Mastram Sex Kahani मस्ती एक्सप्रेस
01-19-2018, 01:14 PM,
#21
RE: Mastram Sex Kahani मस्ती एक्सप्रेस
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सुनीता भाभी अचकचा उठीं- “देवरजी ये क्या करते हो?” और उन्होंने अपनी हथेली चूत के ऊपर रख ली। उनके लिये यह नई बात थी। 

शिशिर ने एक हाथ से बल के साथ उनका पकड़ा और हटा दिया। दूसरे हाथ से उनकी चूत की फांकें खोली और अपना मुंह गड़ा दिया। भाभी ऐतराज में अपनी दोनों टांगें उसकी पीठ पर मारने लगीं और हाथ से शिशिर का सिर उठाने लगीं। लेकिन शिशिर का मुँह उनकी चूत से चिपक गया था तो हटा ही नहीं। वह चटखारे लेकर उनकी चूत के रस को पी रहा था। जैसे ही उसने अपनी जीभ भाभी की क्लिटोरिस के ऊपर रक्खी उनका पैर मारना एकदम रुक गया। 

वो आवाज करने लगीं- “ओओफ्फ्फ… ओ माईई…” और उठाने की जगह उन्होंने उसके सिर को कस के चूत में दबा लिया। 

शिशिर ने भाभी की क्लिटोरिस को दोनों होंठों के बीच ले लिया। 

सुनीता- “ओह्ह… मैं अब और नहीं रुक सकती… मुझे कसके दबा लो लो… लो मैं तो गई…” सुनीता भाभी ने चूत उठाकर के जोर से उसके होंठों से चिपका दी और काफी देर तर उनकी चूत में कंपकंपि बनी रही। शिशिर भाभी की बगल में एक करवट लेट गया और हाथ बढ़ा के उनको खींच लिया। भाभी उससे चिपक गईं और उसके सीने में सिर छुपा लिया।

शिशिर ने उनके सिर पर हाथ रखकर और कसके चिपका लिया। थोड़ी देर वह इसी तरह पड़े रहे एक दूसरे में मगन। 

भाभी फुसफुसाईं- “देवरजी, तुम्हारे प्यार करने का तरीका भी निराला है…”

“हाँ, इसमें लातें पीठ पर खानी पड़ती हैं…”

भाभी ने सिर उसकी छाती पर रगड़ा- “चलो हटो, कहीं ऐसा भी कोई करता है…”

“आपको मजा आया?”

भाभी ने हाँमी में सिर हिला दिया। बोलीं- “देवरजी, ये बाताओ कि कुमुद इतनी अच्छी, लंबी और सुंदर है फिर तुम मेरे पीछे क्यों पड़े रहते थे?” 

शिशिर तुरंत बोला- “भाभी, आपने अपने को पूरे आईने में देखा है आप में ना रुक पाने वाली कशिश है। मैं काबू में ही न रह पाता था। फिर कुमुद सेक्स में चुलबुली नहीं है…” वह फिर बोला- “भाभी आपकी कशिश में कितने लोग खिंचे रहते होंगे…”

सुनीता भाभी बोलीं- “जानती हूँ लेकिन मैं राकेश को पूर्ण समर्पित हूँ, तुम्हारे अलावा…”

शिशिर ने आनंद से उन्हें भींच लिया। धीरे से एक चूचुक मुँह में लेना चाहा तो उन्होंने मना कर दिया- “अब नहीं…” और वह शांत हो गई थीं। 

शिशिर बोला- “बस भाभी, सीने पर मुह रख के लेटने दो…”

वह चित्त हो गई और बड़े प्यार से उसका गाल अपने बायें उभार पर दबा लिया। 

शिशिर गाल को और दबाता गया फिर धीरे-धीरे रगड़ने लगा। थोड़ी देर बाद उसने बगैर दबाव के अपनी दाईं हथेली उनके बायें सीने पर रख दी। भाभी ने मना नहीं किया। उन्हें अच्छा लग रहा था। वह अब अपनी तरफ से उसके सिर पर दबाव बढ़ाती जा रही थीं। शिशिर ने धीरे से अपने होंठ खोलकर दांयें चूचुक को अंदर कर लिया। भाभी ने झुक कर उसके माथे को चूम लिया। सुनीता भाभी अब गर्माने लगीं थीं। मैंने होंठों में चूचुक कसके दबोच लिया और चूसने लगा। 

वह कराही- “उईईईई… माँ… तुम तो काटते हो…” लेकिन सिर को कस के चूची पर दबा लिया। 

अब मैं दांयीं चूची को मज़े से चूस रहा था और बांयीं को कसके मसल रहा था। वह अब चूतड़ हिलाने लगी थीं। शिशिर ने दांयां हाथ चूची से हटाकर उनकी चूत पर रख दिया। उन्होंने दोनों जांघों से कस के दबा लिया। उसका सिर दूसरी चूची की तरफ करतीं हुई बोलीं- “इसको चूसो न…”

शिशिर ने दूसरी चूची मुँह में ले ली और दो ऊँगालियों से चूत की दरार को खोलते हुये तीसरी उंगली छेद में डाल दी। चूत गीली हो रही थी। 

भाभी ने चट से अपनी जांघें खोल दी, बोलीं- “पूरी अंदर डाल दो…”

भाभी ने अपने दांयें हाथ से उसका फड़फड़ाया हुआ लण्ड मुट्ठी बंद कर लिया और कहा- “ओ माई गोड ये तो मेरे हाथ में भी नहीं आ रहा है…”

शिशिर उंगली अंदर बाहर करने लगा। उनकी चूत बुरी तरह रिसने लगी थी। बाहर पानी निकल रहा था। 

“हाय अंदर तक घुसेड़ दो न जल्दी से…” वह पूरी तरह उत्तेजित थीं। वह कसकस के उसके लण्ड पर मुट्ठी चलाने लगीं थीं। 

शिशिर बोला- “भाभी इसकी जगह कोई और भी होती है?” 

भाभी- “तो डालो न उस जगह…” फिर शिशिर के कुछ कहने के पहले उन्होंने पलट के अपनी चूत उसके लण्ड के ऊपर कर ली और हाथ से लण्ड पकड़कर सुपाड़ा चूत में घुसेड़ लिया।

अब शिशिर के पास और कोई चारा नहीं था। उसने सुनीता भाभी को पलटा। उनकी टांगों के बीच में घुटनों के बल बैठ गया। उन्होंने उतावली में टांगें पूरी चौड़ा दी और चूत ऊपर उठा दी। चूत की पंखुड़ियां अलग-अलग थीं, गुलाबी छेद खुला हुआ था, अंदर पानी चमक रहा था। शिशिर ने लण्ड का सुपाडा चूत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे घुसाने लगा। 

सुनीता भाभी की सहमी सी आवाज निकली- “देवरजी धीरे से डालियेगा, आपका बहुत बड़ा और मोटा है…” लेकिन उनकी चूत लण्ड को पूरा का पूरा लील गई। भाभी के मुँह से निकला- “हाय…” 

उसने लण्ड बाहर किया और घच्च से अंदर… वह और जोर से “हाय…” कर उठीं। उसने फिर बाहर किया फिर और जोर से घच्च… उनकी सीत्कार और ऊँची हो गई। शिशिर का सीधा खड़ा लण्ड सुनीता भाभी की चूत में सड़ाक से पूरा घुस जाता था। 

जैसे-जैसे घच्च-घच्च की गति बढ़ती गई भाभी की- “हायय… उईईई… माँ मरी…” की सीत्कार भी। 

