Hindi Sex Porn खूनी हवेली की वासना
07-01-2018, 12:11 PM,
#21
RE: Hindi Sex Porn खूनी हवेली की वासना
खूनी हवेली की वासना पार्ट --21

गतान्क से आगे........................

"थोड़ी देर और चूसो ना" उनको उठते देखकर ठाकुर ने कहा

"बाद में चूस दूँगी" ठकुराइन ने अपनी नाइटी उतारकर एक तरफ फेंकी और पूरी तरह नंगी होकर बिस्तर पर बैठ गयी "फिलहाल मुझे ठंडा करो"

"आज बड़ी गरम हो रखी हो" ठाकुर ने अपना लंड खुद हिलाते हुए कहा "बात क्या है?"

"कोई बात नही है" ठकुराइन ने कहा "अब जल्दी करो"

वो बिस्तर के कोने पर बैठी हुई थी और ठाकुर उनके सामने खड़े हुए थे. ठकुराइन पिछे को होती हुई बिस्तर पर लेट गयी. उनकी गांद बिस्तर के कोने पर थी और टांगे उन्होने हवा में उठा ली. चूत खुल कर पूरी तरह ठाकुर

के सामने आ गयी.

ठाकुर एक पल उन्हें देख कर मुस्कुराए और आगे बढ़कर अपना लंड चूत पर रख कर धीरे से आगे को दबाया. पूरी गीली चूत में लंड आराम से अंदर तक घुस गया.

लंड के अंदर घुसते ही ठकुराइन की चूत में लगी आग जैसे कम होने के बजाय और बढ़ गयी. उनकी चूचियो पर उनके दोनो निपल्स एकदम सख़्त हो गये, चूत इस कदर गीली हो गयी के नीचे चादर पर भी पानी नज़र आने लगा. अपने दोनो बाहें फेलाकर ठकुराइन ने ठाकुर को अपने उपेर खींच लिया. वो अब भी नीचे खड़े हुए थे और ठकुराइन की दोनो टाँगो को उपेर को पकड़ रखा था. नीचे झुकते ही उन्होने दोनो निपल्स को बार बारी चूसना शुरू कर दिया और चूत में धक्को को और तेज़ कर दिया.

उनके दोनो हाथ कभी ठकुराइन की चूचियाँ दबाते, कभी उनके टाँगो को पकड़कर फिर उपेर कर देते, कभी उनकी जाँघो को सहलाते.

उनकी इन सब हरकतों से ठकुराइन के अंदर लगी आग और बढ़ती जा रही थी. वो ठाकुर की गांद को पकड़कर अपनी ओर खींचने लगी.

"और ज़ोर से ... और ज़ोर से ...." उन्होने ठाकुर को उकसाया

ठाकुर एक बार फिर खड़े हो गये और ठकुराइन की टाँगो को पकड़ कर पूरी जान से धक्के मारने लगे. वो अपने लंड को चूत से तकरीबन पूरा ही बाहर खींच लेते और फिर एक ज़ोरदार धक्के से जड़ तक अंदर घुसा देते.

नीचे पड़ी ठकुराइन जैसे एक नशे की सी हालत में थी. ठाकुर का लंड उनकी चूत को पूरी तरह भर रहा था और ज़ोरदार धक्को से उनका पूरा जिस्म हिल रहा था. हर धक्के के साथ उनकी गांद पर ठाकुर के टटटे टकरा रहे थे.

पर ठकुराइन को फिर भी लग रहा था के उनकी आग ठंडी नही हो रही थी, कहीं कुच्छ कमी थी.

ठाकुर के धक्को में तेज़ी आ गयी थी. उन्होने अपने दोनो हाथों से ठकुराइन की दोनो चूचियो को पूरे ज़ोर से पकड़ रखा था और ठकुराइन जानती थी के अब किसी भी पल खेल ख़तम हो जाएगा.

पर ठकुराइन अब भी उसी आग में जल रही थी.

और फिर उन्होने बेकरार होकर आईने में नज़र डाली. उनके दिल में एक ख्वाहिश थी के वो वहाँ खड़ा हो, फिर से उन्हें देख रहा हो और जैसे भगवान ने उनकी सुन ली.

वो खिड़की पर च्छूपा खड़ा था और अंदर झाँक रहा था.

हवेली के बाहर अंधेरा था और उसको यूँ खड़े हुए देख पाना मुश्किल था. पहली नज़र में तो शायद पता भी ना चलता कि कोई वहाँ खड़ा अंदर देख रहा है पर ठकुराइन की नज़र तो उसी को तलाश रही थी इसलिए फ़ौरन वो नज़र आ गया.

वो उनको पूरी तरह नंगी चुदवाते हुए देख रहा था और शायद बाहर खड़ा अपना लंड हिला रहा था.

जैसे इस ख्याल ने एक कमाल सा कर दिया. जो आग ठकुराइन के अंदर लगी हुई थी वो अचानक ज्वालामुखी की तरह फॅट पड़ी. चूत से पानी बह चला और एक अजीब सा सुकून उनके दिल में उतरता चला गया.

"चोदो मुझे" अचानक ठकुराइन ने वो किया जो कभी नही किया था "ज़ोर से चोदो मुझे"

और ठीक उसी पल शीशे में एक पल के लिए ठकुराइन की नज़र उस लड़के की नज़र से मिली. दोनो ने एक दूसरे को देखा. लड़का समझ गया के वो उसको देख रही थी और वो भी ये समझ गयी के लड़का जानता है के उन्होने उसको देख लिया.

और ठकुराइन उसको देखते हुए झाड़ गयी.

"आआहह" वो चिल्ला उठी "मैं गयी. लंड पूरा अंदर घुसा दो"

ठाकुर ने एक ज़ोर से धक्का लगाया और लंड चूत में अंदर डाल कर रुक गये. उनका वीर्य ठकुराइन की चूत को धीरे धीरे भरने लगा.

दोनो की साँस भारी हो रही थी. वो लड़का खिड़की से जा चुका था.

ठाकुर ठकुराइन के उपेर लेटे हैरत से उनको देख रहे थे के आज वो ऐसा बोल कैसे पड़ी और ठकुराइन नीचे बैठी शरम से ज़मीन में गढ़ी जा रही थी.

"हे भगवान" उन्होने दिल ही दिल में सोचा "क्या कर रही हूँ मैं? वो मेरा अपना .... नही नही, ये ठीक नही है. पाप है"

उस रात ठाकुर के कुच्छ रिश्तेदार हवेली आए हुए.थे पूरा दिन घर में हसी मज़ाक का माहौल बना रहा और रात को भी सब उसी मूड में थे.

लाइट ना होने की वजह से सब लोग हवेली की छत पर बैठे हुए थे और ताश खेल रहे थे. शराब और कुच्छ खाने की चीज़ें भी वहीं लगी हुई थी.

नीचे ज़मीन पर बिछि कालीन पर गोल घेरा बनाए हुए बैठे थे. मौसम तोड़ा ठंडा था इसलिए सबने अपनी टाँगो को कंबल के अंदर घुसाया हुआ था.

खुद ठकुराइन ने भी उस रात सबके कहने पर हल्की सी शराब पी ली थी. ताश खेलना उन्हें आता नही था इसलिए वो एक तरफ छत की दीवार से टेक लगाए बैठी थी और सबको देख रही थी. तभी वो छत पर आया.

"तू भी खेलेगा?" ठाकुर ने उससे पुछा तो उसने इनकार में गर्दन हिला दी और सीधा आकर ठकुराइन के पास बैठ गया.

ठकुराइन ने अपनी नज़र दूसरी तरफ घुमा ली. उस रात के बाद वो अब तक उससे नज़र नही मिला पाई थी.

वो सीधा आकर उनकी बगल में बैठ गया और जो कंबल ठकुराइन ने ओढ़ रखा था वही कंबल अपनी टाँगो पर डालकर दीवार से टेक लगाके बैठ गया. वो ठकुराइन के बिल्कुल नज़दीक बैठा था पर वो जानकर दूसरी तरफ देखने का नाटक कर रही थी.

अंधेरी रात थी और छत पर सिर्फ़ उस वक़्त एक लालटेन जल रही थी जिसकी रोशनी में पत्ते खेले जा रहे थे. ठकुराइन और वो लड़के दूसरो से थोड़ा हटके एक तरफ बैठे थे जिसकी वजह से वो दोनो तकरीबन अंधेरे में ही थे.

ठकुराइन अपनी सोच में ही गुम थी के उन्हें अपने पावं पर कुच्छ महसूस हुआ. उन्होने नज़र घूमकर देखा तो दिल धड़क उठा. पहले वो थोड़ा सा फासला बना कर बैठा था पर अब खिसक कर बिल्कुल ठकुराइन के करीब आ चुका था और कंबल के अंदर अपना पावं ठकुराइन के पावं पर रगड़ रहा था.

ठकुराइन ने घूर कर उसकी तरफ देखा और दूर खिसकने लगी के तभी उसने उनका हाथ पकड़ लिया और अगले पल वो किया जो ठकुराइन ने अपने सपनो में भी नही सोचा था.

उसने कंबल के अंदर अपना पाजामा खिसका कर नीचे कर रखा था और ठकुराइन का हाथ पकड़ कर सीधा अपने नंगे लंड पर रख दिया.

सरिता देवी को जैसे 1000 वॉट का झटका लगा. उन्हें समझने में एक सेकेंड नही लगा के चादर के अंदर उनके हाथ में क्या था. उन्होने अपना हाथ वापिस खींचने की कोशिश की पर लड़के ने उनका हाथ अपने हाथ में पकड़ रखा था और ज़बरदस्ती उनकी मुट्ठी अपने लंड पर बंद कर रखी थी.

सरिता देवी ने ताक़त लगाकर हाथ वापिस लेने की कोशिश की. लड़के ने भी पूरी ताक़त से उनका हाथ अपने लंड पर पकड़े रखा, इसी खींचा-तानी में ठाकुर की नज़र उन दोनो पर पड़ गयी.

"अर्रे दोनो माँ बेटे क्या आपस में लड़ रहे हो?" उन्होने हॅस्कर पुछा

"नही बस बात कर रहे हैं" ठकुराइन ने भी ऐसे ही ठंडी आवाज़ बनाकर कहा.

ठाकुर के देखने की वजह से ठकुराइन को अपना हाथ खींचने की कोशिश बंद करनी पड़ी. उनका हाथ ढीला पड़ते ही लड़के ने उसे अपने लंड पर उपेर नीचे करना शुरू कर दिया.

"मत कर" ठकुराइन ने कहा "कोई देख लेगा"

वो लड़का नही माना और ऐसे ही उनका हाथ अपने लंड पर उपेर नीचे करता रहा. वो अपने हाथ से ठकुराइन के हाथ को अपने लंड पर बंद करके मुट्ठी मार रहा था.

"भगवान के लिए मान जा. किसी ने देख लिया तो ग़ज़ब हो जाएगा" ठकुराइन ने फिर कोशिश की

वो फिर भी नही माना और ऐसे ही उनका हाथ अपने लंड पर उपेर नीचे करता रहा. अंधेरा होने की वजह से उनकी ये हरकत किसी को नज़र नही आ रही थी. लड़का वैसे ही ठकुराइन के हाथ को उपेर नीचे करता रहा और अपने हाथ में ठकुराइन को उसका लंड खड़ा होता महसूस होने लगा. धीरे धीरे पूरा लंड सख़्त हो गया और ठकुराइन के हाथ में कस गया.

एक पल के लिए ठकुराइन के दिमाग़ में वो नज़ारा याद आया जब वो नंगी बैठी इसी लंड को चूस रही थी.

ये ख्याल दिमाग़ में आते ही जैसे बेध्यानी में उनकी मुट्ठी लंड पर कस गयी. उनके ऐसा करते ही लड़के ने अपना हाथ उनके हाथ से हटा लिया पर ठकुराइन अब भी उसके लंड को वैसे ही हिलाती रही. उन्हें इस बात का एहसास ही नही हुआ के अब वो खुद उसका लंड हिला रही हैं, वो तो कबका अपना हाथ हटा चुका था.

धीरे धीरे उसका लंड फूलने लगा और उसकी तेज़ होती साँस से ठकुराइन को अंदाज़ा हो गया के वो छूटने वाला है.

उन्होने अपना हाथ हिलाना और तेज़ कर दिया. उनका पूरा हाथ कंबल के अंदर उसके लंड को जकड़े हुए थे और पूरी तेज़ी से उपेर नीचे जा रहा था.

और फिर अचानक उस लड़के के जिस्म ने झटका खाया और ठकुराइन के हाथ में कुच्छ गीला गीला आ गया. वो जानती थी के उस लड़के का काम हो चुका था और उनके हाथ में अब क्या था.

एक पल के लिए उन्हें वो वक़्त याद आया जब यही चीज़ उनके हाथ के बजाय उनके मुँह में थी और कुच्छ उन्होने अंजाने में निगल भी ली थी.

ठकुराइन तब तक लंड को हिलाती रही जब तक के वो बैठकर सिकुड गया और ठकुराइन के हाथ से अपने आप ही छूट गया. तब ठकुराइन को एहसास हुआ के इतनी देर से वो खुद ही लंड हिलाए जा रही थी. लड़का तो आँखें बंद किए बैठा था. उन्होने एक नज़र उसके चेहरे पर डाली. लड़के ने भी अपनी आँखें खोली और ठकुराइन से नज़र मिलाई.

वो दोनो अच्छी तरह से जानते थे के आज हर पुराना रिश्ता तोड़कर उनके बीच एक नया रिश्ता जनम ले चुका था.

ठाकुर उस दिन ठकुराइन को अपने आम का बाग दिखाने लाए थे. 2 गाड़ियाँ थी. एक में ठाकुर और ठकुराइन जिसे खुद ठाकुर चला रहे थे और दूसरी में वो लड़का और कुच्छ नौकर और 3 नौकर थे.

अगले एक घंटे तक ठाकुर ठकुराइन को बड़े शौक ने अपना नया खरीदा आम का बाग दिखाते रहे. ठकुराइन ने कई बार महसूस किया के वो लड़का सबकी नज़र बचा कर बार बार ठकुराइन की तरफ देख रहा था पर वो जब भी पलट कर उसकी तरफ देखती तो वो नज़र घुमा लेता था.

"मुझे प्यास लगी है" काफ़ी देर तक घूमने के बाद ठकुराइन ने कहा.

"पानी की बॉटल?" ठाकुर ने एक नौकर से पुछा

"वो गाड़ी में ही रखी है मालिक" नौकर ने कहा "मैं अभी ले आता हूँ"

नौकर जाने के लिए मुड़ा ही था के अचानक उस लड़के ने उसको रोक दिया.

"यहाँ नज़दीक में ही एक हॅंड-पंप लगा है. वहाँ चलते हैं" उसने कहा

"हां आप वहाँ जाकर पानी पी लीजिए. नलके का पानी अच्छा ताज़ा भी होगा" ठाकुर ने ठकुराइन से कहा

लकड़े ने ठकुराइन को साथ चलने का इशारा किया. वो एक पल के लिए सोच में पड़ गयी. उसके साथ अकेले जाने में वो झिझक रही थी पर इस वक़्त कुच्छ कर नही सकती थी. क्या कहती ठाकुर और नौकरों से के क्यूँ उसके साथ जाना नही चाहती. वो तो उनका खुद का ...क्रमशः........................................
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07-01-2018, 12:12 PM,
#22
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खूनी हवेली की वासना पार्ट --22

गतान्क से आगे........................

"क्या हुआ?" उनकी सोच ठाकुर की आवाज़ से टूटी.

"कुच्छ नही" उन्होने धीरे से कहा और लड़के को चलने का इशारा किया "चलो"

वो लड़का आगे आगे और ठकुराइन पिछे पिछे चल पड़े. उस दिन जो छत पर हुआ था उसके बाद ठकुराइन और उस लड़के की अब तक कोई बात नही हुई थी और ना ही उसके बाद उसने कोई और हरकत करने की कोशिश की थी. पर जाने क्यूँ ठकुराइन को लग रहा था के वो अकेले में उन्हें इसलिए ले जा रहा है ताकि उनके साथ फिर कुच्छ कर सके. जो बात उन्हे समझ नही आ रही थी वो ये थी के सब कुच्छ जानते हुए भी वो क्यूँ उसकी हर बात रख लेती थी, करने देती थी उसको वो सब जो की वो करना चाहता था. क्या इसकी वजह ये थी के कहीं दिल में उन्हें भी ये सब अच्छा लग रहा था? क्या वो खुद भी अंजाने में इस खेल में भाग ले रही थी.

"ये खेल जो की इसलिए मज़ेदार था क्यूंकी ये पूरी दुनिया की नज़र में सबसे बड़ा पाप था? और क्यूंकी इसमें किसी को पता चल जाए तो जान जाने का ख़तरा था? क्या पाप और ख़तरे का रोमांच इस खेल को मज़ेदार बना रहा था जिसकी वजह से वो खुद भी बिना सोचे समझे उस लड़के के साथ कदम मिलाए जा रही थी?"

अचानक वो लड़का रुका तो ठकुराइन का सोचने का सिलसिला टूट गया.

