो एक मर्डर हुआ था ना मेरी कॉलोनी में, सोनी मर्डर केस, जो मरा था उसकी बेटी है" मैने कहा

"आपको कैसे जानती है?" उसने पुचछा
"उसके बाप के खून के बाद ही मिली थी. चाहती है के मैं उसके बाप के खूनी को ढूँढने में उसकी मदद करूँ" मैने जवाब दिया
"और आप ऐसा कर रहे हो?"

"शायद" मैने टालने वाले अंदाज़ में जवाब दिया
"आप वकील से जासूस कब बन गये"
"जासूस नही बना वकील ही हूँ इसलिए तो देख रहा हूँ के मेरे लिए शायद एक नया क्लाइंट बन जाए" मैने हॅस्कर कहा.

"नया क्लाइंट या नयी क्लाइंट?" वो भी वैसे ही हस्ते हुए बोली
"एक ही बात है यार. क्लाइंट तो है" मैने कहा
"दिखने में कैसी है?" उसने पुचा
"क्या मतलब?"
"मतलब के अच्छी दिखती है या बुरी दिखती है, लड़को को जो पसंद है वो उसमें है के नही"

जाने क्यूँ पर प्रिया का रश्मि के बारे में यूँ बात करना मुझे पसंद सा नही आया.

"तू इतना क्यूँ पुच्छ रही है?" मैने कहा
"ऐसे ही. जस्ट क्यूरियस के वो क्या है जो लड़के को पागल कर देती है किसी लड़की के लिए" उसने कहा "क्यूंकी मेरे लिए तो आज तक कोई पागल नही हुआ"
उसकी बात सुनकर मैं हस पड़ा.

"देख लड़के सबसे पहले तो सुंदरता के चक्कर में ही पड़ते हैं. खूबसूरत चेहरा देखते ही लट्तू हो जाते हैं पर बाद में लड़की का नेचर है जिससे वो आक्चुयल में प्यार करते हैं" मैने कहा.

"सर अगर ऐसी बात है ना तो वो शादी में वो लड़का मेरे पिछे आता पर वो मेरी उस कज़िन के पिछे गया जो मेरे सामने कुच्छ नही थी" वो थोड़ा गुस्से में बोली.
"हां तेरी वो बात अधूरी रह गयी थी" मुझे याद आया "अब बता के हुआ क्या था?"

"शादी थी. एक लड़का दिखा. देखने में अच्छा था. उससे पहले मैं और मेरी कज़िन इस बारे में ही बात कर रहे थे के हमें भी कोई लड़का ढूँढके शादी कर लेनी चाहिए. उस लड़के को देखकर मेरी कज़िन ने मुझसे कहा के देख मैं तुझे दिखाती हूँ के लड़के को कैसे फसाते हैं. फिर ना जाने क्या सोचकर मैने कह दिया के चल दोनो शर्त लगते हैं के कौन फसा पाती है और वो मान गयी. मुझे क्या पता था के मेरा तो नंबर ही नही आएगा. ट्राइ तक करने का चान्स नही मिला मुझे"

"क्यूँ ऐसा क्या हुआ?" मैने पुचछा.
"उसने जाकर उस लड़के से बात की और उसके बाद तो वो लड़का ऐसे खुश हो गया जैसे उसको भगवान के दर्शन हो गये हों. मैने जाकर बात करने की कोशिश की तो मुझे तो उसने देखा तक नही, बस मेरी कज़िन के पिछे पिछे था"

"ऐसा क्या कह दिया उसको तेरी कज़िन ने?" मैने पुचछा
"आइ थिंक उसने क्या कहा डोएसन्थ मॅटर. उसने जो किया उसकी वजह से वो लड़का उसके आगे पिछे था" वो बोली.

"और क्या किया उसने?" मैने पुचछा तो वो शर्मा गयी.
"कैसे बताऊं. छ्चोड़िए जाने दीजिए. बस कुच्छ किया था उसने" प्रिया बात टालते हुए बोली.

"अरे बता ना" मैने ज़ोर डाला तो वो फिर शर्मा गयी.
"अरे मुझसे क्या शर्मा रही है. चल बता" मैने फिर ज़ोर डाला.

"सर वो उसको बात करने के बहाने एक तरफ ले गयी. मैं भी पिछे पिछे चल दी. उसको पता नही था के मैं देख रही हूँ. वो उस लड़के को छत पर ले गयी और एक कोने में खड़ी होकर बात करने लगी. जाने क्या बात कर रहे थे पर उसकी बात सुनकर वो लड़का काफ़ी खुश तो लग रहा था. मैं च्छुपकर खड़ी हुई दोनो को देख रही थी और उसके बाद तो मेरी कज़िन ने जो हरकत की, वो देखकर तो मेरी आँखें खुली ही रह गयी"

"अच्छा?" मैने पुचछा "ऐसा क्या किया उसने?"

"सर बात करते करते वो अचानक उस लड़के के करीब गयी और उसने अपना हाथ उस लड़के के सीधा वहाँ पर रख दिया" प्रिया अपनी आवाज़ नीची करके ऐसे बोली जैसे कोई बहुत बड़े राज़ की बात बता रही हो.

"कहाँ रख दिया?" मैने भी उसी अंदाज़ में पुचछा.
"वहाँ पे सिर" उसने मेरी पेंट की तरफ आँख से इशारा करते हुए कहा.
"कहाँ?" मैने उसको च्छेदते हुए कहा.
"वहाँ पे सर. वो लड़को वाली जगह पे" उसने फिर दोबारा मेरी पेंट की तरफ इशारा किया.
"यहाँ पे?" मैने अपने लंड पर हाथ रखा.