कुछ देर तक झटके लगाने के बाद शिशिर पलंग के नीचे खड़ा हो गया। सुनीता भाभी को दोनों टांगों से खींचकर पलंग के किनारे कर लिया। उनकी टांगें चौड़ी करके उनके बीच में खड़ा हो गया। अब खड़े-खड़े उसका लण्ड भाभी की चूत के सामने था। उसने लण्ड चूत के मुँह पर लगाया और कहा- “अपनी दोनों टांगें मेरी कमर पर बाँध लो…” 

भाभी की दोनों चूचियों को दोनों हाथों से मसलाते हुये शिशिर ने एक चोट में सड़ाक से लण्ड अंदर कर दिया तो भाभी हिल गईं और मुँह से चीख निकल गई। शिशिर ने चूत के सामने काफी बाहर तक लण्ड निकालकर एकदम से चोट मारी। 

भाभी और जोर से चीखीं- “ओ माँ… मैं मर जाऊँगी…” उन्होंने कस के शिशिर के कंधे दोनों हाथों से जकड़ लिये और अपना मुँह उसकी छाती में गड़ा लिया। 

शिशिर ने जब चोट मारी तो वह बुदबुदाईं- “शिशिर ये तुम्हारी है, जैसे चाहे लो इसको…” पहली बार उन्होंने उसे शिशिर कह के बुलाया था। 

शिशिर धकाधक चोद रहा था। उसका लण्ड चूत की गहराइयों तक जा रहा था। हर चोट में लण्ड की जड़ चूत के ऊपर धप्प से पड़ती थी। 

भाभी आपे मैं नहीं थीं- “आआह्ह… आआह्ह… ऊंऊंह्ह… हाय ऊईईईइ… ओ शिशिर ये तुम्हारी है फाड़ डालो इसको उफ्फ्फ… ओ शिशिर…”

हर झटके में उसी वेग से सुनीता भाभी बढ़-बढ़ के लण्ड को झेल रही थीं। जोरों से चूत से फच्च-फच्च की आवाज निकल रही थी। अचानक भाभी ने उसकी कमर में टांगें एकदम जकड़ लीं- “ओह्ह… मैं और नहीं ले सकती… मैं तो गईईई मेरे शिशिर…” और भाभी ने अपना ज्वालामुखी उगल दिया। 

उनकी चूत इतनी जोर की कांपी कि शिशिर भी न ठहर पाया- “भाभीईई… मैं भी आया… ये लोओ…” उसने गहराई तक ले जाके पानी छोड़ दिया और देर तक छोड़ता रहा। जब उसने अपना लण्ड बाहर निकाला तो भाभी की चूत से गाढ़ा-गाढ़ा सफेद फेन सा फैलता रहा। 

भाभी ने पैंटी से उसे पोंछा भी नहीं जैसी उनकी आदत थी, बस निढाल पड़ी रही। 

शिशिर ने उनका हाथ पकड़ा। 

तो भाभी शिकायत के लहजे में बोलीं- “देखो तुमने इसकी क्या हालत कर दी है? हथौड़ा सा चलाते हो, अब मैं अब राकेश को रात मैं कैसे दूंगी। इसे देखकर उन्हें शक हो गया तो?”
शिशिर ने कोमलता से उनका हाथ थाम लिया। सुनीता भाभी ने उसे दोनों बाहों में लाड़ से भर लिया और अपने सीने में छुपा लिया।
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01-19-2018, 01:14 PM,
#22
RE: Mastram Sex Kahani मस्ती एक्सप्रेस
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सुनीता की कहानी

होली के आनंद के बाद जब भी शिशिर की मुझे भोगने की तबीयत होती तो कह देता- “भाभी, परांठे सेंकने हैं 24 घंटे का उपवासा रखना…” 

जब मेरी तबीयत मचलती तो मैं शिशिर से कहती- “हथौड़ा लूगीं…” मैं पूरी तरह संतुष्ट थी। राकेश भरपूर चोदता था। स्पेशल चुदाई शिशिर से कराती रहती थी। ग्रुप की महफिल के बाद खासतौर पर मुझे हथौड़े की जरूरत पड़ती थी। शिशिर का व्यवहार मेरी तरफ कोमल बना हुआ था केवल चोदते समय वह कोई लिहाज़ नहीं करता था। मैं बहुत खुश रहती थी। 

गर्मियां शुरू हो गईं थीं। गर्मियों में 10 या 15 दिन के लिये या तो हम लोग रजनी के यहां जाते थे या रजनी और रूपेश हमारे यहां आ जाते थे। इस बार वह लोग हमारे यहां आये। रजनी और मैं कालेज़ के जमाने की सहेलियां थीं, पक्की दोस्त। एक दूसरे के बारे में सब कुछ जानती थीं। हम दोनों ही खूबसूरत समझी जाती थीं। रजनी मेरे से ज्यादा लंबी थी और दुबली भी। मेरा शरीर शुरू से ही सांचे में ढला हुआ था। रजनी तबीयत की मस्त थी। खुलकर सेक्स की बातें करती और आगे बढ़ने के लिये भी तैयार। मैं इस बारे मैं बिल्कुल पक्के खयालों की। 

अब रजनी के सीने और कूल्हों पर मांस चढ़ गया था लेकिन बदन उसका इकहरा ही था, आकर्षक। मेरी शादी रजनी से दो साल पहले हो गई थी। रजनी की शादी हुई तो उसके पति रूपेश मेरे ऊपर दीवाने हो गये। हमें चोदने के लिये बेचैन रहने लगे। रजनी को भी उन्होंने तैयार कर लिया। शादी के थोड़े दिनों बाद ही रजनी ने मेरे से कहा- “रूप तेरी चूत की सैर करना चाहता है बदले में राकेश को मैं अपनी नई नवेली का रस चखा दूंगी…” 

मैंने दो टूक जवाब दिया- “मैं राकेश को पूरी तरह समर्पित हूँ ऐसा कुछ भी नहीं करूंगी…” जानबूझ कर मैंने पता नहीं किया कि राकेश को रजनी ने रसपान कराया या नहीं। रजनी के आने पर राकेश की खुशी देखकर लगता था कि वह स्वाद चख चुके थे। इस बात पर इसके बाद पर्दा पड़ गया था। 

जैसे ही रजनी मुझसे मिली तो कह उठी- “लगता है तुम्हें यह जगह रास आ गई है, बड़ी खुश दिखती हो…” 

जल्दी ही रजनी और रूपेश सबसे घुलमिल गये। शिशिर से रूपेश की भी पटने लगी। ग्रुप की महफिलों में भी दोनों ने खूब बढ़-बढ़ के भाग लिया। रजनी ने तो ऐसे किस्से सुनाये कि उस रात जरूर लोगों ने बीवियों से जम कर कसर निकाली होगी। ज्यादा दिन तो सैर सपाटों में ही निकल गये। जब तब शिशिर और कुमुद या अकेला शिशिर भी सामिल हो जाते थे। 

जो बात कोई न जान पाया था रजनी इतनी जल्दी भांप गई, बोली- “अब तुम्हारी खुशी का राज समझ में आया। शिशिर से इश्क लड़ाया जा रहा है…” 

मैं लाल हो गई, बोली- “तुम भी रजनी गजब हो… शिशिर मेरा देवर है…” 

रजनी बोली- “सब जानती हूँ…” 