"ये सामने" उसने सामने लगे एक हॅंडपंप की तरफ इशारा किया.

ठकुराइन ने देखा के वो बाग के बीच बना एक छ्होटा सा कमरा था जिसमें शायद खेत की ज़रूरत का समान रखा हुआ था. कमरे पर बाहर ताला लगा था और उसके बाहर एक हॅंडपंप लगा हुआ था.

"आप पानी पी लो" लड़के ने नलके की हत्थी को पकड़ा और उपेर नीचे किया. नलके से पानी बह चला

वहाँ पानी पीने के लिए कोई ग्लास या कोई और बर्तन नही था इसलिए ठकुराइन को झुक कर नलके के नीचे हाथ लगाना पड़ा ताकि वो पानी पी सकें. कुच्छ देर तक वो नलके की हत्थी चलाता रहा और ठकुराइन पानी पीती रही. प्यास बुझ गयी तो ठकुराइन ने वैसे ही झुके झुके अपना चेहरा धोना शुरू कर दिया.

अचानक नलके से पानी आना बंद हो गया. ठकुराइन ने चेहरा उठाकर देखा तो वो लड़का अब नलके की हत्थी पकड़े नही खड़ा था वो सोच ही रही थी के अचानक उन्हें अपनी गांद पर 2 हाथ महसूस हुए. वो समझ गयी के हाथ किसके थे.

चेहरा धोते वक़्त उनकी आँखें बंद थी इसलिए उनको पता ही नही चला के कब वो लड़का चुप चाप नालका चलाना छ्चोड़कर उनके पिछे जा खड़ा हुआ.

ठकुराइन के जिस्म को जैसे लकवा मार गया. उनके दिल की धड़कन तेज़ हो गयी और उन्होने फ़ौरन सीधी होने की कोशिश की पर उसने उनकी कमर पर अपना हाथ रखा और उन्हें दबाकर फिर झुका दिया. ठकुराइन ने अपने सामने लगे हॅंडपंप को पकड़ लिया और फिर झुक गयी.

लकड़े ने अपने दोनो हाथों से उनकी गांद को पकड़ रखा था और सारी के उपेर से ही धीरे धीरे सहला रहा था. उसके हाथ उनकी गांद की गोलैईयों की पूरी तरह नाप रहे थे. वो महसूस कर सकती थी के उसके दोनो हाथ काँप रहे थे पर फिर भी वो ऐसे लगा हुआ था जैसे की आटा गूँध रहा हो.

ठकुराइन वैसे ही खामोशी से झुकी रही. खुद उनकी समझ से बाहर था के वो ऐसा क्यूँ कर रही थी.

"क्या वो इसलिए ये सब कर रही थी क्यूंकी ये पाप है और पाप का एहसास इसको और मज़ेदार बना रहा है? क्या इसलिए के इसमें ख़तरा है के वो यूँ खुले में ये सब कर रही थी और ठाकुर कहीं से भी आ सकते थे?" जो भी था, वो वैसे ही झुकी रही.

लड़का थोड़ी देर तक सारी के उपेर से उनकी गांद को दबाता रहा. उसके हाथ धीरे धीरे गांद से उपेर सरक कर सारी और ब्लाउस के बीच उनके नंगे पेट पर आ गये. ठकुराइन के दिल दी धड़कन अपने नंगे जिस्म पर उसके हाथ महसूस करते ही और तेज़ हो गयी और उनके घुटने काँपने लगे.

पर उसके हाथ उनके पेट पर रुके नही. वो धीरे धीरे और उपेर को आते रहे. ठकुराइन समझ गयी के उसके हाथ कहाँ जा रहे हैं पर इससे पहले के वो कुच्छ कहती या करती, हाथ अपनी मंज़िल पर पहुँच गये.

ब्लाउस के उपेर से ही उसने उनकी बड़ी बड़ी चूचियो को अपने हाथों में भर लिया और पूरे ज़ोर से दबा दिया.

और ठीक उसी पल झुकी हुई ठकुराइन की चीज़ पर कोई सख़्त चीज़ आ लगी. वो जानती थी के ये उसका लंड था.

ठकुराइन फ़ौरन उठकर सीधी खड़ी हो गयी और लड़के का हाथ पकड़ कर एक झटके से अपनी छाती से हटा दिया. उनका दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था जैसे अभी छाती से निकलकर उनके मुँह में आ जाएगा.

ठकुराइन उस लड़के से अलग हुई और दो कदम आगे को आकर अपनी उखड़ी हुई साँस संभालने लगी. हैरत उन्हें इस बात की थी के उस वक़्त उनकी खुद की टाँगो के बीच की जगह गीली हो चुकी थी.

वो लड़का फिर धीरे से उनके पिछे आया और ठकुराइन के कंधे पर हाथ रखा. ठकुराइन घबराकर थोड़ा और आगे को हुई और सामने खड़े बड़े से पेड़ के साथ जा लगी. वो लड़का फिर उनके पिछे आ गया और आकर उनसे सॅट गया.

वो लंबाई में ठकुराइन के बराबर ही था इसलिए पिछे से जब वो उनसे सटा तो उसका लंड सीधा फिर उनकी गांद पर आकर दबने लगा. उसकी छाती ठकुराइन की कमर पर और चेहरा उनकी गर्दन पर आ गया.

ठकुराइन बेसूध से पेड़ की तरफ मुँह किए खड़ी थी. उनके चेहरे के सामने उस बड़े से आम के पेड़ का तना था जिसको वो पकड़े खड़ी थी.

आँखें तो उनकी कबकि बंद हो चुकी थी.

"कोई आ जाएगा" उखड़ती हुई सांसो के बीच उन्होने धीरे से कहा

"बस 2 मिनिट" उस लड़के ने जवाब दिया और अपना चेहरा ठकुराइन के कंधे पर उनके बालों के बीच दबा दिया. ठकुराइन भी जैसे उसकी बात मानकर 2 मिनिट के लिए सब भूल गयी. भूल गयी के वो एक आम के बाग में खुले में खड़े थे. उनके चारों तरफ आम के पेड़ थे पर वो ये भूल गयी के थोड़ी ही दूर पर खुद ठाकुर और घर के 3 नौकर थे.

अब वो लड़का साफ साफ उनकी गांद पर अपना लंड रगड़ रहा था. वो पिछे से कपड़े के उपेर से ही उनकी गांद पर इतनी ज़ोर ज़ोर से धक्के मार रहा था के ठकुराइन का पूरा शरीर पेड़ के तने के साथ घिसने लगा था. वो अब भी अपना चेहरा उनके बालों में च्छुपाए हुए था.

उसके दोनो हाथ अब तक ठकुराइन की कमर को पकड़े हुए थे पर फिर धीरे से उसका एक हाथ ठकुराइन के पेट पर आ गया और उपेर को आने लगा. ठकुराइन जानती थी के वो फिर उनकी छाती पर आकर ही रुकेगा पर अब ना तो उनमें उसको रोकने की हिम्मत थी और ना ही शायद वो रोकना चाहती थी. उसका हाथ उपेर को खिसकता हुआ उनकी चूचियो पर आकर रुका और ब्लाउस के उपेर से वो उनकी चूचियाँ मसल्ने लगा. पीछे से वो अब भी उनकी गांद पर अपना लंड रगड़ रहा था.

फिर एक पल को वो रुका. उसका लंड ठकुराइन की गांद से हट गया और जिस हाथ से उसने उनकी कमर पकड़ रखी थी वो हाथ भी हटा लिया. दूसरे हाथ से वो अब भी उनकी चूचियाँ दबा रहा था. ठकुराइन को लगा के शायद उसका काम हो गया और वो हिलने ही लगी थी के उसने फिर दूसरे हाथ से उनकी कमर को थाम लिया और फिर अपना लंड उनकी गांद से सटा दिया.

ठकुराइन को समझते देर नही लगी के वो क्या कर रहा था. उसने अपना पाजामा खोल कर अपना लंड बाहर निकाल लिया था और अब अब अपना नंगा लंड उनकी सारी के उपेर से उनकी गांद पर रगड़ रहा था.

"कोई आ जाएगा" उन्होने फिर आँखें बंद करते हुए कहा

"बस हो गया" उसने धीरे से उनके कान में कहा

और उसके बाद तो जैसे एक तूफान सा आ गया. उनके पिछे खड़ा वो जैसे वासना से पागल हो उठा था. पूरी तेज़ी से वो अपना लंड कभी उनकी गांद पर रगड़ता तो कभी ऐसे धक्के मारता जैसे सही में उनकी गांद मार रहा हो. उसके हाथ भी अब एक जगाब पर नही रुके. एक हाथ जो कमर तक था अब कपड़ो के उपेर से ही कभी उनकी गांद पर जाता तो कभी उनकी टाँगो पर. दूसरा हाथ कभी चूचियाँ दबाता तो कभी उनके नंगे पेट पर आ जाता.

और फिर उसकी हिम्मत बढ़ती चली गयी.

इस बार उसका हाथ जब छातियो तक आया तो रुका नही. उपेर आता हुआ सीधा ठकुराइन के गले तक आया और अपना रास्ता ढूंढता हुआ सीधा पहले उनके ब्लाउस और फिर उनकी ब्रा से होता हुआ उनकी नंगी चूचियो पर आ रुका.

"आआअहह" ठकुराइन सिर्फ़ इतना ही कह सकी.

उसने एक हाथ से उनकी नंगी चूची पूरे ज़ोर से दबाकर पकड़ ली. अपनी चूत पर कुच्छ महसूस हुआ तो ठकुराइन को पता चला के उसका दूसरा हाथ अब सारी के उपेर से सीधा उनकी चूत पर था.

एक हाथ से उनकी नंगी चूची को पकड़े, दूसरे हाथ से चूत को सारी के उपेर से रगड़ते हुए वो उनकी गांद पर ऐसे धक्के मार रहा था जैसे लंड गांद के अंदर बाहर कर रहा हो.

उसकी साँस बढ़ती चली गयी. धक्को में और तेज़ी आ गयी. ठकुराइन जानती थी के अब क्या होगा.

"मेरी सारी खराब मत करना" उनका इतना कहना ही था के वो लड़का एक झटके से अलग हो गया. ठकुराइन ने उसपर एक नज़र डाली तो वो उनसे अलग खड़ा अपना लंड हिला रहा था. ज़मीन पर गिरते उसके वीर्य को देख कर ठकुराइन को फिर अपने मुँह में उसके टेस्ट की याद आ गयी.

"बड़ी देर लगा दी माँ बेटे ने" थोड़ी देर बाद जब अपनी हालत ठीक करके वो ठाकुर से मिले तो ठाकुर ने कहा "अच्छा आप एक काम करें. आप दोनो हवेली निकल जाओ. मुझे कुच्छ काम है यहाँ खेतों पर तो मैं शाम तक आ जाऊँगा"

थोड़ी देर बाद ठकुराइन उस लड़के के साथ अकेली कार में बैठी हवेली की तरफ जा रही थी. ठाकुर और तीनो नौकर पिछे खेतों पर ही रुक गये थे.

क्रमशः........................................
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07-01-2018, 12:12 PM,
#23
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खूनी हवेली की वासना पार्ट --23

गतान्क से आगे........................

बिंदिया अपने कमरे में समान बाँधे बैठी थी. चंदर अपना समान बाँध रहा था और पायल बाहर खेल रही थी.

"चंदर" बिंदिया ने कहा

चंदर ने नज़र उठाकर उसकी तरफ देखा.

"ठाकुर साहब ने आज फिर कहलवाया है के तुझे हवेली ना लेकर जाऊं. वो चाहते हैं के तू यहीं रुक कर खेतों की देख भाल करे"

चंदर ने अजीब नज़रों से उसकी तरफ देखा.

"ऐसे मत देख मेरी तरफ" बिंदिया बोली "रुक जा ना यहीं पर. मैं रोज़ आ जाया करूँगी तेरे पास. तब चोद लेना. और वैसे भी हवेली में किसी को भनक पड़ गयी के तेरे मेरे बीच क्या चल रहा है तो आफ़त आ जाएगी"

चंदर ने इनकार में सर हिलाया

"समझ मेरी बात को. यहाँ आराम से कोई नही होता. मैं दिन में तुझसे एक बार मिलने आ जाया करूँगी और तब जितना जी चाहे चोद लिया करना. जैसे चाहे चोद लेना मैं मना नही करूँगी पर हवेली चलने की ज़िद ना कर. मुझे ठाकुर साहब की बात ना मानते हुए डर लगता है"

चंदर ने गुस्से में उसकी तरफ देखा और फिर अपने पावं पटकता हुआ झोपड़ी से बाहर निकल गया.

सुबह ही ठाकुर साहब ने कहलवाया था के बिंदिया अब हवेली आकर रहना शुरू कर दे. पूरे गाओं को पता चल चुका था के ठकुराइन बिस्तर से लग चुकी हैं. अब चल फिर नही सकती और हर पल कोई ना कोई उनके साथ चाहिए जो उनकी देख रेख कर सके.

दूसरी बात जो पूरे गाओं में जंगल में आग की तरह फेली थी वो ये थी के जै को ठाकुर साहब ने हवेली से निकाल दिया था. कोई नही जानता था के क्यूँ पर अब वो शहर में बने ठाकुर के एक मकान में रहता था. पूरे गाओं का यही कहना था के ठाकुर ने उसको हवेली से इसलिए निकाला ताकि उन्हें जायदाद में बटवारा ना करना पड़े.

जो भी था, बिंदिया को सिर्फ़ ये पता था के उसको अब हवेली में जाकर रहना है. और एक तरह से वो ये सोचकर खुश भी थी. यूँ खेतों के बीच अकेले रहते हुए उसको डर भी लगता था. उसकी बेटी पायल अब जवानी की दहलीज़ पर कदम रख रही थी और बिंदिया के पास उसके बढ़ते जिस्म को ढकने के लिए कपड़े तक नही थे. अब अगर वो हवेली में रहेगी, तो पैसे भी थोड़े ज़्यादा मिल जाया करेंगे और खाना पीना भी हवेली में ही हो जाया करेगा.

यही सब सोचती वो अपनी जगह से उठी और समान पर एक आखरी नज़र डाली. पूरी हवेली में अब कुच्छ भी नही था. सिर्फ़ एक टूटी हुई चारपाई पड़ी थी. बाकी सब समान बँध चुका था. चंदर ने भी बिंदिया के कहने पर अपना समान बाँध लिया था पर बिंदिया को ठाकुर का हुकुम ना मानते हुए दर लग रहा था और उनका हुकुम था के चंदर यहीं खेतों में रहे, हवेली ना आए.

"इसको समझाना पड़ेगा. बाद में आती जाती रहूंगी. ये इस बात को नही समझ रहा के सिर्फ़ मैं इसकी ज़रूरत नही, ये खुद भी मेरी ज़रूरत है" सोचते हुए बिंदिया उठी और झोपड़ी के टूटे हुए दरवाज़े को बंद करके परदा डाल दिया.

झोपड़ी के कोने में ही उसने नहाने की जगह बना रखी थी. समान बाँधने के चक्कर में उसकी हालत खराब हो चुकी थी इसलिए उसने हवेली जाने से पहले एक बार नहाने की सोची.

बिंदिया ने अपने कपड़े उतारकर वहीं कोने में टाँग दिए और पूरी नंगी होकर अपने आपको एक बार देखा. अपने जिस्म पर उसको हमेशा से ही गर्व रहा था. एक बच्चे की माँ थी वो पर जिस्म पर कहीं भी ज़रा भी चर्बी ना निशान नही था. खेतों में काम करते करते उसका पूरा जिस्म गाथा हुआ था. चौड़े कंधे, पतली कमर, गठी हुई टांगे, बड़ी बड़ी पर एकदम तनी हुई चूचियाँ. उसके कूल्हे तक ज़रा भी ढीले नही पड़े थे और एकदम टाइट थे. जब वो घाघरा पहनकर चलती, तो पिछे से सारे मर्द उसकी टाइट गांद देखकर आहें भरते रहते थे, ये बात वो खुद भी जानती थी.

मुस्कुराते हुए उसने वहीं रखी बाल्टी से लेकर पानी अपने उपेर डाला और पूरे जिस्म पर साबुन मलने लगी.

वो अभी नहा ही रही थी के झोपड़ी का दरवाज़ा, जिसमें कुण्डा नही थी, खुला और परदा हटाता हुआ चंदर अंदर आ गया.

बिंदिया ने एक नज़र उसपर डाली और मुस्कुरा कर अपने जिस्म पर साबुन लगाती रही.

"पायल कहाँ है" बिंदिया ने पुछा तो चंदर ने उसको इशारे से बताया के बाहर पेड़ के नीचे वो खेलती खेलती सो गयी थी.

बिंदिया जानती थी के चंदर कभी पायल के सामने उसके साथ कोई हरकत नही करेगा इसलिए जब उसने कहा के पायल बाहर सो रही है, वो समझ गयी के वो अंदर क्या करने आया है.

चंदर ने भी एक एक करके अपने सारे कपड़े उतार दिए. अपने खड़े लंड को हिलाता हुआ वो बिंदिया के करीब आया और उसके कंधो पर हाथ रखा.

