Holi sex stories-होली की सेक्सी कहानियाँ
11-01-2017, 12:10 PM,
#71
RE: Holi sex stories-होली की सेक्सी कहानियाँ
ननद ने खेली होली--6

मैने भी उन दोनों के चेहरे पे लगे हुये वीर्य के थक्कों को अच्छी तरह फैला दिया...खूब लगा हुआ था...तब तक राजीव ने पकड के बारी बारी से दोनों के वीर्य लगे गालों चेहरे पे अपने गाल खूब कस कस के रगड दिये. जो गुलाल में मिला लाल रंग और कालिख उन दोनों ने इनके चेहरे पे लगाया था अब वो सब उन दोनों के चेहरे पे फैला हुआ..।

मैने राजीव का इशारा गुड्डी के खुले स्तनों की ओर किया जहां पे भी वीर्य बहोत लिथडा था...फिर क्या था उन्होने अपने दोनो गाल उन दोनो किशोर जोबनों पे...गोरे गोरे उभारों पे वो लाल गुलाबी रंग और बीच में कालिख के दाग ...और फिर अल्पी का भी नम्बर ..।

भाभी ...अरे आप क्यों भूखी बैठीं हैं....जरा आप भी भैया के माल का स्वाद चख लीजीये....आखिर आप का ही तो माल है.....गुड्डी ने मेरी ओर मुंह बढाया....अभी भी उसमें राजीव की लंड की मलाई भरी पडी थी।

मुंह बढा के मैने उसके होंठों से अपने हॊंठ सटा दिये और पल भर में ना सिर्फ उसके होंठं मेरे होंठो के बीच दबे कुचले जा रहे थे ...बल्कि मेरे जीभ भी उसके मुंह में...गुड्डी की गुलाबी जुबान पे गाढा...ढेर सारा वीर्य का थक्का....मेरी जीभ की नोक ने उसका स्वाद चखा और फिर उसके पूरे मुंह के अंदर घूम के...जहां थोडी देर पहले ही उसके भैया का मोटा कडा लंड....अभी भी उसका स्वाद....उसकी महक...जैसे मैने उसे सिखाया था वो कस के मेरी जीभ चूस रही थी चाट रही थी, उसकी जीभ बार बार उससे लड रही थी....जैसे मेरी जुबान नहो मेरे सैयां का मस्त लंड हो....कुछ देर में जो मैने मुंह ह्ल्के से खॊल के....मेरी जुबान वापस हुयी तो साथ साथ मे गुड्डी की जीभ भी....जैसे लडाई जीतने के बाद कोइ कैदी भी साथ लाये और साथ में गाढी मलाई भी....मैं भी उसे कस के चूस रही थी...आखिर मेरी प्यारी ननद की , मेरे सैयां के बचपन के माल की जुबान थी...और जैसे ही हम अलग हुए उस चालाक ने....अपने चेहरे का रंग मेरे चेहरे पे भी लिथड दिया।

भाभी इसमें भी तो भैया की मलाइ मिली है.....और फिर हम तीनों ही रंग गये तो आप कैसे बची रहतीं....हंस के वो छिनाल बोली।

तब तक पिकचर खतम हो गई।

गुड्डी और अल्पी के चेहरे भी....गोरे गालों पे लाल गुलाबी रंग...कालिख के छींटे और वीर्य की चमक....गुड्डी के तो बालों में भी एक थक्का अभी तक उलझा हुआ था लेकिन मैने बताया नहीं।

क्यों कैसे रही होली की शुरुआत .....मैने पूछा..।

अरे एक्दम गजब ...दीदी....लोग तो अपने जीजू के साथ पानी का रंग खेलते हैं लेकिन हमने तो जीजू की गाढी मलाई में लगे रंग के साथ होली खेली है...।

सोचो अगर आगाज ये है तो अंजाम कैसा होगा...उस कुडी के गुलाबी गालों पे कस के चिकोटी काटते हुये वो बोले।

अरे जीजू ये साल्ली डरने वाली नहीं हैं....लेकिन हां अपनी बहन से जरूर पूछ लीजिये. वो अदा से मटक के बोली।

अरे मेरी ननद किसी से कम नहीं है....लेकिन तेरे भी जीजा तो आने वाले होंगें...मैने पूछा।

अरे कोइ फरक नहीं पैंदा....आगे से उसके जीज पीछे से मेरे जीजा...अल्पी ने टुकडा लगाया।

प्लान हमारा ये था की हम सब पिकचर से हमारे घर चलते...और वहां २-३ घंटे मस्ती...लेकिन अल्पी बोली....की उसकी मम्मी को कहीं जाना है और उन्होने उसे सीधे घर आने को कहा है।

बेचारे राजीव....लेकिन अल्पी ने प्रामिस किया की वो कल शाम को जरूर आयेगी और तब तक वो गुड्डी की ओर इशारा करत्ती बोली,

मेरी इस चिकनी सह्लेली से काम चलाइये...ये भी कम प्यासी नहीं हैं।

लेकिन वो प्लान भी फेल हो गया. उसके जीजा जीत ( जिन्होने मेरे चढाने पे उसे शादी के समय कस के चोद के उसकी , चूत का उद्घाटन किया था और बहोत ही मस्त थे) और बहन लाली, ( गुड्डी की सबसे बडी बहन....अगर आपने नन्द की ट्रेनिंग पढी हो तो ये सब आपको मालूम होगा)....देर रात को आने वाले थे. लेकिन जब हम उसके घर पहुंचे तो वो लोग पहुंचे हुये थे.

मेरे नन्दोई ने पहुंचते ही मुझे बांहों में भर लिया....लेकिन अबकी वो थोडे कम चंचल लग रहे थे....क्यों क्या हुआ...मैने पूछा तो उन्होने बताया की यहां आने से पहले उनकी बीबी ने कुछ सखत पाबंदी लगा दी...शायद उन्हे कुछ् शक हो गया की जब वो शादी में आये थे तो उन्होने गुड्डी के साथ...तो बोलना रंग खेलने तक तो ठीक है लेकिन यहां वहां छूने पे भी पाबंदी और इससे आगे तो कुछ सोच भी नहीं सकते....कूवारी लडकी है अगर कहीं उंच नीच हो गया....अपनी बीबी की आवाज की नकल करते वो बोले।

अरे जीजू इत्ती सी बात...मैने उन्हे हिम्मत बंधाई. याद है पिछली बार जब आप शादी में आये थे...आप खुद कह रहे थे ना की आप की ये साल्ली....हाथ भी नहीं रखने देती थी....लेकिन मैं ने वो चक्कर चलाया की खुद उसने आप का हाथ पकड के अपने १७ साल के जोबन पे रख दिया था ...५-६ महीने पहले की ही तो बात है...और आप से एक नहीं दो दो बार...बिना किसी ना नुकुर...के ...तो आखिर आपकी बीबी भी तो ...उसी की बहन हैं मेरी ननद हैं....और ननदों को नचाना भाभी को नहीं तो और किसे आयेगा।

अरे मैने सोचा था, की अबकी साल्ली के साथ खूब जम के होली खेलूंगा, पहली होली में तो बिदक गयी थी लेकिन अबकी भरे आंगन में सबके सामने....क्या मस्त माल है औ कया मटकते हुये चूतड हैं....तब तक गु्ड्डी हमारे सामने से आंगन से गुजर रही थी...अपने जीजू को दिखा के उसने दोनो जोबन कस के उभार दिये और जीभ निकाल के चिढाया. पीछे से उनकॊ दिखा के चूतड भी मटका दिये...।

मन करता है गांड मार लूं साल्ली की....नन्दोई जी बोली लेकिन अपने बीबी की बात सोच के मन मसोस के रह गये.।

अरे गांड भी मारिये साल्ली की और गांड का मसाला भी चखाइये भी अपनी साल्ली को...बस अपनी इस सलहज पे भरोसा रखिये और हां होली में सलहज का हक साली से कम नहीं होता...पिछली बार तो उस कंवारी साल्ली के चक्कर में मैने छोड दिया था....अबकी मैं नहीं छोडने वाली अपन हक. और मैने दोनो जांघों के बीच कस के उनके तन्नये खडे खूंटे पे रगड दिया।

एक दम...मुस्करा के वो बोले।

तब तक राजीव वहां आ गये. जीत जीजू...अल्पना पे फिदा थे लेकिन शादी के समय तो उनका पूरा समय गुड्डी के साथ ही बीता और अल्पी भी अपने नये बने जीजू राजीव के साथ...जीत ने उनसे पूछा,

क्यों साल्ले...तेरी उस पंजाबी साल्ली की क्या हाल है।

मस्त है जीजा....वो बोले।

लगता है ननदॊइ जी का जी आपकी साली पे आ गया है....क्यों नहीं आप दोनो साली अदल बदल कर लेते...मैने चिढाया।

अरे क्या अदल बदल की बात हो रही है....ये मेरी बडी ननद और जीट ननदोई जी की पत्नी....लाली थीं...मुझसे उमर में २-३ साल ही बडी होंगीं, लेकिन खूब गदराइ, भरे बदन की बडे बडे चूतड...।

अरे ननद जी....जो आफर मैने आपको पिछली बार दिया था...सैंया से सैंया बदलने का...होली का मौका भी है....मैं नंदोई जी के साथ और आप मेरे सैंया के साथ ....साथ में मेरे दो चार देवर फ्री...क्यों मंजूर।

ना बाबा ना....तुम मेरे सैया को भी रखॊ....और अपने सैंया कॊ भॊ...दोनो ओर से ...आखिर छोटी भाभी हो.....मेरी ओर से होली गिफ्ट .....वो भी कम नहीं थीं. उन्होने दहला लगाया।

ना....मुझसे ये नहीं होगा....आखिर आप का काम कैसे चलेगा...और उपर से होली का मौसम....मुझसे तो एक रात नहीं रहा जाता....अरे स्वाद बद्ल लीजिये....और मेरे सैंया का आपके सैंया से कम नहीं है कहिये तो आप के सामने दोनो का नाप के दिखा दूं....बचपन में जो आपने पकडा पकडी की होगी तो जरूर छोटा रहा होगा लेकिन अब....मैने तुरुप का पत्ता जडा।

अरे मुझे तो शक है तब तक नाउन की नयी बहू बसंती...( जो बहू होने के नाते भाभियों के साथ ही रहती थी और ननदों को खुल के गाली देती थी) भी मैदान में आ गई की लाली बीबी....कहीं होली में गली के गदहों का देख के उन्ही के साथ तो नहीं...बडी ताकत है तुम्हारी ननद रानी।

तय ये हुआ की वो, गुड्डी, और जीत कल दोपहर में हम लोगों के यहां आयेंगें।

रात भर मैं सोचती रही की लाली के शक के बाव्जूद क्या चक्कर चलाउं....की जीत और इन का दोनो का काम हो जाये.
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11-01-2017, 12:10 PM,
#72
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ननद ने खेली होली--7

जीत को मैने समझा दिया थी...मिल बांट के खाने को....लाली को अपने ‘सीधे साधे भाइ’ पे तो शक होगा नहीं इसलिये उन के साथ वो गुड्डी को छोडने को तैयार भी हो जायेंगी...और मैने राजीव को भी...सालीयों की अदला बदली के लिये तैयार कर लिया....तो मिल के खाओगे तो ज्यादा मजा आयेगा.....वो बिचारा ननदोइ मान भी गया।

मर्द बेचारे होते ही बुद्ढू हैं और खास कर जहां चूत का चक्कर हो..।

और साथ ही साथ अगर मेरी उस ननद को एक साथ दो मर्दों का शौक लग गया तो जो बची खुची शरम है वो भी खतम हो जायेगी और जब वो होली के बाद हम लोगों के साथ चलेगी तो....फिर उसके साथ जो कुछ होने वाला है उसके लिये....तो एक तीर से तीन शिकार...।

लेकिन लाली को वहां से ह्टाना जरूरी था....उसके सामने जीत की कुछ हिम्मत नहीं पड सकती थी....वो भी शरमाते और गुड्डी भी...।

पर उसका भी रास्ता मैने निकाल लिया...।

अगले दिन आईं मेरी ननद लाली, गुड्डी और जीत।

पतली शिफान की गुलाबी साडी और मैचिंग ब्लाउज में उनका भरा बदन और गदराया लग रह। खूब देह से चिपकी...ब्लाउज से छलकते भरे भरे जोबन...।

बांहों में भर के उन्हे चिढाती मैं बोली, बीबी जी....लगता है रात भर ननदोई जी ने चढाई की जो सुबह देर से उठीं और आने में..।

बात काट के मुझे भी वो कस के भींच के मेरे कान में बोलीं,

अरे तो क्या मेरे भाई ने छोडा होगा मेरी इस मस्त भाभी को।

उन्हे छोड के एक बार मैने फिर उपर से निहारा....वास्तब में असली मजा औरतों को इस उमर में ही आता है...गोरे चिकने गाल, कटाव खूब भरे भरे खेले खाये उभार, भरे हुये कुल्हे...और उपर से कामदार साडी...और लाल चोली कट ब्लाउज,।

सच में मैं गारंटी के साथ कहती हूं नजर न लगे आपको....आज जिस जिस मर्द ने देखा होगा ना आपको....सबका खडा हो गया होगा....इन्क्ल्युडिंग आपके गली के गधों के...वैसे ननद रानी मेरे पास होता ना तो मैं तो यहीं अभी ..।

वो सच में शरमा सी गयीं लेकिन मैं छोडने वाली नहीं थी...और मेरे ख्याल से आपके भाई का भी आपको देख के.....मैने फिर छेडा। पर वो भी..।

अरे तेरे ननदोई का तो एक दम खडा है और वो आज आये भी हैं इसलिये की सलहज कॊ अपनी पिचकारी का दम दिखायेंगें।

वो तो मैं देखूंगी ही छोडूंगी थोडी आखिर छोटी सलहज हूं और होली का मौका है ...और फिर मैने गूड्डी की ओर देखा....।

सफेद शर्ट और स्ट्राईप्ड स्कर्ट में वो भी गजब की लग रही थी...हल्का सा मेक अप....मैने उसे भी बांहों में ले के कस के भींच लिया पर तब तक मेरे नन्दोई जीत की आवाज आई,

अरे भाभी मेरा नम्बर कब लगेगा....अपकी ननदें तो बडी लकी हैं...।

और गुड्डी को छोड के मैने अपने बेताब नंदोई को बांहों में बांध लिया।

भाभी मेरा कुछ....वो बिचारे परेशान ...और निगाहें साली के मस्त उभारों पे गडी...।

देखूंगी....हो सकता है...मैं उनकॊ और परेशान कर रही थी...लेकिन ननदोई जी मेरी एक शर्त है..।

अरे आपकी शर्त मंजूर हैं बस एक घंटे के लिये अकेले में ये साल्ली मिल जाय ना..।

एक क्या पूरे तीन घंटे का सो करिये....लेकिन आज जीजा साले मिल के इस साल्ली की ऐसी सैंड विच बनाइये की चल ना पाये....आगे पीछे दोनो ओर से...मैने और आग लगाई।

एक्दम ...वो बोले और कस के अपना ८ इंच का खूंटा मेरी जांघों के बीच में..।

मैं जो खास डबल भांग वाली गुझिया बना के लाई थी वो ठंडाई के साथ ले आई।

मेरी बडी ननद लाली को पूरा शक था...।

देखॊ मैं भांग वांग....कहीं इसमें कुछ पडा तो नहीं हैं....वो चिहुंक के बोली।

अरे नहीं आप को तो मालूम है मैं कूछ खुद नहीं ...और उन्होने एक गुझिया लेके खा ली।

बेचारी उन्होने अपने ‘सीधे साधे भाई’ पे यकीन कर लिया।

( मैं जानती थी इसलिये मैने पहले से उनसे बोल के रखा था....और बीबी के लिये आदमी थोडा बहोत तो झूठ बोल ही लेता है और भांग सिर्फ गुझिया में नहीं ठंडाई में भी पडी थी वो भी स्पेशल)

ननद रानी आपने मेरे बात पे यकीन नहीं किया ना इसलिये एक मेरे हाथ से और खाइये और मैने जबरन एक गुझिया उनके मुंह में ठूंस दी।