उसके बाद मैं कुछ चोकन्नी रहने लगी। 

लेकिन इस बीच ही शिशिर परांठे सेंकने की फरमाइश कर बैठा। मैंने समझाया कि अभी रजनी रूपेश हैं। लेकिन वो नहीं माना। दिन में ही समय निकालकर उसने मुझे बहुत ही जबरदस्ती से चोदा। मैं त्राहि-त्राहि कर उठी। चूत पर इतनी चोटें पड़ी थीं कि मैं ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। अपनी दोनों टांगें फैला- फैलाकर चल रही थी। शाम को रजनी ने देखा तो मेरी चूत पर चिउंटी काटी। 

मेरे मुँह से जोर से ‘ओह्ह’ निकल गई। 

रजनी बोली- “इसकी कसके रगड़ाई हुई है क्या?” लेकिन राकेश तो ऐसा नहीं करता। क्या बात है शिशिर से लगवा के आई हो…” 

उसने मेरी चोरी पकड़ ली थी। मैं बोली- “क्या करूं रजनी, वह माना ही नहीं…” 

रजनी ने उलाहना देते हुये कहा- “जब रूप ने मांगी थी तो साफ मना कर दिया था कि मैं तो बस राकेश को ही देती हूँ…” 

मैं- “हाँ… मैं केवल राकेश की हूँ। शिशिर स्पेशल है हमारा ही…” 

रजनी- “अरे जाओ, ऐसे लोग जिस किसी पर भी फिसलाते रहते हैं…” 

मैं- “न रजनी, यह केवल मेरा और शिशिर का संबंध है, भाभी और देवर का…” 

रजनी- “अगर मैंने शिशिर को फँसा के दिखा दिया तो?” 

मैं- “तो जो चाहोगी दूंगी। लेकिन क्या सबूत दोगी?” 

रजनी- “शिशिर का अंडरवेर दूंगी मेरी चूत के रस से पोंछा हुआ चाहो तो सूँघ के देख लेना…” रजनी को अब एक मिशन मिल गया था, शिशिर को बहकाने का।
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01-19-2018, 01:14 PM,
#23
RE: Mastram Sex Kahani मस्ती एक्सप्रेस
रजनी की कहानी

सुनीता को उकसाना तो एक बहाना था। सुनीता को देखकर मेरी चूत भी शिशिर से चुदवाने के लिये बेकरार हो रही थी। शर्त के बाद मुझे खुला मौका मिल गया। डोरे डालने के लिये मैंने स्त्री सुलभ हथियारों का इश्तेमाल किया जिसमें शरीर की भाषा, नैनों की भाषा और प्रेम की भाषा शामिल थी। मैं बड़ी सेक्स भरी आवाज में उससे बातें करने लगी। आँखों में रस भर के कहती- “मैं भी तो तुम्हारी भाभी हूँ। सुनीता जैसा मेरा भी तो अधिकार है…” 

कभी बदन को ऐंठकर कुटिलता से कहती- “रात को तो मेरी हालत खराब हो गई…” आफिस फोन कर देती कहीं ले जाने या लंच पर ही ले जाने के लिये। रेस्टोरेंट में बड़े टाइट कपड़े पहनकर जाती जिनसे मेरे चूचुक के आकार साफ दिखाई देते, चूतड़ के उभार साफ नजर आते। बात-बात पर उस पर गिर पड़ती, कंधे पर सिर रख देती, साथ मैं सेक्स भरी बातें भी करती जाती। इन सबका असर यह हुआ कि शिशिर मेरे से बहुत खुल गया। दो मतलब लिये हुये सेक्स भरा मजाक भी करने लगा। जल्दी ही एक दिन शिशिर के आफिस में ही मैंने हाव-भाव से साफ जाहिर कर दिया कि अब क्यों देर करते हो लगाओ न मुझमें और उससे सटकर मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। ले

किन शिशिर पीछे हट गया। उसने एकदम हाथ नहीं झटका न ही मुझे। धकेला बल्की बाहर चलते हुये बोला- “चलो घर चलें, कुमुद इंतजार कर रही होगी…” 

मैं समझ गई कि लोहा पूरी तरह गरम करने के लिये शारीरिक तरीके से बढ़ने की जरूरत है। मैं शरीर का मजा देने के लिये मौके की तलाश में थी और वह मौका मुझे मिल गया। शहर में नुमायश लगी थी। सुनीता, राकेश, शिशिर, कुमुद, मैं, रूप सब लोग गये। 

मैं टाइट सलवार-सूट में थी। एक जगह स्टेज पर गाने बजाने हो रहे थे। लोग घेरा बना के जमा थे। अंथेरा हो रहा था और वह जगह ज्यादा ही अंधेरी थी। हम सब लोग भी गाने सुनने के लिये खड़े हो गये। मैं शिशिर के सामने खड़ी हो गई। अनजानी सी पीछे हुई और अपने पीछे का हिस्सा उसके सामने से चिपका दिया। मेरी चूतड़ों की गोलाइयां उसकी जांघों में पूरी तरह फिट हो गईं थीं। 

मैं चूतड़ों की दरार में उसके सख्त होते हुये लण्ड को महसूस करने लगी थी कि तभी वह वहां से हट गया और सुनीता के पीछे जाकर खड़ा हो गया। सुनीता के चेहरे पर एक मुश्कान उभरी जो मुझे चिढ़ाने के लिये भी थी और शिशिर की उसको लण्ड लगाने की मक्कारी पर भी। 

मैंने सीधी खुराक देने की ठान ली क्योंकी मेरे वहां रहने में कुल छह दिन और रह गये थे जिनमें मुझे अपनी मनमानी करनी थी। अगले ही दिन पिकनिक थी। मैंने उस दिन साड़ी पहनी लेकिन अंदर पैंटी नहीं पहनी। पिकनिक में चादर पर मैं शिशिर के सामने बैठी थी, घुटनों को ऊपर करके। जब देखा कि लोग नहीं देख रहे हैं तो मैंने अपनी टांगें थोड़ी चौड़ी कर दीं जिससे अंदर का नजारा दिख सके। मैंने नोट किया कि शिशिर के ऊपर असर पड़ा है। 

शिशिर दबी आँखों से मेरी साड़ी के अंदर झांक रहा था। ऐसा मैं कभी-कभी ही कर पा रही की क्योंकी इतने लोगों के बीच में बैठी थी, लेकिन उनको शक भी नहीं हो सकता था कि मैंने पैंटी नहीं पहनी है। अबकी बार मौका मिला तो मैंने टांगें पूरी खोल दी, इतनी कि मेरी चूत का मुँह भी खुल गया होगा। अब नजारा उसके सामने था और वह भी जैसे सब कुछ भूलकर आश्चर्य से घूरे जा रहा था। मैं भी उसकी तरफ देखकर मक्कारी से मुश्कुरा रही थी। 

शिशिर सोच रहा था- “ओ माइ गोड कैसी फूली-फूली रसभरी चूत है… सुनीता भाभी से कम नहीं…”

सुनीता की नजरों से यह खेल छुपा न था। जब सुनीता ने शिशिर को रजनी की चूत को घूरते हुये देखा तो हैरानी भी हुई और शिशिर पर गुस्सा भी आया। उसने आवाज देकर शिशिर को कार से खेल का सामान लाने को भेज दिया। 

जब अकेले में शिशिर भाभी-भाभी करता हुआ सुनीता के पास आया तो सुनीता बोली- “देवरजी बड़ी लार टपक रही थी। ये समझ लेना कि कहीं और मुँह मारा तो अपनी भाभी से परांठे कभी भी नहीं खा पाओगो…” 