उसके छूते ही बिंदिया का पूरा शरीर सिहर उठा. वो एक बहुत ही गरम औरत थी जिसको गरम होने में ज़रा भी वक़्त नही लगता था. उसका बस चलता तो वो दिन में 10 बार चुदवाती. इस वक़्त भी चंदर को यूँ नंगा होकर अपने करीब आते देखकर उसकी चूत से पानी बह चला था.

पर चंदर के दिमाग़ में शायद कुच्छ और ही था. बिंदिया ने आगे बढ़कर उसके होंठ चूमने की कोशिश ही की थी के चंदर ने उसको दोनो कंधो से पकड़ा और लगभग धक्का देते हुए घूमकर दीवार से लगा दिया.

अब बिंदिया दीवार के साथ लगी खड़ी थी. उसका चेहरा दीवार की तरफ और कमर चंदर की तरफ थी जिससे वो सटा खड़ा था. उसका नंगा जिस्म बिंदिया के जिस्म से रग़ाद रहा था और लंड गांद के बीच फसा हुआ था. बिंदिया के पूरे शरीर पर साबुन लगा हुआ था जिसकी वजह से दोनो के जिस्म आपस में एक दूसरे पर बिना किसी रुकावट के फिसल रहे थे.

"क्या हुआ?" बिंदिया बोली "अभी तक नाराज़ है?"

जवाब में चंदर ने उसके हाथ में पकड़ा साबुन लिया और अपने एक हाथ में लेकर साबुन अपने लंड पर रगड़ने लगा.

"क्या कर रहा है?" बिंदिया ने पुछा

वो पलटकर चंदर की तरफ देखने ही वाली थी के चंदर ने उसको फिर दीवार से धक्का देकर सटा दिया.

"चंदर" इससे पहले के बिंदिया आगे को कुच्छ कहती, चंदर का साबुन लगा लंड उसकी गांद के बीच आ फसा. बिंदिया समझ गयी के वो क्या करने वाला है और वो फिर पलटने लगी पर तब तक देर हो चुकी थी.

चंदर ने पूरी ताक़त से धक्का लगाया. लंड और बिंदिया की गांद, दोनो पर साबुन लगा हुआ था. लंड बिना रुके पूरा का पूरा बिंदिया की गांद में घुसता चला गया.

"निकाल निकाल" बिंदिया ऐसे तड़प उठी जैसे पानी बिना मच्चली. उसको दिन में तारे दिखाई देने लगे थे. चंदर का पूरा लंड उसकी गांद में समाया हुआ था और उसे ऐसे लग रहा था जैसे उसको काटकर 2 टुकड़ो में बाँट दिया गया हो.

बिंदिया पूरी ताक़त से चंदर को अपने से दूर करने की कोशिश कर रही थी पर वो उसके लिए काफ़ी ताक़तवर साबित हुआ. पूरी जान लगाने के बाद भी बिंदिया ना तो उसको अलग कर पाई और ना ही दीवार से हट सकी.

चंदर ने धक्के मारने शुरू कर दिए थे. उसका लंड बिंदिया की गांद में अंदर बाहर हो रहा था.

"मार ली तूने मेरी चंदर" बिंदिया की आँखों से आँसू बह चले "निकाल ले अपना लंड बाहर. मेरी जान निकल रही है. आआहह आअहह ... मत कर"

बिंदिया रोए जा रही थी, बड़बदाए जा रही थी और चंदर चुप चाप उसकी गांद पर धक्के लगाए जा रहा था. उस वक़्त जैसे वो गूंगे के साथ साथ बेहरा भी हो गया था.

"आआहह .... मर गयी मैं माँ .... मार ली रे तूने चंदर..... आज मेरी गांद भी मार ली ... " बिंदिया का दर्द जैसे बढ़ता जा रहा था.

आज से पहले भी चंदर ने उसकी गांद केयी बार मारने की कोशिश की थी पर बिंदिया ने कभी उसको लंड डालने नही दिया था. बस वो अपनी अंगुली ही उसको चोद्ते वक़्त उसकी गांद में घुसा लेता था. पर आज अचानक हुए इस हमले में ना तो बिंदिया उसको रोक पाई, ना कुच्छ कह पाई.

चंदर का लंड पूरी तरह से उसकी गांद में अंदर बाहर हो रहा था.

"आआहह चंदर..... " बिंदिया वैसे ही बड़बड़ा रही थी "धीरे .... धीरे कर. .... पूरा तो बाहर मत निकाल ... थोड़ा सा अंदर बाहर करता रह .... पूरा बाहर निकालके मत डाल ... अया"

और फिर दर्द जैसे कम होता चला गया. बिंदिया की गांद ने अपने आपको लंड के अनुसार अड्जस्ट कर लिया और बिंदिया के दर्द की जगह एक अजीब मज़े ने ले ली थी जिसका अंदाज़ा उसको आज से पहले कभी ना हुआ था.

"आअहह चंदर" वो अब भी बड़बड़ा रही थी पर बोल बदल चुके थे "मज़ा आ गया रे ,..... इतने वक़्त से क्यूँ रुका हुआ था ... इतनी मस्त गांद मैं तेरे सामने सारा दिन हिलती फिरती थी .. पहले क्यूँ नही मारी?"

उसकी हर बात पर चंदर का जोश बढ़ता जा रहा था और वो और ज़ोर से धक्के मार रहा था.

"अब तक क्यूँ सिर्फ़ चूत मारकर काम चला रहा था? मेरे मुँह में लंड घुसा लिया, चूत में घुसा लिया तो गांद क्यूँ छ्चोड़ रखी थी ... यहाँ भी घुसाता ... ये मज़ा मुझे पहले क्यूँ नही दिया रे"

चंदर के धक्के और बिंदिया का बड़बड़ा दोनो ही तेज़ होते जा रहे थे

"और ज़ोर से ... हां ऐसे ही ... धक्का ज़ोर से लगा ... पूरा लंड बाहर खींच ... हां अब घुसा पूरा अंदर तक ... मार ले मेरी गांद ... तेरे लिए ही बचा रखी थी ... इस गांद के बहुत दीवाने हैं पर आज मारी तूने है"

दोनो अब जैसे पागल हो चुके थे. चंदर पागलपन में धक्के लगा रहा था और बिंदिया पागल की तरह बड़बड़ा रही थी, गांद मरा रही थी.

"मार मेरी गांद ... मार ... मार ... ज़ोर से मार ... लगा धक्का ... पूरा घुसा ... मर्द नही है क्या .... बच्चे की तरह मत मार ... ज़ोर लगाके ढककर मार"

और अचानक चंदर ने पूरा लंड उसकी गांद में घुसाया और वहीं रुक गया. लंड से निकलता वीर्य बिंदिया की गांद में भरने लगा.

आउज़ इसके साथ खुद बिंदिया भी ख़तम होती चली गयी.

थोड़ी देर बाद जब दोनो की साँस थमी तो बिंदिया ने अपनी आँखें बंद किए हुए पिछे खड़े चंदर के बालों में हाथ फिराया. वो दोनो अब भी वैसे ही खड़े थे और लंड अब तक बिंदिया की गांद में था.

"तू मेरे साथ ही चलेगा चंदर" बिंदिया बोली "ठाकुर साहब कुच्छ भी कहें, तू हवेली में ही रहेगा मेरे साथ. तुझे यहाँ छ्चोड़ गयी तो हवेली में मेरी गांद कौन मारा करेगा?"

पीछे खड़े चंदर के चेहरे पर मुस्कुराहट फेल गयी. उसका प्लान कामयाबी की तरफ बढ़ रहा था. हवेली में रहना मतलब ठाकुर के करीब रहना और मौका मिलते ही ....

क्रमशः........................................
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07-01-2018, 12:12 PM,
#24
RE: Hindi Sex Porn खूनी हवेली की वासना
खूनी हवेली की वासना पार्ट --24

गतान्क से आगे........................

बिंदिया पोलीस स्टेशन में ख़ान के सामने बैठी थी.

"चाई लॉगी?" ख़ान ने पुछा तो बिंदिया ने इनकार में सर हिला दिया

ख़ान उसके सामने बैठ गया और एक पेन निकालकर अपनी डाइयरी खोली.

"हाँ तो अब बताना शुरू करो" उसने बिंदिया से कहाँ

"मैने कुच्छ नही किया साहब" बिंदिया ने फ़ौरन कहा

"तो मैने कब कहा के तुमने किया है?" ख़ान ने जवाब दिया "मैं तो सिर्फ़ तुमसे ये पुच्छ रहा हूँ के खून की रात तुम कहाँ थी और तुमने क्या देखा?"

"मैं किचन में थी साहब" बिंदिया ने कहा "उधर की काम कर रही थी, आप चाहें तो मेरी बेटी से पुच्छ लें, वो उधर ही थी मेरे साथ"

"ह्म्‍म्म्म" ख़ान ने अपनी डाइयरी की तरफ देखा. वहाँ उसने पहले से ही यही लिखा हुआ था के बिंदिया खून के वक़्त अपनी बेटी के साथ थी.

"और बाकी सब लोग कहाँ थे उस वक़्त?" उसने बिंदिया से पुछा

"अभी मैं क्या बताऊं साहब" बिंदिया आँखें घूमाते हुए बोली "मैं तो शाम से ही किचन में खाने का इंटेज़ाम कर रही थी"

"

सोचके बताओ" ख़ान ने कहा

"ह्म्‍म्म्म .... चंदर बाहर दरवाज़े पर था, पायल मेरे साथ थी, भूषण बाहर कार लेने को गया था और मालकिन दरवाज़े के पास बैठी थी हमेशा की तरह. बाकी का पता नही"

"किसी को आते जाते देखा तुमने ठाकुर साहब के कमरे में?" ख़ान ने सवाल किया

"मैने तो देखा नही पर पायल बोली थी के छ्होटे मालिक गये थे बड़े मालिक के कमरे में"

"छ्होटे मालिक?" ख़ान ने सवालिया नज़र से देखा

"तेज बाबू" बिंदिया ने जवाब दिया

"फिर?"

"फिर कुच्छ ज़ोर ज़ोर से बोलने की आवाज़ आई. असल में उसी आवाज़ को सुनकर मैने पायल से पुछा था के क्या हुआ तो वो बोली के तेज बाबू गये थे बड़े मालिक के कमरे में"

"चिल्लाने की आवज़ किसकी थी?" ख़ान ने पुचछा

"बड़े मालिक और तेज बाबू दोनो की ही थी. कुच्छ कहा सुनी हो गयी थी शायद"

"किस बारे में बात कर रहे थे वो?" ख़ान ने डाइयरी में सारी बातें लिखते हुए सवाल किया

"ये तो समझ नही आया साहब" बिंदिया ने जवाब दिया पर ख़ान फ़ौरन समझ गया के वो झूठ बोल रही थी.

"खैर" उसने पेन नीचे रखा "कुच्छ हवेली में रहने वालो के बारे में बताओ"

ख़ान खुद जानता था के बिंदिया कुच्छ नही बताएगी. अभी थोड़ी देर पहले ही उसने सॉफ झूठ बोल दिया था के वो नही जानती तेज और ठाकुर किस बात को लेकर लड़ रहे थे.

"अभी मैं क्या बताऊं साहब" बिंदिया ने ख़ान की उम्मीद के मुताबिक ही जवाब दिया "मैं तो बस एक नौकरानी हूँ. बड़े लोगों की बातें मैं क्या जानूँगी भला"

"तो चलो मैं ही पुछ्ता हूँ" ख़ान ने फिर डाइयरी में लिखना शुरू किया "रूपाली के बारे में क्या जानती हो. सच बताना"

"मेमसाहिब बहुत अच्छी औरत हैं. सबका बहुत ध्यान रखती हैं. मेरे को अपने पुराने कपड़े देती हैं पहेन्ने को"

"मैं ये नही पुच्छ रहा. ये बताओ के उनका अपने पति और घर के बाकी लोगों के साथ रिश्ता कैसा था?"

"जैसा होना चाहिए वैसा ही था. सुख शांति से रहती थी" बिंदिया ने फिर गोल मोल जवाब दिया

ख़ान समझ गया के बिंदिया से इस तरह सवाल करके उसको कुच्छ हासिल नही होगा. खेली खाई औरत थी, ऐसे नही टूटेगी.

"काब्से रह रही हो तुम हवेली में?" उसने सवाल किया

"अभी तो बहुत बरस हो गये साहब" बिंदिया ने जवाब दिया "मेरे मरद के मरने के बाद से मैं, पायल और चंदर इधर ही रहने को आ गये थे हवेली में"

"और ऐसा क्यूँ?"

"बड़ी मालकिन को चोट लगने के बाद से उनका ख्याल रखती थी मैं. वो तो बिस्तर से खुद उठ भी नही सकती. रात को पानी वगेरह भी मैं ही उठके देती हूँ"

"तुम उनके कमरे में सोती हो?" ख़ान ने पुछा

"कभी कभी" बिंदिया बोलती रही "जब कभी उनकी तबीयत ज़्यादा खराब हो तब. नही तो मैं अपने ही कमरे में सोती हूँ"

"ठकुराइन और ठाकुर अलग अलग कमरे में क्यूँ सोते हैं?" ख़ान ने सवाल किया

थोड़ी देर के लिए खामोशी च्छा गयी. बिंदिया को समझ नही आ रहा था के वो क्या जवाब दे ये उसके चेहरे से सॉफ ज़ाहिर था.

"अभी उनके लिए एक अलग बिस्तर चाहिए. सोते में हिल डुल नही सकती इसलिए. कभी कभी रात भर दर्द में कराहती हैं जिससे ठाकुर साहब की नींद खराब होती थी इसलिए"

ख़ान को ये बात हाज़ाम नही हुई. अगर बीवी दर्द में कराह रही हो तो किस तरह का पति होगा जो जाकर अलग सो जाएगा, बजाय इसके के अपनी बीवी का ख्याल रखे.

"तुम्हारा अपना रिश्ता कैसा था ठाकुर साहब के साथ?"

ख़ान के सवाल करते ही बिंदिया के चेहरे पर जो भाव बदले उन्हें देखते ही ख़ान समझ गया के इस बार तीर निशाने पर लगा है.

"रिश्ता मतलब?" बिंदिया ने संभालते हुए पुछा

"मतलब तुम्हारी बात चीत कैसी थी ठाकुर साहब के साथ? तुम्हारे साथ उनका रवैयय्या कैसा था?"

"ठीक ही था" बिंदिया बोली "जैसा मालिक नौकर का होता है. कभी मैं ग़लती कर देती थी काम करते हुए तो चिल्ला भी देते थे ठाकुर साहब मुझपर"

थोड़ी देर बाद बिंदिया उठकर पोलीस स्टेशन से चली गयी. ख़ान उससे और भी पुच्छना चाहता था पर वो समझ गया था के बिंदिया आसानी से जवाब देने वाली औरतों में से नही. जिस एक बात का उसको पूरी तरह यकीन था वो ये थी के कुच्छ था बिंदिया और ठाकुर के बीच जिसकी वजह से रिश्ता शब्द सुनते ही वो बौखला गयी थी.

ख़ान जै के सामने बैठा था.

"बहुत दबाव है मेरे उपेर के अब तक चार्ज शीट क्यूँ दाखिल नही की गयी है" वो जै से बोला

"किसी पर शक है आपको?" जै ने पुछा

"सब पर है और किसी पर भी नही" ख़ान ने अपना सर पकड़ते हुए बोला "कहानी हर बार घूम कर फिर एक ही बात पे आ जाती है के हर किसी की गवाही कोई ना कोई दे रहा है. या तो हवेली में मौजूद लोगों को किसी ना किसी ने कहीं ना कहीं देखा है है जिनको नही देखा उनकी गवाही इस बात से मिल जाती है के उनको कमरे में जाते किसी ने भी नही देखा"

थोड़ी देर दोनो चुप बैठे रहे.

"केस शुरू हो गया तो क्या लगता है आपको?" जै ने चुप्पी तोड़ी

"शुरू हो गया तो एक या दो हियरिंग्स में ख़तम हो जाएगा और तुम्हें मौत की सज़ा ही होगी ये मानके चलो" ख़ान ने जवाब दिया

थोड़ी देर के लिए फिर खामोशी च्छा गयी.

"मुझे समझ ये नही आ रहा के शुरू करूँ तो किससे करूँ. तुम्हारे कहने के मुताबिक मैने नौकरों से शुरू किया पर जिससे बात की उसने गोल मोल जवाब ही दिए. ठाकुर खानदान इस सब में इन्वॉल्व्ड है और कई बड़े लोगों का दबाव होने की वजह से मैं ज़ोर ज़बरदस्ती से भी काम नही ले सकता"

"किससे बात की आपने?" जै ने पुचछा

"बिंदिया"

"ह्म्‍म्म्म" जै मुस्कुराते हुए बोला "वो ऐसे कुच्छ नही बोलेगी पर हां खून करने का हौसला और ताक़त दोनो है उसमें, अगर वजह उसके पास हो तो"

ख़ान ने अपनी आँखें सिकोडते हुए जै की तरफ देखा. जै इशारा समझ गया.