अरे ननदोई जी...बेचारे जीत लाली के सामने उनकी हिम्मत नहीं पड रही...साली ऐसे बैठी है, डालिये ना उसके मुंह में.....और फिर अपने हाथ से जीत ने गुड्डी को एक भांग भरी गुझिया खिला दी।

फिर ठंडाई....थोडी देर में कस के सुरुर आने लगा।

जीत गुड्डी को खुल के नान वेज जोक सुना रहे थे।

ननद रानी, वो जॊ दूबे भाभी हैं ना आप को बहोत याद कर रही थीं, कह रही थीं की आप आयें तो मिलने के लिये मैं उन्हे बता दूं। तो मैने बोल दिया की नहीं हमीं दोनो आ के आप से मिल लेंगीं....या तो आप कहिये तो उन्हे बुला ही लूं।

दूबे भाभी ....३४-३५ के दरमयान उमर, दीर्घ स्तना...३८ डी डी, खूब खुल के मजाक करने वाली, बडे नितंब...कन्या प्रेमी....और साथ में मर्द मार भी...कोई भी चीज शायद ही उनसे बची हो, लेकिन गाली गाने में खुले मजाक में...और`खास तौर से ननदों नन्दोईयों से...।

नहीं नहीं तुमने ठीक सोचा....हमीं लोग चल के मिल आयेंगें अच्छा थोडी लगेगा...आखिर उमर में बडी हैं.....मेरा भी बडा मन कर रहा था ...मेरी शादी में उन्होने वो जलवे दिखाये थे.....लाली बोलीं।

जब कल रात मैने सोचा तो मैं उन के मन की बात समझ गई थी.असल में खतरा उन्हे जीत से गुड्डी को नहीं था बल्की गुड्डी से जीत को था। वो ये समझ तो अच्छी तरह गयीं थीं की...लेकिन डर ये रही थीं की कहीं साली जीजा का कोई सीरियस चक्कर चल गया तो वो कहीं किनारे ना हो जायं....मध्यम उमर में कम उमर की लड्कियों से डर होना स्वाभाविक है और यही तीर मैने दूबे भाभी के लिये भी छोडा। वो जानती थी की अगर दूबे भाभी आ गयीं तो अपने नन्दोइ जीत को तो छोडेंगी नहीं और फिर होली का मौका....जीत भी दिल फेंक तो हैं हीं....इसलिये वो चट से चलने को तैयार हो जायेंगी और यहां उनका सीधा साधा भाई तो है ही..।

बस थोडी देर में आते हैं हम लोग दूबे भाभी के यहां से, मैं बोली।

बस पास में है १० मिनट....में आ ते हैं लाली बोलीं।

दरवाजे के पास से निकलते हुये मैने मुड के देखा ....गुड्डी इनके और नन्दोइ जी के बीच में...जीत ने मेरी ओर देखा तो मैने अंगूठे और उंगली से चुदाई का इंटरनएशन्ल सिम्बल बना के लाइन क्लियर का इशारा दे दिया।

ननद ने खेली होली २ जब हम लोग दूबे भाभी के यहां पहुंचे तो वो खुशी से फूली नहीं समाई। बस उन्होने मेरी बडी ननद को बांहों में भर लिया।

अरे आओ ननद रानी....कितने दिन हुये तुमसे मिले...तुम्हारी शादी के बाद तो बस पहली बार मिल रही हो..।

कस के उनके दीर्घ उरोज मेरी ननद लाली के गदराये जोबन् दबा रहे थे। लेकिन जब दूबे भाभी ने मुझे आंख मारी तो मैं समझ गयी की प्लान पक्का..।

अरे भाभी हमारे नन्दोई इनको एक मिनट के लिये छोडते ही नहीं होगे इन बिचारी की क्या गलती - मैं बोली।

अरे तो हमारे नन्दोइ जी की भी क्या गलती...इतनी गद्दर जवानी है हमारी ननद की...देख दबा दबा के कैसे नारंगी से काबुली अनार बना दिया है। दूबे भाभी अब सीधे आंचल के उपर से उनके उभार दबाते बोलीं।

लेकिन चल जरा पानी वानी लाती हूं...व्ररना ननद रानी क्या कहेंगी की होली में आई और भाभी ने पानी भी नहीं पूछा।

जैसे ही दूबे भाभी पानी ले के आयीं पता नहीं कैसे उन्हे पता चल गया...नहीं भाभी नहीं रंग नहीं...बडी महंगी साडी और इस पे रंग छूटेगा भी नहीं...झट से लाली पीछे हट गईं।

सही बात है...और फिर रंग ननद से खेलना है उनकी साडी से थोडी...और मैने झट से आंचल पकड के खींचना शुरु कर दिया।

और दूबे भाभी भी ग्लास एक ओर रख के पेटीकोट में फंसी साडी उन्होने कमर पे खोलनी शुरु कर दी...जैसे ही वो मेरा हाथ पकड्तीं तो दूबे भाभी...कमर पर से और झुक के वो दूबे भाभी को रोकतीं तो मैं चक्कर ले के....थोडी देर में ही पूरी की पूरी साडी मेरे हाथ में....और उस का गोला बना के उपर दुछत्ती पे...।

सिर्फ साया ब्लाउज में मेरी ननद बेचारी खडी...और मेरी निगाहें....लो कट लाल ब्लाउज से छ्लकते दोनों उभारों पे..।

पास आगंदके निपल के बस थोडा उपर ह्ल्के से मैने दबाते हुये शरारत से उनकी आंखों में आंखे डाल के देखा और कहा, क्यों दीदी...ग.ये ब्लाउज भी तो मैचिंग है....उतना ही महंगा होगा साडी के ही पीस का लगता है।

मेरा मतलब समझ के घबडा के वो बोलीं....नहीं नहीं इसे नहीं...इसे रहने दो..।

जब तक वो रोक पातीं दूभे भाभी ने पीछे से उनके दोनो हाथ पकड के मोड दिये।

अरे क्यों शरमा रही हैं अंदर ब्रा वा नहीं पहनी हैं क्या...मेरी उंगली अब सीधे निपल तक पहुंच गई थी, उसे फ्लिक करते हुये मैने पूछा।

वो कस मसा रही थीं हाथ छुडाने की कोशिश कर रही थीं ...पर दूबे भाभी की पकड।

मैने आराम से धीरे धीरे उनके एक दो ...ब्लाउज के सारे बटन खोल डाले और बटन खोलने के साथ अब खुल के मेरी उंगलियां उनके उभारों को रगड रही थीं, छेड रही थीं। ब्लाउज निकाल के उनके हाथ तक ...।

उधर दूबे भाभी ने उनके हाथ छोडॆ और इधर मैने ब्लाउज निकाल के ...वो भी सीधे दुछतॊ पे साडी के पास....।

तेरी साडी भी तो कम अच्छी नहीं हैं...अब लाली का हाथ मेरी साडी पे...।

मुझॆ लगा की दूबे भाभी मेरा साथ देंगी पर वो अंदर चली गयीं थी...और गुथम गुथा के बाद थोडी देर में मेरी हालत भी उन्ही के जैसी और जब दूबे भाभी लौटीं तो...।

कुछ ही देर में हम तीनों ब्रा पेटीकोट में थे।

लाली..टेबल पे रखे ग्लास को झुक के देख रही थी...जिस में रंग के डर से...।

वो ग्लास खाली था। तब तक पीछे से मैने और दूबे भाभी ने उन्हे एक साथ दबोच लिया। दूबे भाभी ने गाढे लाल रंग की टुयूब मुझे पकडा दी थी और उनके दोनों हाथों मे तवे की गाढी कालिख....मेरे दोनों हाथ सीधे उनकी ब्रा में....बहोत दिनों के बाद होली में किसी ननद के गदराये जोबन मेरी मुटठी में थे...पहले तो मैने कस के कच कचा के दोनों हाथों का गाढा लाल रंग उनकी चूंचियों पे कस कस के रगडा, लगाया। एक द्म्म पक्का रंग...और उधर दूबे भाभी ने मेरी ननद के गोरे गाल काला करने में कोई कसर नहीं छोडी। वो छट्पटा रहीं थीं, गुत्थ्मगुथा कर रही थीं पर मैं और दूबे भाभी दोनो एक साथ पीछे से...मेरे हाथ ...उनके उरोजों के सीधे स्पर्श का अब मजा ले रहे थे ...खूब मांसल और कडे....निपल भी बडे बडॆ..।

ननद रानी मैं आपसे कहती थी ना अदला बदली कर लो ...अरे होली में जरा अपनी भाभी के भी सैयां का मजा ले के देखो....चलिये अभी तो भाभी से ही काम चलाइये...मैं बताती हूं की कैसे आपके भैया...जोबन मर्दन करते हैं....धीरे से मैने दोनो चूंचीयां नीचेसे कप कीं और पहले तो हल्के हल्के दबाया..और फिर थोडा सा दबाव बढा के अंगुठे और तर्जनी के बीच कस के निपल को दबा दिया...।

उइइइ....उनके मुंह से चीख निकल पडी।

अरे ये तो शुस्रुआत है और दूसरे निपल को खूब कस के खींच के जोर से पिंच किया। जिस तरह से ननद रानी के निपल खडे थे, ये साफ था की उनको भी जबर्दस्त मजा आ रहा है.फिर तो मैने खूब कस कस के उनके उभार दबाने शुरु कर दिये..।
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11-01-2017, 12:11 PM,
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ननद ने खेली होली--8

ऐसे दबाते मसलते हैं मेरे सैयां मैं उनके कान में बोली। कई बार तो सिर्फ छातियां मसल के झाड देते हैं...चलिये अगर आपको डलवाने में उनसे शरम लग रही हो तो बस एक बार दबवा के देख लिजीये..आपके भैया आपका कहना थोडे ही टालेंगें।

मैने उन्हे कस के छेडा तब तक दूबे भाभी बोलीं, अरे तू अकेले ही इसके दोनो अनारों का मजा लेती रहेगी जरा मुझे भी तो स्वाद लेने दे..।

एक्दम भाभी और मेरा बायां हाथ अब उनकी कमर को कस के पकड के चिकने गोरे पेट को लाल कर रहा था और दूसरा उभार अब दूबे भाभी के कब्जे मे था और उनकी रगडाई तो बडे बडे मर्दों को मात करती थी।

चल देख ...कौन ज्यादा कस के दबाता है...इस ननद छिनाल के अनार...अरे बचपन से दबवा रही है जब टिकोरे थे...और आज मुझ से शरमा रही है।

एक दम भाभी और मैने भी कस के दबाना मसलना शुरु कर दिया।

पांच मिनट में ही जिस तरह से हम दोनों ने रगडाई मसलाइ की....उनके मुंह से चीख सिसकियां....निकलने लगीं।

इसके साथ ही दूबे भाभी ने ढेर सारा सूखा रंग हरा, नीला बैंगनी उनकी ब्रा में डाल दिया, जिससे जैसे ही गीला रंग, पानी पडे ये सारा उनकी चूंचियों को रंग दे.और वो सूखा रंग आगे से मैं उनके पेटीकोट के अंदर भी घुसेड रही थी।

दूबे भाभी के दूसरे हाथ ने पीछे से उनका पेटीकोट उठा के पिछ्वाडा भी रंगना शुरु कर दिया था और फिर एक झटके में....पैंटी खींच के नीचे फेंक दी, अरे ननद रानी जरा बुल्बुल को हवा तो खिलाओ कब तक पिंजडे में बंद किये रहोगी। वो बोलीं और उनका लाली के चूतड को रगड्ना मसलना जारी था और मैने भी आगे से हाथ साये के अंदर डाल के वहां भी रंग लगाना...एक दम चिकनी मक्खन मलाइ थी...गुड्डी की तरह।

तब तक वो थोडा चीखीं...और मतलब दूबे भाभी की बात से आ गया, अरे लाली...क्या बहोत दिनों से ननदोइ जी ने पीछे का बाजा नहीं बजाया है जो इतनी कसी है...' अरे भाभी...कोई बात नहीं आज हम दोनों मिल के ननद रानी की गांड मार के सारी कस्र पूरी कर देंगें। मैने इरादा साफ किया तो वो बोलीं....एक दम होली में ननद पकड में आये तो बिना उसकी गांड मारे छोड्ना तो सख्त ना इंसाफी है।

और जब वो हम दोनों की गिरफ्त से छूटीं अच्छी तरह रंगी पुती तो मुझे लगा की कहीं गुस्सा ना हों...पर कुछ भंग का नशा, कूछ चूंचियों की रगडाई मसलाई....और सबसे बढ के होली का असर....उन्होने टेबल पे रखे रंग उठा के हम दोनों को रंगना शुरु कर दिया और यहां तक की देह में लगे रंग भी...हम दोनों की देह पे ...हमारी ब्रा भी उन के रंग में रंग के लाल पीली हो गई।

फिर उन्हे धकेलते, पकड के हम आंगन में ले आये।

दूबे भाभी का आंगन सारे मुहल्ले की औरतों में होली के लिये मशहूर था। सारी औरतें, ननद भाभीयां ....यहीं जमा होती थीं। उंची उंची दीवारे कोइ मर्द का बच्चा पर भी नहीं मार सकता था....एक छोटे तलैया से गड्ढे में भरा रंग....रंग खेलने और खाने पीने का पूरा इंतजाम....उस चहब्च्चे में सबकी डुबकी लगवाई जाती और ...मुझे याद था की १४ से ४४ तक की शायद ही कोई ऐसी मेरी मुहल्ले पडोस की ननद हो जिसकी मैने यहां होली में जम के उंगली ना की हो....कपडे तो किसी के बचते ही नहीं थे...और एक से एक गंदी गालियां....भाभी कोइ रिस्ते में ननद लगने वाली बच्ची भी क्यों ना हो उससे जब तक १०-५ गाली...और सीधे उसके भाई का नाम लगावा के ना दे देती हों....छोडती नहीं थी।

आज सिर्फ हम तीन थे लेकिन इंतजाम होली से पहले होली का पूरा था।

पहले तो हम दोनों ने हाथ पांव पकड के ....लाली की डोली कर के लाल रंग भरे चहबच्चे में जम के ६-७ डुबकियां लगवाईं और फिर उसी में छोड दिया।

दूबे भाभी और मैं भी उस में घुस गये और फिर क्या ....थोडी देर में लाली की ब्रा मेरे हाथ में थी...और मेरी तो फ्रंट ओपेन होने के कारण एक झटके में ही खुल गई।

और जब हम सब बाहर आये तो तीनों टाप लेस थे।

ननद रानी के साथ होली की शुरुआत तो हो गई लेकिन मैने कुछ खिलाया पिलाया नहीं...और उन्होने वहीं रखी एक व्हिस्की की बोतल खॊली...।

नहीं भाभी मैं ये नहीं ....लाली ने नखरा किया।

अरे साल्ली...मुझे सब मालूम है नन्दोई जी को शौक है तो अब तक तुम्हे बिना पिलाये छोडा होगा क्या...दूबे भाभी बोली फिर अपने अंदाज में अपने दोनों टांगों के बीच इशारा करते हुये कहा...और ये नहीं तो ये शराब पिला दूंगी..सुनहरी शराब...बोल।

अरे भाभी...मेरे लिये मौका अच्छा था...ननद रानी ये भी पियेंगी...अभी ये और बाद में वो। मैने छेडा।

एक पेग के बाद जब दूसरे के लिये वो मना करने लगी तों दूबे भाभी बोलीं पी ले सीधे से वरना ....गांड में बोतल डाल के पूरी बोतल खाली कर दूंगी....जायेगी तो पेट में।

कुछ ही देर में आधी से ज्यादा बोतल खाली थी और उसमें से भी ज्यादा लाली को हम दोनों ने जबरन , मना के पिला डाली।

और थोडी देर में नशे का असर भी दिखना शुरु हो गया।

जिस तरह दूबे भाभी....लाली के रंगे गद्रराये जोबनों की ओर ललचाइ निगाहों से देख रही थी...मैं समझ गयी की उनका इरादा क्या है।

हम दोनों ने आंखॊं आंखों में इशारा किया और ....मैं सीधे लाली के पेटीकोट के पास...और मेरा इरादा समझ उन्होने उठने की कोशिश की लेकिन दूबे भाभी पहले से ही तैयार थीं....कस के उन्होने दोनो कंधे पकड के दबा लिये।