मैंने सुनीता की चालाकी जान ली थी, जब उन्होंने शिशिर को हटा दिया। उसके बाद उन लोगों को कुछ घुसपुस करते हुये भी देखा। समझ गई कि मान मनौवल चल रही होगी, क्योंकी सुनीता को अपना कंट्रोल खतम होते हुये दिख रहा है। मुझे अपनी चूत की ताक़त पर भरोसा था। जानती थी कि ऐसी चूत देखने के बाद कोई भी अपने को काबू में नहीं रख सकता। उस रात मैंने उथेड़बुन करके कैसे भी शिशिर से अकेले में मिलने का समय निकाला। 

मैं शिशिर से झूठी नाराजी दिखाती हुई बोली- “क्या देखे जा रहे थे। आज मैं पैंटी पहनना भूल गई तो तुमको शर्म नहीं आती, अंदर ताक-झाँक करते हो…” 

शिशिर- “जब देखने लायक चीज़ होगी तो आँखें अटकेंगी ही…”

मैं- “तो फिर चाहिये है उसको?”

शिशिर- “उसके दावेदार तो और भी हैं। आप मेरी भाभी की सहेली हैं हमें आपकी इज्जत करनी है…” 

मैं कुछ बौखला सी गई, बोली- “सुनीता और हम एक हैं। तुममें और सुनीता में क्या है मुझे सुनीता ने सब बता दिया है फिर हमको लेने में क्यों परहेज करते हो?” 

शिशिर मेरा हाथ पकड़कर अनुनया भरे स्वर में बोला- “जब आप सब जानती ही हैं तो इन संबंधों को हम लोगों के बीच में ही रहने दीजिये न। सेक्स छोड़ दीजिये बाकी सब बातें मैं आपकी सुनीता भाभी की ही तरह मानूंगा। आप को कोई शिकायत नहीं होगी…” 

उसकी तरफ देखकर कहने को कुछ और नहीं रह गया था। मैं सोच भी नहीं सकती की कि मेरी जैसी औरत देने को तैयार हो और कोई आदमी लेने से मना कर दे। 

सुनीता भी शायाद नहीं सोच सकती थी क्योंकि जब मैंने बताया तो अचानक खुशी से वह उछल पड़ी और मेरे गले लग गई। 

सब कुछ बता देने के बाद मैंने सुनीता से कहा- “अच्छा भाई, मैं भाभी भक्त देवर को मान गई लेकिन जाने के पहले उसका मजा तो चखा दो जिसने मेरी सहेली की यह हालत कर दी है…” 

सुनीता पहले तो मुकर गई। जब बहुत मिन्नतें की तो बोली- “अच्छा देखेंगे…”
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01-19-2018, 01:15 PM,
#24
RE: Mastram Sex Kahani मस्ती एक्सप्रेस
सुनीता और शिशिर

उसी दिन शाम को शिशिर और कुमुद सुनीता के यहां डिनर पर आये। शिशिर का बर्ताव मेरी तरफ बड़ा नरम था जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैंने सुनीता को उकसाया तो अकेला पाकर उसने शिशिर से बात की। 

सुनीता- “तुम बाकई भाभी के हकदार हो। तुमको अपने को सौंपकर मैंने कोई भूल नहीं की। रजनी वापिस जा रही है। वह मेरी बड़ी अंतरंग है। उसकी तमन्ना पूरी कर दो। समझो मेरी तरफ से यह तोहफा है…” 

शिशिर आश्चर्य से- “भाभी क्या बात करती हो? मैं तुम्हारे और कुमुद के अलावा किसी को नहीं छुऊंगा फिर तुम्ही तो उस दिन मुझ पर लांछन लगा रही थी और मेरे से अलग हो जाना चाहती थीं…” 

सुनीता- “वह तो तुमको समझने के लिये कहा था। अब उसकी अच्छी तरह से मरम्मत कर दो कि शर्त लगाने की हेकड़ी भूल जाये…” 

शिशिर- “भाभी मैं तो तुम्हारे बगैर किसी को नहीं करूंगा…” 

सुनीता हँस के- “तो फिर कुमुद को क्यों लगाते हो?” 

शिशिर- “कहो तो करना छोड़ दूं…” 

सुनीता- “नहीं नहीं… तुम कहां बात ले जाते हो। मैं कह रही हूँ कि तुम रजनी को करो बस…” 

शिशिर- “तो आपको भी मौजूद रहना पड़ेगा…” 

सुनीता- “यह कैसे हो सकता है? रजनी मेरे सामने कैसे करायेगी?” 

शिशिर- “क्यों नहीं करायेगी? जब आपकी अंतरंग है और आपसे फरमाइश कर सकती है…” 

सुनीता- “अच्छा देवरजी, अब समझी तुम्हारी चालाकी दोनों को एक साथ लगाना चाहते हो…” 

शिशिर- “जाओ मैं नहीं करूंगा…” 

सुनीता- “अच्छा भाई, हम दोनों हाजिर हो जायेंगी…”
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01-19-2018, 01:15 PM,
#25
RE: Mastram Sex Kahani मस्ती एक्सप्रेस
रजनी

मुझे यह जानकर बड़ी खुशी हुई कि सुनीता ने शिशिर को तैयार कर लिया है। सुनीता का साथ रहना भी मुझे भा रहा था। सुनीता ने जब प्रश्न उठाया कि- लेकिन राकेश और रूप से बचाकर मिलोगी कैसे? 

तो मैंने उसको चैलेंज जैसा लेते हुये कहा- “तुम इसकी फिक्र न करो, मेरे ऊपर छोड़ दो…” लेकिन यह बड़ी समस्या थी। हम लोग छुट्टियों में थे और सब लोग साथ ही निकलते थे। उनसे अलग रहकर एक रात निकल पाना टेढ़ी खीर था। मैंने एक प्लान बनाया। सुनीता को नहीं बताया नहीं तो वह मना कर देती। मैंने सोचा कि रूप और राकेश को किसी और के संग लगा दें। ठीक भी था जब हम लोग मज़े ले रहे थे तो उनको भी मज़े ले लेने दें। सबके ऊपर नजर दौड़ाई तो मिसेज़ अग्रवाल ठीक लगीं। अच्छा भरा बदन था। खूब उभार लिये सीने थे, भारी सेक्सी चूतड़ थे, और उनके जल्दी राजी हो जाने की उम्मीद भी थी। मैंने प्लान पर काम करना चालू कर दिया।

सबसे पहले मिसेज़ अग्रवाल का तैयार करना था। मैं उनसे अकेले में मिली तो सेक्स की बातों के साथ उनके सेक्सी शरीर की बड़ी तारीफ कर दी और कहा- “बुरा न मानो तो एक बात कहूँ… रूप तो तुम्हारे ऊपर मर मिटा है। जब भी मुझे करता है तो तुम्हारा नाम ले-लेकर ही लगाता है…” 

मिसेज़ अग्रवाल शर्माती हुई बोलीं- “ओ माँ… बड़े बुरे हैं वो…” 

मैंने उनके हाथ को दबाते हुये कहा- “बुरे नहीं, जब तुम्हारे नाम का लगाते हैं तो मुझे तारे नजर आ जाते हैं। तुम लगवाके देख लो न…” 

मिसेज़ अग्रवाल- “तुम उन्हें परमिशन दे दोगी?” 