"कम ओन ख़ान साहब" जै ने जवाब दिया "गाओं की पली बढ़ी औरत है वो, खेतों में काम करती थी, पति के मरने के 2 बच्चो को पाल पोसकर बड़ा किया, आपको नही लगता के इतना जिगरा होगा उसमें?"

ख़ान ने हामी भरते हुए गर्दन हिलाई.

"और वो ऐसे कोई जवाब नही देगी, बल्कि हवेली का कोई नौकर अगर कुच्छ जानता है तो ऐसे नही बताएगा क्यूंकी उनको अपनी जान का ख़तरा है के अगर पुरुषोत्तम या तेज को ये पता चल गया के उन्होने ठाकुरों के खिलाफ कुच्छ बोला है तो"

"कहना क्या चाह रहे हो?" ख़ान ने पुछा

"यही ख़ान साहब के उन सबकी दुखती रग पे हाथ रखिए. एक ऐसी नस पकडीए जिसके दबाते ही वो गा कर आपको सब बताएँ"

"शाबाश मेरे शेर. अब इतना बता रहे हो तो ये भी बता दो के ऐसी दुखती रग मैं लाऊँ कहाँ से सबके लिए"

जै ख़ान की तरफ देखकर मुस्कुराने लगा. उस पल वो किसी लोमड़ी की तरह लग रहा था जो हर किसी का कच्चा चिट्ठा जानती हो. ख़ान को समझते एक पल नही लगा.

"तुम जानते हो, ऑफ कोर्स. हवेली में रहे हो, ठाकुर खानदान का हिस्सा हो, तुम्हें तो पता होगा ही"

"सबके बारे में तो नही जानता पर इस बिंदिया के बारे में ऐसा कुच्छ बता सकता हूँ के वो आपके कदमों में गिर जाएगी और जो आप कहोने वो करेगी"

"बोलते रहो"

"ये एक गाओं है ख़ान साहब" जै ने टेबल पर अपने हाथों से तबला बजाते हुए कहा "यहाँ अब भी सबसे बड़ी चीज़ इज़्ज़त होती है, भले खाने के लिए 2 वक़्त की रोटी ना मिले. आप किसी की इज़्ज़त को उच्छालने की धमकी दो, वो वहीं टूट जाएगा"

"सीधे मतलब की बात पे आओ" ख़ान ने जै का हाथ पकड़ कर रोका "और ये तबला बजाना बंद करो"

"चंदू को जानते हैं?" जै ने पुछा

"हां. बिंदिया का बेटा. क्यूँ?"

"सगा बेटा नही है वो उसका" जै बोला

"जानता हूँ"

"तो आपको क्या लगता है के वो उसको अपने साथ क्यूँ रखती है, हर पल, हर जगह"

"इसमें ऐसा क्या है जो नॉर्मल नही है? वो उसको अपना बेटा मानती है"

"ठाकुर साहब के मना करने के बावजूद हवेली लाई थी वो उसको. सुलाती भी रात को अपने ही कमरे में है, किसी छ्होटे बच्चे की तरह"

क्रमशः........................................
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07-01-2018, 12:12 PM,
#25
RE: Hindi Sex Porn खूनी हवेली की वासना
खूनी हवेली की वासना पार्ट --25

गतान्क से आगे........................

"कहना क्या चाह रहे हो?" ख़ान ने हल्के गुस्से से पुछा

"सोचिए"

ख़ान ने एक पल के लिए सोचा और फिर हैरत से जै की तरफ देखा

"बकवास कर रहे हो तुम"

जै ने इनकार में गर्दन हिलाई

"तुम्हें कैसे पता?"

"अपनी आँखों से देखा मैने" जै मुस्कुराते हुए बोला

"और अगर ऐसा ना हुआ तो?"

"जो चीज़ मैने खुद अपनी आँखों से देखी, बार बार देखी, वो ग़लत कैसी हो सकती है ख़ान साहब?"

"अगर तुम्हारी बात सच भी है जै तो काफ़ी कुच्छ इस बात पे भी डिपेंड करता है के बिंदिया जानती कितना है, और क्या जानती है"

जै ने हाँ में गर्दन हिलाई.

"मैं उसको इस बात की धमकी देकर डराउ भी पर अगर उसको हक़ीक़त में कुच्छ नही पता तो सब डरना धमकाना बेकार है"

जै ख़ान की बात सुनकर चुप चाप हां में गर्दन हिलाता रहा.

"वैसे एक बात तो है" ख़ान ने कहा "एक बात पर वो बौखला तो गयी थी"

"किस बात पर?"

"मैने उससे पुछा के ठाकुर के साथ उसका रिश्ता कैसा था और इस पर वो ऐसे चौंक पड़ी जैसे मैने ये पुच्छ लिया हो के ठाकुर के साथ वो आखरी बार कब सोई थी"

"हो तो सकता है" जै ने हामी भारी "चाची काफ़ी सालों से उनसे अलग ही सो रही है और आक्सिडेंट के बाद से तो वो बिस्तर से हिल भी नही पाती. ऐसी हालत में इतने सालों तक चाचा किसी औरत के साथ ना रहें हो ये यकीन करने काबिल बात है नही"

"हां और घर की नौकरानी जो हर पल हाज़िर रहती है उससे आसान क्या होगा"

ख़ान ने बात में बात जोड़ी

"और ख़ास तौर से अगर नौकरानी इतनी गरम हो के अपने बेटे की उमर के लड़के के साथ सोती हो" जै ने बात ख़तम करते हुए कहा

"चलो मैं देखता हूं के ये बात कहाँ पहुँचती है. फिलहाल तो तुम उम्मीद ही करो बस के वो बिंदिया कुच्छ जानती हो"

जै चुप रहा.

"अगर पहले सवाल का जवाब मिल जाए तो दूसरा सवाल अपने हाल हो जाएगा" ख़ान ने कहा

"पहला सवाल?"

"हां" ख़ान ने कहा "अगर किसी तरह ये समझ आ जाए के बंद कमरे के अंदर सबकी नज़र बचा कर खून कैसे हुआ तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है के खूनी कौन है"

"कमरा बंद कहाँ था" जै बोला "दरवाज़ा खुला हुआ था"

"उस दरवाज़े के बाहर तो 2 लोग बैठे थे मेरे भाई" ख़ान ने कहा "दरवाज़े को छ्चोड़कर तो कमरा तो बंद था ना. खिड़की की सिट्कॅनी अंदर से लगी हुई थी"

"जब मैं अंदर दाखिल हुआ तो सिर्फ़ ये देखा था के खिड़की बंद है, सिट्कॅनी के बारे में तो मैं भी कुच्छ नही कह सकता"

"हां अगर सामने लाश पड़ी हो तो खिड़की की सिट्कॅनी की तरफ किसका ध्यान जाता है. वैसे ......." ख़ान कहता कहता रुक गया

"वैसे?" जै ने पुछा

"कुच्छ आया है दिमाग़ में, पहले एक बार खुद देख लूँ, बाद में बताऊँगा"

थोड़ी देर बाद ख़ान अपनी जीप में सवार वापिस गाओं की तरफ चल पड़ा.

उसी शाम वो फिर एक बार हवेली में था. उसकी किस्मत थी के हवेली के सब लोग कहीं गये हुए थे और सिर्फ़ एक पायल और भूषण ही हवेली में थे.

ख़ान ठाकुर के कमरे में खिड़की के सामने खड़ा था.

कमरे में सब कुच्छ वैसा ही था जैसा की पहले, कुच्छ ख़ास बदला नही गया था सिवाय इसके के ज़मीन पर वो कालीन बदल दी गयी थी. ठाकुर के खून के धब्बो वाली कालीन हटा दी गयी थी.

ख़ान बड़े ध्यान से खिड़की की तरफ देख रहा था. खिड़की पर नीचे की तरफ सिर्फ़ एक सिट्कॅनी थी जिसको नीचे कुंडे में गिरने पर खिड़की बंद होती थी. आम तौर पर खिड़कियों में उपेर की तरफ भी सिटकनी होती है जिसको चढ़ा कर खिड़की लॉक की जा सकती है पर इस खिड़की में नही. यहाँ सिर्फ़ एक ही सिट्कॅनी थी.

और ख़ान के दिमाग़ में 2 बाते घूम रही थी जिसपे उसको खुद हैरत थी के उसने ऐसा पहले क्यूँ नही सोचा.

1. खून होने के बाद हवेली में तूफान सा आ गया था. हर किसी का ध्यान जै की तरफ था. तो क्या ये मुमकिन नही के जिसने भी खून किया, वो उस मौके का फ़ायडा उठाकर कमरे में दाखिल हुआ और धीरे से सिट्कॅनी लगा दी जिससे ये लगे के खिड़की पहले से ही अंदर से बंद थी.

2. दूसरी बात के लिए ख़ान ने सिट्कॅनी उपेर की और खिड़की खोली. उसने सिट्कॅनी को घुमा कर टेढ़ा नही किया, बस सीधा सीधा ही उपेर की ओर खींच दी. फिर वो खिड़की पर चढ़ा और बाहर कूद गया. बाहर निकल कर उसने खिड़की को धीरे से बंद करना शुरू किया. जब खिड़की के दोनो किवाड़ तकरीबन बंद हो ही गये तो उसने एक झटके से खिड़की को बंद कर दिया.

झटका लगने की वजह से उपेर की और सीधी खींची हुई सिट्कॅनी नीचे कुंडे में जा गिरी और खिड़की अंदर की तरफ से बंद हो गयी.

कल्लो से आखरी बार बात करने के बाद रूपाली के दिल को जैसे सुकून सा मिल गया था. उसका ये डर के कल्लो कहीं किसी से ये ना कह दे के रूपाली ने उनको देखा था अब जा चुका था. बल्कि कल्लो का उससे डर कर ये विनती करना के वो किसी से शिकायत ना करे उसको और हौसला दे रहा था.

इसके बाद कुच्छ दिन तक रूपाली की कल्लो से इस बारे में कोई बात नही हुई. कल्लो अब भी काफ़ी संभाल गयी थी. रूपाली ने कई बार कोशिश की पर कल्लो तो शंभू काका से इस तरह दूर रहने लगी थी जैसे काका में काँटे उग आए हों. चाहकर भी रूपाली उन दोनो को फिर साथ में नही देख सकी.

उस दिन वो अपने कमरे में बिस्तर पर बैठी पढ़ रही थी. एग्ज़ॅम्स पास आ रहे थे और पिच्छले कुच्छ दिन से उसका ध्यान पढ़ाई में नही लग रहा था. फैल होने का मतलब वो अच्छी तरह जानती थी इसलिए अपने बाप के डर से किताबों में सर खपा रही थी.

तभी कल्लो उसके कमरे में दाखिल हुई और झाड़ू लगाने लगी. उसने सफेद एक सलवार कमीज़ पहेन रखा था और गले में दुपट्टा नही था.

पढ़ते पढ़ते रूपाली ने एक नज़र कल्लो पर डाली और फिर किताब की तरफ देखने लगी. पर उस एक झलक में उसे जो दिखाई दिया उसने रूपाली को दोबारा नज़र उठाने पर मजबूर कर दिया.

कल्लो झुकी हुई झाड़ू लगा रही थी और उसकी कमीज़ के गले से काले रंग में बंद उसकी चूचियाँ सॉफ दिखाई दे रही थी.

रूपाली ने चोर नज़र से फिर एक बार कल्लो की चूचियो की तरफ देखा. उसकी बड़ी बड़ी काली छातियाँ हर बार रूपाली की नज़र को जैसे बाँध सी लेती थी और इस बार भी यही हुआ. पहले चोर नज़र से देखती रूपाली अब बेख़बर होकर कल्लो की चूचियो को घूर रही थी. जब भी झाड़ू लगाने के लिए कल्लो हाथ हिलाती, उसकी चूचियाँ हिलती और ना जाने क्यूँ उनको देखने में रूपाली को एक अजीब सा मज़ा आने लगा.

उसका इस तरह से देखना कल्लो से छुपा ना रहा. उसको एहसास हो गया के रूपाली क्या देख रही थी और वो फ़ौरन खड़ी होकर अपनी कमीज़ ठीक करने लगी.

"ऐसे क्या देख रही हो बीबी जी" कल्लो शरमाते हुए बोली

और ना जाने कहाँ से रूपाली के अंदर इतनी हिम्मत आई पर इससे पहले के उसको खुद भी एहसास होता, वो बोल पड़ी.

"कितने बड़े बड़े हैं तेरे"

जब रूपाली को एहसास हुआ के वो क्या बोल गयी तो उसने खुद अपनी ज़ुबान काट ली. उसकी बात सुनकर कल्लो भी शर्मा सी गयी.

"आप भी ना बीबी जी" कल्लो बोली "कैसी बातें करती हैं"

और इस बार रूपाली ने ग़लती से नही पर खुद जान भूझ कर बात आगे बढ़ाई.

"नही सच कह रही हूँ" वो बोली "बहुत ज़्यादा बड़े हैं तेरे"

"जानती हूँ" कल्लो अपना गला ठीक करते हुए बोली "मुसीबत ही है ये भी एक"

"मुसीबत क्यूँ?" रूपाली ने पुछा

"अजीब से लगते हैं इतने बड़े बड़े" कल्लो ने फिर झाड़ू लगाना शुरू कर दिया "सबसे पहले सबकी नज़र यहीं पड़ती है"

"सब कौन" रूपाली ने शरारत से पुछा

"सब मतलब सब" कल्लो बोली "जैसे के आपकी नज़र भी तो यहीं पड़ी ना जबकि आप तो खुद एक लड़की हो"

"ह्म्‍म्म" रूपाली बोली "तो अच्छी बात होगी ना. सब तुझे ही देखते होंगे"

कल्लो इस बात पर हस पड़ी

"कोई घूर घूर कर आपकी छातियो को देखे तो इसमें अच्छा क्या है. आपके खुद के इतने बड़े होते तो पता चलता"

इस बात पर रूपाली भी हस पड़ी.

"वैसे मर्द घूर घूर कर देखे तो समझ आता है पर आप ऐसे क्या देख रही थी?"

"पता नही" रूपाली बच्चे की तरह इठलाते हुए बोली "अच्छे लग रहे थे तेरे"

"आपके खुद के पास भी तो हैं"

"हां पर तेरे जैसे बड़े बड़े नही हैं" रूपाली ने जवाब दिया

कुच्छ देर तक कल्लो खामोशी से झाड़ू लगाती रही और फिर अपना काम ख़तम करके जाने लगी.

"रुक" रूपाली ने उसो पिछे से आवाज़ दी. कल्लो उसकी तरफ पलटी.

"एक बार और दिखा दे ना" रूपाली ने कहा

कल्लो जैसे उसकी बात सुन कर सकते में आ गयी.

"कैसी बात कर रही हो मालकिन"

"अर्रे मुझसे क्या शर्मा रही है. मैं भी तो लड़की ही हूँ" रूपाली ने कहा

"फिर भी" कल्लो शर्मा गयी "इसका मतलब ये थोड़े ही है के मैं दुनिया जहाँ की औरतों को दिखाती फिरुन्गि"

"दुनिया जहाँ की नही बस मुझे दिखा दे" रूपाली उसको चिड़ाते हुए बोली

"अपने देख लो ना अगर इतना शौक है तो" कल्लो भी हासकर बोली

"वो तो रोज़ ही देखती हूँ. आज तू दिखा दे"

कल्लो ने इनकार में गर्दन हिला दी.

"देख मैं तेरे और शंभू काका के बारे में ......"

"दिखाती हूँ" कल्लो ने उसकी बात भी पूरी नही होने दी और नीचे को झुक गयी

"ऐसे नही" रूपाली ने कहा

"तो फिर?" कल्लो ने पुछा

"पूरा खोलके दिखा" रूपाली ऐसे अड़ गयी थी जैसे कोई छ्होटा बच्चा किसी खिलोने की ज़िद कर रहा हो

"नही बिल्कुल नही" कल्लो उठकर सीधी खड़ी हो गयी

"तो फिर मैं मम्मी पापा को ..... " रूपाली ने कहना शुरू ही किया था के कल्लो ने फिर उसकी बात काट दी

"ठीक है"

क्रमशः........................................
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07-01-2018, 12:13 PM,
#26
RE: Hindi Sex Porn खूनी हवेली की वासना
खूनी हवेली की वासना पार्ट --26

गतान्क से आगे........................

कल्लो ने एक बार दरवाज़े के बाहर नज़र डाली और बंद करके दरवाज़े के पास खड़े खड़े अपनी कमीज़ उपेर को उठाई. रूपाली आँखें फाडे देखने लगी. कल्लो को नंगी वो पहले भी देख चुकी थी पर आज जब अपनी मर्ज़ी से वो उसके आगे नंगी हो रही थी तो रूपाली को अलग ही मज़ा आ रहा था.

और उससे कहीं ज़्यादा मज़ा उसको इसलिए आ रहा था के वो कल्लो को मजबूर कर रही थी.

