Hindi Chudai Kahani मैं और मेरी स्नेहल चाची - Printable Version

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RE: Hindi Chudai Kahani मैं और मेरी स्नेहल चाची - sexstories - 06-21-2018

सुबह छह बजे हम पणजी पहुंचे. मेरी नींद नहीं हुई थी इसलिये थका थका सा लग रहा था. चाची फ़्रेश लग रही थीं, मेरे ऊपर वो करम करके वे आराम से सो गयी थीं. ऑटो से घर जाते वक्त मैंने चाची की ओर देखा. कल बस में जो हुआ, उसके बाद दिन की रोशनी में उनसे क्या और कैसे बोलूं ये मेरे लिये बड़ा धर्मसंकट था. उनसे आंखें भी नहीं मिला पा रहा था. इसलिये मैं बस चुप रहा. मेरा टेंशन देख कर ऑटो में स्नेहल चाची ने मेरी जांघ थपथपायी जैसे कह रही हों कि चिन्ता मत कर, इतना भी मत डर, सब ठीक हो जायेगा.

चाची का घर पणजी से पांच किलोमीटर पर पोर्वोरिम में था. वो भी शहर के थोड़ा बाहर. पुराना पोर्चुगीज़ बंगला था, आजू बाजू में गार्डन था. इतना बड़ा गार्डन था कि छोटे फ़ार्महाउस जैसा ही लग रहा था. आस पास दूर पर एक दो ऐसे ही बंगले और थे, बाकी तो सब हरियाली और बगीचे ही थे. मैं ऑटो को पैसे देने लगा तो चाची ने मेरा हाथ पकड़ लिया. "अब जब तक तू यहां है विनय, ऐसे बिना पूछे पैसे वैसे देना नहीं. मैं जो कहूंगी, बस वही करना. समझ गया ना? और खुद पर काबू रखना, दिमाग को ऐसे बहकने नहीं देना"

मैंने उनकी ओर देखा. उनकी आंखों में यह कहते हुए डिसिप्लिन के साथ थोड़ा आकर्षण भी झलक रहा था. मैं समझ गया, वे सजा देंगी तो भी शायद उसके पीछे उनका भी एक उद्देश्य होगा. चाची ये क्यों कह रही थीं, सिर्फ़ पैसे देने के बारे में नहीं, यहां रहते हुए हर चीज के बारे में कि वे कहें, मैं वैसा ही करूं. और जो उन्होंने कहा कि खुद कुछ मत करना, इसके पीछे उनका क्या मतलब था यह भी मैं थोड़ा समझ गया था. मैं धीमे स्वर में नीचे देख कर बोला "ठीक है चाची"

हम बंगले के अंदर आये. मैंने मन में सोच लिया था कि खुद कुछ करने की झंझट मैं अब नहीं करने वाला. जो करेंगी, वो चाची ही करेंगी. अंदर ड्राइंग रूम में हम पहुंचे तब तक नीलिमा, उनकी बहू वहां आ गयी थी. "ममी, मैंने देख लिया था अपने रूम से आपका ऑटो. नीचे आ ही रही थी. चलो अच्छा हुआ कि आप जल्दी आ गयीं." फ़िर मेरी ओर देखकर बोली "यह विनय है ना? शादी में नहीं आया था पर एक पुराने फोटो पर से पहचान लिया मैंने"

सोफ़े पर बैठते हुए चाची बोलीं "हां और इसको मैं साथ ही ले आयी. इसकी ट्रेनिंग है पणजी में अगले हफ़्ते से. और यह कह रहा था कि वहां गेस्ट हाउस में रहेगा! मैं कान पकड़कर साथ ले आयी कि चुपचाप मेरे साथ चल"

नीलिमा हंस कर बोली "अच्छा किया ममी. यहां अपना घर होते हुए यह ऐसे वहां होस्टल में रहे? और चलिये अब इतने बड़े घर में बस हम दोनों बोर नहीं होंगे. आप नहीं थीं तो अकेले रह कर पागल हो जाऊंगी ऐसा लग रहा था. वैसे वो विमलाबाई रहती थीं सुबह और शाम को. तुम बैठो विनय, मैं चाय बना लाती हूं" जिस तरह से उसका चेहरा आनंदमय हो गया था, उससे यह साफ़ था कि इन सास बहू में अच्छी पटती थी. ऐसा बहुत कम सास बहुओं में होता है. इसलिये मुझे भी पारिवारिक सुख का यह प्रमाण देखकर प्रसन्नता हुई.

ड्राइंग रूम इतना बड़ा था कि लगता है हमारे दो रूम मिलाकर भी उतने बड़े नहीं होते. आखिर गोआ का पुराना बंगला था. बड़ा अच्छा सजा हुआ था. पुराना पर कीमती फ़र्निचर, दीवालों पर कुछ पुरानी सुंदर पेंटिंग्स, सजावट का सामान इत्यादि.

चाय पीते पीते मैंने नजर चुराकर नीलिमा भाभी को नजर भर कर देख लिया. चेहरा एकदम स्वीट था, सुंदर ही था. बाल भी लंबे थे जिसकी एक वेणी उसने बांधी हुई थी. पहली नजर में - फ़र्स्ट इम्प्रेशन - वह मुझे काफ़ी भरे हुए बदन की लगी, याने मोटी सी, जबकि वह चाची से दो इंच ऊंची ही थी. फ़िर कारण मुझे समझ में आया. असल में उसका शरीर प्रमाणबद्ध ही था, कमर भी पतली सी थी. गाउन में से उसके स्तनों का उभार भी मीडियम था याने न ज्यादा बड़े स्तन थे न एकदम छोटे. याने कमर के ऊपर का भाग एकदम ठीक था, हां कमर के नीचे उसके कूल्हे एकदम चौड़े थे. पैर गाउन में से दिख तो नहीं रहे थी पर ऐसा लग रहा था कि टांगें भी मजबूत ही होंगी. इसीलिये कुल मिलाकर एकदम देखो तो ऐसा लगता था कि वह थोड़ी मोटी है. पर वह केवल इल्यूझन जैसा था. वह मोटी नहीं थी, बस कमर के नीचे का भाग भारी था.

मैंने अपने विचारों को लगाम लगायी. खुद को एक गाली दी कि चाची के पीछे पागल होकर और फ़िर कल हुई घटना से अब क्या तू हर औरत को ऐसी वासना की नजर से देखेगा? उनके हर अंग का अंदाजा लगायेगा? माना कि कल जो हुआ वह बहुत मादक और उत्तेजक था पर इस बात की क्या गारंटी थी कि आज भी ऐसा होगा? और नीलिमा भाभी भी घर में थी. उनसे नजर छुपा कर कब और क्या होगा, यह भी पक्का नहीं था. मेरा मन थोड़ा निराश सा हो गया, याने बहुत मीठे लड्डू को टेस्ट करने के बाद बच्चा यह आशा करे कि अब पूरा लड्डू मिलेगा और फ़िर कोई उससे कहे कि बेटा, अब एक ग्लास पानी पी के सो जा.

चाय पीते पीते चाची और नीलिमा में घर के बारे और इधर उधर की बातें होती रहीं. तब तक मैं टहल कर घर देख रहा था. नीचे ड्राइंग रूम के साथ एक बड़ा किचन और एक बेडरूम था; ऊपर सीढ़ी जाती थी. मैंने सीढ़ी पर से देखा तो वहां तीन दरवाजे थे. थोड़ा ऊपर गया. ऊपर एक छोटा ड्राइंग रूम था और तीन बड़े बड़े बेडरूम थे. एक बड़ी बाल्कनी थी.


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मैं नीचे आया तो नीलिमा और चाची की गप्पें अब भी चल रही थीं. मैं बैठकर अखबार पढ़ने लगा. आधे घंटे बाद नीलिमा उठी और चाय के कप समेटने लगी. "अरे बैठ ना, इतनी क्या जल्दी है तेरे को काम करने की? आज छुट्टी है ना?" चाची ने उसे कहा.

"कहां ममी! ऑफ़िस में ज्यादा काम है, इसलिये अब मुझे कई बार पूरे दिन के लिये जाना पड़ता है. आने में सात बज जायेंगे, इसलिये मैं खाना बनाकर जाऊंगी. विनय को भूख लगी हो तो परोस भी दूंगी उसे"

"खाना बनाने वो विमलाबाई आती हैं ना?" चाची ने पूछा.

"कल उनकी तबियत ठीक नहीं थी. अब शायद एक दो दिन ना आयें. पर आप चिंता मत करो ममीजी. मुझे कोई परेशानी नहीं है. विनय, तू अपना सामान रख ले बेडरूम में, तब तक मैं ब्रेकफ़ास्ट बनाती हूं. फ़िर रिलैक्स करना"

मैं नीचे वाले बेडरूम में सामान ले जाने लगा तो स्नेहल चाची बोलीं "अरे यहां नहीं. वैसे यह बेडरूम भी ठीक है पर रोज साफ़ सफ़ाई नहीं होती उसकी. ऊपर वाला ज्यादा अच्छा है. वहां सामान रख दे"

मेरे साथ वे ऊपर आयीं. बीच का दरवाजा खोला और मुझे बेडरूम दिखाया. अच्छा बड़ा और कंफ़र्टेबल था. "देखो, नीलिमा ने थोड़ी साफ़ सफ़ाई भी कर के रखी है इसकी. मैंने आने के पहले फोन किया था कि जरा ऊपर के सब बेडरूम थोड़े ठीक करके रखे."

मैंने वहां सामान रखा. बाहर बाल्कनी थी. बाजू में एक और दरवाजा था. शायद दूसरे बेडरूम में खुलता था पर अभी बंद था, परदा भी लगा हुआ था. चाची बोलीं "वहां हमारा बेडरूम है. इस वाले से लगा हुआ. ये पुराना बंगला है ना, हर कमरे से हर कमरे में जाने को दरवाजे बनाते थे तब. अब ये बंद करके रखा है"

"और नीलिमा भाभी का वो तीसरा बेडरूम होगा चाची" मैंने ऐसे ही बात चलाने को कहा. क्योंकि अब भी उनसे क्या बातें करूं, मुझे समझ में नहीं आ रहा था. कल के बाद अब उनकी ओर नजर जमाकर देखने में भी मुझे संकोच हो रहा था.

"अरे नहीं, ये जो मैंने कहा ना कि हमारा बेडरूम है, तेरे बेडरूम से लगा हुआ, वो याने हम दोनों का है, मेरा और नीलिमा का. वो क्या है कि अब घर में हम दोनों ही हैं. वैसे ही हम दोनों अकेली हैं इतने बड़े घर में. अब इतने कमरे कौन रोज साफ़ करे और जमाकर रखे. ये झंझट कम करने के लिये हम दोनों अब एक ही बेडरूम में आ गयी हैं" कहकर उन्होंने मेरी ओर देखा. न जाने क्यों मुझे लगा कि मेरी ओर देखकर वे मन ही मन मुस्करा रही हैं.

मेरा दिल और बैठ गया. ये लो - याने चाची का अलग बेडरूम भी नहीं है. अब? फ़िर सोचा कि ऐसी बातों में दिमाग खराब करने का कोई फायदा नहीं है.

नीचे से नीलिमा भाभी ने आवाज लगायी तो हम नीचे गये. उन्होंने उपमा बनाया था. नाश्ता करके चाची बोलीं "अब तुम नहा लो विनय. चाहो तो एकाध झपकी ले लो. मैं भी जरा अनपैक करती हूं"

मैं नहाया और फ़िर अपने कपड़े निकाल कर अलमारी में रखे. थोड़ी देर एक झपकी लेने की कोशिश की पर अब भी मन में बहुत एक्साइटमेंट था इसलिये नींद नहीं आ रही थी जबकि बस में मेरी ठीक से नींद नहीं हुई थी. फ़िर एक नॉवल पढ़ने की कोशिश की, चाची अपने कमरे में चली गयी थीं, नीचे नीलिमा भाभी अकेली थीं. मैं भी नीचे चला गया. नीलिमा सब्जी काट रही थी. मुझे बोली "बस अब ममी का हो जाये तो मैं भी नहा लेती हूं, फिर खाना बना कर रखती हूं. तुम बोर तो नहीं हो रहे विनय?"

मैंने नहीं कहा, नीलिमा से थोड़ी फ़ॉर्मल बातें कीं, फ़िर उससे कहा कि मैं जरा घूम कर आता हूं. नीलिमा बोली कि पास ही बहुत अच्छा पब्लिक गार्डन है और वहां से खाड़ी और पणजी का व्यू भी बहुत अच्छा है. मैं बाहर निकल गया.

जब वापस आया तो करीब बारा बज गये थे. नीलिमा मुझे बाहर ही गेट पर मिली. वह ऑफ़िस जा रही थी. सलवार कमीज़ का ड्रेस पहनी थी. अच्छी लग रही थी, वैसे उस ड्रेस में उसके चौड़े कूल्हे एकदम से उभर कर दिख रहे थे. जिनको बहुत स्लिम फ़िगर अच्छे लगते हैं उन्हें शायद वह शेपलेस लगती पर मुझे उसका फ़िगर अच्छा खासा आकर्षक लगा.

नीलिमा बोली "चलो टाइम पर आ गये विनय. ममी सो रही थीं, अभी जागी हैं. नहा धो कर तुम्हारा खाने पर इंतजार कर रही हैं, उनको भी बाहर जाना है"

बाई करके नीलिमा निकल गयी. एक मिनिट मैं उसको पीछे से देखता रहा, उसका चलने का अंदाज अच्छा खासा मादक था, याने कम से कम मेरे लिये. रिलेटिवली पतली कमर और चौड़े कूल्हे होने से उसके नितंब बड़े मतवाले तरीके से डोलते थे. उसने थोड़ी सी हाई हील वाला सैंडल पहना था, उसमें उसकी चाल और आकर्षक लग रही थी.