अब मुझे कोई जल्दी नहीं थी। ह्ल्के ह्ल्के मैने पेटी कोट के नाडे पे हाथ लगाया और पूछा, क्यों ननद रानी...अब तक कौन कौन ये नाडा खोल चुका है..अच्छा चलिये पुरानी बात भूल जाइये....अबकी होली में आपकी भाभियां और हमारे देवर....आपको नाडा बांधने ही नहीं देंगे....है ना मंजूर...।

देवर तो इसका मतलब जो इसके भाई लगते हैं...जान बूझ के दूबे भाभी ने कस के उनके निपल पिंच करते हुये अर्थाया...।

और क्या....मेरे सारे देवर और सैंया हैं ही बहनचोद ....लेकिन उन बिचारों की क्या गलती मेरी साली छिनाल पंच भतारी ननदें हैं हीं ऐसी, कालीन गंज की रंडियों को मात करने वाली.....और अपनी ननदों का बखान करते हुए....मैने उनका नाडा खोल के पेटीकोट नीचे सरका दिया। और ढेर सारे सूखे गीले रंगो से सजी उनकी चूत ....जांघों को भींच के उन्होने छिपाने की कोशिश की पर उसके पहले मैने उसे दबोच लिया, अरे चूत रानी, आज आपने मुझे दर्सन दिया अब जल्द मेरे सैयां को भी दरसन दीजिये...और कस के रगड दिया।

वो बिचारी तडप के रह गयीं। मेरे हाथ की गदोरी कस कस के चूत को रगड रही थी।

कुछ मजे में कुछ छुडाने के लिये वो हाथ पैर पटक रही थीं।

क्यों भाभी अगर कोई दूधारू गाय...दूध दुहाने में हाथ पैर पटके तो क्या करते हैं मैने आंख नचा के दूबे भाभी से पूछा।

अरे तो उसका हाथ पैर बांध के दूहते हैं और क्या...वो बोलीं।

और उसके बाद तो वहीं पडी लाली की रंग में डूबी ब्रा से ये कस के उन की मुश्के बांधीं की...वो बिचारी अपना हाथ एक इंच भी इधर उधर हिला नहीं सकती थीं। अब दूबे भाभी के दोनों हाथ खाली थे। और फिर कस क्स के दोनों चूंचिया रगडने लगीं...।

दूध देने लायक तो एक दम हो गयी है ये....वो बोलीं।

अरे घबराइये मत ये आई इसी लिये मायके हैं ....गाभीन होने। यहां से लौटने के ठीक ९ महीने बाद सोहर होगा इनके यहां....हां फिर ये सोचेंगी की बच्चे से मेरे सैंया को मामा कहल्वायें या बापू....है ना। मैने एक झटके में पूरी उंगली उनके चूत में पेलते हुये कहा। वो अच्छी खासी गीली थीं।

अच्छा तो ननद रानी...मेरे सैयां के बारे में सोच के ही इतनी गीली हो रही है तो सोचिये जब दोनो चूंचियां पकड के वो पेलेंगें तो कित्ता मजा आयेगा है ना। मैं बोली।

उनकी चूत कस के मेरी उंगली भींच रही थी। मैने दूसरे हाथ से उनकी पुत्ती कस के दबोच ली। थोडी देर अंदर बाहर करने के बाद रस से भीगी उंगली दूबे भाभी को दी तो वो ऐसे चूसने लगी जैसे शहद , फिर तो मेरे लिये रोकना बहोत मुश्किल हो गया....और मेरे नदीदे होंठों ने झट से उनके निचले होंठों को अपने कब्जे में कर लिया। वास्तव में बहोत रसीली थीं वो संतरे की फांके....कभी मैं चूसती, कभी चाटती...और फिर दोनों हाथों से दोनो पुत्तियों को फैला के जीभ अंदर पेल दी। लंबी मोटी जीभ लंड की तरह, कभी अंदर कभी बाहर...कभी गोल गोल...चारों ओर..।

नहीं प्लीज छोडो ना ...मुझे ये सब ....नहीं नहीं....वो तडप रही थीं छटपटा रही थीं...।

अरे क्या चीख रही है....अपने मुंह से उनका निपल निकालते हुये दूबे भाभी बोलीं....तूझे इस बात की तकलीफ है की तेरी भाभी मस्त चूत चूस रही है और तूझे कोइ चूसने को नहीं मिल रहा....बात तो तेरी सही है। बडी नाइंसाफी है चल तू मेरी चूस...और उनके मुंह पे चढ के ...वो लाख छट्पटायीं...कमर पटकीं....पर दूबे भाभी की तगडी मोटी जांघों के बीच फंस के आज तक कोई ननद बची थी जो लाली जी बचतीं। और अपनी झांटो भरी बुर कस कस के उन्होने उनके मुंह पे रगडना शुरु कर दिया...वो सर हिला के बचने की कोशिश करतीं तो उन्होने उनके बाल पकड के एक दो बार जो जोर से खींचे...तो उन्होने सर हिलाना बंद कर दिया।

ये देख के मैं और जोश से भर गई और कस कस के चूसने लगी....एक दो बार मैं लाली को झडने के कगार पे ले गयी फिर रुक गई, पर दूबे भाभी ने आंख के इशारे से कहा चालू रह...फिर तो मैं कभी मेरी जीभ उपर नीचे कस क्स के लप लप चाटती...कभी दोनों होंठ...पूरे जोश से चूसते...और अब जब वो झडने लगी तो बजाय रुकने के मैं और जोर से चूसने लगी। वो चूतड पटक रहीं थीं कमर एक एक फीट जमीन से उठा रहीं थी....हाथ तो बेचारी के बंधे थे और मुंह पे दूभे भाभी चढी हुई थीं। जब उनका झडना थोडा कम हुआ तो मैने कस के कच कचा के उनकी क्लिट दोनों होंठ के बीच हल्के से काट ली और क्लिट चूसती रही। उधर दूबे भाभी भी उनके उत्तेजित निपल को मरोड रही थीं, पिंच कर रही थीं....लाली थोडी देर में दुबार झडने लगी। कुछ देर बाद तो हालत ये हो गयी थी कि उनका एक बार का झडना रुकता नहीं था और दूसरी बार का झडना चालू हो जाता। ४-५ बार के बाद तो वो लथपथ हो गयीं ....एक दम शिथिल तब भी एक बार और उन्हे झाड के ही मैने छोडा। जब मैने मुंह हटाया तो जैसे हनींमून से लगातार चुद के लौट के आई दुल्हन की चूत होती है वैसी ही उनकी भी थी...खूब रगडी....लाल लाल मेरे तो मुंह में पानी भर आया। मैं सोचने लगी की काश मैं वो सुपर डिल्डॊ ले आई होती १० इंच वाला...ले तो आई थी मैं डिल्डॊ भी और ढेर सारी चीजें....बट प्लग, एनल बीड्स....लेकिन यहां नहीं था...कमर में बांध के स्ट्रैप आन डिल्डो.....हचक हचक के चोदती....पूरे १० इंच तक पेल के...और इस हालत में वो ननद बेचारी कुछ कर भी नहीं पाती।

और बेचारी क्यों....इसी के चक्कर में तो बेचारे मेरे नन्दोई अपनी साली का मजा खुल के नहीं ले पार रहे थे....मेरे आधे प्लान की किस तरह होली में खुल के गुड्डी को उसके भैया से रगडवाउंगी....और यहां तो बेचारी को अपने जीजा के साथ...।

क्या सोच रही हो..दूबे भाभी बोलीं.।

यही की जरा ननद रानी को ननदोई बन के मजा दिया जाय।

एकदम ...नेकी और पूछ पूछ...चल चढ जा।

अपनी कितनी छोटी ननदों को इसी तरह प्रेम लीला का पाठ पढा के मैने छिनाल बनाया था लेकिन किसी बडी ननद के साथ ये पहला मौका था।

मैने दोनों टांगे उठा के अपने कंधे पे रखी....( ये सोचते हुये कि इस समय मेरे सैंया भी अपनी प्यारी बहना की चिकनी चिकनी जांघे फैला के टांगे कंधे पे रखे....) दोनो जांघों को फैलाया और फिर....पहले एक दो बार हल्के ह्ल्के ...फिर कस के रगडना शुरु कर दिया। जिस तरह मेरी चूत उनकी चूत पे घिस्सा मार रही थी...थोडी ही देर में वो कुन मुनाने लगीं...और फिर उनके चूतड अपने आप ही उठने लगे।

पास में रखी व्हिस्की की आधी बची बोतल उठा के दो घूंट मैने सीधे बोतल से ही लिये और बोतल दूबे भाभी की ओर बढा दी।

दो घूंट उन्होने भी ली और फिर एक पल अपनी चूत उनके मुंह से उठ के ...जब तक...। ननद रानी संहले संहले....बोतल का मुंह उनके मुंह में घुसेड दिया और घल घल कर के सारी की सारी बोतल खाली।
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11-01-2017, 12:11 PM,
#74
RE: Holi sex stories-होली की सेक्सी कहानियाँ
ननद ने खेली होली--9

बहोत कुछ उन्होने अपने मुंह में ही भरा था लेकिन बोतल के निकलते ही दूबे भाभी की चूत ने उनका मुंह सील कर दिया, बेचारी घूंट घूंट करके सब गटक कर गयीं।

उनकी एक चूंची मेरे हाथ में थी और दूसरी दूबे भाभी की गिरफ्त में..और जब मैंने दूबे भाभी की ओर देखा तो ...उनके होंठ एक दम मेरे होंठों के पास...उन्होने होंठ बढा के चूम लिये। मैं क्यों पीछे हटती...मैने अपनी जीभ उनके मुंह में ठेल दी।

वो कन्या प्रेमी थीं तो मुझे भी दोनो तरह का शौक था। मुझे चूसना छोड के थोडी देर बाद दूबे भाभी ने लाली की ओर रुख किया। वो कस कस के अपनी चूत लाली के होंठॊ पे रगड तो रही थीं पर लाली उनका साथ नहीं दे रही थीं, सुन चूत मरानो, भंडुवों की चोदी, भोंसडी वाली...अब मैं कुछ नहीं करुंगी कमर भी नहीं हिलाउंगी...चल अब अपनी जुबान मेरी चूत में डाल के चाट...चूस....और वो न पसंद हो तो गांड चटा दूं...बोल...और तेरी ऐसी ही रगडाई होती रहेगी...जब तक तू मुझे झाड नहीं लेती। हां एक बात और अपनी गांड खोल के सुन....मुझे झाडना इतना आसान नहीं। दो तगडे मर्द घंटे भर चोदते हैं तब जा के मैं कहीं झडती हूं, चल शुरु हो जा।

बेचारी ननद रानी...कभी दूबे भाभी की झांटो भरी बुर चूसतीं कभी चाटती...फिर जीभ अंदर घुसेड के....लेकिन थोडी देर में ही जिस तरह उनके चेहरे पे चमक थी, निपल तन्नाये थे....साफ था की चूत चूसने चाटने में उन्हे भी जम के मजा आ रहा है।

मैं कभी अपनी चूत धीमे धीमे तो कभी तेज तेज, कभी हल्के हल्के से सहलाते हुये तो कभी कस के रगड के घिस्सा मार के...किसी मर्द से कम जोर से नहीं चोद रही थी मैं अपनी प्यारी ननद को।

और साथ ही होली भी चल रही थी....चारों ओर रंग बह रहे थे, बिखरे पडे थे...बस उन्ही को हाथ से कांछ के, समेट के उनके पेट पे चूतडों पे चूंचियों पे....तब तक मुझे कुछ पक्के रंग के पेंट की ट्यूब दिख गयीं और मुझे एक आईडिया आया।

ट्यूब से ही उनके जो अंग अक्सर खुले रहते थे....उन पर मैने एक से एक गालियां....पेट पे लिखा...राजीव की रखैल....अब वो जब भी साडी पहनतीं तो पेट तो दिखता ही...पर दूबे भाभी बोलीं, अरे ये भी कोई गाली हुयी...ले मुझे दे और फिर उन्होने उनके सीने पे और वो भी उपर वाले हिस्से में...जो ब्लाउज से भी झलकता...लिखा छिनाल ...लंड की दीवानी....और बाकी जगहों पे भी...चूत मरानो....भाई चोदी...।

इन सब से बेखबर लाली कस क्स के दूबे भाभी की चूत को चाट रही थीं चूस रही थीं...।

हम तीनों साथ साथ झडे...दूबे भाभी लाली के जीभ से और मैं और लाली चूत की रगड घिस्स से। दूबे, भाभी ने आशिर्वाद दिया, वाह क्या चूत चटोरी है...इस होली पे तुम्हे खूब मोटे मोटे लंड मिलें, तेरी चूत, गांड, मुंह कभी लंड से खाली ना हो .., अरे भाभी....मायके में तो इनके भाई ही मिलेंगे...मैने टोका तो वो हंस के बोली...अरे कया फरक पडता है...लंड तो लंड है।

जब हम दोनों उठे तो कहीं जा के लाली ने सांस ली....हालांकि हाथ अभी भी ...हमने हाथ नहीं खोला था।

कुछ देर बाद वो बोलीं, ये तो गलत है एक के उपर दो...।

( मैने सोचा इसमें क्या गलत है, इस समय तुम्हारी छोटी बहन भी तो एक के साथ दो....एक में अपने जीजू का लंड और दूसरी ओर से अपने भैदोया का लंड गपागप लील रही होगी....तो बडी बहन ....चलो भैया न सही भाभी ही सही) लेकिन उपर उपर मैं बोली...हां एक दम सही चलिये हम लोग बारी बारी से...और बडी दूबे भाभी हैं इसलिये पहले उनका नंबर...वैसे भी इत्ती देर से चूत पे घिस्सा मारते मेरी जांघे भी थक गयी थीं लाली एक मिनट के लिये आंख बंद कर के आराम से लेट गईं....मुझे लगा की दूबे भाभी तो बस अब टूट पडेंगीं पर उन्होने भी आराम से एक हाथ से अपनी सारी चूडी कंगन , लाली की ओर पीठ कर के निकालीं...फिर पहले तो चारो उंगलियों में फिर पूरे हाथ को नारियल के तेल में कस के चुपोडा। मेरी कुछ समझ में नही आ रहा था...ननद जी की चूत इतनी गीली हो गयी थी की उंगली तो आसानी से चली जाती....तो फिर ये नारियल का तेल उनहोने पूरे हाथ में क्यों वो भी कलाई तक....और फिर चूडी क्यों निकाल दी...दूबे भाभी ने मुझे उंगली के इशारे से चुप रहने का इशारा किया और फिर ननद जी की दोनो भरी भरी जांघे फैला के बैठ गयीं....जिस हाथ से उन्होने चुडियां उतार दी थीं उसे नीचे रखा, उनके चूतड के पास और दूसरे हाथ से लाली की चूत बहोत हल्के हल्के य्यर से सहलाने लगीं। मजे से लाली ने आंखे खॊल दीं, उन्हे फ्लाइंग किस लेते हुए दूबे भाभी ने जोर जोर से सहलाना शुरु कर दिया ...फिर उसी हाथ की एक उंगली , फिर दो उंगली....लेकिन कुछ देर बाद ही वो दोनो उंगलिया गोला कार घुमने लगीं,चूत को और चौडा करती...अचानक नीचे रखे हाथ की भी दो उंगलियां भी साथ साथ घुस गईं और चारों उंगलियां एक दम सटी मोटॆ लंड की तरह तेजी से अंदर बाहर.....फिर उसी तरह गोल गोल....कुछ देर बाद जब चूत को उसकी आदत पड गयी....तो उन्होने नीचे वाले हाथ की दो उंगलियां निकाल लीं और उपर वाले हाथ की तीन उंगलियां...अंदर बाहर...साथ में क्भी अंगुठे से क्लिट रगड देतीं। थोडी देर के बाद दूसरे हाथ की भी तीन उंगलियां...अब लाली को थोडा दरद हो रहा था...लेकिन मजा भी आ र्हा था..होंठ भींच के वो दरद पी ले रही थीं। भाभी ने अब उपर वाले हाथ की उंगलियां तो निकाल लीं...लेकिन नीचे वाले हाथ की सबसे छोटी उंगली भी अंदर ठेल दी। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था एक साथ चार चार उंगलियां...लेकिन मैं अपनी आंखॊ से देख रही थी....गपागप सटासट....फिर उन्होने चारों उंगलियों को बाहर निकाला और थोडा मोड क्रे....जैसे चूडी पहनाने वालीयां हाथ मोडवाती हैं वैसे....और अब की जब चारों उंगलियांन अंदर गयीं तो साथ में अगूंठा भी था और वो बोल भी चूडी वालियों की तरह रही थीं...।