कल्लो ने अपनी कमीज़ उठाकर गले तक कर दी. उसके बड़ी बड़ी चूचियाँ ब्रा में रूपाली के सामने आ गयी.

"ब्रा खोल" रूपाली ने कहा

तभी बाहर से रूपाली की माँ की आवाज़ आई. वो कल्लो को आवाज़ देकर बुला रही थी.

"आई मालकिन"

कल्लो ने चिल्ला कर जवाब दिया और फ़ौरन अपनी कमीज़ नीचे करके कपड़े ठीक करती कमरे से बाहर निकल गयी.

रूपाली अभी अभी स्कूल से वापिस आई थी और अपने कमरे में चेंज कर रही थी. घर पर उस वक़्त सिर्फ़ एक कल्लो ही मौजूद थी और उसका भाई भी आते ही खेलने के लिए भाग गया था. थॅकी हुई रूपाली ने अपने कपड़े बदले और थोड़ी देर के लिए बिस्तर पर गिर गयी.

कल जब से उसने कल्लो को अपने सामने कमीज़ उठाए खड़ा देखा था तबसे उसके दिल-ओ-दिमाग़ में एक अजीब सी हलचल मची हुई थी. कल्लो की बड़ी बड़ी चूचियाँ बार बार उसकी नज़रों के सामने आ जाती थी और जाने क्यूँ उसका दिल करता था के वो एक बार उन्हें च्छुकर देखे.

कभी उसके दिमाग़ में ऐसी बातें सोचकर गिल्ट और शरम आती के वो ऐसी गंदी बातें सोच रही है वो भी अपने घर की नौकरानी के बारे में तो कभी उसके दिल में एक अजीब सा रोमांच भर जाता ये सोचकर के वो फिर कल्लो को ऐसा करने के लिए मजबूर कर सकती है.

दोस्त के नाम पर उसकी सहेली उसकी अपनी माँ और दोस्त उसका छ्होटा भाई थे. वो उस इलाक़े के ठाकुर की बेटी थी इसलिए स्कूल में उसके टीचर भी उसके साथ बड़े अदब से बात करते थे.

घर के 2 नौकर रखवाली के लिए उसके और उसके भाई के साथ स्कूल जाते थे और सारा दिन स्कूल के बाहर बैठे रहते थे. इस वजह से स्कूल की बाकी लड़कियाँ उससे दूर ही रहती थी. बस कुच्छ लड़कियाँ ही थी जो उससे बात करती थी और वो भी ऐसी थी जो किताबों में ही डूबी रहती थी.

केयी बार तो रूपाली ने ये भी सुना था के उन किताबी लड़कियों के साथ रहने की वजह से उसको भी बाकी लड़कियाँ बहेनजी कहती थी इसलिए उससे दूर ही रहती थी.

वो एक गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थी इसलिए लड़को के नाम पर वो किसी को भी नही जानती थी. बस जिस एक लड़के से वो बात करती थी वो उसका अपना भाई ही था.

लड़कों के साथ एक लड़की का क्या रिश्ता हो सकता है उसको ये बात भी पिक्चर्स देख देख कर ही पता चली थी और जानती थी के स्कूल की कुच्छ लड़कियों का ऐसा चक्कर है कुच्छ बाहर के लड़कों के साथ.

पर जिन लड़कियों से उसकी दोस्ती थी उनकी आशिक़ी अपनी किताबों के साथ थी. और रूपाली के साथ तो हर वक़्त 2 पहेलवान होते थे जिसकी वजह से उसका किसी लड़के के करीब जाना ना-मुमकिन सा ही था.

और इन सब बातों की वजह से सेक्स की तरफ उसकी जानकारी ना के बराबर थी. गाओं के एक लड़कियों के स्कूल में पढ़ने वाली उस लड़की को सेक्स का कोई ग्यान नही था. सेक्स क्या होता है, क्यूँ होता है, बच्चे कैसे पैदा होते हैं, कहाँ से पैदा होते हैं कुच्छ नही जानती थी वो.

उसके लिए सेक्स के साथ पहला सामना अपने माँ बाप और घर के नौकरों को सेक्स करते हुए देखना ही था. कुच्छ दिन बाद उसने अपनी एक सहेली से इस बारे में बात की जो थी तो खुद भी बहेनजी ही पर रूपाली जानती थी के उसको कुच्छ ना कुच्छ तो पता होगा ही.

रूपाली ने उसको ये नही बताया था के उसने किसी देखा पर उसकी दोस्त ने उसे समझाया के उसने क्या देखा था.

पहली बार जब रूपाली को पता चला के बच्चे कैसे पैदा होते हैं और कहाँ से बाहर आते हैं तो उसका दिल धक से रह गया था. दिल ही दिल में उसने कहीं ये कसम भी खा ली थी के वो कभी बच्चे पैदा नही करेगी.

उसकी सहेली ने उसे एक बाइयालजी की किताब दिखा कर समझाया था के सेक्स क्या होता है, कैसे होता है और रूपाली यही सोचती रह गयी के ये लेसन उनकी बाइयालजी क्लास में बिना पढ़ाए छ्चोड़ क्यूँ दिया गया था.

"पर ये सब अब बदलने वाला है" रूपाली ने दिल ही दिल में सोचा.

वो 12थ स्टॅंडर्ड में थी और एग्ज़ॅम होने वाले थे मतलब कुच्छ ही महीने बाद वो कॉलेज जाएगी. उनके गाओं में कोई कॉलेज नही था और उसके लिए उसे पास के शहर जाना पड़ता.

गाओं से कुच्छ और लड़के लड़की भी कॉलेज के लिए रोज़ाना शहर जाते थे और शाम को घर लौट आते थे इसलिए रूपाली को ये खबर थी के अपने माँ बाप को मनाने के लिए उसे ज़्यादा मेहनत नही करनी पड़ेगी. बस ये सोचकर परेशान थी के अगर ये 2 पहलवान कॉलेज के लिए भी रोज़ उसके साथ शहर गये तो मुसीबत हो जाएगी.

कॉलेज के बारे में रूपाली ने सुना था के वहाँ लड़के लड़कियाँ साथ में पढ़ते हैं और किसी की किसी से बात करने पर कोई रोक टोक नही थी. उसको दिल ही दिल में पता नही कैसे ये यकीन हो गया था के वो कॉलेज जाएगी और वहाँ उसको एक अच्छा सा लड़का मिलेगा जिससे वो भी प्यार करेगी.

और फिर उस लड़के के साथ फिल्म देखने जाया करेगी जैसे की टीवी पर दिखाते हैं.

और फिर उन दोनो की शादी हो जाएगी.

और फिर बच्चे होंगे.

"नही" बच्चे सोचते ही रूपाली की सोच का सिलसिला फ़ौरन टूट गया "बच्चे नही पैदा करूँगी मैं. हे भगवान ... छ्ह्हीईई"

सोचती हुई वो बिस्तर से उठ बैठी.

उसके बहुत तेज़ भूख लगी हुई थी. बाथरूम जाकर उसने अपना हाथ मुँह धोया और खाने के लिए बाहर निकल ही रही थी के कमरे का दरवाज़ा खुला और कल्लो खाने की प्लेट लिए अंदर आ गयी.

"अर्रे तू यहाँ क्यूँ ले आई" रूपाली ने उसको देखकर पुछा "मैं नीचे आ ही रही थी"

"नही कोई बात नही" कल्लो ने कहा "मुझे लगा के आप थक गयी होंगी तो मैं यहीं ले आई"

"टेबल पे रख दे" उसने कल्लो को इशारा किया और टवल से अपना मुँह सॉफ करने लगी.

हाथ मुँह धोते वक़्त कुच्छ पानी उसके कपड़ो पर गिर गया था जिसकी वजह से उसकी हल्के पीले रंग की कमीज़ कंधो और चूचियो पर गीली हो गयी थी. उस गीली कमीज़ के नीचे उसका काले रंग का ब्रा सॉफ नज़र आ रहा था.

"मुझे काला नही पसंद" कल्लो ने अचानक उसकी तरफ देखते हुए कहा

"मतलब?" रूपाली को उसकी बात का मतलब समझ नही आया.

कल्लो ने उसकी छातियो की तरफ इशारा किया जहाँ उसकी कमीज़ हल्की से कहीं कहीं से उसकी छातियो पर चिपक गयी थी.

"काला ब्रा" कल्लो ने अंगुली दिखाते हुए कहा "काला पसंद नही है मुझे"

रूपाली को एक पल के लिए शरम सी आ गयी और उसने फ़ौरन अपनी कमीज़ ठीक की.

"तो काला पेहेन्ति क्यूँ है तू?" रूपाली ने पुचछा

"काला कहाँ पहना है" कल्लो ने फ़ौरन अपने गिरेबान की तरफ देखा

"अभी नही पहले तो पहना था" रूपाली शरारत से मुस्कुराते हुए बोली

कल्लो समझ गयी के उसका इशारा पहले कब की तरफ था.

"क्या करूँ बीबी जी" कल्लो बोली "यहाँ दुकान में जाओ तो 3 ही रंग मिलते हैं, काला, सफेद या क्रीम कलर"

उसकी बात पर दोनो हस पड़ी.

"उमर के हिसाब से तो आपके भी काफ़ी बड़े हैं" कल्लो ने फिर उसकी चूचियो की तरफ इशारा किया.

कल की रूपाली जो इतने खुले तरीके से कल्लो को अपनी छातियाँ दिखाने पर मजबूर कर रही थी आज अपनी बात पर शर्मा बैठी. शायद इसलिए क्यूंकी आज इशारा उसके अपने जिस्म की तरफ था.

"चल जा ना" उसने बात टालते हुए कहा "खाना खाने दे मुझे"

"आज नही देखोगी?" कल्लो ने पुछा

"क्या?"

"ये ...." कल्लो ने अपनी दोनो चूचियो को कमीज़ के उपेर से पकड़ते हुए कहा.

एक पल में सब उल्टा हो गया. जहाँ रूपाली इस सोच में थी के कल्लो को डराकर उसकी चूचिया देखेगी कल्लो के खुद ही कहने पर जैसे सकते में आ गयी.

पहली बार उसको एहसास हुआ के आख़िर वो एक बच्ची थी और कल्लो एक खेली खाई औरत.

"क्या हुआ मालकिन?" कल्लो ने अपनी चूचियाँ अपने हाथों में दबाते हुए कहा "आज नही देखोगी? आज तो घर पर कोई है भी नही"

रूपाली के मुँह से एक बोल ना फूटा. कल्लो अपनी चूचियाँ अपने हाथों में पकड़े रूपाली के करीब आ खड़ी हुई.

"आपको पसंद हैं मेरे?"

रूपाली सिर्फ़ हां में सर हिलाकर रह गयी.

"देखोगी?"

"रूपाली ने फिर हां में सर हिलाया.

कल्लो ने अपने हाथों से अपनी कमीज़ का पल्लू अपनी गर्दन तक उठा दिया. सफेद रंग की ब्रा में बंद उसकी चूचियाँ एक बार फिर रूपाली की आँखों के सामने आ गयी.

हमेशा की तरह इस बार भी रूपाली चुप चाप उसकी चूचियो पर नज़र जमाकर रह गयी. दोनो चूचियाँ बा-मुश्किल ब्रा में समा रही थी.

"क्या पसंद है आपको इनमें?" कल्लो ने पुछा

"कितनी बड़ी हैं तेरी" इस बार रूपाली ने जवाब दिया.

'इससे पहले किसी की देखी हैं आपने?"

रूपाली ने सॉफ झूठ बोलते हुए इनकार में अपनी गर्दन हिला दी. उसने अपनी माँ को पूरी तरह नंगी देखा हुआ था पर ये बात वो कल्लो से तो नही कह सकती थी.

"झूठ बोल रही हैं आप" कल्लो ने कहा तो रूपाली का कलेजा मुँह को आ गया.

"इसको कैसे पता के मैने अपनी माँ को नंगी देखा है" दिल ही दिल में रूपाली ने सोचा

"क्यूँ अपनी खुद की रोज़ नही देखती क्या?" कल्लो ने हस्ते हुए कहा तो रूपाली की जान में जान आई और वो भी हस पड़ी.

"बस अपनी ही देखी हैं. मेरा मतलब था के मैने तेरे अलावा और किसी औरत की नही देखी"

"अच्छे से देखनी हैं?" कल्लो ने पुछा

रूपाली के दिल की धड़कन तेज़ हो चली. वो जानती थी के कल्लो का क्या मतलब था. उसने हां में सर हिलाया.

"लो देख लो" कहते हुए कल्लो ने अपनी ब्रा को नीचे से पकड़ा और अपनी छातियों के उपेर कर दिया. दोनो नंगी छातियाँ ब्रा से बाहर निकल आई.

रूपाली की आँखें खुली रह गयी. ये सच था के वो खुद भी एक लड़की थी पर अपने सामने किसी औरत को इतने करीब से नंगी देखने का उसका ये पहला मौका था, ख़ास तौर से तब जबकि सामने वाली औरत खुद उसे ही दिखाने

के लिए नंगी हो रही थी.

कल्लो अपने हाथों से कमीज़ और ब्रा पकड़े चुप चाप रूपाली के सामने खड़ी रही और रूपाली उसकी चूचियो को ऐसे देखने लगी जैसे कोई रिसर्च वर्क कर रही हो. वो दिल ही दिल में कल्लो की चूचियो और अपनी चूचियो को

मिलाने लगी.

उसकी खुद की चूचियाँ एकदम गोरी थी और कल्लो की एकदम काली.

उसकी खुद की चूचियाँ अभी छ्होटी थी बिल्कुल कच्चे अमरूद की तरह और उसने अभी ब्रा पहेनना शुरू ही किया था जबकि कल्लो की बहुत बड़ी बड़ी थी.

उसकी खुद की चूचियाँ एकदम तनी हुई थी बिल्कुल एवरेस्ट की छोटी की तरहजबकि कल्लो की नीचे को लुढ़की हुई थी, शायद बहुत बड़ी थी इसलिए.

उसके खुद के निपल्स छ्होटे छ्होटे और ब्राउन कलर के थे जैसे किस मिस के दाने हों जबकि कल्लो के बड़े बड़े और काले रंग के थे.

क्रमशः........................................
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07-01-2018, 12:13 PM,
#27
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खूनी हवेली की वासना पार्ट --27 

गतान्क से आगे........................

"ऐसे ही देखती रहोगी क्या?" कल्लो ने सवाल किया तो रूपाली का ध्यान टूटा.

उसने सवालिया नज़र से कल्लो की तरफ देखा.

"च्छुकर नही देखोगी?" कल्लो ने कहा तो रूपाली के दिल की धड़कन तेज़ हो चली. ये सच था के वो खुद ये मंज़र देखना चाहती थी पर उसने देखने से आगे कुच्छ भी नही सोचा था. हाथ लगाने के बारे में तो बिल्कुल भी

नही.

जब कल्लो ने देखा के रूपाली कुच्छ जवाब नही दे रही तो उसने खुद अपने हाथ से रूपाली का हाथ पकड़ा और अपनी छाती पर रख दिया.

रूपाली को समझ नही आया के एक दूसरी औरत की छाती को अपने हाथ में पकड़कर उसे कैसा लग रहा था. कल्लो की बड़ी मुलायम छाती उसके हाथ में थी या यूँ कह लो के उसने बस उसकी छाती पर हाथ रखा हुआ था. वो इतनी बड़ी थी एक उसके हाथ में मुश्किल से समा रही थी. वो बस अपना हाथ वैसे ही रखे खड़ी रही.

"कोई बात नही अच्छे से च्छुकर देख लो. बहुत मंन था ना आपका मेरी देखने का?"

कल्लो ने कहा तो रूपाली ने उसकी पूरी छाती पर हाथ फिराना शुरू कर दिया. वो ऐसे हाथ फिरा रही थी जैसे किसी छ्होटे बच्चे के सामने कोई नयी अजब चीज़ आ गयी हो और वो उसको च्छुकर देख रहा था के ये क्या

है पर समझ नही पा रहा था के क्या करे.

उसका हाथ धीरे धीरे कल्लो की पूरी छाती पर फिरा. फिर उसका ध्यान उस बड़े से काले निपल की तरफ गया और उसने उसको अपनी अंगुलियों के बीच पकड़ लिया.

"आअहह रूपाली बीबी" निपल पकड़ते ही कल्लो के मुँह से आह निकल पड़ी "दबाओ"

"दबाओ?" उसकी बात सुनकर रूपाली ने सोचा "क्या दबाऊं?"

उसके चेहरे को देखकर कल्लो समझ गयी और उसने अपना हाथ रूपाली के हाथ पर रखकर खुद दबाना शुरू कर दिया.

रूपाली को बड़ा अजीब लगा पर वो कल्लो का इशारा समझ गयी. उसको समझ नही आया के दबाकर क्या होना था पर उन बड़ी बड़ी नरम छातियो को दबाने में उसको भी अजीब सा मज़ा आया. उसने अपने एक हाथ से छाती को धीरे धीरे दबाना शुरू कर दिया.