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मैंने फ़िर अपने मन को लगाम दी और घर में दाखिल हुआ. चाची तैयार होकर बैठी थीं, मेरी राह ही देख रही थीं. "चल विनय, खाना खा ले, फ़िर मुझे भी बाहर जाना है"

सो कर वे एकदम फ़्रेश दिख रही थीं. नहा कर उन्होंने एक प्रिन्ट वाली साड़ी और स्लीवलेस ब्लाउज़ पहना था. उनकी मोटी मोटी पर एकदम गोरी चिकनी बाहें उनके बाकी के गुदाज मांसल भरे भरे बदन से एकदम मेल खा रही थीं. पहली बार मैं उन्हें स्लीवलेस ब्लाउज़ में देख रहा था. शायद गोआ में वे जरा ज्यादा मॉडर्न अंदाज में रहती थीं. इस प्रिन्टेड साड़ी के साथ के ब्लाउज़ का कपड़ा जरा महीन था और उसमें से उनकी ब्रा के स्ट्रैप और कपों के आकार का अंदाज आसानी से हो रहा था. ब्रा अच्छी खासी टाइट थी, उसमें कस के बंधे उनके स्तन और उभर आये थे और आंचल में से भी उनका उभार समझ में आता था. ब्लाउज़ की पीठ भी अच्छी लो कट थी और उनकी गोरी मांसल सपाट पीठ का काफ़ी भाग उसमें से दिखता था. ब्लाउज़ और साड़ी के बीच में उनकी कमर और पेट का मुलायम मांसल भाग दिख रहा था.

आज एक खास बात जो मुझे उत्तेजित कर गयी, वह थी उन्होंने पहनी हुई ब्रा के कपों का कोनिकल आकार और उनके कारण आंचल में से माउंट फ़ूजी जैसे दो पर्वतों का उभार! ब्रा के कप बहुत प्रकार के होते हैं पर ऐसे कोनिकल कप देखते ही मुझे कैसा तो भी होता है, लगता है आइसक्रीम के दो बड़े कोन हैं जिनमें खचाखच मीठा माल भरा है.

एक असीम आनंद मेरी नस नस में भर गया. क्यों मैं इतने दिन यही समझता रहा कि स्नेहल चाची बस एक साधारण प्रौढ़े महिला हैं. असल में इतना मादक रूप है उनका. अभी इतनी सेक्सी लगती हैं तो जवानी में कैसी लगती होंगीं! ये ऐसा था जैसे किसी पास के हलवाई के यहां इतने साल सादे लड्डू देखे जिसे कभी खाने की इच्छा नहीं हुई और जब एक चखा तो स्वर्गिक स्वाद निकला उसका.

नजर छुपा कर उनको घूरने के मेरे कृत्य पर उनका ध्यान गया कि नहीं यह मुझे नहीं समझ में आया पर वे खाना परोसते हुए बोलीं. "मुझे अब थोड़ा बाहर जाना है विनय. एक फ़ंक्शन है मेरी एक सहेली के यहां. वहां लंच भी है. मैंने उसे कहा था कि मैं गोआ में नहीं हूं. पर अब अगर उसे पता चला कि मैं जल्दी वापस आ गयी हूं और फ़िर भी नहीं आयी तो बुरा मान जायेगी. मैं दो तीन घंटे में आ जाऊंगी. तू खाना खाकर आराम कर ले, जरा सो ले, बस में कभी ठीक से नींद नहीं होती और तेरी तो शायद बिलकुल नहीं हुई है" यह कहकर उन्होंने मेरे चेहरे पर निगाहें गड़ा दीं. मुझे ऐसे ही लगा कि उनकी बात में एक छुपा हुआ उपहास सा है पर फ़िर वे किचन में चली गयीं.

मुझे जरा निराशा हुई कि वे बाहर जा रही हैं. पहले एक सुखद आशा निर्माण हो गयी थी कि अब नीलिमा भाभी भी नहीं हैं तो घर में अकेले होने के कारण शायद चाची कल की बात कुछ आगे बढ़ायें. आज वे जितनी आकर्षक लग रही थीं, मुझे बार बार लगता था कि जाकर उन्हें चिपट जाऊं और कस के चूम लूं. अब वे उसको बुरा नहीं मानेंगी वो तो निश्चित था. पर फ़िर सुबह उनकी दी हुई चेतावनी कि बस मैं जो कहूं वही करना, मन से कुछ नहीं करना - याद आयी और मैंने अपने मन को मना लिया और खाने बैठ गया.

मैं खाना खा रहा था तब तक चाची वहीं ड्राइंग रूम में कुछ चीजें जमा रही थीं. टी वी यूनिट के ऊपर के शेल्फ़ पर रखे एक गुलदस्ते को वो निकाल रही थीं तब मुझे उनकी कांख दिखी. एकदम शेव की हुई साफ़ चिकनी कांख थी. मेरे मन में आया कि वाह, लगता है चाची रेगुलरली शेव करती हैं. सिर्फ़ कांखों में करती हैं या और कहीं भी. फ़िर मेरे पापी बदमाश मन में आया कि उस शेव की हुई कांख को किस करके कैसा लगेगा, उसपर जीभ चलाकर स्वाद कैसा लगेगा! मैंने तुरंत मन ही मन में अपने आप को एक कस के जूता मारा कि रुक जा साले हरामी, ऐसा करता रहेगा तो तेरी सूरत पर से कोई भी समझ जायेगा कि कैसा गंदा दिमाग पाया है तूने!

बाकी चाची ने मुझसे ज्यादा बातचीत नहीं की. मैं बस यही सोच रहा था कि अब आगे क्या होगा. अपनी प्लेट सिन्क में रखकर मैं हाथ मुंह धोकर आया तो चाची टेबल साफ़ कर रही थीं. मैंने वहीं रखी एक मेगेज़ीन उठा ली. दो मिनिट में चाची ने अपनी पर्स उठाई और चप्पल पहनकर बोलीं "अब जा और जरा आराम कर ले विनय. नीलिमा शाम को छह बजे के पहले नहीं आयेगी. मैं आ जाऊंगी दो तीन बजे तक पर मेरे पास लैच की है, दरवाजा मैं खोल लूंगी, तेरी नींद नहीं डिस्टर्ब होगी. और सुन ... " मेरी ओर देखते हुए वे थोड़ी कड़ाई से बोलीं जैसे किसी छोटे बच्चे को कह रही हों " ... अब ऊपर जाकर सीधे सो जाना, ठीक है?"

मैंने हां कहा, चाची निकल गयीं. मैं सोचने लगा कि आज अभी अकेले में भी चाची ने मुझे कल के बारे में या पूना में उनकी ओर ऐसी नजर से देखने के बारे में कुछ नहीं कहा था, कल तो मेरी मुठ्ठ मारने के बाद सोते समय उन्होंने मुझे कहा था कि वहां गोआ में और आगे सजा दूंगी, तो सजा तो दूर, डांटा भी नहीं था अकेले में. मैंने ऊपर आकर कुरता पाजामा पहना और बिस्तर पर लेट गया. पर आंखों के आगे बार बार चाची ही आ रही थीं. अभी देखे उनके उभरे स्तन, उनकी शेव की हुई कांखें और कल रात जो उन्होंने मेरे लंड को एकदम नंदनवन की सैर करा दी थी वह किस्सा, ये सब बार बार याद आ रहा था. कस के लंड खड़ा हो गया. मूड हो रहा था कि चाची को अपनी फ़ेंटसी में ही भोगते हुए एक मस्त मुठ्ठ मार दी जाये पर फ़िर थोड़ा गिल्टी भी लगने लगा.चाची ने आज्ञा दी थी कि कुछ नहीं करना, बस मैं कहूं वही करना. उनके आदेश की अवहेलना करना अब मेरे लिये असंभव था.

लंड में होती मस्ती को कम करने को और टाइम पास करने को मैं कमरे में इधर उधर घूमने लगा. बाल्कनी में गया, बाहर बगीचे को देखा. लंड थोड़ा शांत होने पर अंदर आया. मेरे और चाची के कमरे के बीच जो दरवाजा था, वो देखा. खोलने की कोशिश की पर शायद उस तरफ़ से सिटकनी लगी थी. परदा भी था.

अब मुझे थोड़ी थकान लग रही थी. इस बार जब बिस्तर पर लेटा तो समझ में भी नहीं आया कि कब आंख लग गयी. मेरी नींद खुली तो देखा साढ़े तीन बजे थे. नींद में शायद कुछ मीठा मीठा सपना देखा होगा क्योंकि लंड एकदम तन्नाया हुआ था. बाजू के कमरे से थोड़ी आवाज आयी तो मैं समझ गया कि शायद चाची वापस आ गयी हैं, उन्हीं के दरवाजा खोलने की आवाज से शायद मेरी नींद खुली होगी.

मैं इंतजार करने लगा कि देखें चाची क्या करती हैं. अपने तने लंड को मैंने पजामे के ऊपर से ही थोड़ा दबाया कि बैठ जाये पर ये कुत्ते की दुम सीधा करने की कोशिश के समान था. इतनी देर में बाजू के कमरे से चाची की आवाज आयी. शायद चाची ने बीच के दरवाजे के पास आकर मुझे बुलाया होगा "अरे विनय, जाग गया कि सो रहा है?"

मैं उठ कर बैठ गया. "स्नेहल चाची, जगा हूं, बहुत अच्छी नींद लगी थी, अब फ़्रेश लग रहा है"

"फ़िर एक मिनिट जरा इधर आ बेटे मेरे कमरे में" चाची ने कहा, उनकी आवाज में फ़िर वही लहजा था जैसा किसी छोटे बच्चे को प्यार से ऑर्डर देते वक्त बड़े बूढ़ों का होता है. अब मैं जरा सकते में आ गया. पायजामे में ये बड़ा तंबू बना था, वो लेकर कैसे उनके सामने जाऊं! माना कि कल जो हुआ उसके बाद इस लिहाज का शायद कोई मतलब ना हो पर यहां आने के बाद तो अब तक चाची ने मुझे कोई भी ऐसा वैसा संकेत नहीं दिया था. और अगर वे अकेली ना हों, कोई उनके साथ आया हो? खड़ा होकर मैं लंड को बैठाने की कोशिश करने लगा.

दो मिनिट में चाची ने फ़िर बीच के दरवाजे पर दस्तक देकर आवाज लगाई "अरे विनय, क्या कर रहा है? चल जल्दी आ" इस बार उनकी आवाज में झुंझलाहट और एक कड़ा आदेश सा था जिसे ठुकराने का साहस मुझमें नहीं था. मैंने कुरता थोड़ा ठीक किया कि मेरे तंबू को वो झांक ले और धड़कते दिल से स्नेहल चाची के कमरे का दरवाजा खोला. जो देखा उससे मेरे पांव वहीं ठिठक से गये.


RE: Hindi Chudai Kahani मैं और मेरी स्नेहल चाची - sexstories - 06-21-2018

मुझे वहीं दरवाजे में खड़ा देखकर चाची बोलीं. "वहां खड़ा मत रह ऐसे. चल अंदर आ और दरवाजा लगा ले"

वे अर्धनग्न अवस्था में आइने के सामने खड़ी थीं. बदन में सिर्फ़ ब्रा और पेटीकोट थे. ब्लाउज़ और साड़ी नीचे फ़र्श पर पड़े थी. मैंने बराबर गेस किया था, आज सादी कॉटन की सफ़ेद ब्रा नहीं थी, जो इस उमर की औरतें अधिकतर पहनती हैं. क्रीम कलर की लेसदार ब्रा थी, पतले स्ट्रैप वाली, और उनके गोरे मुलायम बदन पर एकदम फब रही थी. ब्रा के कोनिकल कप गर्व से एकदम तने हुए थे. उनका वह रूप मुझपर क्या बिजली गिरा गया मैं बता भी नहीं सकता. पहली बार कोई महिला मेरे सामने अर्धनग्न अवस्था में थी; अब तक जब जब मैंने इसके बारे में फ़ेंटसी की थी, यही की थी कि तब मेरे साथ कोई सुंदर जवान युवती होगी. पर अब पचास के आस पास की उमर की, नाटे कद और खाये पिये बदन की, बालों में कुछ सफ़ेद लटें लिये हुए, और रिश्ते में मेरी चाची - स्नेहल चाची मुझे किसी भी युवती से ज्यादा मादक लग रही थीं. उनका वह मुलायम पके अमरूद जैसा बदन और मन में अब भी मुझे उन्होंने कल दिये सुख का आभास, इसने मुझपर जादू सा कर दिया था. इसलिये मैं बस बुत बना टुकुर टुकुर देख रहा था.

चाची शायद मेरे चेहरे पर के हाव भाव से समझ गयी होंगी कि मुझ पर क्या बीत रही है क्योंकि क्षण भर को उनके होंठों पर एक ममता भरी मुस्कान आ गयी, पर फ़िर तुरंत चेहरे पर गंभीरता लाते हुए उन्होंने मेरे तंबू पर नजर दौडाई, जो अब कम होने के बजाय और बड़ा हो गया था. वे कठोर स्वर में बोलीं "इधर आ"

मैं उनके पास गया. कुरते के ऊपर से उन्होंने मेरा लंड पकड़ा और हिला कर बोलीं "अब भी तू बाज नहीं आया ना अपनी हरकतों से? क्या सोच रहा था? बोल?"