हां हां बस थोडा सा ....थोडा सा हल्का सा दर्द होगा....बस अब तो पूरा चला गया....देखो कितना अच्छा लग रहा है....जरा सा और उधर देखॊ...।

मैं सासं रोक के देख रही थी....अब मुझे कुछ कुछ समझ में आ रहा था। आखिर इतनी ब्लू फिल्में देखी थी ...लेकिन सचमुच आंख के सामने...।

अब लेकिन अटक गया था....उंगलिया तो अंदर समा गयी थीं लेकिन आखिर नकल....तभी अचानक दूबे भाभी ने कस के दूसरे हाथ से पूरे ताकत से उनकी क्लिट पिंच कर ली और लाली कस के चीख उठी....जब तक वो संहले संहले ....पूरी मुट्ठी अंदर....पूरी त्ताकत लगा के उन्होने इस तरह पेला जैसे कोई किसी कच्ची कली की सुहाग रात के दिन झिल्ली तोड्ता हो...।

( दूबे भाभी ने बाद में बताया की पहले तो सारी उंगलियां...खूब सिकुडी सिमटी रहती हैं...लेकिन चूत के अंदर घुसा के वो उसे धीरे से फैला देती हैं...।

लेकिन भाभी इसी पे नहीं रुकी॑ं...धीरे धीरे...अंदर की ओर दबाते हुये....गोल गोल घूमा रही थीं...।

सूत सूत वो और अंदर जा रहा था। बचपन से मेरी भाभियों ने सिखाया था, बीबी....तुम चूत रानी की महिमा नहीं जानती ....जिससे इत्ते बडे मोटे बच्चे निकलते हैं....जिससे पूरा संसार निकला है....ये कहना की ये नहीं जायेगा वो नहीं जायेगा....उन की बेइज्जती करना है...जो ये लडकी ये कहती है की हाय राम इतना मोटा कैसे जायेगा....समझॊ छिनाल पना कर रही है....बस उस्का मन कर रहा है गप्प करने का...।

और आज मैं अपनी आंखॊ से देख रही थी। लाली ननद की बुर ने दूबे भाभी की पूरी मुट्ठी घोंट ली थी....और अब उन्होने आल्मोस्ट कलाइ तक...।

फिर एक दो मिनट तक रुकने के बाद भाभी ने आगे पीछे करना शुरु कर दिया....पूरी मुट्ठी से वो उन्हे चोद रही थीं। ननद रानी के चेहरे पे दर्द था लेकिन एक अलग तरह की मस्ती भी थी। वो कराह भी रही थीं और सिसक भी रही थीं। मुझे भी देखने में बडा मजा आ रहा था।

अरे तू क्यों खडी देख रही है...ननद तो तेरी भी हैं...चल पीछे वाला छेद तो खाली ही है लग जा....दूबे भाभी ने मुझे चढाया और दूसरे हाथ से लाली की गांड उपर कर दी। क्या मस्त चूतड थे, रंग, कालिख,पेंट से रंगे पुते...।

अरे नन्द रानी ...एक जगह बची है अभी रंग से और मैने पहले तो जमीन पे गिरे रंग फिर से अपने हाथ में लगाये....और मंझ्ली और तर्जनी पे खूब ढेर सारा गाढा लाल रंग लगा के गांड के छेद बडी मुश्किल से टिप घुसी....और वी चीख उठीं।

ये बेइमानी है ननद जी....दूबे भाभी की तो कलाई तक घोंट ली आपने और मेरी उंगली की टिप से ही चिहुंक रही है....ज्यादा नखडा करियेगा तो मैं भी पूरी मुट्ठी गांड में डाल के गांड मारुंगी.....भले बाद में मोची के पास जाना पडे। अरे ससुराल में तो देवरों ननदोइयों के साथ होली का मजा बहोत लिया होगा...अब इतने द्निनों के बाद होली में मायके आई हैं तो भाभियों के साथ भी होली का मजा ले लीजिये।

मैने दूबे भाभी की ट्रिक सीख ली थी...थोडा आगे पीछे करने के बाद...गोल गोल घुमाना शुरु कर दिया। गांड की दिवारों से रगड के उसे चौडा करते ....और फिर एक उंगली और....गांड के छल्ले ने कस के उंगलियों को पकडा....लेकिन मैने पूरी ताकत से ठेला जैसे कोइ मोटे लंड से गांड मार रहा हो...और गप्प से वो अंदर...उंगली की टिप पे कुछ गीला गीला लगा तो...इसका मतलब की....मैने तीनों उंगलियों को आल्मोस्ट टिप तक खींच लिया और फिर पूरी ताकत से अंदर तक....वो चिलमिलाती रहीं...गांड पटकती रहीं ..पर इससे तो ननद की गांड में उंगली करने का मजा दूगना हो रहा था। मेरी उंगलियों में लगा रंग उनकी गांड में लग रहा था और उनकी गांड का...लिसड लिसड...मैने तीनों उंगलियों को चम्मच की तरह कर के नकल से मोड लिया....और फिर गोल गोल घुमा घुमा के जैस कोई टेढी उंगली से ....करोच करोच कर..।

दूबे भाभी ये देख रही थीं और जोश में...अब क्च क्चा के कलाई तक अंदर बाहर कर रही थीं।

दूबे भाभी की आंखो का मतलब मैं समझ गयी और बोली, अरे ननद रानी आपके चेहरे का तो काफी मेकप किया हम लोगों ने लेकिन मंजन नहीं कराया.....और गांड में से निकाल के उंगली सीधे मुंह में..।

वो मुंह बनाती रहीं....बिल्बिलाती रहीं....लेकिन दूबे भाभी ने जिस तरह से कस के उनका जबडा दबाया ...उन्हे मुंह खोलना ही पडा और एक बार जब मेरी वो तीन उंगलियां मुंह में घुस गयीं तो रगड रगड के दांतो पे..।

( और इसके बाद तो पूरे होली भर...जहां कोई ननद पकड में आती ...ये बात सारी भाभियों में मशहूर हो गयी थी...अरे ज्ररा नबद को मंजन तो कराओ...और फिर गांड से उंगली निकल के सीधे मुंह में....) और कस के मुंह दबाते हुये दूबे भाभी बोलीं....अरे जरा ननद छिनाल को चटनी तो चखाओ....और मेरी उंगली सीधे मुंह में...।

ये सब देख के मैं भी उत्तेजित हो गयी थी....लाली ने दूबे भाभी को तो चूम चाट के झाडा था तो मैं ई क्यों बची रहती...।

और मैं सीधे उनके उपर.....अरे ननद जी देखिये मैने आपकी चूत इतनी बार चूस चूस के झाडी तो एक बार तो आप .मेरी ...।

कहने की देर थी ननद की तारीफ करनी होगी लप लप उनकी जीभ मेरी चूत चाटने लगी...और दोनों होंठ कस कस के चूसने लगे बहोत मजा आ रहा था लेकिन...ठंडाई, व्हिस्की...बीयर...मुझे बडी जोर की आ रही थी...।

और मैं उठने लगी तो दूबे भाभी ने इशारे से पूछा क्या बात है...।

वो चूत में से हाथ निकाल के मेरे पास ही आ के बैठी थीं।

मैने उंगली से १ नम्बर का इशारा किया....तो उनकी आंखो ने मुझे कस के डांटा और उठ के मेरे दोनो कंधे कस के दबाते हुये कान में बोली, अरे होली का मौका है ....नीचे ननद है...इससे बढिया मौका ....चल कर दे....।

लेकिन तब भी मैं उठने की कोशिश करती रही...।

लेकिन दूबे भाभी से जीत पाया कोई आज तक..।

उन्होने मेरे मूत्र छिद्र के पास जोर से सुर सुरी की और फिर मेरे लाख रोकते रोकते ...एक सुनहरी बूंद और फिर ...पूरी धार...।

और बाद में दूबे भाभी ने उन्हे छेडा...क्यों ननद रानी कैसा लगा सुनहली शराब का मजा।

मुझसे बोलीं वो चल हट अब मेरा नम्बर है....और फिर सीधे उनके मुंह पे बैठ के...।

कौन कौन सा गर्हित कर्म नहीं किया उन्होने...।

लाली से जबरन गांड चटवाई....मना करने पे उनके नथुने कस के दबा दिये और जब सांस लेने के लिये मुंह खॊला तो अपनी गांड का छेद सीधे उनके मुंह पे...।

साली अगर एक मिनट भी मुंह बंद हुआ ना तो...ये टेंटुये....एक हाथ गले पे और दूसरा नथुनों पे...।

जो कोई सोच नहीं सकता वो सब भी।

मैं तो सोच भी नहीं सकती थी वो सब पर...।

लेकिन देखने में मजा मुझे भी आ रहा था....बहोत आ रहा था...।

लेकिन सिरफ देखने तक नहीं ...।

अपने बाद दूबे भाभी ने मुझे भी....मैने थोडी ना नुकुर की लेकिन ..।

और उसके साथ रंगों का दौर..।

लाली ने तो कहा था १० मिनट बाद ....मैने नन्दोइ जी को ३ घंटे का मौका दिया था...लेकिन जब हम दोनों वापस निकले दूबे भाभी के यहां से तो पूरे ४ घंटे हो चुके थे।

लाली की ब्रा, पेटीकोट तो सब तार तार और रंग भरे चहबच्चे में था....हां बहोत कहने पे मैनें दुछत्ती पर से साडी और ब्लाउज उतार दिया, और ब्लाउज देने के पहले उनको दिखा के उपर के तीन बटन तोड दिये।

बाहर निकलते ही दूबे भाभी के पडोस में ...एक लडका ...इंटर मे पढता होगा...ढेर सारे रंग भरे गुब्बारे लेके....दूबे भाभी ने बतलाया की...गप्पू है पूरे मुहल्ले भर का देवर। हम शायद बच के निकल भी जाते लेकिन लाली ने ही उसको ललकारा....मुझे दिखा के बोलीं...अरे तेरी भाभी हैं, ऐसे ही तुम्हारे मुहल्ले से बच के निकल जायेंगी.....और उसने उठा के लाल रंग भरा गुब्बारा मेरे उपर फेंका लेकिन मैं झूक गयी और वो सीधे लाली के जोबन पे....ब्लाउज पूरा रंग से गीला....ब्रा तो थी नहीं ,,एक दम उनके उभारों से चिपक गया।
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11-01-2017, 12:11 PM,
#75
RE: Holi sex stories-होली की सेक्सी कहानियाँ
ननद ने खेली होली--10

अरे निशाना तो तेरा एक दम पक्का है सीधे एक दम अपनी बहन के मम्मे पे मारा....एक और मार मेरी ओर से,,,मैने उसे चिढाया। खीझ के उसने पूरी भरी बाल्टी का पानी ही , लेकिन अबकी मैने फिर अपनी ननद को आगे कर दिया...और वो फिर पूरी अच्छी तरह भीग गईं। शिफान की गीली गुलाबी साडी एक दम देह से चिपक गयी, सारे उभार कटाव....और उसके नीचे पेटी कोट भी नहीं....सिर्फ जांघों से ही नहीं बल्की जांघो के बीच में भी अच्छी तरह चिपक गयी।

अरे अपनी बहन से होली खेलने का मन है तो साफ साफ खेल ना...क्यों भाभी का बहाना बनाता है। मैं फिर बोली।

वो कुछ बुद् बुदा रहा था...तो मैने उसे चैलेंज किया....अगर होली खेलने का शौक है ना तो आ जान शाम को ६ बजे मैं बताती हूं, कैसे होली खेलत्ते हैं।

और हंसते हुये हम दोनो आगे बढ गये।

मैने अपना मोबाइल निकाला और पहले तो घर फोन किया की हम लोग रास्ते मैं हैं और फिर उन्हे दिखाती बोली, अब ये नये वाले मोबाइल भी...क्या चीज हैं....इतनी बढियां फोटो खींचते हैं....देखिये ..।

और उन्होने देखा, उनकी दूबे भाभी की गांड चाटती फोटुयें, उनकी बुर में दूबे भाभी का पूरा हाथ, और जब उनके मुंह के ठीक उपर दूबे भाभी गांड फैला के....व्हिस्की की चुस्की लेते....और सब में उनका चेहरा एक दम साफ था....पची...उनके नंसों फोटुयें...और एक विडियों भी उनके नंगे नाच का डांस तो हम तीनों ने किया था....पर...अब वीडियो तो सिर्फ उनका था...।

मैं सोच रही हूं किस को किस को एम एम एस करूं....मैने ऐड्र्स बुक खोल ली थी.....जीत नन्दोई जी को, गुड्डी को, राजीव को....या आपकी छोटी ननद हेमा को....उसका भी मोबाइल नम्बर है मेरे पास।

नहीं नहीं और तुम डिलीट कर दो। वो बिचारी घबडा के बोलीं।

अरे ननद रानी कहां कहां डिलीट करवाइयेगा। दूबे भाभी के मोबाइल मैं तो मैने पहले ही मेसेज कर दिया है और अपने को इ मेल भी...लेकिन चलिये आप कहती हैं तो अभी नहीं भेजती हूं, हां लेकिन ये बताइये की मजा आया की नहीं।

हां आया बहोत आया....घबडा के वो बोलीं।

तो फिर अरे होली मौज मस्ती का त्योहार है और उसमें कुछ खास रिश्ते....जीजा साली, नन्दोई सलहज, ननद भाभी....४ दिन के लिये होली में आप आई हैं चार दिन के लिये हम लोग और फिर मर्दों का तो काम ही छुट्टा घुमना है....कभी किसी सांड को आपने एक खूंटे से बंधे देखा है....नहीं ना ...राजीव को तो मैं चढाती हूं ...और आप के इस रूप को देख के...।

चल मैं समझ गयी तेरा मतलब.....तू छोटी है लेकिन....तूने मेरी आंख खोल दी।

आंख नहीं ननद रानी बहोत कुछ खोल दिया लेकिन....मैने चिढाया।

लेकिन कुछ नहीं...अब चल मैं बताती हूं अब तुझे होली की मस्ती....तेरा भी नम्बर डकाउंगी...हंस के वो बोलीं।

तब तक हम दोनो घर पहुंच गये थे।

ननद की होली २ ब

जब हम दोनों घर लौटे तो वहां तूफान के बाद की शांती लग रही थी.जीत बरामदे में बैठे अखबार पढ रहे थे, राजीव अपने कमरे में थे और गुड्डी किचेन में। नन्दोइ जी हम दोनों को देख के मुस्कराये और जब लाली आगे निकल गईं तो मैने उनसे आंख मार के पूछा…उंगली के इशारे से उन्होने बताया की तीन बार….तो इसका मतलब मेरी चाल काम याब रही….ननद और ननदोई के मिलन करवाने की…लाली को देख के वो बोले,

"भई जबर्द्स्त होली हुयी…तुम लोगों की…"

"और क्या, अब ननद के घर गई थी तो कैसे सूखे सूखे लौटती….लेकिन आप तो" वो बोलीं।

"सच में ये सख्त नाइंसाफी है, ससुराल में जीजा ऐसे सफेद कुरते पाजमें में होली में रहें वो भी साली सलहज के रहते हुए….अभी कान पकडती हूं आपकी साल्ली का, कहां हैं वो"

मैं बोली।

अरे भाभी मैं यहां हूं, किचेन में। मन तो मेरा बहोत कर रहा था जीजू को रंगने का लेकिन आप का ख्याल कर के बख्श दिया, दोनो हाथ में बेसन लगाये वो किचेन से निकलते बोली। देखिये आप के लिये एक दम कोरा छोड रखा है वरना आप कहतीं की साली ने अकेले अकेले खेल लिया , सलहज के लिये कुछ छोडा ही नहीं.."