"ज़ोर से दबाओ"

कल्लो के कहने पर रूपाली ने अपने हाथ का दबाव बढ़ा दिया. अचानक कल्लो ने उसका दूसरा हाथ पकड़कर अपनी दूसरी छाती पर रख दिया.

"दोनो दबाओ"

अब रूपाली कल्लो के सामने खड़ी अपने दोनो हाथों से उसकी चूचियाँ दबा रही थी. अजीब सिचुयेशन हो गयी थी. कल्लो उसको और ज़ोर से दबाने को कह रही थी और रूपाली को समझ नही आ रहा था के क्यूँ पर एक अजीब सा मज़ा आ रहा था. उसके हाथ कल्लो की चूचियो में इस तरह जा रहे थे जैसे के वो आटा गूँध रही हो.

"आआहह" कल्लो ने फिर ज़ोर से आह भरी "चूसो"

रूपाली चौंक पड़ी. वो जानती थी के कल्लो क्या कह रही है पर इससे पहले के वो कुच्छ कहती या करती, कल्लो ने उसके सर के पिछे अपना हाथ और आगे को खींचते हुए उसका मुँह अपनी छाती पर दबा दिया.

वो बड़ा सा निपल सीधा रूपाली के मुँह में गया.

"छियीयीयियी" रूपाली फ़ौरन पिछे हटी और ज़ोर से चिल्लाई "छ्ह्ह्ह्हीइ छ्हीइ छ्ही"

वो अपने होंठ ऐसे अपने हाथ से सॉफ करने लगी जैसे कोई बहुत गंदी चीज़ मुँह में चली गयी हो.

उस दिन बात सिर्फ़ इतनी ही बढ़ पाई थी के कल्लो ने अपना निपल रूपाली के मुँह में दे दिया था जिसपर रूपाली को जैसे उल्टी सी आ गयी थी. वो खुद एक लड़की थी जो औरत बनने की कगार पर खड़ी थी और उसने कभी सपने में भी नही सोचा था के उसके मुँह में एक दूसरी औरत का निपल आएगा. हां वो कल्लो की चूचियाँ देखकर उत्तेजित ज़रूर होती थी पर ये शायद प्रक्रतिक था.

एक औरत को यूँ इस तरह से नंगी देखना उसमें सेक्स की भावनाएँ पैदा करता था पर इससे ज़्यादा कुच्छ और नही.

जब रूपाली छि छि करते हुए कल्लो से दूर हो गयी तो कल्लो भी खामोशी से कमरे से बाहर निकल गयी. फिर कुच्छ दिन तक ना तो और कुच्छ हुआ और ना ही कल्लो या रूपाली ने खुद एक दूसरे के करीब आने की कोशिश की. बात भी बस ज़रूरत के हिसाब से होती थी.

उस दिन रूपाली का जनमदिन था. वो 18 साल की हो गयी. 12थ क्लास की एक्षमन्स वो दे चुकी थी और अपने घरवालो को शहर जाकर कॉलेज में पढ़ने के लिए राज़ी भी कर चुकी थी. उसके जनमदिन की खुशी में उसके पिता ने एक पार्टी रखी थी जिसमें काफ़ी बड़ी बड़े लोग आए हुए थे. कुच्छ पॉलिटीशियन, कुच्छ पोलिसेवाले और कुच्छ आस पास के इलाक़े के ठाकुर घरानो के लोग.

उस पार्टी में खुद ठाकुर शौर्या सिंग भी शामिल था. उन्होने जब उस दिन रूपाली को उसका तोहफा दिया था तब रूपाली को कहीं ख्वाबों में भी इस बात का एहसास नही था के यही इंसान आगे चलकर उसका ससुर बनेगा.

सारी शाम पार्टी चलती रही. जब तक लोग धीरे धीरे गये, तब तक रात के 12 बज चुके थे. कल्लो भी उस दिन अपने घर नही गयी थी और पार्टी में मेहमानो के खाने पीने का ख्याल रख रही थी.

जब पार्टी ख़तम हुई तो रूपाली की माँ ने कल्लो को रात वहीं रुक जाने के लिए कहा. आधी रात को अकेले अपने घर जाना एक औरत के लिए ठीक नही था इसलिए कल्लो भी वहीं रुकी. वो पहले भी कई बार ऐसे रात में रुकी थी और किचन में ही चादर बिछाकर सो जाती थी. उस रात भी ऐसा ही हुआ. रूपाली काफ़ी थॅकी हुई थी इसलिए मेहमआनो के जाते ही अपने कमरे में जाकर सो गयी.

उस वक़्त उसकी माँ और कल्लो घर की सफाई में लगे हुए थे.

रात को अचानक एक आहट पर रूपाली की आँख खुली. उसको ऐसा लगा के दरवाज़ा खोलकर कोई उसके कमरे में दाखिल हुआ है. अंधेरा होने की वजह से उसको ये तो नज़र नही आया के कौन है पर कमरे में दीवार पर लगी घड़ी पर उसने नज़र डाली तो देखा के 3 बज रहे हैं. अंधेरे में सिर्फ़ घड़ी के काँटे चमक रहे थे, और कुच्छ नज़र नही आ रहा था.

"माँ?" उसकी मान अक्सर रात को उसके कमरे में आकर देखती के वो ठीक से तो सो रही है. उस रात भी शायद माँ ही आई होगी सोचकर रूपाली ने आवाज़ दी.

कोई जवाब नही आया पर एक साया धीरे से उसके बिस्तर के पास आकर खड़ा हो गया.

"कौन है?" रूपाली ने आँखें मलते हुए कहा

"मैं हूँ बीबी जी" आवाज़ कल्लो की थी.

"क्या हुआ?" रूपाली ने पुछा

"कुच्छ नही" कल्लो ने कहा और वो रूपाली के बिस्तर पर आकर बैठ गयी

रूपाली खुद भी उठकर बैठ गयी और अपने बिस्तर पर लगे स्विच को ढूँढने लगी ताकि बल्ब जला सके. तभी उसको अपने हाथ पर कल्लो का हाथ महसूस हुआ.

कल्लो ने उसका हाथ पकड़कर लाइट जलाने से रोक दिया.

"क्या हुआ?" रूपाली ने फिर पुचछा

"ष्ह" कल्लो ने चुप रहने का इशारा किया और रूपाली का हाथ पकड़कर अपने जिस्म पर रख लिया.

रूपाली को फ़ौरन एहसास हो गया के उसका हाथ कल्लो की छाती पर है.

"क्या कर रही है?" कहते हुए रूपाली ने अपना हाथ वापिस खींचे की कोशिश की पर कल्लो ने उसका हाथ मज़बूती से पकड़कर अपनी छाती पर रखा हुआ था.

"नींद आ रही है मुझे" रूपाली ने फिर अपना हाथ हटाने की कोशिश की.

"बस थोड़ी देर दबा दो बीबी जी" कहते हुए कल्लो ने खुद अपने हाथ से रूपाली के हाथ को अपनी छातियो पर दबाना शुरू कर दिया

"क्यूँ?" रूपाली ने पुछा

"मेरा बहुत दिल कर रहा था इसलिए आपके कमरे में चली आई. बस थोड़ी देर" कल्लो ने रूपाली के थोड़ा करीब आते हुए कहा

वो दोनो रूपाली के बिस्तर के बीच बैठे हुए थे. एक बार फिर कल्लो की छातियो पर अपना हाथ पड़ते ही रूपाली को थोड़ा अच्छा सा लगा. फिर वही बड़ी बड़ी छातियाँ जिन्हें देखकर वो उत्तेजित हो जाती थी उसके हाथ में थी. उसने अपना हाथ को थोड़ा सा छाती पर दबाया.

"आआहह" कल्लो के मुँह से आ निकल गयी "ऐसे ही.... थोड़ा ज़ोर से"

रूपाली ने एक हाथ से कल्लो की छाती को ज़ोर ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया. लग रहा था जैसे किसी मुलायम सी चीज़ में उसकी अँगुलिया धस जाती थी.

"दबाती रहो मालकिन" कहते हुए कल्लो खिसक कर थोड़ा और उसके करीब आ गयी. अब वो बिस्तर पर बिल्कुल एक दूसरे के आमने सामने बैठी थी.

रूपाली अपने एक हाथ से अब पूरे ज़ोर से कल्लो की एक छाती को दबा रही थी. अजीब सा मंज़र था. कमरे में बिल्कुल अंधेरा था जिसमें वो एक दूसरे को देख नही सकती थी, बस जिस्म का साया सा ही नज़र आ रहा था. कल्लो ने सारी पहेन रखी थी जिसका पल्लू हटा हुआ था और ब्लाउस के उपेर से रूपाली छाती दबा रही थी. रूपाली ने अपनी एक नाइटी पहेन रखी थी.

थोड़ी देर बाद रूपाली ने खुद ही अपना दूसरा हाथ उठाया और कल्लो की दूसरी छाती पर रख दिया.

"आआहह मालकिन" कल्लो ने आह भारी "कितना मज़ा आ रहा है. जादू है आपके हाथों में, मसल डालो मेरी चूचियाँ"

रूपाली के दिमाग़ में फिर वही सवाल उठा के भला यूँ चूचियाँ डबवाने में क्या मज़ा आ रहा है कल्लो को पर उस वक़्त उसने इस बात पर इतना ध्यान नही दिया. हक़ीकत तो ये थी के यूँ किसी दूसरी औरत के जिस्म को च्छुना उसको अच्छा लग रहा था.

अचानक कल्लो ने अपने हाथ भी अपनी छातियो के करीब लाई और कुच्छ करने लगी. पहले तो रूपाली को समझ नही आया पर अगले पल ही अंदाज़ा हो गया के कल्लो अपना ब्लाउस खोल रही थी. रूपाली ने अपने हाथ पिछे हटा लिए और अंधेरे में कल्लो की तरफ देखने लगी. ज़्यादा कुच्छ नज़र नही आ रहा था पर जब एक सफेद रंग का ब्रा नज़र आया तो रूपाली समझ गयी के कल्लो ने अपना ब्लाउस उतार दिया है.

कमरे में घुप अंधेरा था और उपेर से कल्लो खुद भी बिल्कुल काली थी. रूपाली के सामने जैसे सिर्फ़ एक सफेद रंग की ब्रा ही थी, और कुच्छ दिखाई नही दे रहा था.

"मुझे काले रंग की पसंद नही हैं" उसको कल्लो की बात याद आई.

कुच्छ पल बाद ही वो ब्रा भी अपनी जगह से हटी और बिस्तर पर जा गिरी. रूपाली जानती थी के अब कल्लो उपेर से पूरी नंगी बैठी है.

उसके बिना कल्लो के कुच्छ कहने का इंतेज़ार किए अंदाज़े से अपने हाथ फिर कल्लो के सीने की तरफ बढ़ाए. इस बार उसके हाथ में पूरी तरह से नंगी चूचियाँ आई.

कल्लो की चूचियाँ ऐसे गरम थी जैसे उसको बुखार हो रखा हो. रूपाली के ठंडे हाथ पड़ते ही रूपाली और कल्लो दोनो के जिस्म में करेंट दौड़ गया.

"आआहह छोटी मालकिन" अपने गरम जिस्म पर ठंडे हाथों के पड़ते ही एक पल के लिए कल्लो का जिस्म काँपा "दबाओ"

रूपाली को बताने की ज़रूरत नही थी. वो कल्लो के कहने से पहले ही उसकी चूचियो को इस तरह दबा रही थी जैसे उनमें से पानी निचोड़ने की कोशिश कर र्है हो. अब तक कल्लो उसके काफ़ी करीब आ चुकी थी और उसकी उखड़ी हुई साँसें रूपाली को अपने चेहरे पर महसूस हो रही थी.

अब तक दोनो की आँखें अंधेरे की आदि हो चुकी थी और रूपाली को हल्का हल्का सा नज़र आने लगा था. कल्लो ने अब भी अपनी सारी पहनी हुई थी पर उपेर से पूरी तरह नंगी रूपाली के सामने बैठी हुई थी. उसके. दोनो चूचियाँ रूपाली के हाथों में स्पंज बॉल्स जैसी लग रही थी जिन्हें रूपाली पूरी जान से दबा रही थी.

उसकी चूचियाँ को अंधेरे में निहारती रूपाली का ध्यान फिर एक बार उन बड़े बड़े निपल्स की तरफ गया. पिच्छली बार जब कल्लो ने वो निपल उसके मुँह में डाला था तो रूपाली बुरी तरह बिदक गयी थी और अब भी अगर कल्लो फिर कोशिश करती तो रूपाली शायद फिर घबरा जाती. चूचियाँ दबाते दबाते उसने अपने हाथ निपल्स पर सहलाए तो हैरान हो उठी. कल्लो के दोनो निपल्स इस तरहा से उठे हुए थे जैसे उनके अंदर हवा भर गयी हो.

रूपाली ने कई बार नहाते हुए अपने निपल्स पर हाथ लगाया था पर जहाँ तक उसको पता था, निपल्स दबे हुए और सॉफ्ट होते थे पर उस वक़्त कल्लो के निपल्स एकदम कड़क थे. रूपाली ने दोनो निपल्स को अपनी अंगुलियों के बीच लेकर दबाया.

ऐसा करते ही उसके करीब बैठी कल्लो एकदम आकर उससे सॅट गयी. उसने अपना चेहरा रूपाली के कंधे पर रख दिया और अपने दोनो हाथों रूपाली के पीठ पर रख कर उसको पकड़ लिया.

"जादू है आपके हाथों में ... जादू .. कितनी बार दबवाई हैं मैने पर ऐसा मज़ा कभी नही आया" उसके कंधे पर सर रखे रखे कल्लो ने कहा

क्रमशः........................................
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07-01-2018, 12:15 PM,
#28
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गतान्क से आगे........................

कल्लो के करीब होने के वजह से अब रूपाली को उसको चूचियाँ नज़र नही आ रही थी. बस उन दोनो के जिस्म के बीच रूपाली अपने हाथ घुसाकर चूचियाँ दबाए जा रही थी. कल्लो की उखड़ी हुई गरम साँस उसको अपने गले पर महसूस हो रही थी जो धीरे धीरे उसके पुर जिस्म को गरम कर रही थी.

नशे की सी हालत में कल्लो आहें भर रही थी और जब रूपाली ने एक बार फिर उसके निपल्स को दबाया तो वो और भी रूपाली से सॅट गयी. और तब पहली बार रूपाली को उसकी छातियाँ अपनी खुद की छातियों पर महसूस हुई.

एक अजीब सा मज़ा उसके शरीर में भर गया. पहली बार था के किसी और औरत की छातियाँ उसको अपनी छातियों पर महसूस हो रही थी और रूपाली के आनंद की जैसे कोई सीमा नही रही.

और यही वो वक़्त था जब उसको पहली बार समझ आया के क्यूँ कल्लो उसको बार बार अपनी चूचियाँ दबाने को कहती रहती है.

कल्लो की चूचियो का दबाव जब उसकी अपनी चूचियो पर पड़ा तो रूपाली ने भी अपने हाथ चूचियो से हटाकर कल्लो के पीठ पर रख लिए और उससे सॅट गयी. ऐसा करने का उसका इरादा बस यही था के अपनी चूचियों के और ज़ोर से कल्लो की चूचियों पर दबाए. ऐसा करने से उसके सीने में ऐसे एक करेंट सा दौड़ रहा था और वो और कस्के कल्लो से सटी जा रही थी.

कल्लो फ़ौरन समझ गयी के रूपाली क्या करने की कोशिश कर रही है. उसके हाथ रूपाली की पीठ से हटे और दोनो के जिस्म के बीच आते हुए साइड रूपाली की जवान होती चूचियो पर आ गये.

वो पहला मौका था के रूपाली ने अपने जिस्म पर अपने सिवाय किसी और के हाथों को महसूस किया था. कल्लो ने उसकी चूचियो को एक ही पल में ऐसे रगड़ दिया के दर्द की एक लहर उसके पुर जिस्म में दौड़ गयी.

"आआहह कल्लो" रूपाली बोली "धीरे से"

उधर कल्लो भी उसका इशारा समझ गयी. रूपाली ने उसको रोकने की कोई कोशिश नही की थी. उसने अपने हाथों को थोड़ा सा ढीला छ्चोड़ा और रूपाली की चूचियों को मसल्ने लगी.

रूपाली ने पूरी तरह से कल्लो से लिपट गयी. कल्लो कर सर उसके कंधे पर और उसका कल्लो के कंधे पर ऐसे था जैसे दोनो गले मिल रही हों. कल्लो ने एक बार फिर अपने हाथ का दबाव बढ़ाया और पूरे ज़ोर से रूपाली की चूचियो को दबाने लगी.

उधर रूपाली का जिस्म थोड़ी देर के लिए ऐंठ गया और फिर अपने आप ही ढीला पड़ता चला गया. उसके पूरे शरीर में आनंद की एक लहर सी दौड़ गयी और उसे ऐसा लगने लगा जैसे के वो नशे में हो, जैसे हवा में उड़ रही हो. कल्लो के जिस्म पर उसके गिरफ़्त ढीली पड़ गयी और वो धीरे धीरे बिस्तर पर गिरती चली गयी.