मैं- “वो जिस शुख को लेना चाहते हैं, मैं क्यों रोकूं। तुम अपनी बाताओ तुम्हें मंजूर है?” 

उन्होंने आँखों से हामी भर दी। 

उसी रात मैंने रूप से चुदाई कराई। उसकी मन की बात करके तबीयत खुश कर दी। जब वह धक्के लगा रहा था तो मैंने बात छेड़ी- “रूप, मिसेज़ अग्रवाल का दिल है तुम्हारे ऊपर… तुमसे मजा लेना चाहती हैं…” 

रूप ने पूछा- “तुमको कैसे मालूम हुआ?” 

मैंने कहा- “खुद उन्होंने मुझसे इशारों में कह दिया। तुमसे कहने की हिम्मत नहीं हुई कि तुम मना न कर दो…” 

यह बातें करते हुये रूप के धक्के की रफ्तार बढ़ गई। 

मैंने बात जारी रखी- “लेकिन रूप एक बात है, उनका ज्यादा माल खाने का मन है। तुम्हारा और तुम्हारे दोस्त राकेश दोनों का साथ-साथ खाना चाहती हैं…” 

रूप का मन थोड़ा बुझ गया- “पता नहीं राकेश का? वह उसकी बीवी पता नहीं…” 

मैंने चूत कस कर लण्ड पर जमाते हुये उसको उकसाया- “तुम्हारा दोस्त है तैयार करो उसको। तर माल खाने को मिल रहा है…” 

रूप ने जवाब में पूरा पेलते हुये कहा- “करता हूँ उसको तैयार…”

मैंने चूत उसकी झांटों से रगड़ते हुये कहा- “डार्लिंग जल्दी करना, वह मुझसे पूछेगी…” 

उसके बाद रूप के चोदने में बहुत उत्साह आ गया। 

दूसरे दिन ही जवाब मिल गया। राकेश बाखुशी तैयार हो गया। मुझे अब फिर से संगीता अग्रवाल से बात करनी थी। मैं पुराने जमाने की कुटनी का रोल कर रही थी। पत्नियां चुदवाना चाहती थीं, पति चोदने को बेकरार थे, लेकिन कितनी अजीब बात थी की दोनों ही किसी और के लिये दीवाने हो रहे थे। किसी और को चूत देने के नशे मैं मैंने कैसी-कैसी चालें चलीं थीं। 

मिसेज़ अग्रवाल से मिली तो अलग ले जाकर चिउंटी काटती हुई मैं फुसफुसा के बोली- “तेरे मज़े हैं, रूप और राकेश दोनों ही लगाना चाहते हैं…” 

संगीता अग्रवाल समझी नहीं बोली- “अभी तो एक बार मिलना बहुत है…” 

मैंने कान में कहा- “एक साथ ही दोनों हाँ…” और मैंने उसका हाथ दबा दिया। 

संगीता के चेहरे पर घबड़ाहट थी बोली- “न बाबा न… ऐसा कैसे हो सकता है?” 

मैं झूठ बोली- “बड़ा मजा आता है, मैं तो कई बार करा चुकी हूँ। सोचे दो लण्डों का अलग-अलग स्वाद मिलेगा…” 

संगीता के चेहरे पर वासना नाचा उठी- “सच… क्या मैं करा पाऊँगी?” 

मैंने हाथ दबाकर उसके तसल्ली दे दी। वह भी लगवाने के लिये उत्तेजित हो गई। भाग्य से मिस्टर अग्रवाल को दो दिन बाद बाहर जाना था। उस दिन की रात मिसेज़ अग्रवाल के यहां रूप और राकेश के लिये बुक हो गई। मिसेज़ अग्रवाल खाना बड़ा जायकेदार बनाती थीं और खुद भी जायकेदार थीं। रूप और राकेश की बड़ी दावत पक्की थी। हम लोगों के लिये मैदान साफ हो गया। 

मैंने सुनीता को सुझाया कि वह घर में इंतेजाम न करे। किसी भी कारण से रूप और राकेश वापिस आ पहुँचे तो हम लोग रंगे हाथों पकड़े जायेंगे। सुनीता ने शिशिर को खबर कर दी।
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01-19-2018, 01:15 PM,
#26
RE: Mastram Sex Kahani मस्ती एक्सप्रेस
सुनीता, रजनी और शिशिर

शिशिर ने एक आलीशान होटल मैं रूम रिज़र्व कर दिया। सुनीता और रजनी आठ बजे रात को होटल पहुँची शिशिर को साढ़े आठ बजे आना था। कमरे को देखकर दोनों दंग रह गईं। शिशिर ने पांच-सितारा होटल का एक पूरा सूट बुक कर दिया था। खाने के लिये डाइनिंग टेबल, बैठने के लिये सोफा, चमचमाता बाथरूम, क्वीन साइज़ बेड और उसके सामने ढेर सारी खुली जगह। शिशिर साढ़े आठ बजे के पहले ही पहुँच गया। बेल दबाने पर दरवाजा खुला तो सुनीता और रजनी सामने खड़ी थीं, एकदम सजी धजी। 

सुनीता ने दूध सी सफेद साड़ी पहन रखी थी। उसका गोरा रंग उससे मिल गया था। गले में मोतियों का हार, कानों में हीरे के बड़े-बड़े थाप, सुर्ख लिपिस्टिक, रचे होंठ और कमान सी आँखें। 

रजनी ने धानी कुर्ता, सफेद चूड़ीदार, हाथों में ढेर सारी हरी-हरी चूड़ियां, मैचिंग कीमती हार, इयरिग और सुघड़ मेकप। 

शिशिर उनको ताकता ही रह गया। 

सुनीता शर्मा के बोली- “अब आओगो भी या ऐसे ही खड़े रहोगे?”

शिशिर जैसे सोते से जाग गया हो। उसने हाथ के बैग से एक सफेद मोगरे की माला निकाली और सुनीता से बोला- “भाभी ये आपके लिये…” 

सुनीता उसकी ओर पीठ करके खड़ी हो गईं, उसने माला उसके जूड़े में बाँध दी। मोगरा महक उठा। पलट कर सुनीता ने उसके गले में बाहें डाल दी। शिशिर ने उन्हें खींचकर अपने से चिपका लिया। दोनों ऐसे ही जुड़े थोड़ी देर खड़े रहे। सुनीता ने एक चुंबन उसके होठों पर लेकर अपने को अलग किया। 

फिर शिशिर रजनी की तरफ बढ़ा और बैग से सुर्ख गुलाब का बुके उनकी ओर करके बोला- “रजनी जी ये आपके लिये…”

रजनी बोली- “रजनी नहीं, भाभी…”

शिशिर ने अपने को सुधारते हुये कहा- “रजनी भाभी, यह आपके लिये…” 

रजनी ने बढ़ के दोनों बाहें उसके गाले में डाल दी और अपने होंठ कसके उसके होंठों पर गड़ा दिये। शिशिर उनको चूमता रहा। 

इस बीच सुनीता डाइनिंगा टेबल पर जार में रखी सुगंधित मोमबत्ती जला दी थी और उसकी भीनी-भीनी खुशबू कमरें में भरने लगी थी। साफ्ट म्यूजिक लगा दिया था। सुनीता ने लाइट बंद कर दी। शिशिर ने सुनीता की ओर देखा। मोमबत्ती की मंद-मंद रोशनी में वह परी सी लग रही थी। रजनी की कमर में हाथ डाले हुये शिशिर सुनीता की ओर बढ़ा और उसको अपने से चिपका लिया। 