अच्छा चल जल्दी से खाने का काम खतम कर फिर होली खेलते हैं…आज मिल के रगडेंगे तुम्हारे जीजू को और हां आप मत आ जाइयेगा अपने पति को बचाने "मैने लाली से कहा।

अरे वाह मैं क्यों आउंगी बचाने….अपने मायके में इन्होने मुझे मेरे देवर ननदों से बचाया था क्या जो मैं अपनी बहनों भाभीयों से बचाउंगी…बल्कि मैं तो तुम्ही सबो का साथ दूंगी, हंसते हुये वो बोली

किचेन में घुसते ही मैने गुड्डी की पीठ पे कस के धौल जमाइ…झूठी कहती है खेला नहीं चल बता कित्ती बार…।

उसने भी इशारे से तीन बार बोला।

अरे साफ साफ बोल …तीन बार…

ना अब उसने मुंह खोला….तीन राउंड….तीन बार अपने जीजू के साथ और तीन बार भैया के साथ….और एक बार साथ साथ।

पता ये चला की एक बार उसकी गांड मारी गई, एक बार मुंह में झडे और ४ बार चूत चोदी गई। ज्यादातर औरतें तो सुहाग रात में इतना नहॊं चुदती….इसी लिये वो टांगे छितरा के चल रही थी।

उसकी स्कर्ट उठा के जो मैने दो उंगली सीधे उसकी चूत में डाल दी...खूब लस लसा के मलाई भरी थी। मैने दोनों उंगलियों को स्कूप बना के चम्मच की तरह निकाला,

खूब गाढी थक्केदार.। सफेद....तब तक लाली अंदर आ गयीं।

क्या है ये ....उन्होने पूछा।

बेचारी गुड्डी धक्क से रह गयी।

मलाइ है, गुड्डी ने निकाली है, मलाई कोफ्ते के लिये...जरा चख के देखिये।

और उंगली मैने सीधे उनके मुंह में डाल दी....और वो चटखोरे लेते हुये चाटने लगीं।

हूं अच्छी है और दो चार बूंदे जो होंठों पे टपक गयीं थी...चाट ली। कुछ काम तो नहीं है...उन्होने पूछा।

ना ना....मेरी इस प्यारी ननद ने सब कुछ कर रखा है,लगता है सुबह से बिचारी किचेन में ही लगी थी, बस आप टेबल लगा दीजिये....और मेरे ननदोइ और अपने भैया कम सैंया को बुला लाइये बहोत भूखे हों गे दोनो बिचारे है ना गुड्डी। और हां बुरा ना मानियेगा ....खाने के साथ ही आपके सैयां की ऐसी की तैसी होनी वाले है।

एक दम करो....ना करो तो बुरा मान जाउंगी...बिचारे इत्ते अरमानों से ससुराल आये हैं....और अपने भैया और सैयां की मिली जुली मलाई के चटखारे लेती चली गई।

बडी मुश्किल से मैं और गुड्डी मुस्कान दबा पाये।

खाना खाते समय भी छेडखानी चालू रही।

नन्दोई जी का झकाझक सफेद कुरता मुझे खल रहा था, और जब लाली ने भी बोला तो वो बोले,

अरे तेरी छोटी बहन और भाभी की हिम्मत ही नहीं..।

गुड्डी चैलेंज कबूल ....नाक का सवाल है....मैने कहा। एक दम भाभी खाते खाते हंस के वो बोली।

ननद ननदोई खाना खायें तो गालियां ना हों.....मैने और गुड्डी ने मिल के जबरदस्त गालियां सुनाइं.....नन्दोइ जी की छोटी बहन हेमा का नाम ले ले के।

खाना खाने के अंत में मैने गुड्डी को बोला, अरे सुन तू स्वीट डिश तो लायी ही नहीं..।

अरे बनाइ हो तब तो लाये....नन्दोइ जी ने उसे छेडा।

लाती हूं.....और सब की सब आप को ही खिलाउंगी...आंख नचा के बोलते हुये वो किचेन में गई

और क्या और अगर मुंह से ना खा पाये तो नीचे वाले छेद से खिलाउंगीं....मैं अपने रंग पे आ रही थी।

लाली अब मजा ले रही थीं।

तब तक गुड्डी दोनों हाथ से पकड के एक बडा भगोना लेके आयी और नन्दोई जी के पीछे खडी होके पूछने लगी,

क्यों जीजू तैयार हैं दूं....।

अरे साली दे और जीजा मना करे....तेरे लिये तो मैं हमेशा तैयार हूं...अदा से वो बोले।

तो ठीक है और फिर उसने पूरा का पूरा भगोना....पहले बाल सर...गाढे लाल रंग से भरा...फिर सफेद झक्क कुर्ता पाजामा....जब तक वो उठें उठें....पूरी त्रह लाल भभूका।

उसको वो पकडने दौडे लेकिन वो चपला, ये जा वो जा, सीधे आंगन में।

आगे आगे गुड्डी , पीछे पीछे मेरे नन्दोइ।

वो पकडने को बांहें फैलाये आगे बढते..तो वो झूक के बच के निकल जाती...और दूर से खिलखिलाते उन्हे अंगूठा दिखाती...।

जब तेजी से वो दौडते....लगता की अब वो बच नहीं सकती तो अचानक खडी हो के वो उन्हे दांव दे देती और वो आगे निक्ल जाते।

लेकिन कितनी देर बचती वो....आखिर पकडी गयी।

बांहों में भर के कस के अपने कुर्ते का रंग उसके सफेद शर्ट पे रगडते वो बोले ले तेरा रंग तुम्ही को।

ये तो बेइमानी है अदा से वो बोली,अरे होली खेलना था तो रंग तो अपना लाते।

क्या रंग खरीदने के लिये भी पैसे नहीं है....लाली भी अब रंग मे आ रही थीं।

अरे दीदी...इन्हे पैसे की क्या कमी...आपकी छोटी ननद ...क्या नाम है उसका हेमा..। पूरी टकसाल है...हां एक रात में उस रंडियों के मुहल्ले, कालीन गंज में बैठा दें पैसे ही पैसे, सारे शहर का रंग खरीद लें। और आपकी सास वो भी तो अभी चलती होंगी।

और क्या एक दम टन्न माल है....रोज सुबह से घर में पहचान कौन होता है....दूध वाला, मोची, तभी तो इनके यहां हर काम हाफ रेट में होता है। मेरी ननद भी अब पूरे जोश में अ गयी।

अरे तो ननदोइ जी अपनी मां को ही भेज देते रंग वाले की दुकान पे अरे थोडा गाल मिजवातीं, थोडा जोबन दबवातीं...बहोत होता तो एकाध बार अपनी भोंसडी चोदवा लेतीं...फिर तो रंग ही रंग....उन्हे सुना के मैं जोर से बोली।

गुड्डी की शर्ट...स्कर्ट से बाहर आ गयी थी....उपर के सारे बटन रगड घिस्स में खुल गये थे...। सफेद ब्रा साफ साफ दिख रही थी ..और उभारों के ठीक उपर लाल गुलाबी रंग..।

रंग था उनके पास। जेब से रंग निकाल के दोनों हाथॊं में अच्छी तरह लगा रहे थे ननदोई जी। बेचारी गुड्डी खाली खडी थी।

अरे ले ये रंग...कहक्रर मैने पूरा पैकेट रंग का उसकी ओर उछाल दिया ...और उसने एक द.म कैच कर लिया...और मुझे देख के बोली थैंक यू भाभी।

जैसे अखाडे के दोनो ओर दो पहलवान खडे हों और इंतजार कर रहे हों पहल कौन करे...गुड्डी ने भी अपने हाथों मे गाढ बैंगनी काही पक्का रंग मल लि्या था।

वो खडी रही और जैसे वो पास आये झुक के ठीक उनके पीछे....लंबी छरहरी फुर्तीली....और दोनों हाथों मे लगा गाढा बैंगनी काही रंग रगड रगड के उनके गालों पे पूरे चेहरे पे...।

क्यों जीजू आप सोचते हैं की सिर्फ जीजा लोग ही रगड सकते हैं सालियां नहीं....उसने चिढाया।

लेकिन उसकी जीत ज्यादा देर नहीं चली। जीत ने न सिर्फ पकडा बल्की बिना किसी जल्दी बाजी के अपने बायें हाथ में कस के दोनो कलाइयां पकड ली और पीछे से उसे चिपका लिया।

( मैं समझ सकती थी की उसके दोनो हाथ पाजामे के उपर ठीक कहां होगे और वो शैतान 'क्या' पकड रही होगी.)

फिर दूसरे हाथ से उसके गाल पे प्यार से, आराम से गाढा लाल रंग....और फिर शर्ट की बाकी बटने खोल के सीधे ब्रा के अंदर...और जिस तरह से उनके हाथ रगड मसल कर रहे थे...साफ पता लग रहा था की वो क्या कर रहे हैं। और फिर कुछ देर में दूसरा हाथ ब्रा के उपर से लाल रंग...और रंग के साथ उभारों को दबाना मसलना चालू था।
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11-01-2017, 12:11 PM,
#76
RE: Holi sex stories-होली की सेक्सी कहानियाँ
ननद ने खेली होली--11

मैं अपनी बडी ननद लाली के चेहरे के उपर आते जाते भावों को देख रही थी। पहले तो जीत की पीठ हम लोगों के सामने थी लेकिन थोडी देर में गुड्डी पलटी तो वो एक दम सामने...पहले तो लग रहा था की उन्हे कुछ अन्कम्फर्टेबल लग रहा है...लेकिन कुछ भांग और दूबे भाभी के यहां की दारु की मस्ती...पीर जो रगड के होली हम लोगों ने उन के साथ खेली थी....और शायद मोबाइल की फोटुयें...अब उन्हे भी मजा आ रहा था। मुझसे बोलीं, तू भी जा ना, लेकिन मैं टाल गयी, अरे नहीं दीदी थोडी देर तो जीजा साली की होली हो ले ने दीजिये, फिर वहीं से मैने से ननदोई जी को ललकारा,

अरे आप साली की ब्रा से होली खेल रहे हैं...या साल्ली से।

सही..। बोलीं सलह्ज जी आप और दूसरा हाथ भी ब्रा में।

फ्रंट ओपेन ब्रा के फायदे भी होते हैं और नुकसान भी। गुड्डी का नुकस्सान हो गया और नन्दोई जी का फायदा। चटाक से उस टीन ब्रा का फ्रंट हुक चटाक से खुल गया...और दोनों गोरे जवानी के दुधिया कबूतर...फडफडा के...जैसे उडाने के पहले उनले पंखो पे किसी ने लाल गुलाबी रंग लगा दिये हों....गोरे उभारों पे जीजा की उंगलियों के लाल गुलाबी निशान....कुछ देर में एक हाथ स्कर्ट के अंदर चुनमुनिया की भी खॊज खबर ले रहा था। शरमा के उसने दोनों जांघे भींच ली पर हाथ तो पहंच ही चुका था।

दोनों जीजा, साली अपनी दुनिया में मस्त थे। मैं चुपके से आंगन में पहुंची। तीन बाल्टीयों मे मैने पहले से ही रंग घोल के रखा था...और एक बाल्टी तेजी से नन्दोई जी के उपर ....और जैसे ही वो गुड्डी को छॊड के मेरी ओर मुडे दूसरी बालटी का रग निशाना लगा के सीधे पाजामे पे....उनके तन्नाये खूंटे पे...पाजामा पैरों से एक दम चिपक गया और बालिश्त भर का ...इत्ती देर से किशोर साली के साथ रगडाइ मसलाइ का असर...उत्तेजित खूंटा साफ साफ...।

पीछे से गुड्डी और आगे से मैं।

बाजी अब पलट चुकी थी। मैने गुड्डी को समझाया ....पहले चीर हरण...बाकी होली फिर आराम से..।

और उधर जीत मेरे ननदोई जो काम साली के साथ कर रहे थे अब मेरे साथ कर रहे थे और उकसाया मैने ही था....क्यों ननदोई जी...साली का तो खूब मींज, मसला और सलाह्ज का...।

उनके दोनो हाथ मेरे ब्लाउज में मेरे मम्मों के साथ होली खेलने में लगे थे की मैने और गुड्डी ने मिल के उनके कुरते के चिथडे कर दिये।

फट तो मेरा ब्लाउज भी गया लेकिन मैने उनके दोनों हाथों को कस के पीछे कर के पकड लिया और गुड्डी ने उनके फटे हुये कुरते से ही कस के बांध दिया। आखिर 'प्रेसीडेंट गाइड' का अवार्ड मिला था और नाट बांधने में एक्सपर्ट थी। आगे पीछे कर के चेक भी कर लिया एक दम कसी किसी हालत में छुडा नहीं सकते थे वो।

आगे का मोर्चा गुड्डी ने संहाला, पीछे का मैने। चालाक वो, उसने अपने जीजा के कुरते की पूरी तलाशी ली। रंगों के ढेर सारे पैकेट, पेंट के ट्यूब, वार्निश, तरह के कल्रर के सूखे पेंट के पाउडर....बडी तैयारी से आये थे आप ...लेकिन चलिये आप पे ही लग जाये गा ये सारा। उनको दिखाते हुये उसने हथेली पे लाल और सुनहला रंग मिलाया और सीधे उनके छाती पे....वार्निश लगी उंगलियों से उनके निपल को रंगते, फ्लिक करते बोली,

जीजू....आपने तो सिर्फ मेरी ब्रा का हुक तोडा था लेकिन देखिये हम लोगों ने आप को पूरी तरह से टाप लेस कर दिया।

पीछे से मैं कडाही और तवे की कालिख लगे हाथों से उनकी पीठ और ....फिर मेरा हाथ पाजामे के अंदर चला गया। कडे कडे चूतड....दूसरा हाथ उसी तरह उनके निपल दबा पिंच कर रहे थे....जिस तरह से थोडी देर पहले वो दबा मसल रहे थे...।

मेरी देखा देखा देखी गुड्डी का भी हाथ पेट पे रंग लगाते लगाते फिसल के...।

मेरी उंगली तब तक..।

वो हल्के से चीखे...।

क्या बहोत दिनों से गांड नहीं मरवाई है क्या जो बचपन की प्रैक्टिस भूल गयी है ननदोई जी....मैने तो सुना था की मेरी ननद की ससुराल की चाहे लडकियां हो या मर्द बडे से बडा लंड हंसते घोंट जाते हैं ...और धक्का देके मैने पूरी अंगुली...आखिस रंग हर जगह लगबा था।

अरे गुड्डी सब जगह तो तुमने रंग लगा दिया ...लेकिन पाजामे के अंदर इनकी टांगों पे...क्या यहां पे इनकी छिनाल बहने आ के लगायेंगी।

अरे अभी लीजीये ....उन साल्लियों की हिम्मत मेरे जीजा जी को हाथ लगायें....और पाजामे का नाडा तो उसने खोल दिया लेकिन अभी भी वो कुल्हे में फंसा था...दोनों हाथों से पकड के मैने उसे नीचे खींच दिया।

अब वो सिर्फ चड्ढी में...और बो भी एक दम तनी हुयी...लग रहा था अब फटी तब फटी।

रंग लगे हाथों से मैने पहले तो चड्डी पे हाथ फेरा...फिर उनके बल्ज को कस कस के दबाया। बेचारे की हालत खराब हो रही थी। गुड्डी ने जो पाजामे के अंदर हाथ डाला था ...उसके रंग अभी भी चड्ढी पे थे।

क्यों हो जाय चीर हरण पूरा....आंख नचा के मैने गुड्डी से पूछा।

एक दम भाभी हंस के वो बोली। हाथों में लगा रंग खूल के चड्ढी पे वो साथ साथ लगा दबा रही थी।

लेकिन ये हक सिर्फ साली का है...हंस के मैने कहा।

ओ के..और अपने जीजा से वो चिपट गइ। उसके टीन बूब्स, उनकी खुली छाती से रगड रहे थे, और उठी स्कर्ट से ..पैंटी सीधे चड्ढी में से तन्नाये भाले की नोक पे.....हल्के हल्के रगडते...उसने अपने एक हाथ से अब उनके खूंटे को पकड के दबा दिया और द्सरा हाथ उनकी गर्द्नन पे लगा ....खींचते हुये....कान में हल्के से जीभ छुलाते पूछा...।