कल्लो ने उसको सहारा देकर सीधा लिटाया. रूपाली की आँखें अब बंद हो चली थी. 2 हाथ अब भी उसकी चूचियाँ दबा रहे थे.

"आआअहह छ्होटी मालकिन" उसको कल्लो की आवाज़ सुनाई दी तो उसने अपनी आँखें खोली "कितनी सख़्त हैं आपकी चूचियाँ"

रूपाली ने आँखें खोलकर देखा. अंधेरे में भी अब उसको साफ दिखाई दे रहा था. कल्लो साइड में लेटी उसके उपेर झुकी हुई थी. उसके बाल खुले हुए थे और उसकी चूचियाँ नीचे को और लटक रही थी.

अचानक कल्लो के हाथ रूपाली के सीने से हटे और वो सीधी होकर बैठ गयी. रूपाली ने नज़र घूमाकर देखा के वो क्या कर रही है. कल्लो अपनी कमर पर बँधी सारी को ढीला कर रही थी.

"पूरी नंगी?" रूपाली ने मन ही मन सोचा और उसको समझ नही आया के क्या करे.

और उसका शक सही निकला. कल्लो ने पहले अपनी सारी और फिर अपना पेटिकट उतारकर वहीं बिस्तर के नीचे गिरा दिया और पूरी नंगी होकर रूपाली से आकर सॅट गयी.

रूपाली को साइड से अपने हाथ पर कल्लो का पेट और उसकी नंगी जाँघ महसूस हुई.

"कल्लो?" उसके मुँह से सवाल की शकल में नाम निकला

"ष्ह्ह्ह्ह्ह" कल्लो ने अपने होंठों पर अंगुली रखते हुए कहा "बस मज़े लो. आज में आपको पहली बार जन्नत की सैर करती हूँ"

और फिर कल्लो ने वो किया जिसके लिए रूपाली बिल्कुल तैय्यार नही थी पर उसने कल्लो को रोकने की कोशिश भी नही की.

साइड में लेटी हुई कल्लो सरक कर पूरी तरह रूपाली के उपेर आ गयी. उसके वज़न के नीचे रूपाली को एक पल के लिए तकलीफ़ हुई पर अगले ही पल जैसे उसके जिस्म ने खुद ही अपने आपको अड्जस्ट कर लिया और कल्लो का वज़न उसे बिल्कुल भी महसूस होना बंद हो गया.

रूपाली को अब अपनी कोई होश नही रही और वो एक लाश की तरह बिस्तर पर लेटी रही. कल्लो अपनी टाँगें उसके दोनो तरफ रखे उसके उपेर सवार थी और बस रूपाली नीचे आँखें बंद किए लेटी एक अंजाने से एहसास में डूबी जा रही थी.

कल्लो की गरम साँस उसको अपने चेहरे पर महसूस हुई और फिर उसके होंठ अपने माथे पर. उसने रूपाली के माथे को चूमा, फिर बारी बारी उसके दोनो गालों को, फिर उसके गले पर, फिर नाइटी के उपेर से ही उसकी दोनो छातियो को एक एक करके चूमा और धीरे धीरे नीचे सरकने लगी.

रूपाली ने एक बार फिर आँखें खोलकर देखा. पूरी तरह से नंगी कल्लो उसके उपेर बैठी सी हुई थी और उसके जिस्म को चूमते हुए धीरे धीरे नीचे सरक रही थी. रूपाली ने एक आह भरी और फिर अपनी आँखें बंद कर ली.

उसकी टाँगों को चूमते हुए कल्लो रूपाली के घुटनो तक आई और फिर उसकी पिंदलियों पर हाथ रख कर नाइटी को उपेर सरकाने लगी.

"मुझे भी नंगी करेगी क्या?" रूपाली के दिमाग़ में सवाल बिजली की तरह उठा पर कल्लो को रोकने की ना तो उसमें हिम्मत थी और ना ही ताक़त. अपना जिस्म उसको किसी चिड़िया के पंख की तरह हल्का महसूस हो रहा था. आँखें भारी हो रही थी और उसमें जैसे इतनी भी जान नही बची थी के अपने हाथ उपेर उठा सके.

कल्लो ने धीरे धीरे उसकी नाइटी को रूपाली के पेट तक सरका दिया. सोते वक़्त रूपाली नाइटी के नीचे ना तो पॅंटी पेहेन्ति थी और ना ही ब्रा. नाइटी के उपेर सरकते ही उसे ठंडी हवा सीधी अपनी चूत पर महसूस हुई.

"नंगी कर दिया मुझे" रूपाली की दिमाग़ में फिर ख्याल उठा. ये पहली बार था के उसकी चूत किसी और के सामने खुली थी, भले ही वो कोई और एक औरत ही थी.

कल्लो यहाँ भी आकर रुकी नही. उसने नाइटी को सरकाना जारी रखा और थोड़ी ही देर बाद रूपाली की चूचियाँ भी पूरी खुली हुई थी. और फिर कल्लो ने रूपाली के कंधो को सहारा देकर थोड़ा उपेर किया और नाइटी को पूरी तरह उतार कर नीचे फेंक दिया.

"मैं नंगी हूँ ... नंगी" रूपाली का दिमाग़ फिर चिल्लाया. ठंडी हवा अब उसको अपने पूरे जिस्म पर महसूस हो रही थी.

कुच्छ देर अपने जिस्म पर जब उसे कुच्छ भी महसूस नही हुआ तो उसने आँखें खोल कर देखा. कल्लो उसकी बगल में बैठी उसको निहार रही थी.

"मालकिन" जब उसने देखा के रूपाली उसकी तरफ देख रही है तो वो बोली "बहुत सुंदर हो आप. ये कच्चे आम तो आज मैं ही खाऊंगी"

इससे पहले के रूपाली को कुच्छ समझ आता, कल्लो नीचे को झुकी और रूपाली का छ्होटा सा निपल अपने मुँह में ले लिया.

"कल्लो !!! क्या कर रही?" रूपाली बस इतना ही कह सकी. कल्लो को रोकने की ताक़त उसमें अब भी जैसे नही थी.

"बस आप मज़े लो" कल्लो ने कहा और फिर रूपाली के जिस्म पर ऐसे टूट पड़ी जैसे बरसो के भूखे को खाना मिल गया हो.

वो सरक कर फिर पूरी तरह रूपाली के उपेर आ गयी और अपने दोनो हाथों में रूपाली की चूचियाँ को पकड़कर बारी बारी चूसने लगी.

रूपाली को अब अपना कोई होश नही था. उसको बस इतना पता था के उसके जिस्म में एक करेंट सा उठ रहा था जो उसके दिमाग़ को सुन्न और उसकी आँखों को भारी कर रहा था.

कल्लो के हाथ उसको अब अपने पूरे जिस्म पर महसूस हो रहे थे. कभी पेट पर, कभी टाँगो पर, कभी छाती पर, कभी चेहरे पर.

फिर वो हाथ सरक कर रूपाली की टाँगो के बीच गया और सीधा उसको चूत पर आ गया. रूपाली का पूरा जिस्म ज़ोर से हिला, उसकी कमर ने ज़ोर का झटका खाया, एक लहर उसकी टाँगो के बीच से उठकर उसके दिमाग़ से टकराई और फिर रूपाली को कुच्छ याद नही रहा.

भारी होती आँखें अब पूरी तरह बंद हो गयी और रूपाली अपने होश पूरी तरह खो बैठी.

..................

अपनी जीप में बैठा ख़ान गाओं से गुज़रता पोलीस स्टेशन की तरफ जा रहा था. तभी उसकी नज़र सामने सड़क पर चलती बिंदिया पर पड़ी.

दोपहर का वक़्त था. सड़क पर बिंदिया के सिवा कोई नही था. ख़ान ने उसके करीब ले जाकर जीप रोकी.

"कहाँ जा रही हो?"

बिंदिया रुक गयी.

"बस यहीं थोड़ा कुच्छ काम से जा रही थी साहब"

ख़ान ने बिंदिया को एक नज़र उपेर से नीचे तक देखा. एक पुरानी सी सारी में लिपटी वो गाओं की सीधी सादी औरत थी. कद उसका थोड़ा लंबा था और उसको देखकर ही कोई ये कह सकता था के इस औरत ने शारीरिक काम बहुत किया है. उसका पूरा शरीर एकदम गठा हुआ था, कहीं चर्बी का ज़रा भी नाम-ओ-निशान नही.

"वो चंदू के साथ सोती है वो, पता नही कब्से ऐसा चल रहा है" अचानक ख़ान को जै की कही बात याद आई.

बिंदिया को देख कर कोई ये नही कह सकता था के ऐसा हो सकता है. उसकी शकल को देख कर तो लगता था के वो एक अपनी इज़्ज़त संभालने वाली औरत है.

"क्या जै ग़लत हो सकता है?" ख़ान ने दिल ही दिल में सोचा

"कुच्छ काम था साहिब?" बिंदिया की आवाज़ सुनकर ख़ान का ध्यान टूटा.

"हां ऐसा करना के शाम को ज़रा चोव्कि आ जाना" उसने बिंदिया से कहा

"क्यूँ?"

"कुच्छ सवाल करने हैं तुमसे"

"मैं जितना जानती थी पहले ही बता चुकी हूँ. इससे ज़्यादा मुझे कुच्छ नही पता साहब" बिंदिया ने फिर वही 2 टूक़ जवाब दिया.

ख़ान जानता था के वो इस औरत के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती से काम नही ले सकता था और ना ही उसपर पोलीस वाला रोब झाड़ सकता था. इसको कुच्छ कहना मतलब सीधा ठाकुर खानदान से उलझना, मतलब सीधा एक फोन किसी नेता या मंत्री या किसी पहुँचे हुए आदमी को, मतलब ख़ान के लिए मुसीबत.

"अगर जै ग़लत हुआ तो?" ख़ान ने दिमाग़ में फिर सवाल उठा "अगर मैने इस औरत पर ऐसा कोई इल्ज़ाम लगाया तो बखेड़ा खड़ा हो सकता है"

"देखो" ख़ान ने कहना शुरू किया

"अगर जै झूठ बोल रहा है तो?" ख़ान का दिमाग़ फिर चिल्लाया "पर वो झूठ क्यूँ बोलेगा. वो जानता है के उसको मौत की सज़ा होने वाली है"

"हां कहिए" बिंदिया ने ख़ान को सोचते देख फिर सवाल किया

"चान्स तो लेना पड़ेगा" ख़ान ने दिल ही दिल में सोचा "इस बार जै की कही बात पर यकीन करना पड़ेगा"

"मैं जानता हूँ के तुमने जो मुझे बताया उससे कहीं ज़्यादा जानती हो तुम और छुपा रही हो" उसने आख़िर में अंधेरे में तीर चलाने का फ़ैसला कर ही लिया.

"क्या मतलब?" बिंदिया ने चौंकते हुए पुचछा

"मतलब ये के या तो तुम सीधे सीधे मेरे हर सवाल का सही जवाब दो और मुझे सब बता दो नही तो मैं सबको बता दूँगा" ख़ान के दिल की धड़कन तेज़ हो गयी.

उसने आस पास नज़र दौड़ाई ये तसल्ली करने के लिए के अगर यहाँ थप्पड़ पड़ा तो कोई देख तो नही रहा. किसी औरत से वो पहली बार पंगा ले रहा था.

"कमाल हैं" उसने दिल ही दिल में सोचा "एक मामूली औरत से इसलिए डरना पड़ रहा है के वो एक बड़े घर में काम करती है.

"क्या बता देंगे सबसे?" बिंदिया ने हैरत से पुछा

"तुम्हारा राज़" ख़ान ने मुस्कुराते हुए कहा

"कौन सा राज़?" बिंदिया के चेहरे का रंग बदल रहा था.

क्रमशः........................................
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07-01-2018, 12:15 PM,
#29
RE: Hindi Sex Porn खूनी हवेली की वासना
खूनी हवेली की वासना पार्ट --29

गतान्क से आगे........................

ख़ान समझने की कोशिश कर रहा था के ये रंग डर का है या गुस्से का.

"तुम्हारा और चंदू का राज़" उसने सीधे चोट की

और अगले ही पल वो समझ गया के उसका तीर निशाने पर लगा है. जै सच कह रहा था.

"क्या मतलब है आपका?" बिंदिया ने हकलाते हुए पुछा

"देखो बिंदिया" ख़ान ने थोड़ा अकल्मंदी से काम लेना ठीक समझा. ज़ाहिर सी बात थी के बिंदिया इतनी आसानी से तो मानने वाली नही थी

"मैं तो यहाँ नया ही हूँ तो इसलिए मुझे तो ये बातें पता नही हो सकती. किसी ने बताया ही है मुझे. किसी ऐसे ने जिसने के तुम्हें देखा है. अब सोच लो. ये बात झूठ ही सही, पर अगर उड़ गयी तो तुम्हारा क्या बनेगा. उस लड़के के साथ जिसे तुम अपना बेटा कहती हो ....."

"बस" बिंदिया ने बात काट दी "सरासर झूठ है ये. किसने बताया आपको?"

ये ऐसे नही मानेगी. ख़ान ने दिल ही दिल में सोचा.

"जब वो छ्होटा था तबसे ही रह रहा है ना वो तुम्हारे साथ. तो मुझे क्या पता के कब्से ऐसा कर रही हो तुम उसके साथ. इसलिए एक नाबालिग से ऐसा रिश्ता बनाने के जुर्म में, या यूँ कहो के ऐसा तुमने किया इस बात की शक की बिना पर मैं तुम्हें गिरफ्तार कर सकता हूँ. बाद में भले झूठ साबित हो, पर फिर बात उड़ तो जाएगी ही. और वो भी एक ऐसा बच्चे जो अपाहिज था? गूंगा था?"

वो खुद भी दिल में जानता था के ये बात कितनी बड़ी बकवास है. कोई भी अकल्मंद पढ़ा लिखा आदमी हँसेगा उसकी बात पर. पर गाओं की एक अनपढ़ औरत शायद फस जाए. और उसका शक सही निकला.

"क्या पूछना चाहते हैं आप?" जिस तरह से बिंदिया के चेहरे का रंग उड़ चुका था उससे ख़ान समझ गया था के वो यक़ीनन चंदू के साथ सो रही थी.

"यहाँ नही" उसने बिंदिया से कहा "शाम को थाने आ जाना

"शाम को नही आ पाऊँगी" बिंदिया ने जवाब दिया

"तो कल आ जाना" ख़ान ने कहा और जीप स्टार्ट की

"किसी से कहेंगे तो नही ना आप?" बिंदिया ने डरते डरते सवाल किया

"तो मतलब बात सच है?" ख़ान ने मुस्कुराते हुए पुछा

बिंदिया को देख कर ही लग रहा था के वो शरम से मरी जा रही है.

"किसने बताया आपको?" बिंदिया ने नज़र नीची किए हुए सवाल किया

"इश्क़ और मुश्क़ च्छुपाए नही च्छुपते मेरी जान" ख़ान ने कोरे पॉलिसिया अंदाज़ में कहा और जीप आगे बढ़ा दी.

थाने पहुँचकर वो अपनी टेबल पर बैठा और जेब से अपना मोबाइल निकाला.

2 मिस्ड कॉल्स.

पहली डॉक्टर. अस्थाना की. इसी ने ठाकुर साहब का पोस्ट मॉर्टेम किया था.

दूसरी ठाकुर के वकील देवधर की. ख़ान ने दिन में 2 बार इसका नंबर ट्राइ किया था पर उसने उठाया नही था.

पहली कॉल ख़ान ने डॉक्टर. अस्थाना को मिलाई.

"हां डॉक्टर. साहब" दूसरी तरफ से कॉल रिसीव होने पर उसने कहा

"एक बात बताना चाहता हूँ आपको" अस्थाना ने कहा

"हां कहिए"

"पहले आप भरोसा दिलाएँ के किसी से इस बात का ज़िक्र नही करेंगे"

ख़ान चौंक पड़ा.

"मैं ज़ुबान देता हूँ" उसने सोचते हुए कहा

दूसरी तरफ थोड़ी देर खामोशी रही.

"देखिए ये बात आपको बताने की वजह से मेरी जान भी जा सकती है इसलिए प्लीज़ अपना वादा भूलना मत" अस्थाना बोला

"आप बेफिकर रहिए" ख़ान बोला "ये बात मेरे से आगे नही जाएगी"

फिर थोड़ी देर खामोशी.

"पोस्ट मॉर्टेम रिपोर्ट में एक बात लिखी नही थी मैने" अस्थाना आख़िर में बोल पड़ा

"कौन सी बात?" ख़ान ने पुचछा

"देखिए इसमें मैं कुच्छ नही कर सकता था. मुझपर बहुत दबाव था के मैं इस बात का रिपोर्ट में कोई ज़िक्र ना करूँ. धमकी दी गयी थी मुझे"

"कौन सी बात?" ख़ान ने फिर पुछा

फिर थोड़ी देर खामोशी.

"पोस्ट मॉर्टेम में ठाकुर साहब के जिस्म पर किसी औरत के वेजाइनल डिसचार्ज के ट्रेसस मिले थे" अस्थाना ऐसे बोला जैसे दुनिया का सबसे बड़ा राज़ बता रहा हो

ख़ान को उसकी बात का मतलब समझने में एक पल लगा.