मैं चुप रहा. वे फ़िर बोलीं "कोई गंदी किताब देख रहा था? तेरे सामान की तलाशी लेना पड़ेगी"

अब मुझे कुछ कहना जरूरी था, आखिर मुझे लंड खड़ा करने के लिये गंदी किताबों का सहारा लेना पड़े ये मेरी तौहीन थी "नहीं चाची, सच में, आप देख लीजिये अभी मेरे कमरे में चल कर"

"फ़िर मन ही मन किसके बारे में सोच रहा था? ये ..." मेरे लंड को और जोर से पकड़कर वे बोलीं. "... ऐसा कैसे हो गया? दिन रात ऐसा ही रहता है क्या?"

मैं कहना चाहता था कि हां चाची, जब से आपके मम्मे देखे हैं, ऐसा ही रहता है. उधर चाची ने देखा कि मैं कुछ नहीं बोल रहा हूं तो मेरे गाल पर चूंटी काटी. गाल को सहलाते हुए मैं बोला "चाची प्लीज़ ... आप इतनी सुंदर ... मस्त ... लग रही हैं इसलिये अब ... मैं जानबूझकर नहीं करता ... हो जाता है"

"तेरा मतलब है कि मुझे ऐसे ब्रा में देखकर तेरा यह हाल हुआ है? ब्रा में कभी किसी को देखा नहीं? बचपन में तो देखा होगा ना? अपनी इतनी बड़ी चाची को बस एक ब्रा में देख लिया और ऐसा सांड जैसा हो गया?"

"हां चाची" मैं बोला. चाची ने जिस तरह से मेरा लंड पकड़ा था, वह लगातार और तन्ना रहा था.

"झूठ मत बोल, ये तो तूने मुझे अभी देखा है मेरे कमरे में आने के बाद. पर तू ऐसा ही आया था तंबू तान कर. वो तो कपड़े बदलते बदलते मुझे खयाल आया कि अभी तक तुझे ठीक से डांटा भी नहीं इसलिये जरा नसीहत देने बुला लिया" अब मैं चुप हो गया. कुछ भी कहूं चाची को देना है वो सजा वे देंगी हीं.

"बोल क्या सोच रहा था?"

"आप ही के बारे में सोच रहा था चाची. मन पर कंट्रोल नहीं होता"

"तो अब क्या सजा दूं तेरे को? बोल? ऐसे घर की बड़ी औरतों के बारे में गंदा सोचते हैं? बोल?" वे बोलीं.

मैं चुप रहा. कैसे कहता कि नहीं सोचते! मेरे तो मन में था कि कह दूं कि हां चाची, सोचते हैं, सोचना चाहिये हर जवान लड़के को, जो सोचते हैं उन्हें बहुत मजा आता है, मेरे को देखिये कितना मजा आया आपके नाम से हफ़्ते भर मुठ्ठ मारकर. और कल आपने जो सुख दिया मेरे को बस में, वैसा कभी मेरे नसीब में था अगर मैं आपके बारे में गंदा ना सोचता? कमाल की मस्ती का अनुभव करा दिया आपने चाची !!!

चाची बोलीं "ऐसे तू नहीं मानने वाला. चल कपड़े निकाल, तुझे ठीक से सबक सिखाना पड़ेगा."

मैंने कपड़े निकाले. बस ब्रीफ़ बच गयी, वह भी लंड के खड़े होने से सामने ये तनी हुई थी.

"पूरे कपड़े, सब निकाल. जल्दी" चाची मेरा कान पकड़कर बोलीं.

मैंने ब्रीफ़ निकाली. चाची ने उसे मुठ्ठी में ले लिया. "चल, जरा देखें ये इतनी बदमाशी पर क्यों उतर आया है. अभी अभी उमर में आये लड़कों का तो मैं समझ सकती हूं, उनको समझ भी नहीं होती ज्यादा पर तू तो बाईस का हो गया है ना? अब नौकरी करने वाला है. और इस मुस्टंडे को देखो, कैसा थरथरा रहा है"

फ़िर नीचे मेरे लंड की ओर देखा और बोलीं "अच्छा खासा है, बहुत प्यारा है. काफ़ी दम लगता है. कैसा एकदम तैयार खड़ा है बदमाश. लगता है कम से कम तूने मेरी वो बात तो मानी है कि कोई शैतानी ना करना, सो जाना. कुछ कर बैठता तो ये ऐसा नहीं थरथराता होता. अब आ और इधर बैठ. तेरा यह ..." मेरे लंड को पकड़कर वे बोलीं " ... देख मेरी ओर कैसे तन कर देख रहा है. अब मुझे थोड़ा अच्छा लगा इसका यह मतलब नहीं है कि सजा से तू बच जायेगा"

मेरे दिल को थोड़ी तसल्ली हुई. चाची मुझे रैग कर रही थीं, बस. आखिर डांट डपट का कुछ तो शिष्टाचार निभाना था ना! पर मन ही मन मुझे यकीन हो गया कि चाची को भी मेरी जवानी भा गयी है और अब आगे मेरी चांदी ही है. पर मैं चुप रहा, जो शिष्टाचार चल रहा था, वह पूरा तो करना ही था.

लंड से पकड़कर वे मुझे वहां रखे एक टेबल पर ले गयीं. टेबल पर की किताबें उठायीं और मुझे कहा "चल बैठ इसपर. और चुपचाप बैठा रह"

मैं टेबल पर बैठ गया. चाची ने एक कुरसी खींची और मेरे सामने बैठ गयीं. उनका सिर अब मेरी गोद से थोड़ा सा ही ऊपर था. मुझे वे कुछ नहीं बोलीं, बस लंड को पास से देखने लगीं. फ़िर उठ कर चश्मा लेकर आयीं और चश्मा लगाकर देखने लगीं. देखते देखते वे लंड को इधर उधर करके हल्के हल्के दबाती भी जा रही थीं. "इसे कह कि जरा सबर रखे. समझा? नहीं तो कहना कि चाची नाराज हो जायेगी. ऐसा हरदम सांड जैसा घूमना अच्छे घर के लड़कों को शोभा देता है क्या? जब तक तू यहां है विनय, तुझे खुद पर पूरा कंट्रोल रखना होगा, मैं जब तक ना कहूं तब तक अपने आप को रोकना होगा. ठीक है? ये सब तेरी सजा का हिस्सा है" उनकी आवाज में प्यार और वासना के साथ साथ एक कठोर आदेश भी था.

मैंने मुंडी हिलाई. चाची बोलीं "वैसे अच्छा रसीला है, एकदम ज्यूसी" और झुक कर मेरे सुपाड़े को चूमा और उसे जीभ से चखने लगीं. उनकी जीभ पूरे सुपाड़े पर घूम रही थी, कभी ऊपर के सूजे टोप पर, कभी नीचे की मांसल भाग पर और कभी टिप पर. मेरे शरीर में होते कंपन को तो उन्होंने ऐसे नजरंदाज कर दिया था जैसे उसका कोई मतलब ही ना हो. थोड़ी देर इस तरह से मुझे मीठी मार से तड़पा तड़पा कर उन्होंने पूरा सुपाड़ा मुंह में लिया और मन लगा कर चूसने लगीं.

वे पांच मिनिट मैंने कैसे निकाले, वो मैं ही जानता हूं. पर आखिर में मेरी सहनशक्ति जवाब देने लगी. स्नेहल चाची ने न जाने कैसे जान लिया कि अब और चूसा तो रस निकल आयेगा. मुझे लगा था कि वे चूस कर ही मानेंगी पर शायद उनके दिमाग में और ही कुछ था.

मेरा लंड मुंह से निकाल कर वे उठ बैठीं. फ़िर खड़ी हो गयीं. मेरे सिर को उन्होंने अपने हाथों में लिया और मेरे गाल, आंखें, माथा चूमने लगीं. बोलीं "बहुत स्वीट है तू विनय. फ़िर ऐसा बदमाश कैसे हो गया? खैर चल उठ, अभी इस स्वीट डिश को चखने का टाइम नहीं है मेरे पास." फ़िर मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिये और मेरा चुंबन ले लिया.

पहली बार मैंने आखिर उनके बिना कुछ कहे अपने मन से कुछ किया. याने उनके चुंबन का जवाब दिया और फ़िर उनके मोटे मांसल होंठों को चूसने लगा. उन्होंने मुझे अपना मुखरस चूसने दिया और साथ ही धीरे से मुझे पकड़कर मुझे टेबल से नीचे उतरने का इशारा किया.


RE: Hindi Chudai Kahani मैं और मेरी स्नेहल चाची - sexstories - 06-21-2018

मैं नीचे उतरा तो उन्होंने मुझे बाहों में भींच लिया. ब्रा में कसे उनके मम्मे मेरे सीने पर बंपर जैसे दब गये. "लगता है काफ़ी अकल है तुझमें विनय. अब तक जैसा मैं चाहती हूं वैसा ही बिहेव कर रहा है तू. वैसे इतना भी मत घबरा. सजा मिलेगी तो मिलेगी, काम ही ऐसा किया है तूने पर मुझसे घबराने की कोई बात नहीं है. जो कुछ करूंगी वो तेरे भले के लिये ही करूंगी, आखिर तू बहक कर बिगड़ ना जाये, ये जिम्मेदारी तो मेरी ही है ना जब तक तू गोआ में है! अब जरा यह बता कि ऐसा हुआ ही कैसे? अब तक तो मुझे यह भी ठीक से नहीं पता कि आखिर क्यों तेरा मन मुझपर आ गया? क्या सच में मैं अच्छी लगी तेरे को? बोल, मैं नहीं डांटूंगी"

"हां चाची" मुझे उनकी इस बात से थोड़ा हौसला मिला. "अचानक उस दिन जब आप झुकी थीं और आपके ... याने ये - ब्रेस्ट - दिख गये थे मेरे को ... तब से पागल सा हो गया हूं आपके लिये" मैंने थोड़ा हिचकते हुए उनके कंधे को चूमा और फ़िर जब वे कुछ नहीं बोलीं तो उनके स्तन को ब्रा कप के ऊपर से ही हथेली में भर लिया. चाची मुड़ीं और ड्रेसिंग टेबल के आइने के सामने खड़ी हो गयीं. मैं उनके पीछे खड़ा होकर आइने में उनकी छाती देखने लगा. क्या लग रही थीं चाची उस ब्रा में! उन कोनिकल कपों में कसे होने से उनके उरोज और तन कर उभरे हुए थे. मैं धीरे धीरे दबाने लगा, पहले थोड़ा डर कर कि वे डांटें ना, फ़िर थोड़ा और जोर से. मेरा लंड तन कर उनके पेटीकोट के ऊपर कमर पर दबा हुआ था.

उन्होंने अपने पेटीकोट का नाड़ा खोला और वो नीचे गिर गया. अब स्नेहल चाची सिर्फ़ ब्रा और पैंटी में थीं. मुझे उनकी टांगों की साइज़ का अंदाज तो हो ही गया था पर अब वे मोटी ताजी भरी हुई और सही मायने में केले के पेड़ के तने जैसी चिकनी जांघें, जिन्हें संस्कृत के कवियों ने कदली स्तंभ कहा है, मेरी आंखों के सामने थीं. पिंडली पर थोड़े से काले रेशमी बाल थे, छोटे रुएं जैसे. चाची की पैंटी ने उनकी योनि को ढका हुआ था पर उनकी फ़ूली फ़ूली योनि पैंटी की क्रॉच में से ऐसी लग रही थी जैसे अंदर कोई मुलायम पाव रोटी रखी हो. मेरी तरफ़ उनकी पीठ थी और इसलिये मैंने जब थोड़ा पीछे हटकर उनको देखा तो उनके विशाल नितंब मुझे दिखे जो आधे से ज्यादा पैंटी में छुपे थे पर फ़िर भी उनकी गोलाई के कारण निचला कुछ भाग पैंटी के बाहर आ गया था.

मुझे उनका यह अर्धनग्न रूप देख कर जो उत्तेजना हुई, उसका आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते. चाची ने अपने नीचे गिरे कपड़ों की ओर देखा और फ़िर मेरी आंखों में आंखें डालीं. मैंने चुपचाप उनकी साड़ी ब्लाउज़ और पेटीकोट उठाया और ठीक से फ़ोल्ड करके बाजू में रख दिये. उनकी हर तरह की सेवा मुझे करनी होगी, इसका अंदाजा मुझे हो गया था. चाची प्यार से मुस्करा दीं, उन्हें अपना गुलाम मिल गया था.

चाची अपने हाथ पीछे करके अपनी ब्रा के बकल टटोलने लगीं. "विनय बेटे, जरा ये ब्रा के हुक खोल दे. इतनी टाइट है कि न तो मैं खुद उसे पहन सकती हूं ना निकाल सकती हूं. बकल पर हाथ तो पहुंचते हैं, पर फ़िर भी वे खुलते नहीं. अब नीलिमा लगा कर तो गयी, ये भूल गयी कि निकालेगा कौन. मैं तो ये ब्रा पहनती भी नहीं कभी इसी कारण से. पर नीलिमा ने ही आज जिद की कि ममी यही वाली ब्रा पहनना, इस ब्लाउज़ के साथ अच्छी लगती है"

नीलिमा भाभी ने स्नेहलता चाची के - बहू ने अपनी सास की ब्रा के - हुक लगा दिये थे यह बात सुनकर मेरे लंड ने एक किलकारी सी मारी. मेरी नजर आइने में ब्रा में कसे उन मांसल गोलों की ओर लगी थी. "लगता है ब्रा बहुत अच्छी लगी विनय तेरे को जो तब से घूर रहा है"

मैंने हिम्मत करके कहा "हां चाची ... ब्रा बहुत ... सेक्सी है और उसके अंदर जो है वह तो और भी ... आप पर तो बहुत ज्यादा सेक्सी लग रही है"

"अच्छा ये बात है? थोड़ा बहुत बोलना भी आता है तेरे को. इतना सीधा नहीं है जैसा दिखता है. चल अब हुक खोल जल्दी, ये टाइट ब्रा ज्यादा देर नहीं पहनी जाती मेरे से बेटे, चुभने लगती है बदन में"

मैंने हुक खोला और कहा "पर आप बहुत अच्छी लगती हैं चाची ऐसे ब्रा और पैंटी में."