रजनी उसके बायें कंधे से चिपकी थी और सुनीता दांयें से। इसी हालत में वह लोग थिरकते रहे। शिशिर कभी सुनीता को चूमता था कभी रजनी को। शिशिर का लण्ड गरमाने लगा था। रजनी उस पर हाथ फेरने लगी थी। उसने झुक कर सुनीता के दांयें उभार को ब्लाउज़ के ऊपर से ही मुँह में ले लिया। 

सुनीता सी सी कर उठी। सुनीता ने फुसफुसा के कहा- “देवरजी, पहले रजनी को शुख दीजिये, मैं तो आपके पास ही हूँ आज की रात उसकी है…” 

शिशिर ने रजनी को प्यार से चूम लिया- “रजनी भाभी भी तो अपनी हैं…” फिर सुनीता को और भींचते हुये बोला- “भाभी शुरूआत तो मैं आप से ही करूंगा लेकिन तुम दोनों इतनी अच्छी लग रही हो कि मैं कुछ भी नहीं उतारना चाहता…” 

लेकिन रजनी उसका पैंट उतार चुकी थी। अंडरवेर खींचकर रजनी ने उसके लण्ड को मुट्ठी में बांधा तो जैसे लोहे की गरम राड पर हाथ रख दिया हो। शिशिर का बड़ा मोटा और लंबा लण्ड सांप की तरह ऊपर मुँह बाये खड़ा था। पत्थर की तरह सख्त। उसको देखते ही रजनी के मुँह से निकल गया- “ओ माई गुडनेश… अब समझी कि सुनीता इतनी दिवानी क्यों हो रही थी…” फिर रजनी शिशिर की बांहों से खिसक कर नीचे घुटनों के बल बैठ गई। मुट्ठी में बाँधकर उसका लण्ड सीधा अपने सामने कर लिया और मुँह खोलकर अपने नरम होंठ उसके ऊपर रख दिये।

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***** To be contd... ...
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01-19-2018, 01:15 PM,
#27
RE: Mastram Sex Kahani मस्ती एक्सप्रेस
शिशिर ने रजनी को प्यार से चूम लिया- “रजनी भाभी भी तो अपनी हैं…” फिर सुनीता को और भींचते हुये बोला- “भाभी शुरूआत तो मैं आप से ही करूंगा लेकिन तुम दोनों इतनी अच्छी लग रही हो कि मैं कुछ भी नहीं उतारना चाहता…” 

लेकिन रजनी उसका पैंट उतार चुकी थी। अंडरवेर खींचकर रजनी ने उसके लण्ड को मुट्ठी में बांधा तो जैसे लोहे की गरम राड पर हाथ रख दिया हो। शिशिर का बड़ा मोटा और लंबा लण्ड सांप की तरह ऊपर मुँह बाये खड़ा था। पत्थर की तरह सख्त। उसको देखते ही रजनी के मुँह से निकल गया- “ओ माई गुडनेश… अब समझी कि सुनीता इतनी दिवानी क्यों हो रही थी…” फिर रजनी शिशिर की बांहों से खिसक कर नीचे घुटनों के बल बैठ गई। मुट्ठी में बाँधकर उसका लण्ड सीधा अपने सामने कर लिया और मुँह खोलकर अपने नरम होंठ उसके ऊपर रख दिये। 

होंठ लगते ही शिशिर की वासना एकदम जाग उठी। हाथ बढ़ाकर शिशिर ने रजनी को उठा लिया और सुनीता की कमर में हाथ डालकर उन्हें खींचता हुआ बेड तक ले गया। रजनी को बेड के पैताने कारपेट पर बैठा दिया और सुनीता को बेड पर चित्त गिरा दिया। शिशिर ने सुनीता की साड़ी ऊपर तक उलट दी। बाहर के ही नहीं अंदर के कपड़े भी उसने कीमती पहन रखे थे। लेस लगी डिजाइनर पैंटी पर चूत के पानी से एक बड़ा धब्बा बन गया था। शिशिर ने पैंटी अलग की तो सामने दो चिकनी सपाट जांघें थीं, संतरे की रसभरी फांक की तरह सूजी-सूजी चूत की पंखुड़ियां थीं जिनके भीतर से गुलाबीपन झांक रहा था, अर्ध-गोल सुडौल नितम्ब थे जिनके बीच में गहरी दरार थी। 

उसके मुँह से निकल गया- “भाभी तुम बाकई बहुत खूबसूरत हो…” 

दोनों हाथों से उसने सुनीता को खींच लिया और उसकी जांघें अपने कंधों पर धर लीं। सुनीता का धड़ पलंग पर था, नितम्ब पलंग से ऊपर उठे हुये थे और मुँह खोले चूत शिशिर के मुँह से सटी हुई। सुनीता की चूत से मदमस्त सुगंध निकल रही थी। शिशिर ने अपने होंठ सुनीता की चूत की पंखुड़ियों से सटा दिये और चूतड़ आगे करके अपना लण्ड पलंग से टिकी बैठी रजनी के होंठों से लगा दिया। 

रजनी ने सिर ऊंचा करके उसका लण्ड अपने होठों में ले लिया। 

जैसे ही शिशिर ने चूत के अंदर के उभार को होंठों में दबोचा, सुनीता के मुँह से एक सीत्कार निकल गई और वह तनकर के धनुष की तरह हो गई। वह चूत की उठान को होंठों से इस तरह चूसने लगा जैसे संतरे की फांक चूस रहा हो। 

नीचे बैठी रजनी शिशिर के लण्ड को जड़ से दायें हाथ की मुट्ठी में बांधे लालीपोप की तरह चटखारे लेकर चूस रही थी। 

शिशिर दोहरे मज़े ले रहा था। 

रजनी ने मुट्ठी को लण्ड के सिरे तक फिसलाकर उसके ऊपर की खाल को हटा दिया तो लण्ड का सुपाड़ा निकल आया। जैसे लालीपोप खा रही हो, उसने सुपाड़ा अपने मुँह में लेकर हलके से दांत लगा दिये। 

शिशिर उत्तेजना से कराह उठा और उसने सुनीता की चूत की उठान पर हलके से दांत लगा दिये। 

सुनीता के मुँह से चीख निकल गई, बोली- “ओ देवरजी तुम तो काटते हो…” 

शिशिर क्लिट पर जीभ फेरने लगा। सुनीता की सिहरन बढ़ गई। उसने शिशिर के सिर पर हाथ रखकर और कस के उसका मुँह चूत पर दबा लिया। शिशिर ने साथ ही चूतड़ आगे करके और जोर से लण्ड चूत के मुँह में पेला। रजनी ने चूत के होंठों की पकड़ और बढ़ा दी। 

जब रजनी जोर बढ़ा देती थी तो शिशिर सुनीता की चूत पर कसर निकालता था और जब सुनीता रगड़ बढ़ा देती की तो शिशिर रजनी पर कसर मिटाता था। शिशिर सुनीता और रजनी के बीच माध्यम बन हुआ था। 

सुनीता जोरों से- “उईईई… आआआह्ह…” करे जा रही थी। 

रजनी के मुँह से निकल रहा था- “उहूँहूँहूँ हूँहूँहूँ हूँ…” जैसे बड़ी स्वादिष्ट चीज़ चाट रही हो। 