"हां" वो जल्दी से बोली "और बस. वो लड़का तो जैसे उसका भक्त हो गया. और एक घंटे बाद तो मुझे दोनो दिखाई ही नही दिए कहीं. उसके बाद 2 दिन तक सर वो लड़का बस मेरी कज़िन के आगे पिछे ही घूमता रहा"

"वो इसलिए पगली क्यूंकी तेरी कज़िन उस लड़के को सीधा फाइनल स्टेज पर ले आई" मैने कहा.
"फाइनल स्टेज?" वो बोली
"हां मतलब लड़के लड़की के बीच में एंड में जो होता है. जब उस लड़के ने देखा के तेरी कज़िन सीधा मतलब की बात कर रही है तो वो उसके पिछे पिछे हो लिया" मैने कहा तो वो गहरी सोच में पड़ गयी.
"क्या सोच रही है?" मैने पुचछा.
"मुझे तो ये सब कुच्छ भी नही पता सर" वो बोली के तभी मेरा फोन बजने लगा.

फोन रश्मि का था. वो शाम को मिलना चाहती थी. मैने हाँ कहके फोन रख दिया. तब तक प्रिया वापिस अपनी डेस्क पर जाकर बैठ चुकी थी. फोन रखके मैने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराया.

"ऐसे क्या देख रहे हैं?" उसने पुचछा
"सोच रहा के मेरे अगले बर्तडे तक एक साल कैसे कटेगा?" मैने हस्ते हुए कहा.
"मतलब?"
"मतलब ये के इस बर्तडे पेर गिफ्ट में जो चीज़ दिखाई दी है, अगले बर्तडे पर भी वही देखने की तमन्ना है"

मैने कहा तो वो शरम से लाल हो गयी.

"आहमेद साहब" उस शाम जब मैं घर जा रहा था तो मेरा फोन बजा. आवाज़ अंजान थी.

"जी हां बोल रहा हूँ. आप?" मैने पुचछा.
"हमारा नाम वीरेंदर ठकराल है" उस आदमी ने अपना नाम बताया तो मैं फ़ौरन उसको पहचान गया. वो उस लड़के का बाप था जिसपर रेप केस का इल्ज़ाम था.

"कहिए ठकराल साहब" मैने पुचछा.
"कहने का काम तो आपका है वकील साहब. कहते तो आप हैं अदालत में. हम तो बस सुनने वालो में से हैं" दूसरी तरफ से आवाज़ आई.

उसकी इस बात का मेरे पास कोई जवाब नही था. मैं जानता था के वो मुझ पर ताना मार रहा है पर मैं जवाब में क्या कहूँ ये मुझे समझ नही आया.

"जी मैं समझा नही" मैं इतना ही कह पाया.

"तो कोई बात नही हम समझा देते हैं. आपको ये केस हारना है वाकई साहब" मुझे उस आदमी की साफ बात सुनकर हैरानी हुई. उसका कोई किराए का गुंडा ये कहता तो कोई बात नही थी पर उसने खुद मुझे ये बात कही, इसको कोर्ट में मैं उसके अगेन्स्ट उसे कर सकता था और ये शायद वो खुद भी जानता था, पर फिर भी कह रहा था.

"देखिए......." मैने कहना शुरू ही किया था के उसने मेरी बात काट दी.
"फोन पर तो कुच्छ भी नही दिखता आहमेद जी" उसने कहा "आप एक काम कीजिए हमारे घर आ जाइए, फिर कुच्छ आप दिखाना और कुच्छ हम भी दिखा देंगे"

मैं जानता था के वो मुझे घर बुलाके मुझसे क्या बात करेगा इसलिए मैने इनकार करना ही बेहतर समझा.
"मुझे नही लगता के ये ठीक रहेगा" मैने कहा.

"तो कोई बात नही. हम आपके घर आ जाते हैं. हम जानते हैं के आप कहाँ रहते हैं. वो क्या है के हम ये केस जल्दी से जल्दी निपटना चाहते हैं क्यूंकी लड़के को पढ़ने के लिए अमेरिका भेजना है और इस केस के चलते हम ऐसा कर नही पा रहे"

उसकी बात सुनकर मैं फिर हैरत में पड़ गया. आख़िर क्या चाहता है? मुझसे यूँ खुले आम मिलना कोर्ट में बिल्कुल उसके अगेन्स्ट जाता है और फिर भी मुझसे मिलने की ये कोशिश? और जिस अंदाज़ में वो कह रहा था, मैं जानता था के वो सच में मुझसे मिलने आ भी जाएगा.

"नही आपको आने की ज़रूरत नही" मैने कहा "मैं आ जाऊँगा. आप टाइम बता दीजिए"
उसने मुझे अगले दिन का टाइम देकर फोन रख दिया.

वीरेंदर ठकराल शहेर का बहुत बड़ा आदमी था. एक बहुत ही अमीर बिज़्नेस मॅन. पॉलिटिक्स में इन्वॉल्व्ड था. जब मैने ये रेप केस लिया था तो हर किसी ने मुझे कहा था के ठकराल के साथ पंगा लेने का नतीजा ये होगा के मेरी भी लाश कहीं पड़ी मिलेगी जो के अब तक हुआ नही था. केस लेने के बाद मुझे ये अड्वाइस दी गयी थी के मैं केस हारकर ठकराल के साथ हाथ मिला लूँ क्यूंकी वो मेरे काफ़ी काम आ सकता है. ये बात खुद भी मेरे दिमाग़ में कई बार आई थी और अब भी मेरे दिमाग़ में कहीं ऐसा करने की ख्वाहिश थी.

क्रमशः................................
-  - 
Reply
12-02-2018, 04:28 PM,
#30
RE: Bhoot bangla-भूत बंगला
Thanks sir, what a story is this. I loved it, but where is the next part. I want to know the end. So kindly share
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