"अच्छा! चलो कोई बात नहीं, अभी तो निकाले देती हूं, अगर मेरे मन मुताबिक ठीक से रहा यहां तो बाद में तेरे को और भी ब्रा पहन कर दिखा दूंगी ठीक है ना - पर अच्छे आज्ञाकारी लड़के जैसा रहना पड़ेगा मेरे यहां. नहीं रहा तो ...." कहते हुए चाची अपने बाल ठीक करते हुए थोड़ी पीछे हुईं और मुझसे टकरा गयीं. उनका बदन मेरे बदन से सट गयीं और मेरा लंड उनकी पीठ पर दब गया.

मैंने हुक निकाले, हुक निकालते ही ब्रा ढीली हो गयी और उसकी गिरफ़्त से छूटते ही वे मांसल स्तन लटकने लगे. अच्छे बड़े थे चाची के स्तन, इतने बड़े नहीं कि उन इन्टरनेट वाली औरतों जैसे नकली लगें पर छोटे भरे पपीतों जैसे तो थे. मेरे लिये उन लटकते झूलते पपीतों का सौंदर्य किसी युवती के तने जवान उरोजों से भी ज्यादा था. उत्तेजना में मैंने उन स्तनों को पकड़ा और दबाने लगा जैसे रस निकाल रहा होऊं. उनके नंगे मांसल कंधों को मैं पटापट चूमते हुए उनकी चूंचियां मसलता रहा. मैं वैसे बहुत जोर से नहीं दबा रहा था, जबकि मन तो हो रहा था कि उनको मसल कुचल डालूं. चाची के मुंह से एक लंबी सांस और सिसकारी सी निकली और अचानक मुझे लगा कि कहीं मस्ती में मैंने ज्यादा जोर से तो नहीं उनका स्तनमर्दन कर दिया.

पर स्नेहल चाची कुछ नहीं बोलीं, मेरे हाथ अपने स्तनों पर से हटा कर वे मेरी ओर मुड़ीं. आंखों के आगे वे लटकते गोरे स्तन देखकर मुझे नहीं रहा गया, मैं झुक कर पटापट उनको चूमने लगा. उनके निपल एकदम भूरे थे, किसमिस के रंग के और मनुक्कों जैसे बड़े बड़े थे. उनके आजू बाजू जो भूरे रंग के गोले - ऐरोला - थे वो भी अच्छे खासे व्यास के थे, मारी बिस्किटों जैसे. इन्टरेनेट पर ऐसे स्तन मैंने देखे थे पर स्नेहल चाची के ऐसे होंगे ऐसा कभी मन में नहीं आया था. मैंने एक निपल मुंह में लिया और चूसने लगा. मेरा लंड अब उनके पेट पर रगड़ रहा था.

चाची बड़े स्नेह से मुझे बाहों में लिये रहीं. मैं बारी बारी से उनके दोनों निपल चूसे जा रहा था. मेरे बालों में हाथ चलाते उन्होंने दो तीन मिनिट मेरे मन जैसा करने दिया, फिर मेरा सिर अलग किया और मुड़ कर फ़िर से मेरी ओर पीठ करके खड़ी हो गयीं. फ़िर मेरे हाथ पकड़कर उन्होंने खुद ही अपने स्तनों पर रखे और दबा दिये. उनकी इच्छा एकदम साफ़ थी. अपनी चूंचियां उनको दबवानी मसलवानी थीं. अपने मैदे के गोलों को गुंधवाना था. मैं उन मुलायम गोलों को मसलता हुआ उनके कंधों को चूमता उनसे चिपक गया. चाची ने तृप्ति की सांस छोड़ी और फ़िर अपनी गर्दन घुमा कर मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिये. फ़िर मेरी आंखों में देखते हुए मेरे होंठ चूसने लगीं. क्या भावनायें उमड़ आयी थीं उनकी काली काली आंखों में. अथाह वासना, अपने बेटे से छोटे एक लड़के के प्रति लगने वाली ममता और कामना, एक तरह का एरोगेंस - अहंकार, ऐसी भावना जैसे यह सब करके असल में वे मुझपर बड़ा उपकार कर रही हों (वैसे यह सच ही था! उनका यह उपकार ही था!) - एकदम एग्ज़ोटिक मिश्रण था. उनका चुंबन गहरा था, बहुत देर चला, फ़िर जल्दी ही चाची की मचलती जीभ ने मेरे होंठ अलग किये और मेरे मुंह में घुस गयी. मैं उस मीठी चमचम को चूसने में लग गया.

मेरा लंड अब उनकी पैंटी के ऊपर से ही उनके नितंबों के बीच की गहरी लकीर की लंबाई में सट कर समा गया था. मैं धीरे धीरे उसमें अपने लंड को दबा कर मजा ले रहा था. चाची ने मुड़ कर मुझे बाहों में ले लिया "धीरे धीरे बेटे, ऐसे उतावले ना हो, मैं कहीं भागी जा रही हूं क्या, अभी बहुत समय है हमारे पास. मैंने कहा था ना कि सबर रखना, पर ... वैसे तू भी जवान है, कितनी राह देखेगा, है ना? चल आ जा"

वे मुझे पकड़कर फ़िर टेबल के पास ले गयीं. वहां की कुर्सी सीधी करके वे उसपर बैठ गयीं. मेरी ओर देखकर थोड़ा मुस्करायीं और फ़िर अपनी पैंटी उतार दी. मैं सांस बंद करके उनकी जांघों के बीच की गोरी चिकनी फूली डबल रोटी देखने लगा. एकदम साफ़ थी, एक भी बाल नहीं था. खाना खाते वक्त उनकी शेव की हुई कांख देखकर मन में जो सवाल आया था, उसका जवाब मुझे मिल गया था.

चाची ने मुझे पास बुलाया " अब दूर से क्या देख रहा है बेटे? जल्दी आ जा और बैठ मेरे सामने" अपनी टांगें फैलाती हुई वे बोलीं.

मैं धीमे से उनके सामने जमीन पर बैठ गया. सामने चाची की मोटी मोटी गोरी जांघें और उनके बीच स्वादिष्ट डबल रोटी. उन्हें शायद इस बात का आभास होगा कि एकदम से कुछ करने की मेरी हिम्मत नहीं होगी इसलिये उन्होंने खुद मेरा सिर पकड़ा और अपनी टांगों के बीच दबा लिया. "ले, यही चाहिये था ना तुझे?"

इंटरनेट पर चूत का क्लोज़-अप बहुत देखा था पर प्रत्यक्ष में पहली बार देख रहा था. फ़ूली बुर की बीच की गहरी लकीर में से बड़ी मादक सुगंध आ रही थी. मैंने चूत की खुशबू के बारे में इतना सोचा था पर ये बिलकुल अलग थी. सेंट जैसी सुगंधित नहीं थी, अलग ही सुगंध थी, बस इतना ही समझ में आता था कि लंड को पसंद है. मैंने चाची की जांघ का चुंबन लिया, मन तो हो रहा था कि उस सफ़ेद मांस में दांत गड़ा दूं. चाची ने मेरा सिर पकड़कर मेरा चेहरा अपनी बुर पर दबा लिया "चल शुरू कर, अब टाइम वेस्ट मत कर"


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मैं चाटने लगा. टेस्ट के बारे में बता नहीं सकता, थोड़ा खारा, कसैला, मसालेदार .... जो भी था जीभ से ज्यादा लंड को पसंद आया. लंड और उछलने लगा जैसे कह रहा हो कि मुझे भी चखाओ. चाटते चाटते जीभ को मुलायम गीले मांस के अलावा बीच बीच में एक मक्के का कड़ा दाना भी महसूस हो रहा था.

मैं एक्सपेक्ट कर रहा था कि शायद स्नेहल चाची मुझे बतायेंगी कि कैसे उनकी चूत से मुखमैथुन करूं, कहां जीभ लगाऊं, कैसे चाटूं, कैसे चुंबन लूं, कैसा करने से उन्हें ज्यादा सुख मिलता है. पर वे बस टांगें पसारे बैठी रहीं. जैसे किसी देवी ने अपने भक्त पर छोड़ दिया हो कि कैसे वह उसकी पूजा करता है. याने हर तरह की पूजा उन्हें मान्य थी, बस थोड़ा सा बीच बीच में ’अं .. अं .. हां ...’ ऐसा करती थीं. कभी अचानक अपने हाथ से मेरा सिर पकड़ लेतीं.

मैंने मन भरके उनकी बुर के रस का भोग लगाया. उस चिपचिपे शहद जैसे स्त्राव को चाट चाट कर साफ़ किया. आखिर में अचानक चाची ने मेरा सिर कस के अपनी जांघों में जकड़ कर मेरा चेहरा अपनी बुर पर दबा लिया और एक मिनिट बस बैठी रहीं, उनका बदन पथरा सा गया. मैं उनकी चूत के भगोष्ठ मुंह में लेकर चूसता रहा, मेरे मुंह में उन भगोष्ठों का कंपन मुझे महसूस हो रहा था. सहसा मेरे मुंह में और चेहरे पर छूटे उनके पानी से मैंने अंदाजा लगाया कि वे स्खलित हो गयी होंगी.

मैं अपना भीगा मुंह और चेहरा लिये बैठा रहा. मन में एक संतोष की भावना थी कि चाची को ऑर्गज़म तो दिला पाया, भले नौसिखिया होऊं. अब मेरा लंड मुझे पागल कर रहा था, ऐसा तन्नाया था कि लग रहा था कि स्नेहल चाची को नीचे पटककर चढ़ जाऊं और सपासप उनकी नरम नरम पाव रोटी चोद मारूं. पर अब भी इस बात का एहसास था कि वे मुझसे उमर में इतनी बड़ी हैं और उनसे मैं इस तरह से नहीं पेश आ सकता था. और बड़ा कारण यह था कि अब मैं सच में उनका भक्त हो गया था, मेरा बस इतना ही कर्तव्य था कि अपनी मालकिन की सेवा करूं, उन्हें अधिकाधिक सुख दूं और उनकी सेवा में जो भी आनंद मिले, उसे ग्रहण करूं.

मुझे लगा था कि वे मुझे पूछेंगी कि कैसा लगा मेरा रस, स्वाद आया? पर उन्होंने कुछ नहीं पूछा. बस हल्के सा गालों में मुस्करायीं, उनको मेरे चेहरे के हावभाव से ही उत्तर मिल गया होगा. मुझे यह भी महसूस हुआ कि चाची का सेल्फ़ कॉन्फ़िडेन्स इतना जबरदस्त है कि उनके मन में भी नहीं आया होगा कि किसी को उनकी बुर का शहद पसंद नहीं आयेगा, उनके अनुसार तो शायद यह उन्होंने मुझपर किया हुआ एहसान था कि वे मुझे अपना अमरित चखने दे रही थीं.

"विनय, चल अब बिस्तर पर आ जा ... आराम से" कहकर वे मुझे बेड पर ले गयीं. उनके कमरे का वह डबल बेड एकदम बड़ा था, पुराने स्टाइल का, आज कल के डबल बेड से डेढ़ गुना बड़ा. मुझे पकड़कर वे करवट पर लेट गयीं और मुझे पास खींच कर आगोश में ले लिया. "क्यों रे नालायक? कुछ दिल भरा? या अब भी देखना है मुझे टुकुर टुकुर जैसा पिछले हफ़्ते भर से देख रहा है?"

"चाची ... वो गलती हो गयी ... आपको ऐसी नजर से नहीं देखना था ... पर वो आपके ... याने स्तन दिख गये तो मन बहुत विचलित हो गया था मेरा ... आप इतनी बड़ी हैं और ... मां भी आपको इतना रिस्पेक्ट करती है ... "

"तो सिर्फ़ मेरे स्तन इतने भा गये तुमको कि अपनी मां जैसी चाची को बुरी नजर से देखने लगे तुम?" उन्होंने मेरी आंखों में देखकर कहा.

"चाची ... उसके बाद आप मुझे ... बहुत सेक्सी लगने लगीं ... आप की हर चीज ... पांव भी ..."

चाची मुस्करा दीं "चलो कोई बात नहीं. और नतीजा तो अच्छा ही हुआ ना ... मेरे को भी तेरे जैसा क्यूट गुड्डा मिल गया खेलने को ... पर मुझे लगता है कि प्यार के साथ साथ इस गुड्डे की जरा पिटाई भी करना पड़ेगी नहीं तो ये बिगड़ जायेगा" फ़िर वे मुझे चूमने लगीं. उनके चुंबन प्यार से ज्यादा वासना के चुंबन थे. मेरे होंठों को वे ऐसे चूस रही थीं जैसे खा जाना चाहती हों. मुझे मजा आ गया. कोई औरत जबरदस्ती मुझपर मनमानी करके मुझे भोग रही है यह मेरी सबसे उत्तेजक फ़ेंटसी है.