शिशिर की जीभ चूत की गहराइयों तक घुस जाती थी और सुनीता तड़प-तड़प जाती थी। शिशिर दोनों हाथों से सुनीता की दोनों चूचियों को मसल रहा था। उसके दोनों चूचुक ब्लाउज़ के ऊपर ही एक-एक इंचा उभर आये थे। 

रजनी उंगली और अंगूठे की रिंग बना के शिशिर के लण्ड को उसमें ले रही थौ साथ ही मुँह से चूसती जाती थी। 

काफी देर तक वे मज़े लेटते रहे। सुनीता की गुलाबी तितली तनकर सख्त हो गयी थी। शिशिर ने उसके ऊपर अंगूठा रखा।


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01-19-2018, 01:15 PM,
#28
RE: Mastram Sex Kahani मस्ती एक्सप्रेस
सुनीता एकदम कांप गई- “ओओ माँ अंअंअं अंआंआं आआआ आआआ मैं तो गईईईई… … …” उसने कसके चूत शिशिर के मुँह से चिपका दी और जोरों से दोनों हाथों से उसका सिर टांगों में दबा लिया। 

शिशिर बड़ा उत्तेजित हो उठा। उसने लण्ड पेलने की गति बढ़ाई और उसके लण्ड ने वीर्य उगलना चालू कर दिया। रजनी ने मुँह से लण्ड निकाल लिया। लण्ड से गाढ़ा रस निकलता ही जा रहा था। रजनी ने सुनीता की पैंटी उठा ली और ढेर सारा वीर्य उस पर ले लिया। 

रजनी उठी और खड़े होकर शिशिर से चिपक गई। शिशिर के वीर्य से भरे अपने होंठ, सुनीता के रस से गीले शिशिर के होठों से सटा दिये। रजनी ने उठकर सुनीता की ओर देखा तो वह निढाल पड़ी हुई थी। साड़ी उलटी हुई थी। बड़ी ही चिकनी और सुडौल टांगों के बीच चूत की फांकें तराशी हुई डबलरोटी की तरह फूली हुईं थी। उनके ऊपर बड़े सलीके से कतरे हुये सुनहरे बालों का तिकोन सा बना था। दोनों फांकें फैल गईं थीं। अंदर का गुलाबीपन दिखाई दे रहा था जिसके अंदर से नमी झांक रही थी। बुरी तरह चूसने से चूत लाल हो गई थी। पेट और टांगों पर जरा सा भी ज्यादा मांस नहीं था। सब कुछ एकदम अनुपात में। ब्लाउज़ बुरी तरह से मसला हुआ था जिसमें से सुडौल गोलाइयां उभरी हुई थीं। सफेद साड़ी में चूत खोले कोई अप्सरा पड़ी थी। रजनी पहली बार अपनी अंतरंग सहेली के अंदर के भागों को देख रही थी।

इस बीच शिशिर बाथरूम चला गया था। रजनी की चूत में आग लगी हुई थी। रजनी ने एक झटके से अपनी सलवार का नाड़ा खोल लिया और चूत के रस से गीली हो गई पैंटी को खींचकर निकाल फेंका। अपना कुर्ता भी निकाल फेंका और बिल्ली की तरह चलती हुई सुनीता के ऊपर आ गई। वह सुनीता के ब्लाउज़ के बटन खोलने लगी। रजनी पहली बार ऐसा कर रही थी। 

सुनीता भौचक्की रह गई, बोली “रजनी… ये क्या करती हो?” 

रजनी तब तक उसका ब्लाउज़ और ब्रेजियर अलग कर चुकी थी। बड़े-बड़े गोले स्प्रिंग से उछलकर बाहर आ गये थे। रजनी ने देखा तो बोल पड़ी- “सुनीता, तू बाकई बहुत खूबसूरत है…” 

रजनी ने सुनीता का बायां उभार चूचुक सहित मुँह में भर लिया और अपनी चूत सुनीता की चूत के ऊपर बैठा दी। जब रजनी की चूत की पंखुड़ियों ने सुनीता की चूत के अंदर रगड़ा तो सुनीता को बहुत अच्छा लगा। उसने रजनी की पतली कमर अपनी दोंनों टांगों के बीच भर ली और अपनी टांगें उसकी कमर पर कसकर उसकी चूत को और कसकर अपनी चूत में घुसा लिया। 

रजनी ने अपनी दाईं चूची उसके मुँह में दे दी। 

शिशिर जब बाथरूम से आया तो उसने देखा कि सुनीता चित्त लेटी है, रजनी उसके ऊपर लेटी है। रजनी सुनीता की एक चूची चूस रही है और सुनीता रजनी की चूची पर पिली पड़ी है। सुनीता की नारंगी की तरह रस से भरी हुई सुनहरे तराशे बालों वाली चूत रजनी की लंबी फांक वाली रसीली सफाचट चूत में लाक है। सुनीता की चूत का एक होंठ रजनी की चूत में घुसा है और रजनी की चूत का एक होंठ सुनीता की चूत के भीतर। दोनों एक दूसरे की चूत के अंदर के दाने को रगड़ रही हैं। चूत को ज्यादा से ज्यादा खुला रखने के लिये सुनीता ने अपनी टांगें रजनी की कमर पर कस रखी हैं और रजनी ने टांगें फैला रखी हैं। दोनों कस-कस के आवाजें निकाल रही हैं। 

यह देखकर शिशिर का लण्ड तनकर उत्तेजना से हिलने लगा। वह आगे बढ़ा और पलंग के पैताने जाकर उसने उन दोनों को वैसे ही गुथी हालत में पलंग के किनारे तक खींच लिया। पैताने खड़े-खड़े ही उसने अपना लण्ड हाथ से पकड़ा, सुनीता की चूत के मुंह पर रखा और एक झटके में ही पूरा अंदर कर दिया। 

सुनीता के मुँह से निकला- “उईई माँ…” 

उसने दो तीन बार उसको अंदर बाहर पेला। फिर अपना लण्ड बाहर खींच लिया। फिर से मुट्ठी में पकड़ा और अबकी बार रजनी के सुराख से मिलाया और जोर लगा के घुसाता ही गया। 

रजनी कराह उठी- “ओ माई गोड…” 

दो तीन बार उसने उसकी चूत में ही अंदर बाहर किया फिर खींच लिया। फिर उसने सुनीता की बुर पर लगाया और बोला- “लो भाभी अब तुम लो…” और सारा का सारा अंदर कर दिया। 

सुनीता बनावटी शिकायत से- “देवरजी, तुम तो अंदर तक हिला देते हो…” 

बाहर खींचकर शिशिर ने रजनी की बुर में एक झटके में पूरा भीतर ओर कहा- “लो रजनी भाभी तुम लो…” 

रजनी- “हाँ… लगाओ तुम्हारे लण्ड में जोर है तो मेरी चूत भी कम नहीं…” 

शिशिर एक बार सुनीता को चोदता था और एक बार रजनी को। दोनों के अंदर उसका लण्ड एक की चूत से निकलता तो दूसरी की चूत में घुस जाता।
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01-19-2018, 01:16 PM,
#29
RE: Mastram Sex Kahani मस्ती एक्सप्रेस
उसको दुहरा स्वाद मिल रहा था। एक बार सुनीता की मांसल, स्पंजी, लण्ड को जकड़ने वाली बुर का और दूसरी बार पतली, लंबी, गरम सुरंग का जिसमें लण्ड गहराई तक घुस जाता था। जब वह रजनी पर चोट करता तो रजनी झेलते हुये अपनी चूत सुनीता की चूत पर रगड़ देती। जब वह सुनीता पर जोर लगाता तो सुनीता टांगों की जकड़ और बढ़ा देती कि उसकी चूत रजनी की बुर पर रगड़ मार देती। शिशिर की रफ्तार बहुत बढ़ गई थी। धखाधक-धकाधक वह लगाये जा रहा था- सुनीता में, रजनी में, फिर सुनीता में। सुनीता रजनी एक दूसरे की चूचियों को कस के जकड़े हुये थीं। उनका सिसकना बढ़ गया था। 