क्यों जीजू मार लिया जाय की ...छोड दिया जाय।

मैं जीत को पीछे से दबोचे थी। मेरे उभार कस के उनके पीठ पे रगड रहे थे ....और दोनों हाथ उनके निपल पे जैसे कोइ मर्द कस के पीछे से किसी औरत को पकड के स्तन मर्दन करे....।

अरे बिचारे अपनी छिनाल बहनों को छोड के ससुराल में मरवाने ही तो आये हैं...मार ले। मैने गुड्डी से उन्हे सुनाते कहा।

वो उन्हे छोड के दूर हट गयी, फिर अपने दोनों हाथों से चड्ढी के वेस्ट बैंड को पकड के नीचे सरकाया। पीछे से मैं भी उसका साथ दे रही थी। लेकिन फिर वो रुक गयी।

नितम्ब पूरे खुले गये थे और चड्ढी सिर्फ उत्तेजित लिंग पे लटकी थी। पीछॆ से मैं कस कस के उनके दोनों कडे चूतड दबा रही थी, दोनों हाथों से खींच के फैला रही थी।

आप सोच सकते हैं होली में एक ओर से किशोर नई नवेली साली और पीछे से मादक सलहज..।

एक झटके से उसने चड्ढी खींच के उपर छत पे फेंक दी।

जैसे कोइ बटन दबाने पे निकलने वाला चाकू स्प्रिंग के जोर से निकल आये ....पूरे बालिश्त भर का उनका लंबा मोटा लंड....।

देख मैं कह रही थी ना की इस पे जरा भी रंग नहीं लगा है ...ये काम सिर्फ साली का है....रंग दे इसको भी...इस लंड के डंडे को....मैने उसे चढाया।

एक दम भाभी....बिना शरमाये ..आंगन में बह रहे रंग उसने हाथ में लगा के दोनों हाथों से....फिर उसे लगा की शायद इससे काम नहीं चलेगा....तो दोनों हाथों में उसने खूब गाढा लाल रंग पोता...और मुट्ठी में ले के आगे पीछे...कुछ ही देर में वो लाल भभूका हो रहा था। मेरे ननदोइ का लंड मैं कैसे छोड देती....जब वह दूसरे कोट के लिये हाथ में रंग लगाती तो फिर मैं ....बैंगनी....काही...इतना कडा लग रहा था ....बहोत अच्छा...मै सोच रही थी...अगर हाथ में इतना अच्छा लग रहा है तो बुर में कितना अच्छा लगता होगा.जब गुड्डी ने फिर उसे अपने किशोर शरमाते झिझकते हाथों में पकड लिया तो मैं उनके लटकते बाल्स पे..।

थोडी ही देर में ५-६ कोट रंग उस पे भी लग गया था।

यहां से जाके अपनी बहन हेमा से हफ्ते भर चुसवाना....तब जाके छुटेगा ये रंग....साली सलहज का लगाया रंग है कोई मजाक नहीं।

लाली एक टक हम लोगों को देख रही थीं

अरे दुल्हन का घूंघट तो खोल ...और उसने एक बार में सुपाडे का चमडा खींच दिया और ...जोश से भरा, पहाडी आलू ऐसा खोब मोटा लाल सुपाडा..।

अरे तू ले ले इसको मुंह में बडा मस्त है...।

नहीं भाभी...अपनी बडी दीदी की ओर देख के वो हिचकी।

अरे छिनाल पना ना कर मुझे मालूम है, अभी थोडी देर पहले मुंह, गांड, चूत सब में न जाने कितनी बार इसी लंड को गटका होगा। धीमी आवाज में मैने उसे डांटा।

अरे नहीं भाभी भॊली सूरत बना के वो बोली, कहां...जीजू का मुंह में नहीं लिया था सिर्फ एक बार गांड में और दो बार चूत में....नदीदे की तरह वो उस मस्त सुपाडे को देख रहे थे।

तो ले ले ना...साल्ली है तो साल्ली का पहल हक है जीजा के लंड पे...मैने जोर से अबकी बोला।

वो अभी भी अपनी बडी दीदी को देख रही थी।

अरे पूछ ले ना अपनी दीदी से मना थोडे ही करेंगी....मैने फिर चढाया।

दीदी ...ले लूं...लंड की ओर ललचाइ निगाह से देखती वो बोली।

लाली कुछ नहीं बोली।

अरे साफ साफ बोल ना क्या लेना चाहती है तू, तब तो वो बोलेंगी। मैने फिर हड्काया।

लंड को पकड के अबकी हिम्मत कर वो बोली, दीदी, ले लूं....जीजा का लंड....मुंह में।

अरे ले ले...मेरी छोटी बहन है। तू नहीं लेगी तो क्या इनकी गदहा चोदी बहन लेगी...उसके तो वैसे ही ७०० यार हैं.....लाली भी अब मस्ती में आ गयी थीं।

गुड्डी ने रसदार लीची की तरह झट गडप कर लिया।

मैने भी पीछे से इनके हाथ खोल दिये....अब तो नन्दोइ जी ने कस के दोनों हाथों से उसका सर पकड के सटासट...गपागप ...उसका मुंह चोदना शुरु कर दिया था। और वो भी उसके गुलाबी गाल कस कस के फूल चिपक रहे थे....आधे से ज्यादा लंड वो गडप कर गयी थी और खूब मस्ती से चूस रही थी। जीभ नीचे से चाट रही थी...होंठ कस कस के लिंग को रगड रहे थे और चूस रहे थे, और उसकी बडी बडी कजरारी आंखे जिस तरह से अपने जीजू को देख के हंस रही थीं, खुश हो रही थीं....बस लग रहा था सारे जीजा साली की होली इसी तरह हो।

मैं मस्ती से उन दोनों की होली को देख रही थी और खुद मस्त हो रही थी

नन्दोइ जी भी कभी एक हाथ से ब्रा में उसके आधे खुले ढके रंगे पुते उरोज मसल दे रहे थे और कभी दोनों हाथों से उसका सर पकड कचकचा के उसका मुंह चोदते..।

अचानक किसी ने दोनों हाथों से पकड के मेरा पेटीकोट खींच दिया....ढीला तो ननदोई जी ने ही होली खेलते समय अंदर हाथ डालने के चक्कर में कर दिया था। जब तक मैं सम्हलूं सम्हलूं...साडी भी...ब्लाउज तो पहले ही नन्दोई जी ने फाड दिया था।

मैने देखा तो लाली, मंद मंद मुसकराते....दोनो हाथों में साडी और पेटीकोट पकडॆ...।

क्यों आगयीं अपने पति का साथ देने....मैंने छेडा।

ना अपनी प्यारी भाभी से होली खेलने...हंस के वो बोलीं....वहां तो दो भाभीयां थीं एक ननद ....अब यहां मुकाबला बराबर का होगा। हंसते हंसते वो बोलीं।

कहते हैं हिंदी फिल्मों मे विलेन यही गलती करता है....गलत मौके पे डायलाग बोलने की तब तक हीरो आखिरी वार कर देता है। मैने बहोत फिल्में घर से भाग भाग कर देखीं थीं।

एक झपट्टे में मैने एक हाथ उनके ब्लाउज पे डाला और दूसरा साडी की गांठ पे। सम्हलने के पहले ही ब्लाउज फ्ट चुका था और साडी भी खुली नहीं पर ढीली जरूर हो चुकी थी। ब्रा और पेटीकोट तो दूबे भाभी के यहां हुये होली की नजर चढ चुके थे।

पर लाली भी कम नहीं थीं..मेरी टांगों के बीच में टांग फंसा के गिराने की कोशिश की,गिरते गिरते...मैने उन्हे पकड लिया और मैं नीचे वो उपर।

हां ये पोज ठीक है...आंगन में फैले रंग बटोर के मेरे जोबन पे कस के लगाते वो बोलीं, उन की जांघे मेरी जांघों के बीच में और कस के रगड घिस्स..।

मजा तो मुझे भी आ रहा था....लेकिन साथ में मेरे हाथ आंगन में फर्श पे कुछ ढूंढ रहे थे...और आखिर में मैने पा लिया...रंग की गिरी हुयी पुडिया...आंगन में बह रहे रंग से ही उसे दोनों हाथों पे लगाया...और अचानक पूरी ताकत से उनके चेहरे पे और जब तक वो सम्हल पायें मैं उपर...और पहला काम तो मैने ये कहा किया की उनका फटा ब्लाउज और आधी खुली साडी पकड के निकाल दी और दूर फेंक दी.फिर एक हाथ से उनकी क्लिट और दूसरे से निपल कस के पिंच किये।

कुछ दर्द से और कुछ मजे से वो बिलबिला उठीं।
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11-01-2017, 12:11 PM,
#77
RE: Holi sex stories-होली की सेक्सी कहानियाँ
ननद ने खेली होली--12

दोनों हाथों से मैने उनकी कलाइयां कस के पकड के आंगन के फर्श पे दबा रखी थीं। उनकी दो चार चुडीयां भी टूट गईं पर मैने पकड ढीली नहीं की।

आप कहें की रंग...तो ननद भाभी की होली में रंग की जरूरत थोडे ही पडती है। ननदोई जी ने मेरी चूंचीयों पे इतना रंग लगा रखा था....एक नहीं कई ननदों पे लगाने के लिये काफी था।

अपनी कडी कडी रंग लगी चूंचिया मैं उनकी गदराई चूंचीयों पे रगड रही थी। कस के अपनी छाती से उनकी छाती दबाती हुई बोली, क्यों ननदोई जी ऐसे ही दबाते हैं क्या...'

अरे बगल में ही तो हैं दबवा के देख लो ना...सच में बडा मजा आयेगा...जवाब में नीचे से छाती रगडते हुये बोली।

मैने अपनी जांघों के बीच उनकी जांघे दबा रखी थीं और चुत से कस के उनकी चूत पे घिस्से मार मार के....हम दोनों की ही हालत खराब हो रही थी

ऐसी मस्त चूत है ननद रानी एक बार मेरे सैंया से मरवा के देख लो ना...मैने फिर चिढाया.।

वही गलती मैने की ...ज्यादा बोलने की मेरी हाथ की पकड थोडी ढीली हुई और उन्होने एक घुटबे से मेरे पेट में धक्का दिया और छुडा के ...मैं नीचे। लेकिन नीचे से भी मैं बेकाबू थी...मेरे हाथ उनकी भरी भरी चूंचीयां दबा रहे थे...मेरे होंठ कच कचा के निपल काट रहे थे। बस ये समझिये की आप औरतों की ड्ब्लू ड्ब्लू ई देख रहे हों....बस फरक यही था की दोनों बिना कपडों के हो, होली के रंगों से सराबोर और एक से एक गालियां दे रही हों।

थोडी देर में मैं उपर थी...उनके सीने पे चढी एक हाथ गले पे और दूसरा चूत पे ...दो उंगलियां अंदर।

ननद रानी मैं बोर्डिंग में थी और रैगिंग के जमाने से ले के...लास्ट इयर तक लेस्बियन रेस्लिंग क्वीन थी....बोली मैं।

अरे तो मैं भी कुछ कम नहीं थी..चल ऐन होली के दिन मुकाबला होगा आंगन में...और कोई बीच में नहीं आयेगा....मंजूर...उन्होने चैलेंज दिया।

मंजूर ....लेकिन हारने वाली को मुहल्ले के हर मर्द से चुदाना होगा जो होली में आयेगा...मैने दांव बताया।

एकदम ...हंस के उन्होने दांव कबूल कर लिया।

सब मतलब सब....आंख नचा के मैं बोली।

समझती हूं मैं ...छिनाल तेरी चालाकी लेकिन एक बार जुबान दे दी तो दे दी....मंजूर है।

लुढकते हुये हम लोग एक दम नन्दोइ जी के बगल में आ गये थे लेकिन मेरा ध्यान तो नीचे पडी ननद रानी पे था।

अरे भाभी ....मुहल्ले के मर्दों की चिंता बाद में करना जरा ये बगल में तो....इनका तो इलाज करो।

रंगों से लिपटे नन्दोई जी आंगन में...लेटे और उनका बित्ते भर का खडा लंड हवा में लोह की खंभे की तरह..।

अरे एक दम सलह्ज नहीं करेगी तो कौन करेगी....बीबी तो साले से फंस गयी है.....क्यों ननदोई जी और उठ के मैं सीधे टांगे फैला के उनके लंड के उपर...खुला मोटा सुपाडा मेरी चूत को रगड्ता हुआ...थोडा सा दबा के मैने आधा सुपाडा अंदर किया फिर रुक गई...और चूत से कस कस के सुपाडा भींचने लगी।

नन्दोई जी की आंखॊ में न जाने कब की भूख पूरी होने की खुशी साफ झलक रही थी। उन्होने कच कचा के मेरे उभार पकड लिये और बोले अब आयेगा मजा ससुराल की होली का।

एक दम नन्दूई जी कह के मैने उनके दोनों कंधे पकड के कस के धक्का मारा और आधे से ज्यादा लंड, मेरी चूत में रगडता, घिसता....अंदर पैबस्त हो गया।

क्यों मजा आ रहा है....मेरे मर्द से चुदवाने में....बगल में ध्यान से देख रही लाली ने पूछा।

अरे आपके मर्द कहां...मेरे नन्दोइ हैं..हां वैसे मैं अपने मर्द को भी नन्दोइ बनाने को तैयार हूं.क्यों नन्दोइ जी हो जाए इस होली में एक दिन बद के.....मैं इनके सैंया के साथ और ये मेरे सैंया के साथ ....अगल बगल।

एक दम मुझको मंजूर है कह के कस के उन्होने मेरी चूंचियां दबा के जोर से नीचे धक्का दिया।

क्या जोर था उनके हाथों में जिस तरह पूरी ताकत से वो मेरी चूंचीयां भींच रहे थे मसल रहे थे....और लंड भी इतना कडा और मस्त....लेकिन मैने और आग लगाई,

अरे ननदोई जी क्या मेरी ननद की ननद की चूत समझ रखी है....अपनी छोटी बहन हेमा की....अरे लडकियों की चुदाई और एक औरत की चुदाइ में जमीन आसमान का फर्क है।

अच्छा बताता हूं तुझे और एक झटके में उन्होने मुझे नीचे कर दिया...मेरी जांघे फैला के वो करारा धक्का दिया की मुझे दिन में भी तारे नज्रर आ गये।

क्यों आया मजा भाभी, लाली बोली,

उंह कुछ खास नहीं, ननद रानी....एक बार जब तुम मेरे सैंयां का लंड घोंट लोगी ना तो पता चलेगा, मर्द का लंड क्या होता है...मैने और मिर्चें लगाईं।

फिर तो एक हाथ से उन्होने मेरी क्लिट दूसरे से एक निपल पिंच करने शुरु किये...और दूसरा निपल मुंह में...क्या मस्त चुसाइ कर रहे थे नन्दोइ और साथ में इंजन के पिस्टन की तरह...मूसल अंदर बाहर।

हां अब लग रहा है की नन्दोइ जी को बचपन से उनकी मां बहनों ने अच्छी तरह ट्रेन किया है...हां हां...ओह....मेरे मुंह से मजे से सिसकियां निकल रही थीं।

अरी बहनचोद मां तक पहुंच गई अब बताता हूं....तेरी चूत को चोद चोद के भॊसडा ना बना दिया ...ऐसा झाडुंगा की हफ्ते भर तक सडका टपकता रहेगा,,,और फिर मेरए दोनों पैरों को मोड के दुहरा कर दिया और पैरों को एक दम सटा के...,मेरी कसी चूत और संकरी हो गई...और उसमें उनका मूसल जैसा लंड...दोनो भरे भरे चूतडों को पकड वो करारा धक्का दिया की चोट सीधे बच्चे दानी पे लगी।