उनके मुलायम बड़े बड़े स्तन मेरी छाती पर दब कर स्पंज के गोलों से लग रहे थे, पर उनके निपल कड़े हो गये थे, उनकी चुभन अलग महसूस हो रही थी. मेरा लंड उनके पेट पर दबा हुआ था. मैं कमर हिलाकर धक्के देने लगा कि लंड उनके पेट पर रगड़े तो लंड को बेचारे को भी कुछ मौका मिले मस्ती करने का.

स्नेहल चाची सीधी होकर सो गयीं. मेरे लंड को पकड़कर बोलीं "लगता है इस बेचारे को अब और तरसाया तो यह घुटने टेक देगा. चल आ जा फटाफट" मैं उनकी फैली हुई जांघों के बीच बैठ गया और चाची ने खुद मेरे शिश्न को पकड़कर अपनी चूत के मुख पर रख दिया, अधीर होकर मैंने लंड पेला और एक ही बार में वह उस विशाल गीली तपती गुफ़ा में जड़ तक समा गया. उस गरमा गरम चिपचिपी और मखमली म्यान ने मेरे लंड को पूरा आत्मसात कर लिया. मैं चोदने लगा. फ़ाइनली हमारी रिश्तेदार गोआ वाली स्नेहल चाची को चोद रहा हूं यह भावना एकदम मदहोश करने वाली थी.

कुछ देर मैं बस अपने हाथों पर वजन संभाले लंड पेल रहा था. आंखों के सामने स्नेहल चाची का चेहरा था जिस पर अब वासना की ललाई आ गयी थी. उनके जैसी बड़ी सयानी स्त्री मेरे चोदने से इतनी गरमा गयी थी, यह एहसास किसी शराब की खुमारी से कम नहीं था. मैंने झुक कर उनका चुंबन लिया और अपने धक्के बढ़ा दिये. उनके विशाल स्तन अब अपने ही वजन से फैल से गये थे. मैंने झुक कर एक बेरी मुंह में ली और चूसते चूसते घचाघच धक्के मारने लगा.

"आराम से बेटे, मजा ले लेकर हौले हौले .... ऐसे जल्दबाजी मत करो" चाची ने सावधान किया पर मेरे लिये अब रुकना मुमकिन नहीं था. मेरे धक्के और तीव्र हो गये. मेरी तड़प देख कर चाची ने पलटी मार कर मुझे अपने नीचे दबा लिया और मेरे मुंह में अपना आधा स्तन ठूंस दिया. अब धक्के मारना मेरे लिये संभव नहीं था क्योंकि वे काफ़ी शक्ति के साथ मुझे नीचे दबायी हुई थीं. "रुक ... रुक जा अब" वे बोलीं और मुझे अपने शरीर के नीचे दबाये पड़ी रहीं.

उनके स्वर में एक कठोर आदेश था. किसी तरह मैंने अपनी तड़प पर काबू किया और सांस लेता हुआ उनके मम्मे को चूसता हुआ पड़ा रहा. जब मेरी सांसों की गति थोड़ी धीमी हुई तो वे करवट बदल कर लेट गयीं पर मुझे अपनी बाहों और टांगों में जकड़े रहीं. "अब ठीक है? फ़िर से तो नहीं ऐसा पागल जैसा करेगा?"

मैंने मुंडी हिलाई. "अब आराम से कर, गहरा अंदर तक जा मेरे बदन में, धक्के अंदर तक लगा पर फ़्रीक्वेन्सी कम कर. फ़िर से नहीं बताऊंगी, समझा?"

मैंने "सॉरी चाची" कहा तो वे मुझे अपने ऊपर ले कर फ़िर से चित हो गयीं. "चल, चालू कर अपनी चाची की सेवा" उन्होंने आंखें बंद कर लीं और मैं फ़िर चालू हो गया.

जितना मुझे संभव था, उतना कंट्रोल रख कर मैंने यह रतिसाधना चालू रखी. बीच में फिर एक दो बार रुका. चोदने में इतना स्वर्गिक सुख है, इसका मुझे पहली बार अनुभव हो रहा था. ऊपर से इस संबंध का स्वरूप, यह वर्ज्य संभोग, टाबू रिलेशन और यह अहसास कि मैं एक पचास साल की नारी से संभोग कर रहा हूं, इन सब ने मिलकर इस सुख में बड़ी मीठी तीख पैदा कर दी थी.

कुछ देर बाद चाची ने भी प्रतिसाद देना शुरू किया. उन्हें भी अब अपनी वासना असहनीय हो रही है, इसका यह प्रमाण था. वे धीरे धीरे अपने विशाल चूतड़ उचका उचका कर नीचे से प्रहार करने लगी थीं. वे अब स्खलन के नजदीक आ रही हैं यह जानकर भी मैंने किसी तरह अपने ऊपर नियंत्रण रखा, और जैसा उनको अच्छा लगता था वैसे गहरा चोदता रहा.

अचानक स्नेहल चाची का बदन तन सा गया और उनके मुंह से एक लंबी सिसकारी निकली. वे कुछ बोली नहीं पर मुझे उन्होंने कस के भींच लिया और मेरे होंठ अपने होंठो में दबा लिये. ंउनकी बुर ने मेरे लंड को ऐसे जकड़ लिया जैसे किसी ने मुठ्ठी में भर लिया हो. मैंने अब सब सावधानी ताक पर रख दी और हचक हचक कर चोदने लगा. चाची को चोदने का असली मजा मुझे उन आखरी दो मिनिटों में आया. अब लगा कि मैं सही मायने में उनके उस मुलायम पके बदन का भोग लगा रहा हूं. मेरा स्खलन तीव्र था, एकदम मदहोश करने वाला, पर उस स्खलन के आनंद की किलकारी चाची के मुंह में दब कर रह गयी, जिसने मेरे मुंह को पकड़ रखा था. वह अलौकिक आनंद, पहली रति का सुख अब भी मेरे अंतर्मन पर अंकित है.

कुछ देर हम वैसे ही सुख में डूबे पड़े रहे. मैं चाची को चूमता रहा. इस बार अब मैंने उनके कानों, आंखों, गालों, माथे के चुंबन भी लिये, जैसे इतना सुख देने को उन्हें थैंक यू कह रहा होऊं. चाची ने कुछ देर बाद आंखें खोल कर कहा "बहुत अच्छा किया बेटे" उन शब्दों से मेरे मन में जो तृप्ति महसूस हुई, कह नहीं सकता, किसी नारी को पहली बार मैंने इतना सुख दिया था. मन में ठान ली कि अब स्नेहल चाची को जितना रति सुख दे सकता हूं, अपनी तरफ़ से पूरा दूंगा.

"अब जा और आराम कर. एक नींद और ले ले. जवानी में नींद की ज्यादा जरूरत होती है बच्चों को. तेरी सजा तो रह ही गयी इस चक्कर में ... अब बाद में दूंगी" चाची बोलीं. मैं उठ कर कपड़े पहनने लगा. पहनते पहनते जरा ठिठक कर बोला "चाची ... मैं ..."

चाची ने मेरी ओर देखा. मेरा धैर्य जवाब दे गया. "कुछ नहीं चाची" कहकर मैं वहां से भाग लिया. असल में मुझे पूछना था कि रात को क्या और कैसे करना है. रात को नीलिमा भाभी भी होंगी और वो भी चाची के कमरे में. क्या चुपचाप नीचे वाले कमरे में बुलायेंगी स्नेहल चाची, भाभी के सोने के बाद? पर पूछने की हिम्मत नहीं हुई. चाची कुछ न कुछ करेंगी, अब तक जो करना था, वो उन्हींने किया था. मेरे पूछने से नाराज न हो जायें! अपने कमरे में आकर अपने बिस्तर पर ढेर हो गया. जो सोया वो तीन घंटे बाद उठा. सफ़र की थकान जाती रही थी और संभोग की तृप्ति भी नस नस में समायी थी.


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मैं नीचे आया तो चाची वहीं बैठी टी वी देख रही थीं. साड़ी बदलकर उन्होंने घर में पहनने की सादी साड़ी और ब्लाउज़ पहन लिया था. मुझे चाय बना दी. मेरी ओर देखकर बस जरा मुस्करायीं, कुछ बोली नहीं. मैं भी चुप रहा, पर अब उनसे दूर रहना मेरे लिये मुश्किल होता जा रहा था. उनके भरे पूरे मांसल मुलायम बदन ने मुझे जो सुख दिया था, वह सुख मुझे और चाहिये था, हर वक्त चाहिये था. आखिर जवानी का जोश था मेरा. मन ये हो रहा था कि उनसे चिपक कर सोफ़े पर बैठ जाऊं और जो वे करने दें, याने चूमा चाटी, स्तनमर्दन वगैरह, कम से कम वो तो करूं. मैं ऐसा करता तो शायद वे करने भी देतीं, पर उनके प्रति जहां मेरे मन में तीव्र आकर्षण था वहीं एक तरह का डर भी बना हुआ था कि वे किसी बात पर डांट न दें. अब वैसे डर का कोई कारण नहीं था, कोई वे मुझे छड़ी लेकर पीटने थोड़े वाली थीं. डर यह था कि वे अगर नाराज हो जायें तो उसका असर मुझे भविष्य में मिलने आले उस असीम सुख पर पड़ेगा जो चाची से मुझे मिलने वाला था. और इससे बड़ा डर मेरे लिये क्या हो सकता था! अगर कोई हमें स्वर्ग सुख देता है तो हम जरा घबराने भी लगते हैं कि ऐसा कोई काम अपने हाथ से न हो जाये कि उस सुख में व्यत्यय आ जाये.

चाय खतम होने पर मैंने चाची से कहा कि मैं घूम आता हूं. उनके सामने सिर्फ़ ऐसे ही बैठे रहना मेरे लिये मुश्किल था. और अब फ़ॉर्मल बातें भी करूं तो क्या करूं. भले हमारा संभोग शुरू हो गया था पर इमोशनल लेवल पर तो अभी थोड़ी दूरी थी. चाची ने आज्ञा दे दी तो मैंने चैन की सांस ली और निकल पड़ा.

वापस आया तो सात बज गये थे. नीलिमा भाभी भी आ गयी थी. चाची किचन में कुछ काम कर रही थीं. शायद शाम के खाने की थोड़ी तैयारी कर रही थीं. नीलिमा वहीं बैठे बैठे उनसे बातें कर रही थी. मुझे देख कर आवाज देकर उसने वहीं बुला लिया "क्यों विनय, कैसा लगा हमारा गोआ?"

"एकदम मस्त है भाभी. मुझे लगा था उससे भी ज्यादा अच्छा है" एक नजर चुराकर मैंने चाची की ओर देख लिया. मन में आया कि अगर चाची मुझे धारावी की झोपड़ पट्टी में ले जातीं और पूछतीं कि कैसी जगह है तो मैं अच्छी ही कहता.

"गोआ में देखने जैसा और अच्छा लगने लायक बहुत कुछ है विनय बेटे. यहां कुछ दिन और रहेगा तब पता चलेगा तुझे. मेरा तो विश्वास है कि हमारे गोआ को देखकर अब तू कंपनी से यहीं ट्रान्सफ़र करा लेगा" चाची ने कहा.

"ऐसा हुआ तो कितना अच्छा होगा ना ममी!" नीलिमा खुशी से बोली "हमें भी कंपनी हो जायेगी. तुझे मालूम नहीं है कि यहां इतने बड़े घर में अकेलापन कैसे खाने को दौड़ता है"

कुछ देर और बातें करके मैं बाहर ड्राइंगरूम में बैठ गया. आठ बजे ही खाना तैयार था. चाची खाना लगाते लगाते मेरी ओर देखकर बोलीं "तुम तो रोज नौ साढ़े नौ को खाना खाते थे ना बेटे पूना में?"

"हां चाची. कभी कभी तो दस बज जाते थे"

"तुझे एक दो दिन तकलीफ़ तो होगी पर यहां की आदत डाल ले तो अच्छा है, यहां सब जल्दी खाना खा लेते हैं" स्नेहल चाची बोलीं.

"सो भी जल्दी जाते हैं, आराम की जिंदगी है, सुसेगाडो ... जैसा यहां के लोग कहते हैं" नीलिमा बोली.

खाना खाकर हम सब ड्राइंग रूम में आ गये और टी वी देखने लगे. मैं एक कुरसी में था और चाची और नीलिमा सोफ़े पर बैठे थे. टी वी देखते देखते गप्पें चल रही थीं. मैं तो हमेशा की तरह चुप ही था, बस बीच में एक दो वाक्य बोलता था. अधिकतर गप्पें चाची और नीलिमा के बीच चल रही थीं. उनकी अच्छी पटती थी, यह तो मुझे पहले ही महसूस हो गया था. आज भी गप्पें मारते मारते कुछ कहते वक्त कभी कभी चाची नीलिमा की जांघ पर चपत मारतीं, और दोनों हंसने लगतीं. ऐसा लगता था कि जैसे सास बहू नहीं, दो सहेलियां हैं. मैं सोचने लगा कि क्या ये दोनों हमेशा ऐसी मस्ती में रहती हैं या आज कुछ ज्यादा चढ़ रही है.

आधे घंटे बाद नीलिमा ने एक अंगड़ाई ली तो स्नेहल चाची ने उसकी कमर में हाथ डालकर प्यार से पूछा "थक गयी है लगता है. आज काम था क्या बहुत ऑफ़िस में?"