जैसे ही चोट लगती सुनीता बुदबुदाती- “ओओह्ह शिशिर मैं क्या करूं हुहूँ…” 

सुनीता जब ज्यादा आनंद में आ जाती थी तो शिशिर का नाम लेकर पुकारने लगती थी। 

रजनी का चुनौती वाला रुख अब भी बना हुआ था, हालांकि उसमें रहम जैसा भाव आ गया था। उसके अंदर धक्क से जाता तो रजनी कराह उठती- “ओ मेरे राम्म्म… हाँ हाँ काट डालो इसको आज… इसे छोड़ना नहीं…” 

शिशिर ने सुनीता की जांघें को दोनों हाथों से थाम रखा था जो रजनी की कमर पर कसी हुईं थीं। खड़े-खड़े वह एक के बाद एक दोनों को पेले जा रहा था जैसे पिस्टन शंट कर रहा हो।

सुनीता मैं घुसता तो सुनीता तड़पती- “ओओ… ओओओ… आआआ… ओ मेरी मम्मीई… ओ माईई गोड… उईईई म्माँ मैं मरीई…”

रजनी झेलती तो दांतों के ऊपर दांत जकड़े हुये अंदर लंबी सांस खींचती- “ऊऊऊऊऊऊ…” जब चोट पड़ चुकती तो जोर से सांस बाहर करती- “ओफ्फ्फ्फ…” 

सुनीता की बुर बुरी तरह से रिस रही थी। जांघों तक पानी फैल गया था। रजनी की बुर भी पूरी गीली हो रही थी। दोनों की चूत गुत्थम-गुत्था थीं और एक दूसरे के पानी से लथफथ हो रही थीं। 

शिशिर का लण्ड उनकी चूत से फच्च-फच्च की आवाज निकाल रहा था। 

सुनीता और रजनी की कराह बढ़ती जा रही थी- “ओओ… ओओओ… आआआ… ओ मेरी मम्मीई… ओ माईई गोड… उईईई म्माँ मैं मरीई…” “ऊऊऊऊऊऊ… ओफ्फ्फ्फ”

शिशिर ने और गति बढ़ाई तो रजनी ने सुनीता की चूची को छोड़कर अपने होंठ उसके होंठों पर गड़ा दिये। शिशिर ने हाथ बढ़ाकर सुनीता की दोनों चूचियां हथेलियों में थाम लीं और शंटिंग चालू रखी। दोनों होंठ चूसती जातीं थीं और “ऊंऊं” की आवाज करती जाती थीं। जैसे ही शिशिर ने चूचियों की घुंडियों को ऊँगलियों में मसला तो सुनीता चिल्ला उठी- “ओ शिशिर मैं तो गईईई… मत निकालो बाहर…” 

इसके साथ ही अपनी कमर उठाकर उसने रजनी की चूत से इतने कस के सटा ली कि रजनी हिल न सकी। उसकी रगड़ से रजनी का पानी भी छूट गया- “आआआ… मैं क्या करूं? माँ मेरी मैं झड़ीईई…”

शिशिर ने जल्दी से पूछा- “रजनी भाभी, आपने बर्थ कंट्रोल की गोली ली है?” 

रजनी के हाँ कहते ही शिशिर ने रजनी की बुर में अपना पूरा लण्ड अंदर किये हुये ही सारा वीर्य उगलना चालू कर दिया। करीब-करीब एक साथ तीनों लोग सिहरते रहे। जब शिशिर ने लण्ड बाहर किया तो रजनी की मसली चूत के अंदर से गाढ़ा-गाढ़ा सफेद द्रव बाहर निकलकर सुनीता की चूत पर गिर रहा था। 

रजनी ने उठकर अपनी चूत को पोंछा। 

सुनीता ने हाथ से खींचकर शिशिर को अपनी बगल में लिटा लिया। 

शिशिर ने हाथ बढ़ा के रजनी को अपनी दूसरी तरफ लिटा लिया। दोनों ने शिशिर के एक-एक कंधे पर सिर रख लिया। 

रजनी बोली- “थैंक यू शिशिर, मैं पूरी तरह संतुष्ट हो गई हूँ, खासतौर पर तुमने मेरी सहेली से मेरी जान पहचान करवा दी…” 

सुनीता लाजाती हुई बोली- “धत्त… ऐसा भी कोई करता है?” 

शिशिर बोला- “रजनी भाभी, अभी कहां? अभी आपसे अकेले की मुलाकात तो करनी है…” 

रजनी- “न बाबा… और मैं न ले सकूंगी…” 

सुनीता- “शिशिर इसको मत छोड़ना। इतनी इठलाती थी, हैकड़ी तो बंद हो इसकी…” 

शिशिर ने सुनीता को भिंचकर चूम लिया फिर रजनी को भींचकर उसको चूम लिया।


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01-19-2018, 01:16 PM,
#30
RE: Mastram Sex Kahani मस्ती एक्सप्रेस
मिसेज़ संगीता अग्रवाल राकेश और रूपेश

जब सुनीता और रजनी शिशिर से मुलाकात का बेसबरी से इंतेजार कर रही थीं, ठीक उसी समय राकेश और रूपेश मिसेज़ अग्रवाल के घर पर दस्तक दे रहे थे। मिसेज़ अग्रवाल ने दरवाजा खोला। एकदम सजी-धजी, पूरा श्रिंगार किये। कमनीय तो थीं ही और मादक हो उठी थीं। पूरे उठे हुये जोबन, उभरे गोल-गोल चूतड़, दमकता रंग, आँखों में शुरूर, मोटी नहीं थी पर शरीर अच्छा भरा हुआ। 

उन्होंने राकेश का हाथ पकड़ते हुये कहा- “आइये देवर जी…” 

फिर रूपेश की ओर देखते हुये- “आइये रूपेश जी…” 

कोई हिचकिचाहट नहीं थी, न शर्मा रही थीं। अंदर आकर राकेश ने कीमती परफ्यूम भेंट की तो वह उससे सटकर खड़ी हो गईं, बोली- “लीजिये लगा दीजिये…” 

राकेश उनके उभार की नजदीकी महसूस करने लगा था। उसके शरीर में झनझनाहट सी लगने लगी थी। 

वह बोलीं “बैठिये…” 

लिविंग रूम में शानदार सोफे पड़े हुये थे। खुशहाली और शुरूचि चारों ओर नजर आ रही थी। राकेश और रूपेश बड़े से सोफे पर बैठ गये। 

मिसेज़ अग्रवाल ने पूछा- “आप लोग कुछ हार्ड ड्रिंक लेना चाहेंगे? मैं तो लेती नहीं…” 

राकेश- “अगर आप साकी बनेंगी तो जरूर लेंगे…” 

मिसेज़ अग्रवाल- “आप बनाइये तो सही मैं सब कुछ बनूंगी। आज की रात आपके नाम है, अगर कुछ कमी रह गई तो सुनीता और रजनी शिकायत करेंगी…”
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