अरे तेरी छिनाल मां के गुन नहीं गाउंगी तो किसके गाउंगी...ना जाने मेरी ननद की सासु जी ने किस घुड साल में गधों की गली में जा जा के चुदवाया होगा की ये गधे घोडे के लंड वाला लडका हुआ, जो चोद चोद के मेरी छिनाल ननदों को...ओह काटो नहीं...नन्दोई जी ने कस के मेरे गदराये जोबन पे दांत गडा दिये थे।

ले ले..अरे अभी तो सलहज रानी तुम्हारी चूत चोद रहा हूं...फिर तेरी गांड मारुंगा फिर तेरे इन मस्त मम्मों के बीच ...हचक हचके के चोदते नन्दोइ जी बोले।

मुझे बहोत मजा आ रहा था....एक तो ५-६ दिन के उपवास के बाद आज चूत को भोजन मिल रहा था और फिर नन्दोइ बेचारे पहले तो बीबी के डर के मारे भीगी बिल्ली बन रहे थे और अब जब एक बार मैने उन्हे वश में कर लिया तो....उन्ही के सामने इस तरह...हचक के चोद रहे थे..।

अरे चोदो ना नंदोई जी चूत चोदो गांड मारो....आज मेरी इस गरमागरम चूत को अपने हलब्बी लंड से चोद दो....मैं अपनी कसी चूत कस के उनके लंड पे भींच रही थी, चूंचियां उनके सीने से रगड रही थी...।

तब तक हर हर....बाल्टी से हरे रंग की धार...पूरी की पूरी बाल्टी....मेरी चूंचियों पे ..।



अचानक मैने देखा, गुड्डी नहीं दिख रही थी...चारो ओर मैने और नजर घुमाइ....मेरे सैंया जी लापता थे....तो इसका मतलब भाई बहन...मौके का फायदा उठाया जा रहा था। चार बार चूत चुद चुकी थी...लेकिन मन नहीं भरा था...मेरी असली ननद थी...और मौका भी तो होली का था।

मैं ननदोई जी के नीचे दबी थी और वो हचक हचक के चोद रहे थे। साथ में मौके का फायदा उठा के लाली, मेरी बडी ननद, आंगन में बह रहे रंग को उठा उठा के मेरी चूंचीयों पे लगा रही थीं, फिर हाथ में लाल रंग कस के लगा के उन्होने मेरी चूचीयों पे पोत दिया। मैं भी हंस हंस के पुतवाती रही। और जैसे ही वो हटीं, मैने कस के जीत को अपनी बांहों में भींच लिया और मेरे रसीले जुबना पे लगा रंग ननदोई जी के सीने पे, दोनों पैरों को मैने उनके कमर पे भींच लिया और कस क्स के लिपट के अपनी देह का सारा रंग उनकी देह में...साथ में मेरी चूत कस के उनकी पिचकारी को भींच रही थी, चूत लंड पे रगड रही थी और जम के गालियां दे रही थी।

अरी मेरे ननद के ननद के यार, बहन के भंडुए अपने मायके में बहनों के साथ बहोत होली खेली होगी उस हेमा छिनाल की उभरती चूंचियों पे बहोत रंग लगाया होगा लेकिन ऐसी नहीं खेली होगी आंगन में खुल के।

एक दम सलहज जी तभी तो होली में ससुराल आया हूं.....और उन्होने वो हचक के चोदना शुरु किया...आधे घंटे के बाद ही वो झडे और उस समय तक हम दोनों लथ पथ हो गये थे। पहले तो दूबे भाभी के यहां ननद जी के साथ होली और फिर घर लौट के नन्दोई जी के साथ होली..।

जब मेरी जान में जान आई तो मेरी जांघों के बीच गाढा थक्केदार वीर्य बह रहा था और नन्दोई जी बगल में बैठे थे।

लाली चलने के लिये कहने लगी तो मैं नन्दोइ जी की ओर इशारा कर के कहने लगी और इनके कपडे ...वो तो चिथडे हो गये हैं।

तब तक गुड्डी भी आ गई। वो बोली अरे जीजू ऐसे ही चल चलेंगें।

अरे तू तो जानती नहीं, तेरे जीजू इतने चिकने हैं, और इस हालत में....रास्ते में एक से एक लौंडे बाज रहते हैं...मार मार के इनकी गांड इतनी चौडी कर देंगे की जितनी इनकी मां का भॊंसडा भी नहीं होगा। हां जो हमारे पास होगा वही तो पहनायेंगे।

एक दम भाभी, गुड्डी मेरा मतलब समझ के बोली। और फिर थोडी देर में उनकी बीबी का पेटीकोट, मेरी साडी और ब्रा....साथ में पूरा सिंगार, हाथों में चूडियां,नेल पालिश, पैरों में महावर, पायल और बिछुये, होंठों पे लिप स्टिक, माथे पे बिंदी, गले में माला...साथ में हम सब गा भी रहे थे..।

रसिया को नार बनाउंगी, रसिया को,

सिर पे उढाय सुरंग रंग चुनरी गले में माल पहनाउंगी, रसिया को।

हां ब्लाउज स्पेशल था.। सफेद और उस पे रंग से उनकी छोटी बहन हेमा के रेट लिखे हुये थे, चार आने चूंची दबवाने के, आठ आने एक बार चुद्ववाने के पांच रुपये में रात भर...और ढेर सारी गालियां

तब तक वो भी आ गये थे और बोले की अरे शाम हो गई है चाय वाय हो जाय। मैने गुड्डी को इशारा किया और थोडी ही देर में वो चाय और पकौडे ले आये।

थोडी देर में पकौडों ने असर दिखाना शुरु किया...किसी को नहीं मालूम था सिवाय मेरे और गुड्डी के।

और होली हो नाच गाना ना हो।
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11-01-2017, 12:11 PM,
#78
RE: Holi sex stories-होली की सेक्सी कहानियाँ
ननद ने खेली होली--13

पहले तो नन्दोई जी के ही पैरों में घुंघरु बांधे गये। साडी ब्लाउज में गजब के लग रहे थे। खूब ठुमके दिखाये उन्होने। उसके बाद हम लोग...।

होली का सदा बहार गीत...रंग बरसे भीगे चुनर वाली...रंग बरसे...और शुरु मैने ही किया...खूब अदा से ...।

अरे सोने के थाली में जेवना परोसों अरे...( और फिर मैने लाइन थोडी बदल दी और ननदोई जी के गोद में जा के बैठ गई)

अरे सोने के थाली में जुबना परोसों अरे जोबना परोंसों...( और दोनॊ हाथॊ से अपने दोनो उभार उठा के सीधे ननदोई जी के होठों पे लगा दिया)

अरे जेवे ननद जी का यार बलम तरसै...बलम तरसैं...ननदोई जी को दोनों हाथॊ से पकड के उनकी ओर देख के..।

फिर ननद जी का नम्बर आया तो उन्होने..।

पान इलाची का बीडा लगायों गाया और खिलाया भी अपने सैंया कॊ भी और भैया को भी।

लेकिन मजा आया गुड्डी के साथ ...उसने बडी अदा से छोटे छोटे चूतड ,मटकाते हुये ठुमके लगाये...और गाया..।

अरे बेला चुन चुन सेजियां सेजियां लगाई, अरे सेजियां लगाई..।

मैं सोच रही थी की देखें वो किसका नाम लेती ही लेकिन पहले तो उसने अपने जीजू कॊ खूब ललचाया रिझाया फिर मेरे सैंया की गोद में बैठ के लाइन पूरी की,

अरे सोवे गोरी का यार जीजा तरसैं...अरे सोवे मेरा यार..।

ननदोई जी ने मुझे चैलेंजे किया, अरे होली के गाने हों और जोगीडा ना हो कबीर ना हो...ये फिल्मी विल्मी तो ठीक है...।

मैने पहले तो थोडा नखडा किया फिर लेकिन शर्त रखी की सब साथ साथ गायेंगे खास के नन्दोई जी और वो ढोलक भी बजायेंगे...।

उन्होने ढोलक पकडी और लाली ननद जी ने मंजीरे,

मैने गाना शुरु किया और गुड्डी भी साथ दे रही थी..।

अरे होली में नंदोई जी की बहना का सब कोइ सुना हाल अरे होली में,

अरे एक तो उनकी चोली पकडे दूसरा पकडे गाल,

अरे हेमा जी का अरे हेमा जी का तिसरा धईले माल...अरे होली में..।

कबीरा सा रा सा रा..।

हो जोगी जी हां जॊगी जी

ननदोई जी की बहना तो पक्की हईं छिनाल..।

कोइ उनकी चूंची दबलस कोई कटले गाल,

तीन तीन यारन से चुद्व्वायें तबीयत भई निहाल..।

जोगीडा सा रा सा रा

अरे हम्ररे खेत में गन्ना है और खेत में घूंची,

लाली छिनारिया रोज दबवाये भैया से दोनों चूंची,

जोगीडा सा रा सा रा...अरे देख चली जा..।

चारो ओर लगा पताका और लगी है झंडी,

गुड्डी ननद हैं मशहूर कालीन गंज में रंडी...।

चुदवावै सारी रात....जोगीडा सा रा रा ओह सारा.।

ओह जोगी जी हां जॊगी जी,

अरे कहां से देखो पानी बहता कहां पे हो गया लासा...अरे

अरे लाली ननद की लाली ननद की बुर से पानी बहता

और गुड्डी की बुर हो गई लासा..।

एक ओर से सैंया चोदे एक ओर से भैया..।

यारों की लाइन लगी है

....जरा सा देख तमाशा

जोगीडा सा रा सा रा.। .।

और इस गाने के साथ मैं और गुड्डी जम के अबीर गुलाल उडा रहे थे और एक बार फिर से सूखे रंगों की होली शुरु हो गई।

बेचारे जीत नन्दोइ जी को तो हम लोगों ने इस हालत में छोडा नहीं था की वो ड्राइव कर पाते, इसलिये ये ही लाली, जीत और गुड्डी को छोडने गये। उसके बाद से उन्हे अल्पी और क्म्मॊ को ले के शापिंग पे जाना था।

मैं बेड रूम में जा के लेट गई। डबल होली में, ननद और ननदोइ दोनों के साथ मजा तो बहोत आया लेकिन मैं थोडी थक गई थी।

जब हम लोग दूबे भाभी के यहां होली खेल रहे थे और यहां गुड्डी की रगडाइ हो थी, वो सब कैमरे में रिकार्ड करवा लिया था कैसे अपने भैया और जीजू के साथ , एक साथ। मैनें देखना शुरु किया, थोडा फास्ट फारवर्ड कर के , थोडा रोक रोक के। वो सीन बहोत जोरदार था जब मेरी ननद रानी, वो किशोर किसी एक्स्पर्ट की तरह दो दो लंड को एक साथ....जीत का लंड उसने मुंह में लिया था और अपने भैया का मुठीया रही थी। और फिर दोनों लंड को ...बारी बारी से ...जीभ निकाल के जैसे कॊइ लडकी एक साथ दो दो लालीपाप चाटे...उसकी जीभ लपट झपट के पहले मेरे सैंया के सुपाडे के चारो ओर ...और फिर ननदोइ जी के ...उसके जवान होठ गप्प से सुपाडे को होंठॊ में भर लेते, दबा देते, भींच लेते...और जीभ पी होल को छॆडती...और जिस तरह से प्यार से उसकी बडी बडी कजरारी आंखे...चेहरा उठा के वो देखती...जब चूसते चूसते गाल थक जाते तो अपने टेनिस बाल साइज के छोटे छोटे कडे जोबन के बीच दबा के लंड को रगडती...अकेली उस लडकी ने दोनों मदों की हालत खराब कर रखी थी। चल मैं सोच रही थी...३ दिन की बात और है। नरसों होली है और उसके अगले दिन सुबह ही इस बुलबुल को ले के हम फुर हो जायेंगें। साल भर की कोचिंग में नाम लिखवाना है उसका, लेकिन असली कोचिंग तो उसे मैं दूंगी। लंड की कोई कमी नहीं होगी..एक साथ दो तीन...हरदम उसकी चूत से वीर्य बहता रहेगा।

आज दूबे भाभी ने क्या कया करम नहीं किए लाली ननद के और उसके बाद वो एक दम सुधर गईं। कहां तो वो ननदोई जी को गुड्डी पे हाथ नहीं डालने दे रही थीं और कहां उनके सामने उनकी छोटी बहन ने अपने जीजू का लंड न सिर्फ चूसा, बल्की उनसे कहलवाया भी। और उनके भैया के सामने नंगा करके मैने क्या कुश्ती लडी...अरे होली में ये सब ना हो तो मजा कया है। तब तक वो सीन आ गया जिसमें गुड्डी की सैंड विच बनी। एक एक बार दोनों से चुद चुकी थी वो। दोनों का लंड चाट चाट के फिर उसने खडा कर दिया था। और अबकी उसके भैया ने लेट के उसे अपने उपर ले लिया...खूब मजे से वो छिनार उनका इतना मोटा लंड घोंट गई....खैर चिल्लाती भी कैसे उसके मुंह में उसके जीजा लंड पेल रहे थे और दोनों हाथों से उसके कंधे को पकड के राजीव के लंड के उपर उसे कस के दबा भी रहे थे।

राजीव भी उसकी पतली कमर को पकड के पूरी ताकत से उसे अपनी ओर खींच रहे थे और इंच इंच कर के उस छिनाल ने वो लंड घॊंट ही लिया। पी र्कैसे आराम से खुद ही उपर नीचे कर के ...चूत में दो बार की चुदाइ का माल भरा था..इस लिये खूब सटासट जा रहा था। नन्दोई जी मेरे सैंया को आंख मारी और उन्होने पूरी ताकत से खींच के उसे अपनी ओर कर लिया। पीछे से नन्दोई जी गांड सहला रहे थे....कितने दिनों से वो उसकी इस छोटी छोटी कसी गांड के दीवाने थे...और उसे पता तो चल ही गया होगा खास कर जब उन्होने थूक लगा के उसकी गांड की दरार पे उंगली रगडनी चालू कर दी। खूब क्रींम लगाया उन्होने अपने सुपाडे में ...नन्दोई जी का खूब मोटा है लेकिन राजीव से १८ होगा...इसी लिये मैने राजीव को मना किया था...उनका तो मेरी मुट्ठी इतना होगा।
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11-01-2017, 12:11 PM,
#79
RE: Holi sex stories-होली की सेक्सी कहानियाँ
ननद ने खेली होली--14

मैने प्लान बना रखा था जब ये हम लोगों के साथ रहेगी....मैं अपने उपर लेके अपनी चूंची उसके मुंह में घुसेड के राजीव से उसकी गांड मरवाउंगी, अपने सामने...और सिर्फ थूक लगा के। अरे गांड मारी जाय ननद की और चीख चिल्लाहट ना हो दर्द ना हो...तो क्या मजा। चीख तो वो अभी भी रही थी, लेकिन राजीव ने उसके मुंह में जीभ डाल के उसे बंद कर दिया। नन्दोई जी भी सुफाडा ठेल के रुक गये। वो गांड पटकती रही छटपटाती रही, लेकिन एक बार गांड के छल्ले को लंड पार कर ले ना फिर तो...उसके बाद धीरे धीरे आधा लंड...नीचे से राजीव धक्का दे रहे थे और उपर से ....कभी बारी बारी से कभी साथ साथ...वो चीख रही थी, सिसक रही थी...उसके बाद दो बार और चुदी वो। और राजीव उसके भैया जब उसके मुंह में झडे तो साल्ली....पूरा गटक गई। एक बूंद भी बाहर नहीं। और मैं कब सो गई पता नहीं।

अगले दिन दिया आइ, गुड्डी और अल्पी की सहेली। मैने बताया था ना की ननद की ट्रेनिंग में...गुड्डी की सहेली जो अपने सगे भाई से फंसी थी और जिसको देख के राजीव का टन टना गया था और उसकी भी गीली हो गई थी।

खूब गदराइ, गोरी, जब से चूंचिया उठान शुरु हुआ था नौवें -दसवें क्लास से ही दबवा मिजवा रही थी। इसलिये खूब भरे भरे....( अरे जोबन तो आते ही हैं मर्दों के लिये फालतू में लडकियां इतना बचा छुपा के रखती हैं, मेरी एक भाभी कहती थीं), शोख धानी शलवार, कुर्ता।