"हां ममी, बोर हो गयी, काम खतम ही नहीं होता था. वो तो मैं निकल आयी नहीं तो रात को नौ बजे तक भी वहीं बैठी रहती. आप का आराम हुआ कि नहीं दोपहर में? वो फ़न्क्शन कैसा रहा कामत चाची के यहां?""

"अच्छा था पर मैं तीन बजे ही निकल आयी. फ़िर आराम किया. विनय भी लगता है थका होगा. कह रहा था कि दोपहर को नींद नहीं आयी ठीक से, ज्यादा थकने पर ऐसा हो जाता है कभी कभी" मेरी ओर देखते हुए चाची निर्विकार चेहरे से बोलीं.

अब मेरी समझ में नहीं आया कि क्या कहूं. असल में मुझे एकदम फ़्रेश लग रहा था. पर चाची कह रही थीं कि विनय को नींद आ रही है. मुझे लगा शायद जैसे यह मेरे लिये एक हिंट है, फ़िर मैंने सोचा कि चलो, यही ठीक है. मैंने भी हाथ ऊपर करके एक जम्हाई छोड़ी और बोला "हां चाची, ये बस की जरनी ऐसी ही होती है."

अब तक नीलिमा भाभी वहीं सोफ़े पर पसर गयी थी. उसने चाची की गोद में सिर रख दिया और आराम से लेट गयी. चाची लाड़ से उसके घने बालों में उंगलियां चलाते बोलीं. "चल, आज जल्दी सो जा. मैं भी आती हूं. वैसे भी हम दस बजे तक सो ही जाते हैं"

मैं जिस कुरसी में बैठा था, नीलिमा का सिर उसकी ओर था, और इसलिये उसके गाउन के गले में से अंदर का काफ़ी कुछ दिख रहा था. उसने शायद घर आकर ब्रा निकाल दी थी इसलिये उसके छोटे मीडियम साइज़ के पुष्ट स्तन करीब करीब पूरे दिख रहे थे, बस निपल छोड़ कर. उसका भी गाउन घुटने तक चढ़ गया था इसलिये उसके पैर भी दिख रहे थे. अच्छी गोरी एकदम चिकनी पिंडलियां थीं, जरा भी बाल नहीं थे, पर एकदम भरी हुई सॉलिड थीं.

चाची ने मेरी ओर देखा. उन्हें पता चल गया कि मेरी नजर कहां टिकी हुई है पर वे कुछ नहीं बोलीं. मैंने जल्दी से नजर हटाई और टी वी पर जमा दी. दो मिनिट में नीलिमा उठी और हाथ पैर लंबे कर अंगड़ाई ली. फ़िर बोली "मैं जा रही हूं सोने ममी. अच्छा विनय, गुड नाइट" मैंने भी गुड नाइट कहा.

"ठीक है तू चल, मैं भी आयी" चाची उठते हुए बोलीं.

नीलिमा ऊपर चली गयी. चाची साफ़ सफ़ाई करने लगीं, मैंने भी कुछ मदद की. फ़िर उन्होंने लाइट ऑफ़ की और हम दोनों ऊपर आये. अपने बेडरूम के दरवाजे के पास चाची रुक गयीं. मुड़ कर मुझसे बोलीं "अब तू नॉवल वगैरह पढ़ने वाला है विनय या सोने वाला है? मेरी मान तो लाइट ऑफ़ कर और सो जा, आराम कर ले, जरूरी है, कल तेरे को जॉइन भी करना है"

मैंन कहा "चाची, बस कपड़े बदल कर सोने ही वाला हूं" चाची मुस्करा दीं और अपने कमरे में चली गयीं. मैं रूम में आया. कपड़े बदले. असल में मुझे नींद नहीं आ रही थी, काफ़ी एक्साइटेड था. दोपहर चाची ने जो मस्ती की थी मेरे साथ, वही याद आ रही थी, बहुत मन हो रहा था कि चाची के साथ फ़िर वैसा ही मौका मिले. पर अब नीलिमा भी घर में थी, घर में क्या, चाची के कमरे में ही थी.

फ़िर मेरा ध्यान गया चाची के उस वाक्य पर कि लाइट ऑफ़ करके सो जा. क्या उनका मतलब था कि नीलिमा के सो जाने के बाद वे चुपचाप मेरे कमरे में आयेंगीं? इस मादक आशा से दिल बाग बाग हो गया, लंड भी सिर उठाने लगा.

इसलिये मैंने दरवाजा भी सिर्फ़ उढ़का दिया, अंदर से सिटकनी नहीं लगायी. चाची आयें तो उनको सहूलियत हो इसलिये. लाइट ऑफ़ किया और बिस्तर पर लेट गया.

अंधेरे में दोनो कमरों के बीच जो दरवाजा था, उसकी एक दरार में से लाइट आ रही थी. याने अभी वे सोयी नहीं थीं. मैं इंतजार करने लगा. कब वो लाइट ऑफ़ होता है और कब उसके कुछ देर बाद चाची आती हैं. बार बार मेरा ध्यान दरवाजे से दिखती लाइट की ओर जा रहा था.

पंधरा बीस मिनिट हो गये फ़िर भी लाइट वैसा का वैसा. पहले शांति थी पर अब चाची के कमरे से बोलने की धीमी धीमी आवाजें आ रही थी. ठीक से सुनाई नहीं दे रहा था पर ऐसा लग रहा था कि दोनों गप्पें मार रही हैं.मुझे बड़ी कोफ़्त हुई, यहां मुझे नीलिमा भाभी बोल कर गयी कि नींद आ रही है और यहां सास के साथ अब गप्पें करने पर तुली है! कुछ देर बाद मुझे हंसने की आवाज आयी, फ़िर शांत हो गया. अब बीच में चाची या नीलिमा के बोलने की आवाज आती और फ़िर सब शांत हो जाता.

मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि ये कैसी गप्पें हैं जो न तो जोर से चल रही हैं और न खतम होती हैं. बड़ी कोफ़्त भी हो रही थी, लंड चाची के इंतजार में खड़ा था. आखिर मैं उठ कर दरवाजे के पास गया. मुझे नीलिमा की आवाज आयी "आप ऐसे आइये ना ममी ..." फ़िर थोड़ी देर से उसके धीमे धीमे हंसने की आवाज आयी और चाची की आवाज आयी "ये क्या कर रही है नीलिमा ... मैंने क्या कहा था ..." फ़िर वे भी चुप हो गयीं.


RE: Hindi Chudai Kahani मैं और मेरी स्नेहल चाची - sexstories - 06-21-2018

मुझे समझ में नहीं आया कि ये किस तरह की गप्पें हैं. मैंने दरवाजे के सामने का परदा हटाया. बंद दरवाजे में एक दरार थी जिसमें से वो रोशनी दिख रही थी. मैं थोड़ी देर जरा पशोपेश में रहा क्योंकि प्राइवेसी का मामला था और ऐसे किसी के कमरे में देखना मुझे पसंद नहीं. पर फ़िर एक बार नीलिमा ने ’अं .. अं .." ऐसा किया तो मुझे रहा नहीं गया. मैं नीचे बैठ गया और दरवाजे के पास सरककर उस दरार से आंख लगा कर देखने लगा. दरार अच्छी खासी चौड़ी थी, बीच में करीब एक सेंटिमीटर का छेद सा था और उससे आंख सटाने के बाद उस कमरे का करीब करीब कर भाग दिखता था.

देखते ही मैं सुन्न सा हो गया. ऐसी बात नहीं है कि जो देखा वो बिलकुल ही अनपेक्षित था. इन सास बहू के अच्छे प्रेम के संबंध देखकर और चाची के इस कथन से कि ऑफ़िस जाते वक्त नीलिमा उनकी ब्रा के हुक लगा कर गयी थी क्योंकि वे टाइट थे और उनसे नहीं लगते थे, मेरे मन के किसी कोने में एक बड़ा नाजुक पर शैतानी भरा प्रश्न जाग उठा था. फ़िर भी जब सामने प्रत्यक्ष देखा तो जैसे मन में मस्ती का भूचाल सा आ गया. ये ऐसा था जैसे हम लॉटरी लेते हैं तो यह नहीं सोचते कि एक करोड़ मिलने ही वाले हैं. पर मन में एक आशा तो रहती है और जब मिलती है लॉटरी तो बेहद खुशी होती है पर पूरा शॉक नहीं लगता कि यह तो असंभव था, कैसे हो गया!

चाची और नीलिमा दोनों पूरी नग्नावस्था में बिस्तर पर थीं. दोनों पलंग के सिरहाने से टिक कर बैठी थीं और आपस में लिपटी हुई एक दूसरे को बाहों में भरकर चुंबन ले रही थीं. नीलिमा ने एक हाथ चाची के गले में डालकर उनका सिर अपने पास कर लिया था और उनके होंठों पर होंठ रखकर चूम रही थीं. दूसरा हाथ चाची के स्तनों को सहला रहा था, बीच बीच में वह उनको दबाने लगती, फ़िर झुक कर एक निपल थोड़ी देर चूसती और फ़िर सिर ऊपर करके अपनी सास के चुंबन लेने में जुट जाती. नीलिमा के स्तन चाची की तुलना में छोटे थे, पर एकदम प्रमाणबद्ध थे, छोटे आमों की तरह लग रहे थे. निपल भी जरा जरा से थे.

चाची एक हाथ नीलिमा की कमर में डाले हुए थीं और उसे कस के अपने बदन से चिपका रखा था. दूसरा हाथ नीलिमा की जांघों पर फ़िर रहा था. मेरे देखते देखते नीलिमा ने अपनी जांघें फैला कर चाची का हाथ उनमें दबा लिया. चूमा चाटी लगातार चल रही थी, उसमें जरा भी ब्रेक नहीं आ रहा था.

कुछ देर के बाद चाची ने कुछ कहा, मुझे ठीक से सुनाई नहीं दिया, बस इतना सुनाई दिया कि " ... जरा हाथ छोड़ेगी तब तो मैं ... कैसे कर रही है?"

नीलिमा धीमे स्वर में बोली " ... हफ़्ते भर अकेली .... पागल हो गयी मैं ..." फ़िर दोनों हाथों से चाची का सिर पकड़ा और उनके होंठ अपने होंठों में दबा कर ऐसे चूसने लगी जैसे खा जायेगी, याने जिस ओपन माउथ किस कहते हैं वैसा गहरा खा जाने वाला किस! चाची ने उसे किस करने दिया पर अपना हाथ धीरे से बाहर निकाला. आखिर नीलिमा ने अपनी जांघें फैला दीं. अच्छी खासी मोटी जांघें थीं, थुलथुली नहीं कह सकते क्योंकि मांस कसा हुआ था, सॉलिड, एकदम मजबूत टांगें, जैसी एथेलीट लड़कियों की होती हैं. नीलिमा की बुर भी एकदम क्लीन शेव्ड थी. लगता था इस मामले में दोनों सास बहू एक खयाल की थीं.

चाची ने नीलिमा की बुर को अपनी दो उंगलियों से सहलाना शुरू कर दिया. इतनी दूर से भी मुझे नीलिमा की चूत की भग पर चमकते चिपचिपे पानी का गीलापन दिखा. चाची ने धीरे से दो उंगलियों में नीलिमा की बुर के भगोष्ठ कैंची जैसे लेकर रगड़ना शुरू किया. बीच में वे एक उंगली अंदर डाल देतीं और अंदर बाहर करतीं. उनकी खुद की टांगें एकदम एक दूसरे से सटी हुई थीं. मैंने ध्यान देकर देखा तो वे उनको बहुत धीरे धीरे आपस में रगड़ रही थीं.

थोड़ी देर में नीलिमा उनके बाहुपाश से दूर हुई और खुद नीचे सरककर बिस्तर पर लेट गयी. एक करवट पर सो कर उसने अपनी ऊपर की टांग हवा में उठा ली. उसकी बुर अब पूरी खुली थी. अंदर का लाल भाग भी थोड़ा दिख रहा था. स्नेहल चाची ने प्यार से उसकी चिकनी जांघों पर हाथ फेरा और फ़िर नीलिमा की जांघ को तकिया बनाकर लेट गयीं. फ़िर सरककर अपनी बहू की योनि के चुंबन लेने लगीं. नीलिमा कुछ देर वैसे ही पड़ी रही फ़िर उसने चाची की कमर में हाथ डालकर उनका बदन अपनी और खींचा और उनके नरम नरम फ़ूले हुए पेट के चुंबन लेने लगी.

मेरा सिर अब उत्तेजना और वासना से भनभना गया था. लग रहा था कि मुठ्ठ मार लूं पर किसी अन्दरूनी आवाज ने मुझे अब भी सबर करने की सलाह दी. सास बहू के इन मादक कर्मों ने मुझे जो सुखद वासना भरे आश्चर्य का जो धक्का दिया था, उससे मैं अब भी संवरा नहीं था. मैं जरा और आराम से फ़र्ष पर बैठ गया और पजामे की स्लिट से लंड बाहर निकाला. उसको हाथ में लेकर पुचकारते हुए चाची और नीलिमा की रति देखने लगा. मुझे अपने प्रश्न का उत्तर भी मिल गया था कि क्यों नीलिमा को सोने की जल्दी थी और क्यों चाची ने मुझे भी आग्रह किया था कि मैं भी सो जाऊं.

चाची अब नीलिमा की चूत में मुंह डाले हुई थीं. सास द्वारा बहू की बुर के रस का पान कई तरह से हो रहा था, कभी चाट कर, कभी भगोष्ठ मुंह में लेकर आम जैसे चूसकर और कभी जीभ अंदर डाल कर. जब नीलिमा ने चाची को और पास खींचने की कोशिश की तो चाची ने उसे रोक दिया, लगता है ऐसे तरसाने में उनको बड़ा मजा आता था.