"मतलब ......"

"जी हां" अस्थाना उसकी बात ख़तम करने से पहले ही बोल पड़ा "ठाकुर साहब मरने से कुच्छ वक़्त पहले ही किसी के साथ हम-बिस्तर हुए थे"

ख़ान पे जैसे एक बॉम्ब सा गिरा

"इतनी ज़रूरी बात पोस्ट मॉर्टेम से निकाल दी आपने?"

"दबाव था मुझपर" अस्थाना बोला

ख़ान उसकी बात समझ गया. वो एक पोलीस वाला होते हुए एक मामूली नौकरानी से डर रहा था, अस्थाना तो बेचारा एक सीधा शरीफ डॉक्टर था.

"और अब ये क्यूँ बता रहे हैं आप मुझे?" ख़ान ने पुछा

"ठाकुर साहब का एक एहसान था मुझपर. मैं भी चाहता हूँ के उनका क़ातिल पकड़ा जाए. इसलिए मैने ये बात भी आपको बता दी के शायद इससे कुच्छ मदद मिले"

"और ये बात ग़लत हुई तो?" ख़ान ने सवाल किया

"पोस्ट मॉर्टेम रिपोर्ट की ओरिजिनल अनेडिटेड कॉपी अब भी मेरे पास है" अस्थाना बोला

थोड़ी देर फिर खामोशी रही.

"ये बात सच है" अस्थाना ने कहा और फोन रख दिया

ख़ान का दिमाग़ जैसे चक्कर खा गया.

ठाकुर हमबिस्तर हुआ था किसी के साथ. पर किसके? उसकी बीवी तो इस काम की थी ही नही.

और ज़ाहिर सी बात है के इसीलिए इस बात को दबाया गया. अगर बीवी नही तो कौन सो रही थी ठाकुर के साथ?

ज़रूर ठाकुर के बेटो ने ही इस बात को पोस्ट मॉर्टेम रिपोर्ट से हटवाया होगा.

और उस रात फोन भी तो मुझे किसी औरत ने ही किया था, खून की जानकारी देने के लिए जो बाद में सामने नही आई.

सोचते सोचते ख़ान ने देवधर का नंबर मिलाया.

"मैं आपसे ठाकुर साहब की वसीयत के बारे में पुच्छना चाह रहा था" देवधर के फोन उठाने पर ख़ान ने कहा.

"जी पुछिये" देवधर बोला

"कौन है बेनिफिशीयरी?" ख़ान ने पुचछा

"वैसे तो मैं ये बात आपको बताने से इनकार कर सकता हूँ पर फिर आप कोर्ट से ऑर्डर लाएँगे के ये इन्फर्मेशन आपको मर्डर इन्वेस्टिगेशन के लिए चाहिए और फिर वैसे भी ये वसीयत अब खोली ही जाएगी इसलिए मैं बता ही देता हूँ" देवधर ऐसे बोला जैसे ख़ान पर एहसान कर रहा हो

"ह्म्‍म्म्मम" ख़ान ने अपना गुस्सा पीते हुए हामी भरी

"5 लोग हैं बेनिफिशीयरी" देवधर बोला

ठाकुर के 3 बेटे, 1 बेटी और बीवी. ख़ान ने दिल ही दिल में सोचा

"ठाकुर साहब के 3 बेटे, बेटी और उनकी नौकरानी की बेटी पायल" ख़ान पर उस दिन का दूसरा बॉम्ब आकर गिरा.

वो अभी सोच ही रहा था के उसने सही सुना या ग़लत के फिर तीसरा बॉम्ब भी आ गिरा.

"वैसे तो ये वसीयत ठाकुर साहब बदलना चाहते थे पर अब वो रहे नही तो यही अप्लिकबल विल है"

"बदलना चाहते थे?" ख़ान ने पुछा

"हां मरने से 2 दिन पहले फोन किया था मुझे पर फिर बिज़ी होने की वजह से ना मैं उनसे मिलने जा सका और ना वो मिलने आ सके"

अगले दिन सुबह ख़ान देवधर के ऑफीस में उसके सामने बैठा था.

"काफ़ी इंटेरेस्ट है आपको विल में. कहीं अपना नाम तो एक्सपेक्ट नही कर रहे थे?" देवधर ने हस्ते हुए पुछा

"काश ऐसा होता के हमें भी कोई लाखों करोड़ों की जयदाद छ्चोड़के जाता" ख़ान ने मुस्कुराते हुए कहा "पर अपना तो वही हाल है के सारा दिन मेहनत करके कमाओ तो 2 वक़्त की रोटी खाओ"

ख़ान की बात पर दोनो हस पड़े.

"वसीयत के लिए इतना दूर आने की क्या ज़रूरत थी आपको? फोन पर ही बात कर लेते" देवधर ने कहा

"नही असल में आया तो मैं किसी और काम से हूँ. सोचा आपसे भी मिलता चलूं"

"ज़रूर" देवधर ने वसीयत निकालते हुए कहा "कहिए क्या जानना चाहते हैं"

"वसीयत कब बदली गयी थी?" ख़ान ने सवाल किया

"यही कोई 3 साल पहले"

"क्या बदलाव था?"

"पहले 4 लोगों के नाम थे, 3 साल पहले पायल का भी नाम जोड़ दिया था ठाकुर साहब ने"

"4 लोग?" ख़ान ने शक्की अंदाज़ में सवाल किया

"हां" देवधर वसीयत की तरफ देखता हुआ बोला "ठाकुर साहब के 4 बच्चे"

"और ठकुराइन?"

"उनका नाम तो कोई 12-13 साल पहले ही हटा दिया था ठाकुर साहब ने" देवधर सिगरेट जलाते हुए बोला.

हाथ बढ़ा कर उसने एक सिगरेट ख़ान को ऑफर की.

"ठकुराइन का नाम हटाने की कोई वजह?" ख़ान ने सिगरेट का कश लगते हुए कहा

"कोई वजह तो ज़रूर होगी ही ख़ान साहब पर अगर आप ये उम्मीद कर रहे हैं के मुझे वजह पता है तो ग़लत उम्मीद कर रहे हैं"

"आप वकील थे" ख़ान ने उम्मीद भरे आवाज़ में कहा

"और सिर्फ़ वकील बने रहने में भलाई थी मेरी. ज़्यादा अपनी नाक उनके घर के मामलो में घुसाता तो मुझे काट के फेंक देते और नया वकील रख लेते"

"आपका कोई ख्याल के ऐसा क्यूँ हुआ हो सकता है के ठकुराइन को वसीयत से निकाल दिया गया?"

देवधर ने इनकार में गर्दन हिलाई.

"कोई ख्याल के घर की नौकरानी की बेटी को जायदाद का हिस्सेदार क्यूँ बनाया गया?"

देवधर ने फिर इनकार में सर हिलाया.

"आपको अजीब नही लगा?" ख़ान ने पुछा

"लगा था पर जब मैने पुछा के ऐसा क्यूँ तो मुझे सिर्फ़ ये कहा के वो नौकरानी की बच्ची को भी कुच्छ देकर जाना चाहते हैं क्यूंकी उसकी माँ उनकी बहुत देखभाल करती है"

"ह्म्‍म्म्मममम" ख़ान सोचते हुए बोला

थोड़ी देर दोनो खामोशी से सिगरेट के कश लगते रहे

"जब ठकुराइन का नाम हटाया गया था विल से, उस वक़्त कौन कौन था विल में?" कुच्छ देर बाद ख़ान बोला

"देखिए पहले 6 लोग थे" देवधर आराम से कुर्सी से टेक लगाता हुआ कहने लगा "ठाकुर साहब के 4 बच्चे, उनकी पत्नी और उनका भतीजा जै. कोई 15 साल पहले जै का नाम हटा दिया गया, फिर ठकुराइन का और अब पायल का नाम जोड़ दिया गया"

क्रमशः........................................
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07-01-2018, 12:15 PM,
#30
RE: Hindi Sex Porn खूनी हवेली की वासना
खूनी हवेली की वासना पार्ट --30

गतान्क से आगे........................

ठीक जैसा की जै ने कहा था, 15 साल पहले उसका नाम वासेयत से हटाने की बात कर रहे थे जब उसको हवेली से निकल दिया था, ख़ान ने सोचा.

कोई एक घंटे बाद ख़ान ने शहर के बीच बने कब्रिस्तान के पास गाड़ी लाकर रोकी. ठीक आज ही के दिन उसकी माँ का इंतेक़ाल हुआ था और तबसे उसने ये आदत बना ली थी के हर महीने उस तारीख को कब्रिस्तान आता था.

सुबह के तकरीबन 11 बज रहे थे जब ख़ान ने सेंट्रल जैल के सामने अपनी जीप रोकी.

बाहर ब्लॅक कलर की एक मर्सिडीस खड़ी थी. ख़ान कार देखते ही समझ गया के ये गाड़ी हवेली की थी.

"जै से मिलने हवेली से कौन आया?" ख़ान सोच ही रहा था के उसको अपने सवाल का जवाब मिल गया. जैल का दरवाज़ा खुला और अंदर से कामिनी बाहर निकली.

और हमेशा की तरह ख़ान उसको फिर बस देखता ही रह गया. वो सावले रंग की आम सी शकल सूरत की लड़की थी पर उसके पूरे अंदाज़ में कुच्छ ऐसा था के नज़र बस उसपर अटक कर रह जाती थी.

ख़ान जीप में बैठा उसको देखता रहा. कामिनी जैल से बाहर निकली, अपनी गाड़ी में बैठी और चली गयी.

कुच्छ देर बाद ख़ान जै के सामने बैठा था. जै उसकी नज़र में सॉफ ज़ाहिर सवाल को देखकर फ़ौरन समझ गया के वो क्या पुच्छना चाह रहा था.

"पूरी हवेली में बस यही है शायद जिसे मेरे बेगुनाह होने पर यकीन है. आज मिलने चली आई थी" जै ने जवाब दिया

"कुच्छ ऐसा बताया इसने जिससे हमें मदद मिले?"

"कहाँ सर" जै ने जवाब दिया "सीधी सादी लड़की है बेचारी. घर में सब इसको भोली कहके बुलाते हैं"

"ह्म्‍म्म्म" ख़ान ने जवाब दिया

"आपको कुच्छ पता चला?" जै बोला

"तुम्हारी बात सही निकली बिंदिया के बारे में"

"आपने बात की उससे?" जै ने फ़ौरन सवाल किया

ख़ान ने हां में सर हिलाया

"क्या बोली?"

"डर गयी थी काफ़ी. मिलने आने वाली थी आज मुझसे और मैं उम्मीद कर रहा था के आज कुच्छ कोशिश करूँगा पता करने का उससे पर फिर मुझे कुच्छ काम था तो शहर चला आया.

"और किसी से बात?"

"नही यार. और सच कहो तो मुझे यही नही पता के बिंदिया से भी क्या पुछु. मुझे तो इतना भी यकीन नही के इसको कुच्छ पता भी है. अंधेरे में तीर चलाने वाली बात है"

"अगर उससे नही तो भूषण से बात करने की कोशिश कीजिए. काफ़ी टाइम से है वो हवेली में, सारी ज़िंदगी यहीं गुज़ारी है उसने अपनी. शायद कुच्छ पता चले"

"और उसकी भी कोई दुखती रग है?"

जै हस पड़ा

"नही दुखती रग तो नही है पर कमज़ोर है एक, गांजा. 2 कश साथ बैठा कर लगवा दीजिए, जो जानता है सब उगल देगा"

"ठीक है. करता हूँ बात, फिलहाल तो चलूं. एक दो काम और हैं मुझे"

तकरीबन 1 बजे ख़ान फिर गाओं पहुँचा. पता चला के बिंदिया उससे मिलने आई थी पर फिर इंतेज़ार करके चली गयी.

थोड़ी देर पोलीस स्टेशन में रुकने के बाद ख़ान अपने कमरे पर पहुँचा. दोपहर के 2 बज रहे थे, गर्मी और लू पूरे ज़ोर पर थी. सब अपने अपने घरो में दुब्के हुए थे.

वो खाना खाने को तैय्यार हो ही रहा था के दरवाज़ा खटखटने की आवाज़ आई. उसने उठकर दरवाज़ा खोला.

सामने बिंदिया खड़ी थी.

"तुम"? बिंदिया के अपने घर पर आया देखकर ख़ान चौंक पड़ा "यहाँ क्या कर रही हो?'

"थाने गयी थी सुबह पर पता चला के आप ही नही हो" बिंदिया ने कहा

"हां कुच्छ काम निकल आया था इसलिए जाना पड़ गया था" ख़ान बोला

"तो मैने सोचा के आपके घर जाकर ही मिल आऊँ"

"शाम को आ जाती. इतनी दोपहर में यहाँ आने की क्या ज़रूरत थी"

"नही कोई बात नही. इधर से गुज़र रही थी तो सोचा के आपसे मिलती ही चलूं. शाम को हवेली में ज़रा ज़्यादा काम होता है इसलिए शायद आना होता या नही"

साली ऐसे जता रही है जैसे मुझसे मिलने आकर मुझपे एहसान करती, एक बड़ा आदमी शामिल हो जाए तो पोलिसेवला अकेला कुच्छ नही उखाड़ सकता, , ख़ान ने दिल ही दिल में सोचा.

"आओ अंदर आओ" उसने बिंदिया से कहा और दरवाज़े से हट गया.

ख़ान एक छ्होटे से सरकारी क्वॉर्टर में रहता था, 2 कमरे और किचन, टाय्लेट, बस.

बिंदिया अंदर आई तो ख़ान ने उसको ढंग से देखा. बाहर धूप तेज़ थी जिसकी वजह से वो एक पल के लिए बिंदिया को गौर से देख नही पाया था पर जब वो अंदर आई तो ख़ान ने एक नज़र उसपर डाली. उसने एक काले रंग की सारी

डाल रखी थी जिसके पल्लू को उसने अपने उपरी जिस्म पर चादर की तरह लपेट रखा था.

"बैठो" ख़ान ने सामने रखी एक कुर्सी की तरफ इशारा किया.

बिंदिया ने अब तक जो पल्लू अपने उपेर लपेट रखा था हटा दिया. अब उसकी सारी की पल्लू आम तौर पर उसके कंधे पर था जैसा की अक्सर सारी पहनी हुई औरतों का होता है. सारी के नीचे उसने एक स्लीव्ले ब्लाउस पहना हुआ

था.

"कहो" उसने एक दूसरी कुर्सी पर बैठते हुए कहा.

"मैं क्या कहूँ" बिंदिया बोली "आपने बुलाया था, आप कहिए के क्या चाहते हैं"

"ख़ास कुच्छ नही" ख़ान ने अपनी टेबल का ड्रॉयर खोलते हुए कहा "बस कुच्छ सवालों के जवाब"

"आपके सवाल मैं जानती हूँ और मेरा जवाब है हां" बिंदिया बोली

"हां?" ड्रॉयर में कुच्छ ढूँढते हुए ख़ान ने गर्दन उठाकर बिंदिया की तरफ देखा.

जवाब में बिंदिया उठकर सीधी खड़ी हो गयी और उसने अपनी सारी का पल्लू नीचे गिरा दिया. अगले ही पल ख़ान समझ गया के गर्मी होते हुए भी उसने यहाँ आते हुए अपनी सारी का पल्लू और उपेर क्यूँ लपेट रखा था.

उसका ब्लाउस एक तो स्लीव्ले और उपेर से बिल्कुल ट्रॅन्स्परेंट था. ब्लाउस के नीचे उसने कोई ब्रा नही पहेन रखी थी. ट्रॅन्स्परेंट ब्लाउस के नीचे उसकी बड़ी बड़ी चूचियाँ सीधे ख़ान की नज़रों के सामने थी.

ख़ान समझ गया के बिंदिया ने उसके डराने धमकाने का क्या मतलब निकाला था.

"मैं आपके सामने हूँ और जब तक आप यहाँ हैं, जब आप चाहेंगे आ जाऊंगी. बस मेरी इज़्ज़त मत उच्छालना नही तो मेरे पास मरने के अलावा और कोई चारा नही बचेगा"

ख़ान ने एक नज़र उसपर उपेर से नीचे तक डाली. उसके सामने खड़ी औरत की एक जवान बेटी थी पर उसके बावजूद खुद उसके जिस्म में कहीं कोई ढीलापन नही था. पेट पर कोई चर्बी नही और जिस्म अब भी पूरे शेप में था.

ब्लाउस के अंदर से झाँकति चूचियाँ ब्रा ना होने के बावजूद भी अब तक तनी हुई थी.

"चोदने की हिसाब से माल बुरा नही है" ख़ान के दिल में ख्याल आया.

एक पल को उसने फिलहाल मौके का फ़ायदा उठाने की सोची पर फिर अपना ख्याल बदल दिया.

"अपने आप को ढको प्लीज़" उसने ड्रॉयर से पेन और अपनी डाइयरी निकाली "और बैठ जाओ"

क्रमशः........................................
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