गुड्डी आई है क्या...उसने पूछा। लेकिन उसकी चपल आंख टेबल पे पडी प्लेट में गुलाल अबीर पे थी ( होली शुरु हो चुकी थी, इस लिये मैं प्लेट में गुलाल अबीर जरूर रखती थी और नीचे छुपा के पक्के रंग)।

पहले तू ये बता की तू सहेली किसकी है फिर मैं रिश्ता तय कर के आगे बरताव करुं। हंस के मैं बोली। अल्पी को मेरी बहन बनने की और राजीव को जीजू बना के, उनके साथ उसके मजे लेने की खबर उसकी सारी सहेलियों को लग चुकी थी।

देखिये भाभी ...गुड्डी मेरी पक्की सहेली है इसलिये आपको तो मैं भाभी ही कहुंगी और मेरा आपका तो रिश्ता पहले दिन से ही ननद भाभी का है, लेकिन अल्पी मेरी अच्छी सहेली है और जो उसके जीजू वो मेरे जीजू...और जो उसका हक जीजू पे वो मेरा...खास तौर से फागुन में तो जीजा साली का ...मुस्करा के वो बोली।

तो फिर भाभी से ...थोडा सा लगवा लो...हाथ में गुलाल ले के उसके गोरे गदराये गालों की ओर बढी।

ना ना भाभी ...आज नहीं होली के दिन..। होली के दिन आप चाहे जितना डालियेगा मैं मना नहीं करुंगी। उसने नखडा बनाया।

अरे चल जरा सा बस सगुन के लिये...और मैने थोडा सा गुलाल गाल में लगा दिया। देख कितना सुंदर लगता है तेरे गोरे गाल पे ये गुलाल...और फिर मैने एक चुटकी माथे पे भी लगा दिया और फिर दुबारा गाल पे लगा के अबकी कस के मीज दिया। कितने मुलायम गाल हैं, इनके और नन्दोई जी के हाथ आ गये तो कच कचा के काटे बिना छोडेंगे नहीं, और कस कस के मसलेंगें।

झुक के प्लेट से उसने भी अबीर उठा ली...थोडा मैं भी तो लगा दू और मेरे चेहरे पे लगाने लगी।

गाल से मेरा हाथ गले पे आ गया। हल्का सा गुलाल मैने वहां भी लगा दिया।

वो मेरा इरादा सम्झ गई और जोर से उसने दोनो हाथ गले के पास ला के मेरा हाथ रोकने की कोशिश की, नहीं भाभी वहां नहीं।

क्यों वहां कोई खास चीज है क्या और उसके रोकते रोकते....मैं बहोत ननदों से होली खेल चुकी थी...मेरा हाथा सीधे उसके कबूतर पे..।

क्या मस्त उभार थे, इस उमर में भी आल्मोस्ट मेरी साइज के...खूब कडे...मेरे हाथ पहले उसके उरोज के उपर के हिस्से पे...एक बार होली में जब हाथ ब्रा के अंदर घुस जाय तो निकालना मुश्किल होता है....और थोडी देर में ही मेरा हाथ कस कस के मींज रहा था, दबा रहा था, चल तेरे जीजू जबतक नहीं आते भाभी से ही काम चला मैने चिढाया.।

धत्त भाभी...मैने ऐसा तो नहीं कहा था...बस हो गया प्लीज ....हाथ ....निकाल....ओह ..ओह..।

चल तू भी क्या याद करेगी किस सीधी भाभी से पाला पडा था और मैने हाथ ब्रा से तो निकाल लिया लेकिन उस हाथ से उसका कुर्ता पूरी तरह फैला के रखा और दूसरे हाथ से बडी प्लेट का गुलाल उठा के ( उसमें पक्का सूखा लाल रंग भी मिला हुआ था) सीधे उसके कुर्ते के अंदर...ब्रा ....ब्रा के अंदर लाल...लाल। अ

अरे एक गलती हो गई...ननद की मांग तो भरी ही नहीं...और ढेर सारा गुलाल ...उसकी मांग में...अब चल तेरी मांग मैने भरी है, तो सुहाग रात भी मैं मनाउंगी मैने चिढाया।

भाभी अब मुझे भी तो लगाने दीजिये...वो बोली।

एक् दम बोल कहो कहां लगाना है और मैने खुद आंचल हटा दिया, मेरे लो कट ब्लाउज से....वो गाल ...गले से होते हुए मेरे उभार तक..।

और मौके का फायदा उठा के मैने उसके कुर्ते के सारे बटब खॊल दिये...ब्रा साफ साफ दिख रही थी। गुलाल से रंगी...।

मैने तेरे एक कबूतर पे तो गुलाल लगाया दूसरे पे नहीं ...और मैने अबकी खुल के अंदर हाथ डाल के उसका दूसरा जोबन पकड लिया।

मेरा दूसरा हाथ उसके शलवार के नाडे पे था।

१० मिनट के अंदर हम दोनों के कपडे दूर पडे थे,,,अबीर गुलाल से लथ पथ...हम दोनो सिक्स्टी नाइन की पोज में....मेरी जीभ उसकी जांघॊं के बीच में और उसकी मेरी ...जैसे अखाडे में लड रहे पहलवानों की देह धूल मिट्टी में लिपटी रह्ती है...उसी तरह गुलाल अबीर में लिपटी हम ननद भौजाइ, एक किशोरी एक तरुणी..।

गुलाल से सने मेरे दोनों हाथ अभी भी उसके चूतड रंग रहे थे और जीभ....कभी उसकी लेबिया को फ्लिक करती, कभी क्लिट को...।

और दिया उमर में कम भले हो लेकिन अनुभव में कम नहीं लग रही थी। उसके भी हाथ, उंगलिया, जीभ मेरे तन मन को रंग रहे थे।

हम दोनों एक दूसरे को किनारे पे पहुंचाते पहुंचाते रुक जाते...और फिर से शुरु हो जाते।

तभी मुझे जीत और इनकी आवाज सुनाई पडी...।

आ जाओ तुम दोनों के लिये गिफ्ट है ...मैने हंस के दावत दी।

और राजी्व ने तो जब से पहली बार दिया को देखा था तब से...उनका उसके लिये तन्नाया था। वो मेरे सर की ओर आये । एक हाथ से मैने दिया की लेबिया कस के फैलाई और राजीव का बीयर कैन ऐसा मोटा लंड पकड के उसकी चूत में लगा दिया। राजीव ने कस के उसके दोनों किशोर चूतड पकडे और पूरी ताकत से एक बार में अपना हलब्बी लौंडा पेल दिया।

उईईईईईईईईईईईई माआआआआं......हम दोनों के मुंह से एक साथ निकला।

पीछे से नन्दोई जी ने अपना लंड मेरी चूत में पेल दिया था। फिर तो दोनों ने हम दोनों की एक साथ हचक हचक के वो चुदाइ की...सिक्स्टी नाइन करते चुदवाने का ये मेरा पहला मौका था.।

मैं राजीव के मोटे लंड को दिया की चूत में रगडते, फैलाते घुसते देख रही थी.।

मेरी जीभ अब भी चुप नहीं थी....वो अब राजीव के मोटॆ चिकने लंड को चाट रही थी जब तक वो दिया की कसी चूत में कच कचा के घुसता...और जब पूरा लंड दिया की चूत में होता तो मेरे होंठ कस के उसकी क्लिट को चूसते, भींचते और हल्के से काट लेते.।

दिया की जीभ भी यही बदमाशियां कर रही थी। मैं मजे से एक साथ ननद और ननदोइ का मजा लूट रही थी होली में...और आधे घंटे की नान स्टाप चुदाइ के बाद हम चारों एक साथ झडे।
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11-01-2017, 12:12 PM,
#80
RE: Holi sex stories-होली की सेक्सी कहानियाँ
ननद ने खेली होली--15

जब दिया उठी तो उसने एक खुश खबरी दी...अल्पी और गुड्डी के क्लास की आज फेयर वेल थी और उसकी तीन सहेलियां आ रही थी होली खेलने, मधु, शिखा और नीतू।

चलो तैयार हो जाओ तुम दोनॊं...मैने उनसे और ननदोई जी से कहा।

एक दम फटा फट...और दोनो गायब हो गये।

थोडी देर में तूफान की तरह तीनों दाखिल हुयीं।

जैसे गुलाल और अबीर के इंद्र धनुष आ गयें हो लाल गुलाबी पीले धानी चुनरियां दुपटे...और दिया भी उनके साथ शामिल हो गई।

मधु टाप और जीन्स में, शिखा चुनरी और चोली में और नीतू स्कूल के सफेद ब्लाउज और स्कर्ट में....।

रंग, गुलाल से लैस हाथों में पहले से रंग लगाये..।

ब्रज में आज मची होरी ब्रज में...।

अपने अपने घर से निकरीं कोई सांवर कोई गोरी रे...।

कोइ जोबन ...कोइ उमर की थोरी रे..।

और ये और जीत भी सफेद कुर्ते पाजामें में बेकाबू हो रहे थे।

हे नहीं मैने उन सबों के अरमानों पे पानी फेर दिया, चलो पहले एक दो मेरे साथ किचेन में हेल्प कराओ और हां रंग वंग सब पीछे....पहले मैं अपनी ननदों कॊ खिला पिला लूंगी फिर होळी और ....उन लडकियों से मैने पूछा, तुम लोग तो सिर्फ ननदोइ जी से खेलोगी ये तो तुम्हारे भाई लगेंगें।

नहींंंंंंंंंंंं अब समवेत स्वर में चिल्लाइं। अल्पी के जीजू तो हमारे भी जीजू।

गुड्डी तो मुझे मालूम था की नहीं आयेगी। उसकी बडी बहन लाली ने तय किया था की वो आज ही होली का सब काम खतम कर लेंगी और कल सिर्फ औरतों लडकियों की होली...और उसमें वो लेसबियन कुश्ती ...भी होनी थी ....मेरी और लाली की...तो कल तो टाइम मिलता नहीं...पर अल्पी...मेरे पूछे बिना नीतू बोली, भाभी वो थोडी थकी थकी लग रही थी...फिर उसको भी घर जल्दी लौटना था। मैं समझ गई कल इन्होने वो हचक के उसे चोदा था ....होली थी ...छोटी साली थी और फिर कल की गुड्डी के घर होने वाली होली में मेरी असिस्टेंट तो वहॊ थी। तो उसे भी होली का सब काम आज ही निपटाना था।

किचेन में ढेर सारी गरम गुझिया बना के मैं और नीतू बाहर आये तो वहां दिया, शिखा और मधु ने सब इंतजाम कर दिया था। घर के पिछवाडॆ एक छोटा सा पांड जैसा था, छाती तक पानी होगा, मैने पहले ही टेसू डाल के उसे रंगीन कर दिया था चारों ओर दहकते हुये पलाश के पेड, बौराये हुये आम.। खूब घने पेड आउर चारों ओर दीवार भी....मैने अपनी ननदों को सब समझा दिया...यहां तक की ट्रिक भी बता दिया...जीत मेरे ननदोइ और उनके जीजा...उन्हे गुद गुदी बहोत लगती है और ये ...ये तो बस दो चार लड्कियां रिक्वेस्ट कर लें चुप चाप रंग लगवा लेंगें...उन्हे मैने ढेर सारे रंग भी दिये। तब तक जीत और ये भी आ गये मैने सब को जबर्न गुझिया खिलाई और ठंडाई पिलाई...ये कहने की बात नहीं...की सबमें डबल भांग मिली हुई थी। और बोला,

चलिये सबसे पहले इतनी सुंदर सेक्सी ननदें आई हैं रंग खेलने इसलिये पहले आप दोनों चुप चाप रंग लगवा लें...एक एक पे दो...दो...उन के मुलायम किशोर हाथों से गालों सीने पे रंग लगवाने में उन दोनों को भी मजा आ रहा था। लेकिन होली में कोइ रुल थोडी चलता है पहले तो मधु के के टाप में जीत ने हाथ डाला और फिर फिर शिखा की चोली में इन्होने घात लगाई। और वो सब साल्लीयां आई भी तो इसीलिये आई थीं। और फिर तालाब में पहले नीतू..और फिर जो जाके निकलती वो दूसरे को भी। ....शिखा थोडा नखडा कर रही थी...लेकिन सबने मिल के एक साथ उसे हाथ पांव पकड के पानी में...और जब वो सारी निकलीं तो...देह से चिपके टाप, चोली, चूतडों के बीच में धंसी शलवार, लहंगा...सब कुछ दिखता है....तब तक इन्होने मेरी ओर इशारा किया और जब तक मैं सम्हलूं...चारों हाथ पैर ननदो के कब्जे में थे और मैं पानी में....दो ने मिल के मेरी साडी खींची और दो ने सीधे ब्लाउज फाड दिया। मुझे लगा की जीत या कम से कम ये तो मेरी सहायता के लिये उत्रेंगे लेकिन ये बाहर खडे खडे खी खी करते रहे...खैर मैने अकले ही किसी का टाप किसी का ब्लाउज...और हम सब थोडी देर में आल्मोस्ट टापलेस थे और उसके बाद उन दोनों का नम्बर था।

अब तक भांग का असर पूरी तरह चढ गया था...फिर तो किसी के पैंटी मे हाथ था तो किसी के ब्रा में और मैने भी एक साथ दो दो ननदों की रगडाइ शुरु कर दी।

सालियां ४ और जीजा दो फिर भी अब अक उन के कपडे बचे हैं कैसी साली हो तुम सब....और फिर चीर हरण पूरा हो गया।

हे इतनी मस्त सालियांं और अभी तक ...बिना चुदे कोई गई तो...अरे लंड का रंग नहीं लगा तो फिर क्या जीजा साली की होली....मैने ललकारा....फिर तो वो बो होल्ड्स बार्ड होली शुरु हुई...।

जो उन दोनों से बचती उसे मैं पकड लेती...।

तीन चार घंटे तक चली होली....तिजहरिया में वो वापस गई<

अगले दिन गुड्डी के घर` सिर्फ औरतों की होली...सारी ननद भाभीयां...१४ से ४४ तक....और दरवाजा ना सिर्फ अंदर से बंद बल्की बाहर से भी ताला मारा हुआ...और आस पास कोइ मर्द ना होने से...आज औअर्तें लडकियां कुछ ज्यादा ही बौरा गईं थी। भांग,ठंडाइ का भी इसमें कम हाथ नहीं था। जोगीडा सा रा सा रा...कबीर गालियों से आंगन गूंज रहा था। कुच बडी उमर की भौजाइयां तो फ्राक में छोटे छोटे टिकोरे वाली ननदों को देख के रोक नहीं पा रहीं थीं.रंग, अबीर गुलाल तो एक बहाना था। असली होली तो देह की हो रही थी.....मन की जो भी कुत्सित बातें थी जो सोच भी नहीं सकते थे...वो सब बाहर आ रही थीं। कहते हैं ना होली साल भर का मैल साफ करने का त्योहार है, तन का भी मन का भी...तो बस वो हो रहा था। कीचड साफ करने का पर्व है ये इसीलिये तो शायद कई जगह कीचड से भी होली खेली जाती है..और वहां भी कीचड की भी होली हुई।

पहले तो माथे गालों पे गुलाल, फिर गले पे फिर हाथ सरकते स्ररकते थोडा नीचे...।

नहीं नहीं भाभी वहां नहीं....रोकना , जबरद्स्ती...।

अरे होली में तो ये सगुन होता है....।

उंह..उंह....नहीं नहीं..।

अरे क्यों क्या ये जगह अपने भैया केलिये रिजर्व की है क्या या शाम को किसी यार ने टाइम दिया है...फिर कचाक से पूरा हाथ...अंदर..।

और ननदें भी क्यों छोडने लगी भौजाइयों को...।

क्यों भाभी भैया ऐसे ही दबाते हैं क्या....अरे भैया से तो रात भर दबाती मिजवाती हैं हमारा जरा सा हाथ लगते ही बिचक रही हैं..।

अरे ननद रानी आप भी तो बचपन से मिजवाती होंगी अपने भैया से...तभी तो नींबू से बडके अनार हो गये...आपको तो पता ही होगा और फिर भाभी के हाथ में ननद के...अरे ऐसे ...नही ऐसे दबाते हैऔर निपल खींच के इसे भी तो..।
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