नीलिमा बोली "ममी प्लीज़ ..." पर चाची ने एक न सुनी, उलटे अपने पैर मोड़ लिये और नीलिमा के पेट पर अपने घुटने टिका दिये कि वो उनकी बुर तक पहुंच ही न पाये. नीलिमा ने तड़प कर चाची के पांव पकड़ लिये और उनके चुंबन लेने लगी. मैं देखता रह गया. चाची के गोरे गोरे खूबसूरत पैरों पर मेरी निगाह कई बार गई थी. अब नीलिमा जिस तरह से उनको चूम रही थी, देख कर मुझे उससे ईर्ष्या होने लगी. मैं सोचने लगा कि साले, आज दोपहर को मौका था जब चाची कुरसी पर बैठी थीं, उनके चरणस्पर्ष कर लेता, करते वक्त पांव चूम लेता तो क्या वे मना करतीं?

अचानक नीलिमा उठी और चाची को उसने सीधा लिटा दिया. चाची ने चुपचाप अपनी लाड़ली बहू को अपने मन की करने दी. नीलिमा ने चाची को सीधा सुलाकर उनके सिर के नीचे एक तकिया दिया और फ़िर अपने घुटने उनके सिर के दोनों ओर टेक कर उनके चेहरे पर ही बैठ गयी. अपनी बुर से चाची का मुंह बंद करके नीलिमा फ़िर चाची के मुंह को चोदने लगी. अब यह कहना अटपटा लगता है कि कोई किसीका मुंह चोद रहा है और वो भी एक औरत, पर जो चल रहा था, उसके लिये मुझे और कोई शब्द नहीं सूझ रहा था, चाची के सिर को जांघों में जकड़कर नीलिमा ऊपर नीचे होते हुई अपनी चूत उनके होंठों पर रगड़ रही थी.

उसकी बुर को चूसते हुए चाची ने अपना एक हाथ अपनी जांघों के बीच ले लिया था और शायद हस्तमैथुन कर रही थीं, उनकी जांघें आपस में कैंची की तरह धीरे धीरे चल रही थीं. थोड़ी देर से ’ममी ... ओह ममी ...’ कहते हुए नीलिमा लस्त होकर निढाल हो गयी, और वैसे ही पलंग के सिरहाने को पकड़कर चाची के चेहरे पर बैठी रही.

उसको झड़ने का पूरा समय देकर चाची ने उसे बाजू में किया और उठ बैठीं. फ़िर नीलिमा को बाहों में लेकर उसका कान पकड़ा "अब पिटेगी मुझसे! हमेशा कहती हूं ना कि कि ऐसी जल्दबाजी नहीं करना, आराम से, धीरे धीरे इस सुख का मजा लूटना है. हमेशा तो तू इतना अच्छा करती है, आज दस मिनिट में ही ढेर हो गयी, हो क्या गया तुझे? उस विनय की वजह से तो नहीं?"

नीलिमा ने कराहकर "उई मां ऽ ऽ .. कितनी जोर से कान खींचा ममी ...ऽ " कहकर अपना कान छुड़वाया और थोड़ा चिढ़ कर बोली "अब आप ने तो रात को बस में भी उस छोकरे के साथ मजा ले लिया, फ़िर आज दोपहर को भी उसपर हाथ साफ़ कर लिया, हाथ क्या, अपना काफ़ी कुछ साफ़ कर लिया और अगर मैंने जरा मस्ती की तो डांटने लगीं?"

वे दोनों अब भी धीमी आवाज में बोल रही थीं पर मुझे अब साफ़ सुनाई दे रहा था. शायद मेरे कान अब ट्यून हो गये थे.

"तो क्या हुआ? क्या मेरा अधिकार नहीं है विनय पर? उसकी मां मेरी छोटी बहन जैसी है, मुझे इतना मानती है. और ये बता ... विनय को यहां लाया कौन? वैसे ही छोड़ देती तो वो या तो दूसरी नौकरी पकड़ लेता या यहां गेस्ट हाउस में चला जाता. वो तो अच्छा हुआ कि उस दिन ..." फ़िर उन्होंने नीलिमा के कान में कुछ कहना शुरू किया. दो मिनिट तक न जाने क्या बताती रहीं, नीलिमा बस मुंह पर हाथ रखकर हंसती रही. चाची ने फ़िर मेरे कमरे की ओर देखा और नीलिमा से कुछ बोलीं. नीलिमा ने भी देखा और अपनी मुंडी हिला दी. फ़िर बोली "लगता है बेचारा सो गया है. चाची, पर वो रुमाल कहां है?"


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"कौनसा रुमाल?"

"जिसमें आपने उस बेचारे कमसिन लड़के का रस निकाला था. धो डाला क्या? आपका भी जवाब नहीं ममी, मुझे तो उस बेचारे पर दया आ रही है. एक बार आपने उसे चंगुल में लेने की ठान ली, उसके बाद उसकी क्या बिसात कि आप से छूट पाये? शेरनी के पंजे से हिरन का बच्चा बचता है क्या कभी?" नीलिमा बोली और फ़िर हंसने लगी.

"चल कुछ भी बोलती है. बहुत अच्छा बच्चा है विनय. बहुत स्वीट है. अभी जरा भोला भाला सा है, जवानी तो चढ़ी है पर अब तक उसका क्या करना है यह नहीं सोचा बेचारे ने. और रही उसे फंसाने की बात, अब पहल तो उसीने की थी ना! ऐसा मेरी ओर देखता था जैसे आंखों से ही खा जाना चाहता हो. अब अगर मेमना ही इस शेरनी से शिकार करवाना चाहता था तो मैं क्या करती?"

"सब पता है ममी कि आप क्या चीज हो. आप के आगे कोई टिका है आज तक!!! कोई एक्स्प्लेनेशन देने की जरूरत नहीं है. पर वो रुमाल का तो बताइये, धो डाला क्या?"

"अब तुझे क्या करना है उससे?"

"पुरुष सेंट है वो ममी, वो भी एक इतने जवान छोकरे का, अच्छी लगती है उसकी खुशबू, बहुत दिन हो गये मैं तरस गयी"

"अरे नीचे पर्स रखी है, ऊपर लाना भूल गयी, उसी में है, मैं ले आती हूं"

"ऐसी ही जायेंगी नीचे?" नीलिमा ने पूछा.

"तो क्या हुआ? पहली बार कर रही हूं क्या? तू भी तो नंगी घूमती है इतनी बार. घर में और है ही कौन? चल ले आती हूं"

"थोड़ी देर से ले आना ममी, अभी बस मेरे पास रहो" नीलिमा चाची की छातियों में मुंह छुपा कर बोली. चाची ने खुद ही अपना एक स्तनाग्र उसके मुंह में दे दिया. "एकदम बच्ची बन जाती है तू कभी कभी"

"बच्ची ही तो हूं आप की, अब बच्चों जैसा करने दो" नीलिमा ने कहा और फ़िर चाची का निपल चूसने में मग्न हो गयी.

थोड़ी देर के बाद चाची बोलीं "वैसे स्वाद चखना हो तो है मेरे पास"

"कौनसा स्वाद ममीजी? इतने सारे स्वाद हैं आपने अंगों में, हर अंग का टेस्ट अलग अलग है और मुझे सब अच्छे लगते हैं"

"अरी विनय की जवानी के टेस्ट के बारे में कह रही हूं. अभी होगा यहां देख, भले सूख गया होगा पर फ़िर भी स्वाद तो होगा. मैंने नहाया नहीं उसके बाद" अपनी जांघें खोल कर नीलिमा को दिखाती हुई चाची बोलीं."

"और मैं तब से ट्राइ कर रही थी तो आप ने मुंह ही नहीं लगाने दिया" नीलिमा ने शिकायत की.

"अरी मजा आता है तेरे को थोड़ा तंग करने में"

नीलिमा ने चाची को बिस्तर पर लिटाया और उनकी टांगों में घुसने की कोशिश करने लगी. चाची ने उसे दूर किया और उठ कर बैठ गयीं "आज आप मुझे रुला कर छोड़ेंगी ना सासूमां?" नीलिमा ने उनकी ओर देखकर शिकायत की.

"अरे नहीं पगली, वहां चेयर पर बैठती हूं, बहुत देर हो गयी लेटे लेटे. फ़िर आराम से चखना तेरे को जो चाहे" स्नेहल चाची उठ कर कुरसी में बैठ गयीं. नीलिमा को सामने नीचे बैठाकर टांगें फैलाकर उन्होंने नीलिमा का सिर उनके बीच दबा लिया. मेरी पहचान का आसन था. ये जो चल रहा था वो देखना याने मेरे ऊपर घोर अत्याचार था. पर क्या करता, देखता रहा. नीलिमा मन लगाकर स्वाद चख रही थी. चाची ने उसका सिर पकड़कर और अपनी बुर पर दबाया और कहा "अरे बेटी, जरा जीभ अंदर तक डाल, तब तो आयेगा टेस्ट"

"थोड़ा अलग स्वाद तो है पर ठीक से ले नहीं पा रही" उसने सिर उठाकर चाची से कहा.

"अरे सात आठ घंटे हो गये अब. और मेरे रस में एकदम मिल भी गया होगा. अगली बार तेरे को एकदम फ़्रेश टेस्ट दूंगी." चाची ने अपनी टांगें आपस में जोड़ कर नीलिमा के सिर को उनकी गिरफ़्त में ले लिया और फ़िर आगे पीछे होकर धीमे धीमे धक्के मारने लगीं. फ़िर एक जोर की सांस ली और टांगें कस के नीलिमा भाभी के सिर को भींच कर स्थिर हो गयीं. दो मिनिट बाद एक लंबी सांस ली और नीलिमा को छोड़ा. "बहुत प्यार से चूसती है तू बेटी, बहुत सुख देती है. अब तू जरा बैठ, मैं नीचे जाकर वो रुमाल लेकर आती हूं"

मैं बैठा बैठा जरा चिंतित हो गया था. चाची ने नीलिमा को सब बता दिया था. अब कल कैसे उसके सामने जाऊंगा और उससे क्या बातें करूंगा, यही समझ में नहीं आ रहा था. शरम सी आ रही थी, पर उन सास बहू के वे कारनामे देखकर लंड की तो हालत बहुत खस्ता हो गयी थी. किसी तरह टाइम पास करना ही था क्योंकि अब यह लाइव लेस्बियन रति देखना बंद करना मेरे बस की बात नहीं थी.

चाची के बाहर जाने के बाद नीलिमा उठी और टेबल के पास जाकर वहां रखी बॉटल से पानी पीने लगी. मेरी ओर उसकी पीठ थी. क्या नितंब थे, एकदम गोल भरे तरबूज. उसकी कमर और कमर के ऊपर के शरीर की तुलना में वे महाकाय थे. असल में शायद बहुत लोग नीलिमा के फ़िगर को बेडौल या बॉटम हेवी ही कहते पर मेरे लिये तो वो साक्षात मेनका थी. इस तरबूजों पर सिर रखकर सोने में क्या मजा आयेगा! और उनके बीच अगर लंड गाड़ने का मौका मिले तो!!!

मैं यह सब सोचते सोचते लंड को पुचकारते पुचकारते अपनी रंगीन खयालों की दुनिया में खोया हुआ था कि अचानक कमरे का दरवाजा खुला और लाइट ऑन हो गयी. चाची वहां खड़ी थीं और मेरी ओर देख रही थीं. मुझे थोड़ा शॉक ही लगा. मैंने नहीं सोचा था कि ऐसा कुछ होगा. वे दोनों तो यही मान कर चल रही थीं ना कि मैं सोया हुआ हूं! मैं लंड हाथ में लिये भोंचक्का होकर बस उनकी ओर देखता रहा.

"चल कपड़े निकाल" चाची ने पास आकर आदेश दिया. वे वैसी ही पूर्ण नग्नावस्था में मेरे सामने खड़ी थीं. हाथ में वही रुमाल था. उसको सूंघ कर वे मेरी ओर देखकर मुस्करायीं "नीलिमा को भी सुगंध अच्छी लगेगी, इसीलिये मैंने अब तक धोया नहीं. जवान वीर्य की खुशबू अलग ही होती है. चल जल्दी कर"

मैंने चुपचाप कपड़े निकाले, और कर भी क्या सकता था! चाची ने मेरे लंड को पकड़ा और लंड से ही मुझे खींचती हुई अपने बेडरूम में ले गयीं.


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"ले नीलिमा ... तेरे लिये रुमाल ले आयी और रुमाल में रस निकालने वाले को भी ले आयी"

"सरप्राइज़ !!! ... आओ विनय ... वेलकम ... कितने प्यारे लग रहे हो, ये क्या ममी, आप तो इसे ऐसे खींच कर लाई हैं जैसे जैसे सईस लगाम पकड़कर घोड़े को ले जाता है." नीलिमा ने कहा और हंसने लगी. फ़िर मेरे पास आयी और मुझे पास लेकर मेरा प्यार भरा चुंबन ले लिया "अरे मजाक कर रही थी, भाभी हूं, मजाक तो कर सकती हूं, बुरा मत मान" उसके जवान भरे भरे स्तन मेरी छाती पर गड़ रहे थे.

"मैं क्यों बुरा मानूंगा भाभी. आप जैसी अप्सरायें कुछ भी करें तो भी कौन ऐसा मूर्ख होगा कि माइंड करे" मैंने कहा. मेरा मन अब अपार सुख के सागर में गोते लगा रहा था. विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैं इस स्वर्ग में हूं.

"सच में घोड़ा है यह" चाची ने बड़े गर्व से कहा "मस्त स्टेमिना है इसका. पहली बार है पर इतना कंट्रोल करता है बेचारा कि हद नहीं. और विनय, तुझे क्या लगा कि रात को मैं तेरे को ऐसे ही अकेला तड़पने को छोड़ दूंगी?"

नीलिमा ने मुझे बिस्तर पर धकेल दिया और मेरा लंड हाथ में लेकर खेलने लगी "अरे ममी ने तो मुझे आते ही बता दिया था सब. आज ऑफ़िस का काम भी मेरा तीन बजे तक हो गया था पर फ़िर एक सहेली के यहां चली गयी मैं कि ममी को तेरे साथ अकेले में टाइम मिले. मैं तो कह रही थी कि रहने दो ममी, क्यों नाटक करके बेचारे को टेन्शन देती हो, सीधे एक साथ विनय को गोआ में वेल्कम करेंगे. पर ममी बोलीं कि मुझे देखना है उसका स्वभाव कैसा है, ओवरस्मार्ट लड़कों जैसा अपनी अपनी चलाता है या शांत और थोड़ा नरम स्वभाव का है जिससे हमारी पट सके. फ़िर ममी ने अभी शाम को बताया कि आज दोपहर को क्या हुआ."

मैंने चाची की ओर देखा तो वे मुस्करायीं. नीलिमा आगे बोली "अरे विनय राजा, तेरी चाची और मुझमें कुछ छुपा नहीं है, हम अपने दिल की बात खुल कर एक दूसरे को कहते हैं. फ़िर अभी सोचा कि थोड़ा तेरे से मजाक किया जाये. तू कहां सोने वाला था, ममी ने बताया भी मुझे कि दरवाजे के पास बैठा होगा." नीलिमा मेरे लंड को अब ऐसे पकड़े थी जैसे छोड़ना ही न चाहती हो.

"और यह सच में बैठा था दरवाजे के पास लंबी लंबी सांसें भरते" चाची बोलीं. फ़िर मुझे बिस्तर पर धकेलते हुए बोलीं "चल, अब टाइम वेस्ट मत कर. सीधा लेट जा"

मैं चुपचाप लेट गया पर मेरा झंडा ऊंचा था. "अब ऐसा ही पड़ा रह, हमें जो करना है वो करने दे. और हम जो कहें वो करना. ठीक है?" मैंने मुंडी से हां कहा.

नीलिमा अब तक मेरे लंड को चूमने में व्यस्त हो गयी थी. "ममी ... एकदम मस्त है ...आपकी भी पसंद की दाद देनी पड़ेगी ... एकदम फ़ीस्ट है फ़ीस्ट"

"मैंने कहा था ना तुझसे कि सब्र करना सीख, उसका फल हमेशा मीठा होता है. अब ये क्या कर रही है? इतने दिन बाद मिला है तो जरा ठीक से सलीके से उसका उपयोग कर" चाची ने नीलिमा का मुंह मेरे लंड से हटाते हुए बोलीं. नीलिमा अब भूखे की तरह मेरा लंड निगलने में लगी हुई थी.

"चूसने दीजिये ना ममी, इतने दिन हो गये मेरे को" नीलिमा ने मिन्नत की.

"अरे विनय कहीं भागा जा रहा है? बाद में कर लेना, चल उठ, जरा ठीक से मजा ले"

"फ़िर मैं ही करूंगी पहले ममीजी, आप ने तो दोपहर में खूब मस्ती कर ली होगी" नीलिमा को और सबर करना मुश्किल हो रहा था.

"कर लेना बेटी पर पहले विनय की तो सोच, वो ऐसा ही भूखा प्यासा बैठा है, उसको तो कुछ मीठा चखा पहले"

नीलिमा मेरी ओर मुड़ कर शैतानी से बोली "सॉरी विनय, मुझे याद ही नहीं रहा. तेरे लिये काफ़ी कुछ है मेरे पास चखाने को" फ़िर उसने अपनी उंगलियों से अपनी चूत खोल कर मुझे दिखाई "यहीं चखेगा कि बैठूं कुरसी में - ममी के फ़ेवरेट पोज़ में?" उसकी गुलाबी बुर पास से एकदम गीली चिपचिपी दिख रही थी.

"अब उसे क्यों उठाती है, अभी तो लिटाया है उसे. तू ही चखा दे ना तेरे फ़ेवरेट पोज़ में" स्नेहल चाची ने उलटा ताना मारा.

नीलिमा झट से आकर मेरे सिर के दोनों ओर घुटने टेक कर बैठ गयी. उसकी चूत का खुला मुंह भी एकदम रसीला लग रहा था. मैंने जीभ लगायी और नीलिमा नीचे बैठ कर मेरे होंठों पर अपनी बुर रगड़ने लगी. वह बहुत उत्तेजित थी, उत्तेजना से उसकी बुर के भगोष्ठ थरथरा से रहे थे और वह निचला मुंह बार बार खुल और बंद हो रहा था. आंखें बंद कर लो तो ऐसा ही लग रहा था कि कोई मुंह खोल कर होंठों के चुंबन ले रहा है, मैं उस चासनी को चखने में जुट गया.

चाची हमारे पास बैठकर आराम से अपने बहू के करतब देख रही थीं. नीलिमा के पास सरककर उन्होंने नीलिमा की चूंचियां हथेली में ले लीं और उन्हें दबाने और मसलने लगीं. उनकी उंगलियां बीच बीच में नीलिमा के निपलों को पकड़कर पिन्च करने लगतीं. यह तो अच्छा हुआ कि मेरे लंड को उन्होंने नहीं पकड़ा नहीं तो उसका बचना मुश्किल था.

जल्दी ही नीलिमा ने अपना एक दो चम्मच शहद मुझे पिला ही दिया. पर वह अब भी मस्ती में थी, उसका सारा ध्यान मेरे लंड पर लगा हुआ था. "ये तो और तन गया है ममी"

"तू ही देख ले, ऐसे दूर से देख कर आह भरती रहेगी तो गाड़ी छूट जायेगी तेरी" चाची ने उसकी प्यार भरी चुटकी ली. नीलिमा उठ कर मेरे शरीर के दोनों ओर पैर रखकर बैठ गयी और मेरा लंड धीरे धीरे पर बिना रुके एक बार में अपनी चूत में घुसेड़ लिया. फ़िर आनंद की सिसकारी छोड़ कर बोली "एकदम कड़ा है ममीजी, गन्ने जैसा, कैसा उछल रहा है मेरे अंदर"

"ठीक से कर, ज्यादा उछल कूद मत कर, आराम से मजा ले, विनय बहुत दिन रहने वाला है यहां" नीलिमा ऊपर नीचे होकर मेरे लंड से चुदवाने लगी. उसकी गीली तपती बुर में से ’सप’ ’सप’ ’सप’ की आवाजें आ रही थीं. "ओह मां ऽ ऽ ... कितने दिनों बाद चुदवा रही हूं आज ... लंड से चुदवाना क्या होता है मैं तो भूल ही चली थी"

चाची नीलिमा के पास बैठी बैठी उसकी पीठ पर हाथ फेर रही थीं. उनकी जांघें मेरे चेहरे के पास थीं. मैंने अपना सिर मोड़ कर उनकी मोटी जांघ पर होंठ रख दिये. उधर नीलिमा की सांसें अब तेज हो चली थीं. जिस तरह से उसकी आंखें पथरा सी गयी थीं, वह अपने चरम बिन्दु के करीब पहुंच गयी थी. चाची ने उसकी बुर अपनी हथेली में ली और नीलिमा के बदन के साथ ही उनका हाथ ऊपर नीचे होने लगा. मैंने ध्यान से देखा तो उनकी उंगली नीलिमा के क्लिट पर चल रही थी. नीलिमा ’ओह ऽ .. ममी ... ममी ... उई मां ऽ .." करने लगी तो चाची ने झट उसे बाहों में लेकर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिये. नीलिमा दो मिनिट में अपने बंद मुंह से ’अं .. अं ... अं’ करती स्खलित हो गयी.

चाची थोड़ा सरकीं तो अब उनका पांव मेरे चेहरे के सामने आ गया. पास से पहली बार देख रहा था. दूर से वे पैर जितने क्यूट लगते थे, पास से और भी ज्यादा थे. एकदम साफ़ सुथरे गुलाबी तलवे, गोरी नाजुक उंगलियां और उनपर पर्ल कलर का नेल पेंट, मांसल चिकनी ऐड़ी .... मैंने धीरे से अपने मन की कर ही ली, उनके पांव का चुम्मा ले लिया. मुझे लगा कि चाची शायद बिचक जायें पर उन्होंने ऐसा दर्शाया कि कुछ हुआ ही नहीं. धीरे से अपना पांव सरकाकर मेरे चेहरे पर टिका दिया कि मैं एक दो चुम्मे और ले सकूं.

नीलिमा उठ बैठी. उसकी सांस चल रही थी, चेहरे पर एकदम तृप्ति के भाव थे. चाची बोलीं "बस हो गया? मुझे तो लगा था कि आज रात भर तू इसे नहीं छोड़ेगी.

"इतनी सेल्फ़िश नहीं हूं ममीजी, अब आप करो"

"मैं भी करूंगी, तेरा हो जाने के बाद. और कर ले नहीं तो कहेगी कि ममी ने जल्दबाजी मचा दी. ऐसा कर तू अब कि ठीक से नीचे लेट और विनय को मेहनत करने दे, बहुत देर से बस आराम कर रहा है. क्यों विनय, अभी दम है और? या तेरा ये सोंटा ..." लंड को पकड़कर बोलीं "हार मानने को आ गया है?"

"चाची .... मैं ....

"अरे बोल बेटे, अब भी घबरा रहा है क्या मुझसे?" चाची बड़े स्नेह से बोलीं.

"चाची, मुझे नहीं लगता कि मैं अब पांच मिनिट से ज्यादा टिकूंगा. मुझको तो ऐसा लग रहा है कि स्वर्ग पहुंच गया हूं और खुद रंभा और उर्वशी मुझसे सेवा करवा रही हैं. पर इतना विश्वास है कि अभी झड़ भी गया तो भी बस थोड़ी देर में आप दोनों की सेवा करने के काबिल हो जाऊंगा, अब क्या बताऊं आप को, पिहले हफ़्ते में तो आप को चोरी छुपे देखकर और आपके बारे में सोच कर मैंने दिन में चार चार बार ... याने ..." फ़िर मैं चुप हो गया. मुझे खुद सुखद आश्चर्य हुआ, इतना बड़ा वाक्य मैं उनसे पहली बार बोला था.

नीलिमा ने ताली बजाई "वाह ... क्या स्पीच दी है! कहां से ढूंढ कर ले आयीं आप इस हीरे को ममी, ये तो सच में ’काम’ का लड़का है"

"अरे वैसे ये मेरी नजर में तीन चार साल से था. उसके पहले तो बहुत छोटा था, पर था बड़ा क्यूट. फ़िर तीन साल पहले ये जिस तरह से मेरी ओर देख रहा था .... याद है विनय वो शादी वाले दिन जब मैं साड़ी बदल रही थी?"

"हां चाची ... " मैं शर्मा कर बोला.

"हां तुझे तो याद होगा ही ...बदमाश कहीं का! तो तब से मुझे लगा कि यह जरा छुपे रुस्तम जैसा है. अब इस बार जब इसने मेरी छाती की ओर देखा, याने जब मैं चश्मा उठा रही थी ... इसकी आंखों के भाव देखने लायक थे"

"चाची ... याने आपने तभी पहचान लिया कि मेरे मन में क्या चल रहा है" मैंने आश्चर्य से पूछा.

"तो क्या मैं इतनी मूर्ख लगी तुझे? पर नीलिमा बेटी, तभी मैंने इसकी नस पहचान ली, और फ़िर इसे जरा धीरे धीरे और दिखाना शुरू किया, वैसे इसकी नजर हमेशा मेरी छाती पर ज्यादा रहती थी"

"आप की छाती ... या छतियां कहूं ममीजी ... ग्रेट ही हैं, कोई भी इनकी ओर देखेगा" नीलिमा मुंह पर हाथ रखकर हंसने लगी.

"चलो गप्पें बहुत हो गयीं, तो विनय, तू कहता है ना कि तेरा इतना दम है, चल देखते हैं" चाची ने मुझे हाथ पकड़कर उठाते हुए कहा.

उस रात यह रति दो घंटे और चली. अब डीटेल में क्या बताऊं, इतना सब हो रहा था पर संक्षिप्त में यह कह सकता हूं कि दोनों ने मिलकर मेरा लंड चूसा और बड़े स्वाद के साथ मेरी मलाई का भोग लगाया. उसके अलावा दोनों को मैंने एक एक बार चोदा, और बड़े गर्व से कह सकता हूं कि बड़े जोश से चोदा. आखिर जब मैं अपने कमरे में वापस आने को उठा तो चाची बोलीं "नींद आयेगी ना तेरे को? या गोली दूं? आखिर कल तुझे जॉइन करना है" मैंने कहा कि जरूरत नहीं है. मेरी नस नस इतनी झनझना गयी थी कि बिस्तर पर लेटते ही नींद आ गयी. गोटियां भी दुख रही थीं पर इसकी मुझे आदत थी, आखिर बार बार मुठ्ठ मारकर भी वे दुखती ही हैं.


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